


दस महाविद्याओं में माता मातंगी का प्रमुख स्थान है। मातंगी शब्द जीवन के प्रत्येक पहलू को उजागर करने की क्रिया का नाम है। जिससे जीवन के हर पहलु में पूर्णता मिलती है। पुरुषों में जहाँ मातंगी दीक्षा पूर्ण पौरुषता प्रदान कर व्यक्ति को निर्भय और यौवनमय बना देती है वहीं स्त्रीयों को रुप, लावण्य और सौन्दर्य एवं कोमलता युक्त बना देती है। भगवती सरस्वती का ही तांत्रोक्त स्वरुप होने के कारण माता मातंगी वाणी, संगीत, ज्ञान, और कला की अधिष्ठात्री देवी भी हैं। मातंगी दिक्षा को ग्रहण करने वाले साधक को रचनात्मकता बढ़ाने, स्पष्ट संवाद स्थापित करने, लोगों को आकर्षित करने, एवं शत्रुओं पर नियंत्रण स्थापित करने में पूर्ण विजय प्राप्त होती है। वह जिस क्षेत्र में जाने की इच्छा रखता है, सफलता उसके कदम निश्चित ही चूमती है।
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त्रिपुर सुन्दरी महाकाली का रक्तवर्णा रुप हैं। धन, ऐश्वर्य, भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी मानी जाती हैं। त्रिपुर सुन्दरी महाविद्या शक्ति दीक्षा लेने से साधक की आध्यात्मिक उन्नति और जीवन की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा सौन्दर्य, समृद्धि और प्रेम में वृद्धि होती है। शरीर की तीन नाड़ियां इड़ा, पिंगला और सुसुम्ना जो मन, बुद्धि और चित्त को नियंत्रित करती है, वह शक्ति जागृत हो जाती है। भू, भुवः स्वः यह तीनों इसी महाशक्ति से उत्पन्न हुए हैं। इसीलिये इसे त्रिपुर सुन्दरी कहा जाता है। यदि इस दिक्षा को पहले प्राप्त कर लिया जाय तो साधना में भी शीघ्र सफलता मिलती है। बुद्धि तेज होती है और आध्यात्मिक उन्नति होती है तथा उपरोक्त सभी गुण साधक के अंदर विद्यमान होते ही हैं।
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माता सीता का सतीत्व भारतीय संस्कृति में पवित्रता, असीम सहनशीलता, साहस, समर्पण और अटूट पतिव्रता धर्म निवर्हन का सर्वोच्च प्रतीक है। वे आदर्श पत्नी, त्यागमयी माँ और धर्मपरायण स्त्री के रुप में जानी जाती हैं। जिन्होंने विकट परिस्थितियों में भी अपना धैर्य नहीं खोया और खुद को सदा पवित्र बनाये रखा। भूमि से उत्पन्न होने के कारण माता सीता का एक अन्य नाम “भूमिजा”हैजोहमें यह बताता है कि शक्ति, धैर्य और प्रेम ही जीवन की सर्वोच्च उर्जा है। सीता सतीत्व सौभाग्य लक्ष्मी दीक्षा को ग्रहण करने के बाद से ही साधक शरीर से मुक्त होकर आत्मा के स्तर पर कार्य करना प्रारंभ कर देते हैं। इसी विशिष्टता के कारण माता सीता का एक नाम “वैदेही” भी है। लक्ष्मी स्वरुपा होने के साथ-साथ माता सीता की संकल्प शक्ति भी अद्वितीय है। दिक्षा मनुष्य को दक्ष बनाती है ताकि उसका जीवन सुयोग्य हो सके। अतः उचित समय पर सद्गुरुदेवजी से यह विशिष्ट एवं दुर्लभ दीक्षा अवश्य लें जिससे आप का जीवन भी भारतीय संस्कृति में वर्णित ‘भूमिजा’ और ‘वैदेही’ जैसे नामों को पवित्र और सार्थक कर सके।
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