





लेकिन सामान्य मानव शरीर अत्यंत क्षुद्र एवं गन्दा है, मल-मूत्र, रक्त आदि के सिवाय कुछ है ही नहीं, जबकि दिव्यता और आनन्द की उपलब्धि तो केवल दिव्य एवं चैतन्यता प्राप्त देह में ही सम्भव है। जिस प्रकार जल में ही जल का पूर्ण रूप से मिलन सम्भव है, तेल में नहीं, उसी प्रकार शरीर एवं मन को चैतन्यता युक्त बना कर ही इष्ट की चैतन्यता को समाहित किया जा सकता है।
यह यंत्र गुरू कृपा का एक ऐसा ही श्रेष्ठ प्रसाद है, जो पूर्णता एवं पूर्ण दिव्यता को प्रदान करने वाले सिद्धाश्रम मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठित किया गया है तथा जिसे पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास पूर्वक पूजा स्थान में स्थापित करने से साधक के शरीर में दिव्यता और चैतन्यता का संचार होने लगता है, कुण्डलिनी स्वतः ही स्पंदित होने लगती है, समस्त साधनाओं में सफलता प्राप्त होने लगती है और पूर्णता की ओर अग्रसर होने की क्रिया प्रारम्भ होने लगती है।
विधि
इस यंत्र को गुरू पूर्णिमा पर व किसी भी गुरूवार के दिन प्रातः काल पूजा स्थान में रखकर इसका धूप, दीप, कुंकुंम, अक्षत आदि से पूजन करें, फिर दो माह तक नित्य ‘ऊँ भू र्भुव स्वः’’ मंत्र का मात्र 5 बार उच्चारण करें। 2 माह बाद यंत्र को जल में विसर्जित करें। इस यंत्र के स्थापन के बाद अपने अन्दर आई पवित्रता एवं चैतन्यता को आप स्वयं ही एहसास कर सकेंगे।
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