






ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने जीवन में उन्नति नहीं कर पाता, वह परिश्रम तो पूरा करता है, परन्तु उसे जीवन में सुख नहीं मिलता, उसे निरन्तर आर्थिक हानि होती रहती है, न तो व्यापार में वृद्धि होती है, और न धन-संचय होता है, परिवार में रोग-शोक, बीमारी से किसी भी प्रकार का सुख नहीं मिल पाता, चारों तरफ से परेशानियां उसे घेरे रहती हैं।
यह स्थिति स्त्रियों के लिये असहनीय होती है, दुर्भाग्य के कारण ही स्त्री को अपने ससुराल में सुख नहीं मिलता, पति दूसरी स्त्री में अनुरक्त हो जाता है, स्वास्थ्य बराबर कमजोर बना रहता है, और उसे नित्य नई व्याधियों और तनाव प्राप्त होते रहते हैं, यही एक कारण होता जब स्त्री विधवा जीवन व्यतीत करने को मजबूर होती है।
दुर्भाग्य की काली छाया पुरूष या स्त्री के जीवन पर न पड़े, उनके सभी पाप-दोष समाप्त हो, वह जीवन में पूर्ण अनुकूलता प्राप्त हो, सुहाग अक्षुण्ण रह सके, कुल-वंश का सुख मिल सके, पुत्रियों के शीघ्र विवाह सम्पन्न हो, जीवन सुखदायक और सौभाग्यशाली बना रहे, उसके सारे ऋण समाप्त हो, आर्थिक उन्नति होने लगे और वह पूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर जीवन में निरन्तर उन्नति करता रहे। अतः उक्त सुस्थितियों की प्राप्ति हेतु पति-पत्नी अखण्ड सावित्री सुहाग सौभाग्य सर्व सुखदा प्राप्ति दीक्षा अवश्य ही ग्रहण करें। जो साधक यह दीक्षा आत्मसात करता है, वह मानसिक तनाव से दूर रहता है, उसके सभी रोग दूर हो जाते हैं, धन, कीर्ति और आयु की वृद्धि होती है, तथा उसके महापाप भी पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं, उसकी सारी आशाओं की पूर्ति होती है, चाहे उस पर कितना ही भीषण तांत्रिक प्रयोग किया हुआ हो, तो वह प्रयोग निश्चित ही समाप्त हो जाता है, यही नहीं अपितु उसके सारे मनोरथ और सारे उद्देश्य सिद्ध हो जाते हैं, तथा तेज एवं बल की वृद्धि होती है।
अविवाहित पुत्रियों व बेटियों को योग्य वर प्राप्ति हेतु यह दीक्षा अवश्य ही ग्रहण करने से उनका जीवन सुमंगलमय बनने की ओर अग्रसर हो सकेगा।
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त्रिपुर भैरवी दीक्षा से जहाँ प्रेत बाधा से मुक्ति प्राप्त होती है, वहीं शारीरिक दुर्बलता भी समाप्त होती है, व्यक्ति का स्वास्थ्य निखरने लगता है। तंत्र बाधाओं के निवारण के लिये इस दीक्षा का विशेष महत्त्व है। शत्रुओं और बाधाओं का संहार करने के साथ ही त्रिपुर भैरवी अपने साधक को यश, मान, पद, प्रतिष्ठा प्रदान करती हैं। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक में आत्म शक्ति त्वरित रूप से जाग्रत होने लगती है और बड़ी से बड़ी परिस्थितियों में भी साधक आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है, असाध्य और दुष्कर से दुष्कर कार्यों को भी पूर्ण कर लेता है। दीक्षा प्राप्त होने पर साधक किसी भी स्थान पर निश्चिंत, निर्भय आ-जा सकता है, ये इतर योनियां स्वयं ही ऐसे साधक से भय खाती है।
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