





शरीर को अन्नमय कोष इसलिये कहते हैं, क्योंकि वह अन्न से निर्मित होता है और इसलिये बहुत कुछ निर्भर करता है कि आप किस प्रकार का भोजन ग्रहण करते है। आपका आहार सिर्फ जीवनचलाऊ नहीं है, वह आपके व्यक्तित्व की पहली पर्त निर्मित करता है और उस पर्त के ऊपर बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप भीतर यात्रा कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सभी भोजन एक प्रकार जैसे नहीं हैं।
यह जो हमारी पहली पर्त है, यह भोजन की ही पर्त है। इसलिये भोजन का विवेक महत्वपूर्ण है। एक विशुद्ध शाकाहारी शरीर को एक तरह की लोच देता है, जो मांसाहारी के शरीर को उपलब्ध नहीं होती। तो आप क्या भोजन दे रहे हैं, वह इन सात करोड़ कोषों को निर्मित कर रहा है, इनकी मांग निर्मित कर रहा है और शरीर के लिये सबसे श्रेष्ठ व महत्वपूर्ण भोजन ‘सात्विक भोजन’ है। सात्विक भोजन हम उसे कहते हैं, जिससे लत पैदा न हो- ऐसा भोजन, जो सिर्फ शरीर को ऊर्जा देता हो। ऐसा भोजन जो शरीर की मांग-पूर्ति करता हो, लेकिन शरीर में पागलपान पैदा न करता हो।
शरीर की दूसरी पर्त को ऋषियों ने ‘प्राणमय कोष’ कहा है। जैसे ही शरीर पारदर्शी होगा, वैसी ही इस शरीर के पीछे छिपे प्राण-शरीर का पता चलता है। यह जो प्राणमय शरीर है, यह ऊर्जा से निर्मित है, शक्ति से निर्मित है। यह शक्ति मिलती है सूर्य से, वायु से, यह शक्ति मिलती है अनंत-अनंत सूक्ष्म तरंगों से। यह जो ऊर्जा शरीर है, यह हमारे भीतर की पर्त है, इसकी आहार तरंगे हैं- जैसे गीत जब प्राण पर पहुँच जाता है तो नृत्य बन जाता है। कोई वाणी का स्वर सुनकर, किसी सागर की लहर के साथ, किसी के प्रेम-क्षण में, आकाश में चांद देखकर, कभी उगते सूरज को देखकर, कभी हवा के एक झोंके में, कभी किसी को फूल बनते देखकर, भीतर एक कंपन दौड़ जाता है, वह तरंग आपकी प्राण-ऊर्जा का हिस्सा है। हम किसी के दर्शन करने जाते हैं, तो दर्शन का केवल इतना मतलब है कि हम उस जगह के पास जा रहें है, जहाँ एक बहुत जीवंत प्राण शरीर है, जिसके चारों तरफ एक वायुमंडल है प्राण शरीर का, वहाँ बैठ जाना दो क्षण भी आपके प्राण-शरीर को गति देता है, तो आपके प्राण-शरीर में तत्काल तरंगें पैदा हो जाती हैं।
प्राणायाम के सारे प्रयोग इस प्राण-शरीर को पारदर्शी बनाने के प्रयोग हैं। शरीर में जितनी ज्यादा मात्रा में प्राणवायु जाती है, ऑक्सीजन जाती है, उतना यह प्राण-शरीर स्वच्छ और शुद्ध होता है। यह जो प्राण-शरीर है, यह चूंकि ऊर्जा शरीर है, इसलिये प्राणवायु से प्रभावित होता है। इसलिये जितनी गहरी श्वास ली जा सके उतनी हितकर है। जितनी गहरी श्वास होगी उतने आप प्राणवान होंगे और उतनी आपकी मेधा प्रखर होगी। ऊर्जा शरीर- प्राणमय कोष को जो शुद्ध कर ले वही तीसरे शरीर के प्रति जाग्रत हो पाता है और इस तीसरे शरीर को मनोमय कोष कहा गया है, जो निर्मित होता है विचार की तरंगों से। विचार भी भीतर प्रवेश करके एक देह का निर्माण करते हैं। बुद्ध ने कहा है-‘‘तुम जैसा सोचोगे वैसे ही हो जाओगे, या तुम जैसे हो गये हो, वह तुम्हारे सोचने का ही परिणाम है।’’
जितना सुसंस्कृत और सुशिक्षित व्यक्ति होता है, उतनी बड़ी मनोमय देह होती है। यह मनोमय कोष बहुत सूक्ष्म संग्रह करती चली जाती है। यह जन्मों-जन्मों तक जो भी इसने विचार की तरंग की तरह पाया है, इकट्ठा कर लिया है। विचार भी वस्तुगत हैं, अत्यंत सूक्ष्म है। पर हम उसका भी भोजन कर रहे हैं और प्रतिपल हम अपने भीतर विचार को ले जा रहे हैं। वह विचार हमारे भीतर एक काया को निर्मित कर रहा है, एक शरीर निर्मित हो रहा है। इसीलिये कैसा विचार आप अपने भीतर ले जा रहे हैं वैसी आप की मनोकाया होगी।
अगर एक व्यक्ति पूरे समय राम-राम भीतर जपता हुआ गुजरे, तो दूसरे शब्द उसके भीतर प्रवेश नहीं कर पायेंगे, क्योंकि शब्द प्रवेश के लिये अंतराल चाहिये, खाली जगह चाहिये। एक आदमी चौबीस घंटे अगर भीतर राम-राम करता रहे, चाहे वह खाना खाता हो, दुकान जाता हो, किसी की बात भी करता हो, तो उसने एक सुरक्षित दीवार खड़ी कर ली, जिसके भीतर कुछ नहीं डाल सकते। अब इस राम के दीवार को पार करना असंभव है। वह आदमी अपनी मनोकाया को एक विशेष रूप और आकृति देने की कोशिश में लगा है।
यदि उस राम के दीवार में कुछ प्रवेश करेगा तो वह प्रवेश वही चीज कर पायेगी जो राम की धारणा से तालमेल खा सके, अन्यथा नहीं कर पायेगी। यह जो पर्त है, यह अब अपने अनुकूल जो है उसे गति दे देगी और प्रतिकूल जो है उसे रोक देगी और यह व्यक्ति अपने भीतर की मनोकाया का एक अर्थों में मालिक होना शुरू हो जायेगा। अगर मन की काया को शुद्ध करना है, तो उसका एक ही उपाय है- वह है, विचारों में एक तरह का सामंजस्य चाहिये, एक संगीतबद्धता चाहिये, एकस्वरता चाहिये। तो मन की काया शुद्ध होती है और आदमी भीतर प्रवेश करता है।
चौथा शरीर है विज्ञानमय कोष। यह शरीर निर्मित है चेतना से, होश से, बोध से, वह बोध शरीर है। जब चौथा शरीर अनुभव में आता है, तो विचार भी केवल उपयोगी रह जाते हैं- जब जरूरत होती है, तब आप विचार करते हैं। ध्यान चौथे शरीर को जगाने का उपाय है- क्योंकि ध्यान चेतना को बढ़ाता है, ध्यान विज्ञान को बढ़ाता है, ध्यान बोध को जगाता है। तो ध्यान चौथे शरीर को बढ़ाने की व्यवस्था है। इस विज्ञानमय शरीर का भोजन ध्यान है। ध्यान भी ऊर्जा है, ध्यान भी शक्ति है, और ध्यान वैसा ही शक्ति है जैसी कोई भी शक्ति—अति सूक्ष्म। इन चारों कोषों के पार पांचवी देह है, उसे ऋषियों ने कहा है, ‘आनंदमय कोष’। शुद्धतम ऊर्जा है ध्यान। अगर आप शुद्धतम विज्ञान ऊर्जा में खड़े हैं, तो आपको पता ही नहीं चलेगा कि चौथा शरीर भी है, क्योंकि जैसे ही कोई विज्ञान काया में खड़ा होता है, उसे विज्ञान काया का पता नहीं चलता, उसे आनंद काया का पता चलता है।
पांचवे शरीर की एक खूबी है कि वह शुद्धतम ही है। वह अशुद्ध हो ही नहीं सकता। इसलिये आनंद के विपरित हमारे पास कोई भी शब्द नहीं है। आनंद के विपरित कोई ऊर्जा नहीं है। इसलिये पांचवां जो शरीर है वह शुद्ध ही है और इसलिये पांचवें शरीर के साथ कुछ भी करने की जरूरत नहीं। आनंद जो है, अद्वैत, अकेला है और आनंद की खोज इसलिये है कि वह हमारी परम देह है। अगर आनंदमय शरीर को होश आ जाये तो आनंद भी अतिक्रमण हो जाता है और तब व्यक्ति उसे पा लेता है जो वह है। वह फिर देह नहीं है, वह आत्मा है।
‘इन चार कोषों के साथ आत्मा बरगद के बीज में वृक्ष की तरह अपने कारणस्वरूप अज्ञान में रहती है और उस कारणस्वरूप अज्ञान को आनंदमय कोष कहते हैं। जैसे कि बरगद का वृक्ष बीज में छिपा हो और जब तक बीज न टूटे तब तक बरगद का वृक्ष पैदा न हो, ऐसे ही आत्मा के पास जो सबसे पहली पर्त है, सबसे गहरी और आत्मा के सबसे निकट वह पर्त है आनंदमय कोष। वह जो आनंदमय कोष है, वह आत्मा की खोल है। पांचवे शरीर तक पहुँचने में मनुष्य का प्रयास जरूरी है, पांचवें के पार होने में प्रयास की कोई जरूरत नहीं और इसलिये जिसने पाँच के प्रयास करते क्षण भी स्मरण रखा की सद्गुरू की अनुकंपा और उसकी दया और उसकी कृपा और उसकी करूणा ही खींच लेगी, वह जब पाँचवे पर पहुँचेगा तब यह बात काम करेगी।
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