





यह मानव जीवन परम आनन्द की प्राप्ति ब्रह्मानंद की प्राप्ति के लिये मिला है।
पशु के जीवन का आनन्द क्या है? भोज व भोग करना अर्थात् खाना खाना और बच्चे पैदा करना, वह भी अपने गडरिये (समाज) की दया पर या उनके आदेश पर। अगर आपने भी अपने गडरिये के आदेश पर अपने आनन्द को अपने घर-बार, सम्पत्ति, बाल-बच्चे तक सीमित रखा है तो आपका जीवन भी पशु तुल्य नहीं अपितु उससे भी निम्न है!! क्योंकि आपको तो मानव जन्म प्राप्त हुआ है, आप में तो वह ज्ञान पुन्ज सोचने समझने व अध्ययन करने की परम शक्ति है, आप ज्ञान को एक व्यक्ति से दूसरे व एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक विस्तार कर सकते हैं, जो हम शास्त्रों के, ग्रन्थों के माध्यम से आगे पहुँचाते हैं, “परन्तु आज के युग का सबसे बड़ा सन्ताप-दु:ख यही है कि आपने पढ़ना, अध्ययन करना, स्वयम् को दिव्य ज्ञान से पूर्ण करना साधना छोड़ दिया है।” यह ही प्रमुख कारण है आपके वियोग का, आपकी चिंता का, एक पशु की तरह भय से इधर-उधर भागते रहने का, डर का, कभी भी एक भी क्षण रूक कर जीवन के उस अमूल्य उपहार का आनन्द नहीं लिया। इस आनन्द की अनुभुति तभी सम्भव है जब आपका साक्षात्कार स्वयम् से, अपने ईष्ट से, अपने गुरू से होगा, वह उस गूढ ज्ञान से होगा जिसकी प्राप्ति से आपको उस परम आनन्द की ब्रह्मानंद की प्राप्ति होगी।
आपको अपने जीवन का गडरिया, मालिक स्वयम् बनना होगा, आपके सुख, विलास, भोग किसी और के नहीं अपितु स्वयम् आप के हाथों में हो।
इस 08-09-10 जुलाई को नारायण शक्तिमय गुरू पूर्णिमा महामाया महामालिनी अम्बिका लक्ष्मी साधना महोत्सव, रायपुर (छ.ग.) में सम्मिलित होकर आप गुरू चेतना में लीन होकर उस ब्रह्मानंद की प्राप्ति करें।
आपका अपना
विनीत श्रीमाली
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