





वातावरण इसी से दूषित होता है। वाणी के बाणों का निशान जो भी व्यक्ति होता है वह तो तिलमिला जाता है, निर्दोष साक्षी भी बच नहीं पाता। हिंसा केवल तन से ही नहीं होती, मन से भी किसी का बुरा चाहने से हो जाती है। ‘वचन’ में हुई हिंसा का आघात गहरे जाकर मर्म पर होता है। कटुवचन श्रवणों से मन पर चोट करते हैं तो सारा शरीर झनझना उठता है। वाणी मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्त्व का पूर्जा-पूर्जा खोलकर रख देती है। किसी का चरित्र विश्लेषण करना हो तो उसकी बातों से पूरी रूपरेखा सामने आ जाती है।
विधाता ने सृष्टि के समस्त जीवों में से केवल मनुष्य को वाक शक्ति दी है। अभिव्यक्ति का यह साधन दुर्वचनों के लिए नहीं दिया गया था। जिह्वा का काम रस को चखना है, इसलिए रसना भी कहलाती है। भोजन में खट्टा-मीठा, तीखा, कड़वा चखकर जैसे खाने योग्य पदार्थ हम ग्रहण करते हैं, इसी तरह से मन में आई बात को मुँह से निकालने से पहले देश-काल और व्यक्ति देखकर कहना उचित है। क्रोध भीतर आग सी भड़़का देता है, इसलिए उस समय जो कुछ भी बोला जाता है, दूसरे को जलाए बिना नहीं रहता।
जीभ खुद तो बिना हड्डी की है पर दूसरे की हड्डी तोड़ने में माहिर है। टाँमस फुलर कहते हैं कि हमें जीभ से सावधान रहना चाहिए, क्योंकि यह गीली जगह में रहती है इसलिए बेवजह फिसल जाने की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। जापान की एक कहावत है कि केवल तीन इंच लंबी जीभ छह फुट ऊंचे आदमी को धराशायी कर सकती है। कवि रहीम ने जिह्वा के कारनामे बताए हैं। अनाप-शनाप बोलकर खुद तो दाँतों के किले में छिप जाती है, पर सहना पड़ता है बेचारे कपाल को-
बोलना एक कला है। इसी के द्वारा हम अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। किसी को अपनी बात बताने समझाने के लिए हम अनेक शब्दों का प्रयोग करते हैं। ‘शब्द’ ये शब्द ही तो हैं, जो हमें किसी के भी पास कर सकते हैं और चाहे तो किसी से भी दूर। इन शब्दों में बड़ी ताकत है। ये किसी के मन को शीतलता प्रदान कर सकते हैं, तो किसी के मन को भस्म तक कर सकते हैं। इस ‘शब्द’ की व्याख्या करते हुए कबीर दास ने कहा हैः
संसार का नियम है कि जो आया है, उसे एक न एक दिन जाना है। मनुष्य इस संसार में जन्म लेता है, फिर अपना कर्म करता है और अपनी आयु पूर्ण होने पर अपना देह त्याग देता है। उसके जन्म और मृत्यु के बीच का समय ऐसा होता है, जिसमें वह चाहे तो अपनी मीठी वाणी से साँप जैसे भयंकर मनुष्य के अहंकार रूपी विष को उतार सकता है। किसी दुश्मन को भी अपना बना सकता है। मनुष्य के मीठे बोल उसे संसार में अमर बना सकते हैं। अर्थात उसके मरने के बाद भी उसे याद करते हैं। तभी तो ठीक ही कहा गया है कि ‘बोलने से पहले शब्दों को तोलना चाहिए’ शब्द गिने नहीं तौले जाने चाहिए।
यदि कोई अच्छा, मीठा बोलना जानता है तो शब्द के बराबर कोई धन नहीं है। हीरा रुपयों में बिकता है, परन्तु उत्तम शब्दों का मोलभाव नहीं किया जा सकता। अर्थात शब्द हीरों से भी श्रेष्ठ हैं, वे अमूल्य हैं।
हमें मानव जीवन बड़ी मुश्किलों से मिला है। इसे लोगों की निंदा या बुराइयाँ करके या किसी को बुरा-भला कहकर व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिये। अगर हमारे प्यार से बोलने पर किसी के चेहरे पर हँसी आती है तो इससे बड़ा पुण्य कोई नहीं। मीठा बोलना किसी तीर्थ से कम नहीं। परन्तु आज मनुष्य सिर्फ ‘मैं’ में जी रहा है। उस पर अहंकार का कब्जा है। वह हर किसी से आगे निकलना चाहता है। इसके लिए वह दूसरों से तो क्या, अपनों को भी कटु वचन बोलने से पीछे नहीं हटता। शब्द या वाणी सीधा हृदय को प्रभावित करते हैं। अन्य घावों को तो भरता फिर भी आसान है, परन्तु कटु शब्दों से दिल पर हुए आघात को ठीक करना बहुत कठिन है।
एक तरफ ‘ऊँ’ शब्द है जिसमें स्वयं ईश्वर का वास है, तो दूसरी तरफ द्रौपदी के शब्द ‘अंधे का पुत्र अंधा’, जिसने दुर्योधन के हृदय पर गहरा आधात किया और महाभारत के भीषण युद्ध का एक कारण बना। यह हमें तय करना है कि हमें किन शब्दों का चयन करना है-वे जो ईश्वर तक को हमारे करीब ला दें या उन शब्दों को, जो हमारे अपनों को भी हमसे दूर कर दें।
सरित प्रवाह को दूर से देखकर यह अनुमान लगाना कठिन होता है कि नदी के जल में मछलियाँ तथा अन्य जल – जंतु भी अठखेलियाँ कर रहे हैं। लुढ़कते पत्थर, मृत शरीर तथा वन-संपदा के अवशेषों का भी हम प्रायः बहते जल में दूर से अनुमान नहीं कर पाते। किंतु जब हम इस जल में कोई जाल लगा देते हैं तो उसमें मछलियों सहित अनेकानेक वस्तुएं ठहर जाती हैं। जब तक जाल नहीं लगाया गया था तब तक हमें जल के साथ बह रही वस्तुओं का कोई ज्ञान नहीं था। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रवाहित जल में जल के अतिरिक्त किसी अन्य जीव-जंतु या वस्तु की उपस्थिति नहीं थी।
हमारे द्वारा कृत कार्यों का भी एक प्रवाह होता है। हमारे कर्म-प्रवाह में प्रायः ऐसे भी कार्य हो जाते हैं जो करने योग्य नहीं होते। लेकिन हम उन्हें कभी अज्ञानवश, कभी किसी झोंक में और कभी अहंकारवश कर जाते हैं। ऐसे कार्यों को लगातार करते रहने से हम अपने घर-परिवार, भाई-बंधु, व्यापार या नौकरी में तनावग्रस्त रहते हैं।
हमें पूरी सजगता से अपने कर्म-प्रवाह की धारा के बीच आत्म चिंतन की सुक्ष्म छलनी लगाए रखनी चाहिए ताकि हमें अपनी कमियाँ और त्रुटियाँ ज्ञात होती रहें। हमें पता रहे कि इसमें कब-कौन सी भूल हो गई। यदि कभी कोई हमारी ओर सहज भाव से संकेत करे तब तो हमें अवश्य ही आत्म चिंतन करना चाहिये।
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