





भक्ति कालीन युग में जन्में हिंदी साहित्य के एक अनमोल कवि, जिनके जन्म को लेकर कई किंवदंतियां प्रचलित हैं और माना जाता है की इनका जन्म 13वीं से 14वीं सदी के बीच हुआ था। इनकी माता एक ब्राह्मण विधवा थी। जिन्होंने इन्हें ऋषि मुनियों के आशीर्वाद से प्राप्त किया था। परन्तु विधवा होने के कारण लोक लाज के डर से इन्हें जन्म के पश्चात एक तालाब के किनारे इन्हें छोड़ आई, जिसे लहरतारा नाम से जाना जाता है और यह आज भी काशी नगरी में मौजूद है। वहाँ से एक मुस्लिम दंपति जिनका नाम नीमा और नीरू ने उन्हें उठाया और अपने पुत्र की तरह इनका पालन पोषण किया। नीमा और नीरू पेशे से जुलाहे थे, परन्तु अपने पुत्र की तरह इन्हें पाला और इनका नाम कबीर रखा, जिसका अर्थ श्रेष्ठ होता है।
कबीर ने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली। उन्हें बुनकर के रूप में प्रशिक्षित भी नहीं किया गया था। हालाँकि उनकी कविताएँ रूपकों की बुनाई से भरपूर हैं, लेकिन उनका दिल पूरी तरह से इस पेशे में नहीं था। वह सत्य की खोज के लिए आध्यात्मिक यात्रा पर थे, जो उनकी कविता में स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन मानव मूल्यों की रक्षा और मानव सेवा में व्यतीत कर दिया । वे शुरू से हमारे समाज में प्रचलित पाखंडों, कुरीतियों, अंधविश्वास, धर्म के नाम पर होने वाले अत्याचारों का खंडन और विरोध करते थे और शायद यही वजह है की इन्होंने निराकार ब्रह्म की उपासना की। इन पर स्वामी रामानंद जी का बेहद प्रभाव था। एक बार की बात है जब कबीर दास जी घाट पर सीढ़ियों पर लेटे हुए थे और वहाँ से स्वामी रामानंद गुजरे और उन्होंने अनजाने में अपने पैर कबीर दास जी पर रख दीये और ऐसा करने के बाद वे राम-राम कहने लगे और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और इस तरह वे कबीर दास जी को अपना शिष्य बनाने पर मजबूर हो गए। और इस प्रकार उन्हें रामानंद जी का सानिध्य प्राप्त हुआ। वे स्वामी रामानंद के सबसे चहेते शिष्य थे और वे जो भी बताते उसे तुरंत कंठस्थ कर लेते और उनकी बातों का सदैव अपने जीवन में अमल करते।
कबीर दास का एक बहुत प्रसिद्ध दोहा-
कल के कार्यों को आज और आज के कार्यों को अभी समाप्त करें, आप उन्हें कब खत्म करेंगे, अगर दुनिया अगले ही पल खत्म हो जाए?
कबीर का केवल जन्म ही नहीं अपितु मृत्यु भी बहुत बड़ी रहस्यमय तरीके से हुई। जैसा की कहा जाता है की काशी में मृत्यु होने पर सीधा मोक्ष की प्राप्ति होती है परन्तु कबीर दास जी ने इस कथन को असत्य ठहराते हुए, मृत्यु के समय काशी से बहार चले गए और वही उनकी मृत्यु हुई। उनका कहना था की दुनिया में सत्य से बढ़ कर कुछ नहीं होता और यही सबसे बड़ा तप है जिसे कोई झुठला नहीं सकता।
संत कबीर दास को अपनी प्रभावशाली परंपराओं और संस्कृति के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्धि मिली। वह उस समय की मौजूदा धार्मिक मनोदशा जैसे हिंदू धर्म, तंत्रवाद के साथ-साथ व्यक्तिगत भक्तिवाद से पूर्वाग्रहित थे।
कबीर दास ने एक सार्वभौमिक मार्ग देकर धर्मों का समन्वय करने का प्रयास किया जिसका पालन सभी मनुष्यों द्वारा किया जा सके।
उनके अनुसार प्रत्येक जीवन का संबंध दो आध्यात्मिक सिद्धांतों ( जीवात्मा और परमात्मा) से है।
मोक्ष के बारे में उनका विचार है कि यह इन दो दिव्य सिद्धांतों को एकजुट करने की प्रक्रिया है।
उन्होंने तथ्यपरक गुरु की प्रशंसा को प्रतिध्वनित करते हुए संक्षिप्त और सरल शैली में कविताएँ लिखीं।
उन्होंने मनुष्य के सच्चे धर्म का अर्थ समझाने का प्रयास किया जिसका पालन करना चाहिए। इससे आम लोगों को उनका संदेश आसानी से समझने में मदद मिली है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,