





भगवान शिव की चेतना योगी और गृहस्थ दोनों के रुप में व्याप्त है। आदियोगी और परमज्ञानी शिव को समानता, सृजन और परिवर्तन का प्रतीक व सृष्टि का प्रथम योगी माना गया है, जो सदैव ध्यान मुद्रा में रहकर अपनी तीसरी आंख (ज्ञान) के माध्यम से संसार को देखते हैं। समानता के प्रतीक महादेव अपने भक्तों में कोई भेदभाव नहीं करते, वे भूत, प्रेत, देवता और असुर सभी को समान रूप से अपनाते हैं। उन्होंने सृष्टि की रक्षा के लिए विष (कालकूट) को अपने कंठ में धारण किया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ (त्यागी) कहलाये। उनके जटाओं में व्याप्त गंगा, ज्ञान का प्रतीक है; चंद्रमा, मन का प्रतिनिधित्व करता है; तो सर्प, अहंकार के शमन का, तीसरी आंख (विवेक), और भस्म में (नश्वरता) शामिल हैं। उनका त्रिशूल तीन गुणों-सत्व, रज और तम पर नियंत्रण का प्रतीक है। डमरु नाद और लय का प्रतीक है। शिव का अर्थ ही ‘कल्याण’ है जो साधक के जीवन में स्थिरता लाते हैं।
भारतीय संस्कृति, वेदों, उपनिषदों तथा पुराणों में गुरु और भगवान शिव को एक-दूसरे का पर्याय माना गया है अर्थात् गुरु ही शिव हैं तथा शिव ही गुरु हैं। इस दिव्य सिद्ध कवच को देव दुर्लभ मंत्रों से सिद्ध कर सद्गुरु और शिव की शक्तियों का समायोजन किया गया है। गुरु पूर्णिमा पर्व के बाद आने वाला श्रावण मास का प्रथम सोमवार इसे धारण करने के लिये पूर्णतः अनुकूल दिवस है। जिसे धारण करने से साधक के जीवन में व्याप्त बाधाओं का समूल शमन होता है तथा उपरोक्त प्रतीकों की शक्तियाँ सायुज्य स्वरुप में साधक के भीतर स्थापित होती हैं।
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