





सम्राट ने सोचा, फिर उसने अपने वजीर को बुलाया और उसे एक दर्पण दिया। वह दर्पण किसी जादूगर ने सम्राट को भेंट किया था। उस दर्पण की खूबी थी कि जो भी उसमें देखेगा, उसे चीजें वैसी दिखाई पड़ने लगेगी, जैसी वे है। वैसी नहीं, जैसी उसने कल्पना में मान रखी है, वैसी नहीं, जैसा उसने भ्रम पाल रखा है, वैसी नहीं, जैसा उसका पक्षपात है, वरन वैसी, जैसी कि वे अपने आप में है। उसे यथार्थ दिखाई पड़ने लगेगा। और यथार्थ दिखाई पड़ जाये तो जीवन रूपांतरित हो जाता है। जो भी उस दर्पण में झांक लेगा, फिर वह वही आदमी नहीं रह जायेगा जो कल तक था।
वजीर उस जादुई दर्पण को लेकर उस दूर के नगर में पहुँचा। वजीर जानता था लोगों को भलीभांति। सम्राट तो महलों में ही रहा है। उसे दर्पण की खूबी का पता होगा, लोगों की खूबी का पता नहीं है। वजीर जानता था क्या हश्र होगा, क्या परिणाम होगा। पर राजा की आज्ञा थी, पूरी करनी थी। उसने जाकर उस अनूठे दर्पण को गांव के बीच चौराहे पर खड़ा कर दिया, डुंडी पिटवा दी- कि यह दर्पण अनूठा है, सम्राट ने भेंट भेजा है। इस दर्पण को हम यहीं छोड़ जा रहे है। इसकी सुरक्षा करना और इसका उपयोग करना। जब भी किसी के चित्त में बेचैनी, अशांति, घृणा का रोग पकड़े, इसमें झांकना। तुम्हें वैसी ही दिखाई पड़ने लगेगी, जैसी है।
जैसे कि तुम सोचते हो, लोग तुम्हारा अपमान कर रहे है। दर्पण में देखना, स्थिति उलटी ही पाओगे। कोई तुम्हारा अपमान करने को उत्सुक नहीं है। तुम ही जरूरत से ज्यादा सम्मान मांग रहे हो। दर्पण में देखते ही दिखाई पड़ जायेगा कि तुमने अपने अहंकार का गुब्बारा इतना बड़ा कर लिया है कि तुम जहां भी जाते हो, तुम ही लोगों से टकरा जाते हो। कोई तुमसे टकराने को उत्सुक नहीं।
अगर तुम्हें लगे कि लोग तुम्हें दुःख दे रहे है, तो दर्पण में देखने से पता चल जायेगा कि कोई इस संसार में किसी को दुःख दे नहीं सकता। तुम हजार-हजार मार्गो से दुःख पाने के उपाय करते हो। फिर जब उपाय पूरे हो जाते है, तब तुम रोते, सीखते, चिल्लाते हो। तुम्हें लगे जब भी कुछ पीड़ा, परेशानी, बेचैनी, तो दूसरे पर उतरदायित्त्व मत फेंकना, पहले दर्पण में झांक लेना।
डुंटी पीट दी गई। वजीर कुछ दिन रूका भी रहा देखने कि क्या होता है। उसे पता था कि क्या होगा।
एक वर्ग था गांव में पंडितों का, मौलवियों का, जानकारों का, तथाकथित ज्ञानियों का। उन्होंने कहा, वस्तुंए हमें वैसी ही दिखाई पड़ती है, जैसी है। हम इस दर्पण में क्यो देखें? क्या हम नासमझ है कि हमें वस्तुएं उनके यथार्थ में दिखाई नहीं पड़ती? क्या हम पागल है? अब तक हम क्या धूप में बाल पकाते रहे? उस दर्पण के पास वे ही जायें जिनको अपनी बुद्धि पर भरोसा न हो। हमें भरोसा है। न केवल वे स्वयं नहीं गये, उन्होंने गांव में हवा पैदा की कि कोई जा न सके। उन्होंने खबर की कि जो पागल होंगे वहीं जायेंगे। दर्पण होगा खूबी का, लेकिन पागलों के ही काम का है, बीमारों के काम का है। हम तो स्वस्थ हैं। और हमें तो चीजें यथार्थ रूप में दिखाई ही पड़ती है। दर्पण का प्रयोजन क्या है?
दूसरा वर्ग था एक गांव में सीधे-सादे लोगों का, लेकिन कायरों का। उन्होंने कहा कि दर्पण में देखो न देखो, लेकिन सम्राट ने भेजा है, सम्मान तो देना जरूरी है। तो उन्होंने एक छोटा सा मंडप तैयार कर दिया, फूल-हार सजा दिये। यद्यपि उन्होंने भी ध्यान रखा कि फूल-हार लगाते वक्त, दीप जलाते वक्त, कहीं भूल से दर्पण में चेहरा न दिख जाये। क्योंकि कौन जाने ठीक ही हो। तो सब अस्तव्यस्त हो जायेगा। जीवन बंधा है एक ढांचे में, कहीं कुछ और दिखाई पड़ने लगा तो कहीं के न रहेंगे। एक सुरक्षा है बंधे-बंधाए जीवन की धारा में। कायर उसे बदलने से डरता है। तो उन्होंने पूजा की, इस भय से कि कहीं भूल-चूक से भी दर्पण में चेहरा दिखाई पड़ गया तो क्रांति हो जायेगी। उन्होंने बहूमूल्य मखमल का एक परदा भी दर्पण पर टांग दिया। कहा उन्होंने यही कि वह दर्पण का सम्मान किया जा रहा है, पूजा की जा रही है। लेकिन गहरे में सुरक्षा की तैयारी थी।
गांव में एक तीसरा वर्ग था, जिन्होंने ने केवल विरोध किया, बल्कि गांव में यह हवा भी पैदा की कि दर्पण हमारे अपमान का सूचक है। किसी और नगर में ऐसा दर्पण नहीं है, हमारे नगर में ही सम्राट ने भेजा है। यह भयंकर अपमान है। इसका मतलब है- हम पागल है, मूढ़ है, हमें चीजें गलत दिखाई पड़ती है, हमारे पास आंखे नहीं है, हम अंधे है। इस दर्पण को उखाड़ कर फेंकना है। इसे यहां टिकने न देंगे।
कुछ एक चौथा वर्ग भी था, बहुत छोटे लोगों का, जैसे डॉक्टर फणनीस स्वभाव, सोहन, पुंगलिया, बागमार, ऐसे थोडे़ से लोग थे। उन्होंने हिम्मत जुटा कर दर्पण में झांक कर देखा, रूपांतरित हुए। तो लोगों ने कहा, ये हिप्नोटाइज्ड हो गये है। ये सम्मोहित हो गए है। लोग जैसा दर्पण से बचते थे, वैसा ही इन लोगों से भी बचने लगे। क्योंकि इनमें भी दर्पण की कुछ खूबी आ गई। इनकी आँखों में भी जो झांकता, उसे भी चीजे वैसी दिखाई पड़ने लगती, जैसी कि थीं।
अंततः लोगों ने दर्पण नष्ट कर दिया, क्योंकि वह बहुत उपद्रव था। ने केवल उन्होंने यह किया कि दर्पण नष्ट कर दिया, जिन्होंने दर्पण से देखा था उनका जीवन दुभर कर दिया। और ऐसा नहीं कि दुश्मनों ने किया, घर के लोगों ने भी कर दिया, परिवार के लोगों ने भी कर दिया, क्योंकि अब उनकी आंखे झेलना मुश्किल हो गई।
ऐसी ही कथा है सारे धर्मो की। हर धर्म एक दर्पण लाता है तुम्हारे नगर में। और हर धर्म की चेष्टा है कि उस दर्पण में तुम वैसा देख लो जैसा सत्य है। और ये प्रतिक्रियाएं है जो आदमी करता है।
कायर होकर पूजा करने से कुछ लाभ न होगा। कायर के साथ पूजा का कोई संबंध ही नहीं। पूजा तो दुस्साहस है। क्योंकि पूजा तो स्वयं को बदलने की तैयारी है। पूजा तो क्रांति में उतरना है। स्वर्ण को अग्नि में डालना है, ताकि वह निखर सके।
और जो भी क्रांति की तरफ चलता है, उसे अपने को मिटाना ही होगा। रत्ती-रत्ती मिटाना होगा। क्योंकि तुम्हारे और यथार्थ के बीच तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी नहीं खड़ा है। तुम्हारी बंधी हुई बुद्धि की धारणाएं, पक्षपात, शास्त्र, सिद्धांत सब तुम्हें रोकेंगे। वे कहेंगे, तुम तो जानते हो! जानने को बचा क्या है? सब सावधान होना जरूरी होगा।
अगर तुम जानते ही थे, तो एक कसौटी सदा कस लेना कि जो जानता है वह आनंदित होगा। जानने का और कोई अर्थ नहीं है। जो ज्ञान आनंद तक न ले आये वह ज्ञान नहीं है। ज्ञान हो नहीं सकता। जिस भोजन से भूख ही न मिटती हो, उसे भोजन का क्या कहना! वह भोजन की चर्चा होगी, भोजन नहीं हो सकता। हो सकता है पूरा पाकशास्त्र तुम्हारे हाथ में हो, तो भी तुम भूखे ही रहोगे। पाकशास्त्रों से कहीं भूख मिटी है? रूखी-सूखी रोटी भी मिटा देती है। बड़ा बहुमूल्य पाकशास्त्र, स्वर्ण की जिल्दों में बंधा हो तो भी, हीरे-जवाहरातों से जड़ा हो तो भी किसी भी काम नहीं आता। भूख मिटाने का उसमें कोई संबंध नहीं।
जब भी कोई धर्म जन्मता है तब तो एक दर्पण होता है। जब किसी संत का आविर्भाव होता है, तब वह एक दर्पण होता है। उस दर्पण में तुम झांकोगे तो ही! झांकने के पहले तुम्हें साहस जुटाना होगा। झांकने के पहले तुम्हें यह बात तय कर लेनी होगी कि तुम जानते नहीं हो।
जिस व्यक्ति को यह ख्याल आ गया कि मुझे पता नहीं है, वह द्वार पर खड़ा हो गया। जिसको यह ख्याल है कि मुझे पता है ही, वह दर्पण के पास से भी आंख बंद किये गुजर जायेगा। क्योंकि देखूं दर्पण में?
और तुम अपनी जीवन-व्यवस्था को अगर बचाव करने में लगे हो, यद्यपि उससे तुमने दुःख पाया है, पीड़ा पाई है, नरक पाया है, लेकिन फिर भी तुम उसके आदी हो गये हो। कारागृह में कैदी जंजीरों का भी आदी हो जाता है। उनको भी छोड़ने का मन नहीं करता।
बीमार आदमी अपनी बीमारी को भी पकड़ता है। पहचान हो जाती है, पुराने नारे हो जाते है। आज अचानक बीमारी छोड़ कर चली जायेगी, तुम्हें समझ में ही न आयेगा, अब क्या करें? कल तक तो एक योजना थी। सुबह से उठ कर डॉक्टर के घर जाते थे, दवा लाते थे, दवा लेते थे, लेटते थे, लोगों से दुःख की चर्चा करते थे, लोगों की सहानुभूति जुटाते थे, सभी मित्र, परिचित, अपरिचित प्रेम प्रकट करते थे- एक ढांचा था। आज अचानक बीमारी चली गई। आज न डॉक्टर के घर जाना है, न दवा खरीदनी है, न आज पत्नी उतना प्रेम करती मालूम पड़ती है, न मित्र उतनी दया करते मालूम पड़ते है। दुनिया अचानक रूखी-सुखी मालूम पड़ने लगी, एक मरूस्थल फैल गया। कल तक हरियाली थी। बीमारी के साथ बड़ा गहरा संबंध हो गया। अब तुम बीमारी छोड़ना न चाहोगे।
दुःख भी तुम छोड़ना नहीं चाहते। संत इतना ही कहते है कि तुम दुःख छोड़ दो, आनंद तो मिला ही हुआ है। तुम गलत को छोड़ दो, ठीक तो उपलब्ध ही है। सिर्फ गलत हाथ में न हो तो ठीक हाथ में आ जाये। गलत आंख में न हो तो ठीक आंख में आ जाये। इतना ही दर्पण है।
जीवत माटी हुई रहै, साई सनमुख होई।
जो परमात्मा के सामने जाने का साहस करेगा, वह जीते जी मिट्टी हो जायेगा।
परमात्मा को तो खोजने बहुत लोग निकलते है, लेकिन जीते जी मिट्टी होने की क्षमता कभी विरले व्यक्तियों में होती है। इसलिये खोजते बहुत है, पाते बहुत कम है। इसमें परमात्मा का कोई कसूर नहीं है। तुम जब तक उसके लिये जगह ही नहीं है तुम्हारे पास। तुम ही अपने अंतर्गृह में इस बुरी तरह भरे हो कि वहां स्थान नहीं है, अवकाश नहीं है कि परमात्मा प्रवेश कर जाये। वहां तुमने बूंद भर जगह नहीं छोड़ी है।
तुम्हारी हालत ऐसी है जैसे मैने सुना है कि मथुरा का एक पंडित था, उसकी बड़ी ख्याति थी। भोजन के संबंध में। किसी के घर आमंत्रण था, भोजन करने के बाद -भोजन तो वह करता ही गया- उसे भेजने के लिय भी बैलगाड़ी पर रख कर घर वापस ले जाना पड़ा। चलने की भी स्थिति न रही। घर पहुँच कर उसकी पत्नी ने उससे कहा, यह गोली एक दवा की खा लो, क्योंकि यह तो तुमने हालत खराब कर ली। उसने आंख खोली। उसने कहा, नासमझ! अगर गोली ही खाने की जगह होती तो एक लड्डू ही और न खा लेते? वह जगह तो पहले ही नहीं बची है।
वैसी तुम्हारी दशा है। परमात्मा को लायेंगे अगर जगह होती, तो तुम थोड़ा फर्नीचर और खरीद लाते, थोड़ा धन और जुटा लेते, थोड़े पद-प्रतिष्ठा के मानपत्र और इकट्ठे कर लेते। तुम थोड़ा कूड़ा-करकट और भर लेते। जगह है ही नहीं। वह तुमने छोड़ी ही नहीं है। और तुम्हारे भीतर जब तक ऐसी जगह न हो कि पूरा आकाश हो जाये, तब तक परमात्मा का आना नहीं हो सकता।
विराट को बुलाते हो, शून्य बनाना पड़ेगा। असीम को बुलाते हो, सीमारहित शून्यता भीतर घनीभूत करनी पड़ेगी। ध्यान कुछ और नहीं, समाधि कुछ और नहीं, तुम्हारे मिट जाने का नाम है। तुम थोड़े ही ध्यान करोगे। तुम मिटोगे तब ध्यान होगा। तुम थोड़े ही समाधिस्थ हो जाओगे। तुम खो जाओगे तब समाधि होगी। तुम्हारा और समाधि का कभी कोई मिलना न होगा। यहां तुम गये, वहां समाधि आई। तुम रहे, समाधि न आ पायेगी। समाधि का कुल इतना अर्थ है कि तुम्हारे भीतर खाली शून्य हो गया। अब तुम्हारे भीतर कुछ भी नहीं है। उस शून्यता में, उस पवित्रता में ही परमात्मा अवतरित होता है।
परमात्मा के सामने जो आया, वह जीते जी मिट्टी हो गया। या जीते जी जो मिट्टी हो गया, उसके सामने परमात्मा आ गया। ये दोनों बातें एक ही सिक्के के दो पहलू है। जीवित माटी हो रही। परमात्मा की फिक्र ही मत करों तुम जीते जी मर जाओ। जीते जी मर जाओ। मरते तो सभी है, आज नहीं कल। भक्त मरने के पहले मर जाता है। वह कहता है, जब मरना ही है, तो मौत की क्या प्रतीक्षा करनी। हम खुद ही मिट जाते है।
वह जीता है इस अर्थो में कि श्वास चल रहीं है। मर जाता है इस अर्थो में कि मैं का कोई भाव नहीं रह जाता। जीता है इस अर्थो में कि भूख लगती है, प्यास लगती है, भोजन भी मांग लाता है, पानी भी पी लेता है। मर जाता है इस अर्थो में कि अब जीने की कोई आकांक्षा नहीं रह जाती। तुम्हारी जीने की आकांक्षा ही, जीवेषणा-जीता रहूं, सदा जीता रहूं, मैं बना रहूं, मिट न जाऊं कहीं, खो न जाऊं कहीं- उस जीवन को वह छोड़ देता है।
वह जीता है, अगर परमात्मा जिलाए जा रहा है, श्वास लिये जा रहा है। तो संत कोई आत्महत्या नहीं कर लेता है। वह कहता है, तेरी मर्जी। जिलाए तो ठीक, मारे तो ठीक। अपनी तरफ से हम मरे हुए हैं। हमने अपने को तो अपनी तरफ से मिटा दिया, अब तेरी जो इच्छा।
सभी मरते हैं पीछे तो। धार्मिक पहले ही मर जाता है। वह मृत्यु को इतना कष्ट भी नहीं देता। वह अपने को पहले ही समेट लेता है। वह अपने को बढ़ाता ही नहीं। वह अपने को बनाता ही नहीं। वह अपने को सम्भालता ही नहीं। वह एक भीतर शून्य को जीने लगता है। देह होती है, मन नहीं होता। श्वास चलती है, चलाने वाला नहीं होता। उठना-बैठना होता है, भीतर का कर्ता खो जाता है।
ये सारे कृत्य निसर्ग से चलते है। इनको चलाने की कोई जरूरत नहीं।
तुम श्वास थोड़े ही लेते हो, श्वास चलती है। तुम कुछ भी न करो तो चलती है। तुम गहरे सोए रहो तो चलती है। तुम मूर्छित पड़े हो तो चलती है। शराब पी ली है, नाली में गिर गये हो, तो चलती है। चलाने में तुम्हारा कोई हाथ नहीं है।
तो जो अपने आप चलता रहता है वह चलता रहता है। भूख लगती है, प्यास लगती है।
यही धार्मिक-अधार्मिक का फर्क है। अधार्मिक, जब मौत आती है तब भी मरने को राजी नहीं होता। लड़ता है, सब तरह की चेष्टा करता है, और थोड़ी देर रूक जाए। नाव भी लग गई किनारे पर, तब भी वह किनारे को जकड़े रहता है। उसे जबरदस्ती ले जाना पड़ता है।
यमदूत मृत्यु के कारण नहीं आते, यमदूत तुम्हारी पकड़ के कारण आते है। सारे संसार में कथाएं हैं इस बात की कि मरते वक्त परमात्मा को भेजने है लोग- बड़े दुष्ट प्रकृति के लोग, बड़े शक्तिशाली पहलवान जैसे, भैंसों पर सवार होकर । वह कोई मृत्यु के कारण नहीं, वह तुम्हारी जबरदस्ती है रूके रहने की। तुम अगर जाने को राजी हो तो बात ही अलग हो जाती है। यमदूत आते ही नहीं। अगर बहुत गहरे में तुम देख पाओं तो समझ लोगे कि मृत्यु भी नहीं आती। क्योंकि वह तो तुम काम पहले ही निपटा चुके। वह मरने का काम तो हो ही गया। तुम एक हवा के झोके की तरह चले जाते हो। कोई ले जाता नहीं।
बुद्ध का एक नाम है तथागत। तथागत का अर्थ होता है, हवा के झोंके की तरह जो चला गया। पता भी न चला कब आया, पता भी न चला कब चला गया। जिसके जाने से जरा भी शोरगुल न था, जिसका जाना ऐसे हो गया-चुपचाप, कानों-कान खबर न पड़ी। कोई यमदूतों ने बुद्ध को नहीं छुड़ाया संसार से, उस संसार को पहले ही छोड़ दिया था।
बुद्धपुरूष ऐसा है जैसे किनारे से सब जंजीरे तोड़ कर नाव की प्रतीक्षा में खड़ा है। नाव आए, वह सवार हो जाए। साधारण संसारी ऐसा है कि नाव पास आती देख कर मौत की, वह और खूंटियां गाड़ लेता है किनारे पर। हाथ-पैर भी जकड़ देता है। सब तरह के बंध कर अपने को पकड़ कर रह जाता है। मित्र-प्रियजनों को बुला लेता है कि सब तरफ से पकड़ लो, कहीं से जा न सकूं।…. ले जाया जाता है। उसकी मौत एक बेहूदी घटना बन जाती है। उसकी मौत एक कुरूप कृत्य हो जाती है।
और ध्यान रखना, जो मर भी नहीं सकता शांति से, वह जी नहीं सका होगा शांति से। क्योंकि मौत तो महाशांति है। वह तो परम विश्राम है। वह तो थके हुए तत्त्वों का वापस लौट जाना है, और कुछ भी नहीं है। शरीर थक गया, सत्तर साल तक काम करता रहा, भयंकर लंबी यात्रा थी, दूभर चढ़ाई थी। हृदय धड़कता रहा, श्वास चलती रही, खून साफ करता रहा, सत्तर-अस्सी साल तक। और बिना किसी विशेष आयोजन के यह महान यंत्र काम करता रहा। यह थक गया। इसके तत्त्व अब वापस लौट जाना चाहते है। मिट्टी मिट्टी में विश्राम करना चाहती है, जल जल में जाना चाहता है, आकाश आकाश में खो जाना चाहता है। मृत्यु तो विश्राम है। जैसे रोज नींद विश्राम है। हर दिन के बाद, हर दिन के श्रम के बाद रात है विश्राम के लिए, ऐसे हर जीवन के बाद रात है मौत की, सौ जाने के लिए। विश्राम से कोई घबड़ाता है?
अज्ञानी तड़पता है कि मर जाऊंगा। अशांति से मरता है। जो अशांति से मरता है वह जी तो सकता ही नहीं शांति से। जिसकी नींद तक अशांत है, उसका जागरण तो महा अशांत होगा। मृत्यु कसौटी है। कैसे तुम मरोगे, उससे तुम्हारे पूरे जीवन के संबंध में निर्णय मिल जायेगा। मृत्यु तुम्हारे पूरे जीवन के संबंध में वक्तव्य दे जायेगी- तुम कैसे जीये।
जो आनन्द से जीया था, वह आनंद से मरेगा, महाआनंद से मरेगा। जो प्रेम से जीया था, वह प्रेम से ही लीन हो जायगा। जो अहोभाव से नाचा था, वह नाचते हुए ही विदा होगा। संघर्ष नहीं होगा। बचने की क्षण भर के लिये आकांक्षा नहीं होगी। वह स्वयं तत्पर होगा। यमदूत से खींचेंगे नहीं, वह खुद ही नाव पर सवार हो जायेगा।
अगर जीवन के फूल गंदे और कड़वे और दुर्गंध-युक्त रहे है, तो मौत सुगंध-युक्त नहीं हो सकती। अगर सारे जीवन फूलों की खेती की, सुंदर फूलों की, सौन्दर्य से भरे फूलों की, सुंगध भरे फूलों की, तो मौत में एक सुगंध होगी। व्यक्ति तो खा जायेगा, सुगंध तैरती रह जायेगी।
इसलिए बुद्ध मर जाते है, सुगंध तैरती रह जाती है। बुद्ध का खोना हो गया, लेकिन बुद्ध का गीत गूंजता रहता है। वह गूंजता ही रहेगा। उसके मिटने का कोई उपाय नहीं है।
मेरा बैरी मैं मुवा, मुझे न मारे कोई।
मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होई।।
मेरा बेरी मैं मुआ! कि मेरा दुश्मन मैं ही हूं। मुझे न मारे कोई। मुझे कोई और नहीं मारता।
महावीर ने कहा तुम ही हो अपने मित्र, तुम ही हो अपने शत्रु। जो अपने शत्रु है, वे ही सांसारिक है। जो अपने मित्र है, वे ही धार्मिक है। तुम कूडा-करकट इकट्ठा कर लेते हो, आत्मा को बेच डालते हो। तुम क्रोध, घृणा, वैमनस्य में जीने लगते हो, प्रेम, आनंद, अहोभाव, करूणा तिरोहित हो जाते है। तुम अपने ही मित्र कैसे अपने को कह सकोगे?
किसी और ने तुम्हें नहीं मारा है, किसी और ने तुम्हें नहीं लुटा है, तुम ही अपने को काटते रहे हो, अपने को जहर देते रहे हो। तुम्हारे जीवन में अगर घाव है, तो उनमें तुम्हारे ही हस्ताक्षर है। और तुम्हारे हृदय में अगर पीड़ाओं के घनीभूत मेघ है, तो वह तुमने अर्जित किया है जन्मो-जन्मों में। तुम जो हो, वह तुम्हारे कृत्यों का फल हो।
मैं ही अपना शत्रु हूं।
कोई मुझे मारता थोड़े ही है! अब यह बड़ी सूक्ष्म बात है। मौत तुम्हें नहीं मारती, जीवित रहने की आकांक्षा तुम्हें मारती है।
इसीलिये मैंने दर्पण की कथा तुमसे कहीं, ताकि तुम्हें तथ्य दिखाई पड़ने लगे। तुम सोचते हो, मौत आती है और तुम्हें मारती है। नहीं, तुम जितनी मात्रा में जीवन को जकड़ रखना चाहते हो, उतनी ही बड़ी मात्रा में मौत आती है। तुम्हारी जितनी पकड़ होती है जीवन पर, उतने ही जोर से मौत के दूतों को तुम्हें जीवन से छुड़ाना पड़ता है। अगर तुम्हारी कोई भी पकड़ न हो, पकड़ ही न हो, तो मौत आती ही नहीं। मौत के समय अधिक लोग बेहोश हो जाते है, क्योंकि बड़ी छीना-झपटी होती है। सिर्फ संत पुरूष होश में मरते है, क्योंकि छीना-झपटी कुछ है ही नहीं।
वस्तुत सच्चाई तो यह है कि जो लोग सम्यकरूपेण जीये है सम्यकरूपेण मरते है। मौत के आखिरी क्षण में उनकी सजगता अपनी चरम उत्कृष्ट कोटि पर होती है, आखिरी कोटि पर होती है। जैसे बुझने के पहले दीये में लपट आखिरी आ जाती है, वैसे ही उनके जीवन में सारे जीवन के बोध का सार-संचित घटित होता है। मृत्यु के क्षण में, जब सब मर रहा होता है, उनके भीतर जो अमृत ज्योति है, वह बड़ी प्रगाढ़ता से जलती है।
यह ठीक भी है। क्योंकि विपरीत में ही चीजें प्रगाढ़ होकर दिखाई पड़ती है। अब तक तो मिले-जुले थे शरीर से, कोई भेद-फासला न था ज्यादा। अब शरीर दूर पड़ने लगा, चेतना अलग हटने लगी, मिश्रण टूट रहा है। इस घड़ी में बोध परिपूर्ण होगा। इस घड़ी में चेतना शुद्ध होगी। शरीर की कण भर भी छाया उस पर न रह जायेगी। मन के विचार की क्षण भर भी विकृति न पड़ेगी। दर्पण बिलकुल शुद्ध होगा।
मृत्यु के क्षण में संत पुरूष- जिसने अपने को पहले ही मार डाला है, अहंकार का त्याग कर दिया है- वह बड़ी प्रगाढ़ ज्योति को उपलब्ध होता है। वह अनुरूप करता है कि मैं तो जीवन हूँ, मृत्यु कैसे हो सकती है? तब वह देखता हैः मृत्यु आस-पास घट रही है, मुझमें नहीं। मेरे पास घट रही है, मुझमें नहीं।
तुम देखोगेः तुम्हारे भीतर घट रही है। क्योंकि तुम्हें अपना तो पता ही नहीं। और जिसे तुमने अपना आपा समझ रखा है, वह सिर्फ एक झूठी धारणा है अहंकार की, नाम रूप की, माया की।
अगर तुम बहुत सम्मान चाहते हो, तो तुम्हारा अपमान होगा। अगर तुम अतिशय सफलता चाहते हो, तो तुम्हें विफलता मिलेगी। अगर तुम बहुत धनी होना चाहते हो, तो तुम निर्धन मरोगे। अगर सम्राट होने की आकांक्षा है, तो भिखारी होना तुम्हारी नियति होगी। तुम जो भी अतिशय से चाहोगे, उससे उलटा परिणाम होगा।
समझदार पहले से ही सफलता की दौड़ में सम्मिलित नहीं होते। उन्हें तुम हरा न सकोगे। वे पहले से ही पीछे खड़े होते है। तुम उन्हें गिरा न सकोगे। वे मांगते ही कुछ नहीं। तुम उनसे छीन न सकोगे।
यह सारे धर्म का सार संचय है। तुम्हें अगर बचना हो, तो अपने को बचाना ही मत।
बचाओंगे, और मिटोगे। मिटोगे, बच जाओगे।
धर्म को विराधाभ्यास की भाषा बोलनी पड़ती है। क्योंकि तुम्हारा जीवन इतने अंधेरे में है कि किसी और तरह से खबर पहुँचाई नहीं जा सकती। सीधी बात भी कहनी हो तो तिरछी करके पहुँचानी पड़ती है, क्योंकि तुम बड़ी तिरछी हालत में पड़े हो। सीधी-सादी मेरी बात है, लेकिन तिरछी लगती है। क्योंकि तुम तिरछे हो। तुम्हारे भीतर जाकर तिरछी हो जाती है।
अब यह बात सीधी-सादी है। अगर तुम मान ही न चाहो, तो क्या तुम्हारा कोई अपमान कर सकेगा? कैसे करेगा? अगर तुम सफलता न चाहो, तो तुम विफल हो सकते हो? कैसे होओगे? अगर तुमने जीतना ही न चाहा हो, तो तुम्हें कोई हरा सकता है? तो तुम्हारी ही जीतने की आकांक्षा हराती है। और तुम्हारी ही जीने की अतिशय आकांक्षा मारती है। तुम्हारी ही पकड़ के कारण तुम से छुड़ाया जाता है।
मुझे न मारे कोई।
मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होई।।
मैं ही अपने को मारता हूँ और मैं ही चाहूं तो मैं अमृत को उपलब्ध हो सकता हूं- मरजीवा! मर कर भी जीया हुआ हो सकता हूं। मरजीवा शब्द बड़ा अच्छा है। मरूं भी एक अर्थ में और जीता भी रहूं।
मर भी जाऊंगा, फिर भी न मरूंगा। क्योंकि मैं जागता रहूंगा और देखता रहूंगा कि मैं तो हूं। मेरे होने की शुद्धि बढ़ेगी, घटेगी नहीं। जो मरने को राजी है, वह अमृत को उपलब्ध हो जाता है। अमृत को पाने की कला है, स्वेच्छा से मरने को राजी हो जाना। मरते सभी है।
मरते सभी है अनिच्छा से। ध्यान में, समाधि में व्यक्ति से मर जाता है। छोड़ देता है। मरजीवा हो जाता है।
उपनिषद फीके हो जायें। वेद-वचन छोटे मालूम पड़ते हैं।
मैं ही अपने आगे खड़ा हूं, इसलिये तू छिप गया, अन्यथा तू तो सामने ही है।
इसे तुम मंत्र की तरह अपने भीतर गूंज जाने दो। इसे कभी-कभी एकांत क्षण में मंत्र की तरह ही दोहराना, ताकि इसका स्वाद ले सको। समझने की बात कम, स्वाद लेने की बात ज्यादा। ताकि इसकी मिठास तुम्हारे कंठ में उतर जाये, हृदय में चली जाये, तुम्हारे खून-मांस-मज्जा में समा जाये।
बस जरा मैं हट जाऊं बीच से। कौन तुम्हें रोके है? परमात्मा सब ओर है, कण-कण में है, हवा की लहर-लहर में है। सब तरफ से उसने ही तुम्हें घेरा है। बाहर-भीतर वहीं दिखाई पड़ रहा है, वही देख रहा है। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। उससे ज्यादा प्रकट कुछ कैसे हो सकता है? क्योंकि जो भी प्रकट है, वही प्रकट है। फिर भी लोग पूछते है- परमात्मा कहां है? फिर भी लोग खोजते है काशी में, काबा में- परमात्मा कहां है?
परमात्मा को खोजा कि तुम गलत रास्ते पर निकल गये। तुमने पहले तो यह मान ही लिया कि यहां नहीं है। वहीं भूल हो गई। तुम जहां भी रहोगे, वहीं तो ‘यहां’ होगा। तुम्हें यहां दिखाई न पड़ा- इन वृक्षों में दिखाई न पड़ा, इन पत्थरों में दिखाई न पड़ा, इन लोगों में दिखाई न पड़ा जो यहां मौजूद है। तुम पूछते हो, परमात्मा कहां है? तुम काशी जाओगे, वहां दूसरे लोग होंगे, दूसरे वृक्ष होंगे, दूसरी चट्टाने होंगी, मगर वहां पहुँचते ही वे तुम्हारे चारों तरफ घेरने वाला वातावरण बन जायंगी। काशी ‘यहां’ हो जायेगा, काबा भी ‘यहां’ हो जायेगा। तुम जहां जाओंगे वही तो ‘यहां’ से जायेगा। और परमात्मा तुम्हें यहां दिखाई न पड़ा, तो कहीं भी दिखाई न पड़ेगा।
जो खोजने निकलता है परमात्मा को, वह कभी उसे खोज नहीं पाता। क्योंकि उसने बुनियादी भूल तो स्वीकार कर ली कि वह यहां नहीं है। गणित वहीं भूल से हो गया। बस अब आगे गणित कभी भी ठीक न हो सकेगा। अगर तुमने कभी भी गणित किया हो, तो पहले कदम पर बहुत सावधानी की जरूरत है। क्योंकि पहले कदम पर आखिरी निष्कर्ष निर्भर है। पहला कदम आधी मंजिल है। वहां जो चुक गया, वह कभी ठीक जगह पहुँच ही नहीं सकता।
परमात्मा ही है। वह यहां दिखाई नहीं पड़ता। जाहिर है कि तुम्हारी आंख पर कोई पर्दा है। वृक्ष दिखाई पड़ता है, परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता। चट्टान दिखाई पड़ती है, परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता। मैं तुम्हें दिखाई पड़ता हूं, परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता। तुम्हारा पड़ोसी दिखाई पड़ता है, परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता। कुछ आंख पर परदा है। उस परदे को हटाने की बात है, परमात्मा को खोजने की बात नहीं। कोई सूक्ष्म परदा होगा, क्योंकि आंख तुम्हारी खुली मालुम पड़ती है। लेकिन कोई धीमी धुंध होगी। कोई सपने की तरह तुम्हारी आंखों को घेरे हुये है।
अहंकार सपने की एक दीवाल है। दिखाई नहीं पड़ती, पारदर्शी है, जैसे कांच की हो, शुद्ध कांच की हो। दिखाई नहीं पड़ता, आर-पार दिखाई पड़ता है, लेकिन पूरे वक्त आंखो पर पड़ी है। तुम जब भी कुछ देखते हो, तुम्हारा मैं भीतर खड़े होकर देखता है। तुम एक फूल को देखते हो, मैं बीच में आ गया। तुम्हारा मन, तुम्हारे विचार बीच में आ गये। फूल और तुम्हारे बीच फासला हो गया।
फूल को तो तुम वस्तुतः उसी दिन देख पाओगे, जिस दिन तुम्हारे और फूल के बीच कोई विचार की धारा न होगी, कोई मैं का भाव ही न होगा। तुम होओगे, लेकिन मैं बिलकुल न होगा। एक शून्य, एक शांत गहरी झील, जिस पर एक लहर भी नहीं उठती। एक निराकार आकाश! उस क्षण फूल में तुम्हें ब्रह्म दिखाई पड़ जायेगा। ब्रह्म तो गहराई है यथार्थ की। तुम जितने शांत होते जाओगे उतनी गहराई की प्रतीति होने लगेगी।
प्रमाण कुछ भी नहीं हो सकता। जब तक आंख पर मैं का परदा पड़ा हो, कोई प्रमाण सिद्ध नहीं कर सकता कि परमात्मा है। क्योंकि परमात्मा तो केवल अनुभव से ही सिद्ध हो सकता है। यह तो ऐसा ही है, जैसे बुखार के बाद तुम्हारा स्वाद खो जाता है। तुमने कभी ख्याल किया कि बुखार के बाद कुछ भी भोजन करो, बेस्वाद मालूम पड़ता है। तुम्हारी जीभ पर और भोजन के बीच एक परदा है। एक पतली सतह जम गई बुखार की, बीमारी की। तुम्हारे जीभ के संवेदन-अणु थक गए है, उदास पड़े है, कोई उत्साह नहीं है, तुम भोजन को लील भी जाते हो, पर स्वाद नहीं आता।
जैसे भोजन में स्वाद है, ऐसा सब में छिपा परमात्मा है। लेकिन स्वाद की क्षमता तो चाहिये। तुम जब स्वस्थ हो जाते हो, स्वाद की क्षमता लौट आती है। तब साधारण सी रूखी-सूखी रोटी में भी बहुत स्वाद आता है। नहीं तो अत्यंत बहुमूल्य मिष्ठान भी कचरे की तरह तुम भीतर डाल ले सकते हो, लेकिन स्वाद न आयेगा।
तुम्हारा भीतरी स्वास्थ्य ही स्वाद की संभावना को पैदा करता है। तुम जब भीतर से लयबद्ध होते हो तब तुम्हें बाहर का संगीत सुनाई पड़ता है। तुम्हारी जितनी लयबद्धता बढ़ती जाती है, उतने ही तुम गहरे अस्तित्व में उतरने लगते हो। पत्ती-पत्ती में अनंत सागर है जीवन का। पत्थर-पत्थर में अनंत सागर है जीवन का।
इस मैं को ऐसी जगह छिपा दो, जहां कोई भी न देख सके। यह तो प्रतीकात्मक बात है। इस मैं को मिटा दो। क्योंकि कहीं भी छिपाओगे, कोई न कोई देख ही लेगा।
एक कहानी है। दो युवक एक गुरू के पास आये। वे दीक्षित होना चाहते थे। उस फकीर ने कहा, दीक्षा तो बाद में दूंगा, पहले तुम्हारी परीक्षा होगी। ये दो कबूतर है, ये तुम ले जाओ। एक-एक कबूतर दोनों को दे दिया और कहा, ऐसी जगह जाकर मार डालना कबूतर को, जहां कोई देखने वाला न हो।
पहला युवक गया। मिनट भी नहीं लगे होंगे कि वापस लौट आया मार कर कबूतर को। गुरू ने पूछा, मार लाये? ऐसी जगह इतनी जल्दी खोज ली, जहां कोई न देखे?
उसने कहा, बगल की गली में ही कोई नहीं था। गया, मारा, आ गया।
दूसरा युवक महीनों तक न लौटा। साल पूरा होने लगा, तब वह आया- बदहवास, थका-हारा, लेकिन एक नई ज्योति उसकी आंखों में। सुख कर कांटा हो गया था, लेकिन कुछ घटा था। गुरू ने उसकी आंख में जलते दीयों को देख कर ही पहचान लिया। कबूतर अब भी जिंदा था। उसने कहा, अरे! साल भर बाद लौटे और कबूतर को मार कर न आए?
उसने कहा, ऐसी कोई जगह ही नहीं न खोज सका। बहुत खोजी। भीड़-बाजार से दूर हट गया, एकांत जंगल में गया। वहां भी देखा कि पक्षी है, और पक्षी देख रहे है। एक अंधेरी गुफा में गया, गहन अंधकार था, कोई भी न देखता था। जैसे ही मैंने उसकी गर्दन पर हाथ रखा, मुझे याद आया कि मैं तो देख ही रहा हूँ। फिर मैंने ऐसा उपाय किया कि अपने दोनों हाथ पीछे करके अपनी पीठ की तरफ मारना चाहा कि वहां तो मैं नहीं देख रहा। तब मुझे ख्याल आया, कम से कम कबूतर तो देख ही रहा है! फिर मुश्किल हो गया। सब उपाय करे आ गया हूं। यह आपने बात ही ऐसी कठिन बता दी- जहां कोई न देखे! कबूतर तो कम से कम देखेगा ही। तब मैं हार गया। मैने कहा कि अब मामला नहीं है। अपने को भी बचा लिया, सारी दुनिया से दूर हट गया, गहन अंधकार में उतर गया, गुफाएं खोज ली, सब इंतजाम कर डाला, लेकिन अब इसका क्या इंतजाम करूंगा। यह कबूतर, टक-टक इसकी आंख देख रहीं है! और आपने कहा, जहां कोई न देखे।
कहां छिपाओगे लेकिन? कम से कम तुम तो जानोगे ही, कहां छिपाया है। तुम तो देखते ही रहोगे। कोई न देखे, कबूतर तो देखेगा। तुम तो देखोगे। इसे तो छिपाने से काम न चलेगा। इसको तो मिटाना ही पड़ेगा, शून्य ही करना पड़ेगा।
और जैसे-जैसे तुम इसको छिपाने लगोगे, जहां कोई न देखे, जिस-जिस पर मात्रा में यह छिपने लगेगा, खाने लगेगा, मिटने लगेगा, इसके गवाह न रह जायेंगे, वैसे-वैसे प्यारा प्रकट होने लगेगा।
जिस मात्रा में तुम्हारा अहंकार, उस मात्रा में नरक, उस मात्रा में दुःख। अगर तुम बहुत दुःखी हो, तो ठीक से समझ लेना कि बहुत अहंकारी हो। क्योंकि और दूसरा कोई अर्थ नहीं होता। जिस-जिस मात्रा में तुम आनंदित, उतने तुम निरहंकारी। आनंद को सीधा घटाने-बढ़ाने का कोई उपाय नहीं। अहंकार की मात्रा घटाओं-बढ़ाओं। जिस मात्रा में अहंकार घटता है, आनंद बढ़ता है। क्योंकि वही ऊर्जा जो अहंकार में उलझी थी, मुक्त हो जाती है। जिस मात्रा में अहंकार बढ़ता है। उसी मात्रा में आनंद घटता है। क्योंकि वही ऊर्जा जो आनंद देती है, अहंकार में बंद होती चली जाती है। ये एक ही ऊर्जा के खेल है। इसलिये हमने ब्रह्म की परिभाषा में आनंद को रखा है- सच्चिदानंद। आखिरी बात आनंद है ब्रह्म के जगत में। इसलिये आनंद को आखिर में कहा है- सत, चित, आनंद। उसके पार फिर कुछ भी नहीं।
उस परमात्मा को पाने जो चलता है, उस महासंपदा को पाने जो चलता है, ये सब छोटे कंकड़-पत्थर सब छूट जाते है। अस्थियों में छिपी मज्जा सूख जाती है, तो ही उस परमात्मा का मिलन होता है।
दूभर है मार्ग। कठिन है यात्रा। संतों ने कहाः खड्ग की धार। क्योंकि जैसे ही तुम रूपांतरित होना शुरू करोगे, तुम कठिनाई में पड़ोगे। समाज तो तुम्हारे साथ नहीं बदलेगा। तुम अकेले पड़ जाओगे, तुम अजनबी हो जाओगे। अपनों के बीच पराए। लोग तुम पर संदेह करने लगेंगे। तुम सच्चे हो रहे हो, तुम इन्हें गलत होते हुए पागल हो रहे हो। तुम्हारे जीवन में रोशनी आ रही है, लेकिन वे समझेंगे कि तुम सम्मोहित हो गये हो। तुम्हारे जीवन में शांति उतर रही है, लेकिन व हँसेगे। क्योंकि हंसी के द्वारा ही वे अपनी आत्मरक्षा कर सकते है। वे तुम्हारा व्यंग्य करेंगे, क्योंकि व्यंग्य ही उनकी सुरक्षा है। यद्यपि भीड़ उनकी है, बहुमत उनका है। इसलिये वे जो भी कहेंगे, उसके पीछे भीड़ का बल होगा। तुम अकेले पड़ जाओगे।
इस संसार में अकेले पड़ जाना बड़ा कठिन काम है। एकाकी है यात्रा। क्यों इस रास्ते पर दो तो चली ही नहीं सकते। अकेले चलना होगा। असुरक्षित, असहाय,
लेकिन ध्यान रखना, एक बार तुमने हिम्मत कर ली इस भीड़ की नामसझी के बाहर होने की कि परमात्मा का बल तुम्हारे साथ है। यह बल भी कोई बल है। यह धोखा है बल का। इसके लिये तो तुम निर्बल ही हो जाओ तो अच्छा। क्योंकि संत कहते हैः निर्बल के बल राम! इधर जो निर्बल हुआ, वहां परमात्मा का बल मिल जाता है।
परम पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,