





बहुत उपनिषदयुगीन कथा है कि याज्ञवल्क्य अपनी सारी संपत्ति अपनी दोनों पत्नियों को सौंपकर संन्यासी होना चाहता है। उसकी एक पत्नी तो राजी हो गई। आधी संपत्ति बहुत संपत्ति थी। लेकिन दूसरी पत्नी ने पूछा कि जो आप मुझे देने जा रहे हैं, यह क्या है? याज्ञवल्क्य ने कहा, यह संपदा है। पत्नी ने कहा, संपदा को छोड़कर आप क्यों जा रहे हैं? और अगर आप छोड़कर जा रहे हैं, तो आप किसकी तलाश में जा रहे हैं? पति ने कहा, मैंने तो समझ लिया कि यह संपदा नहीं है। और असली संपदा की खोज में जाता हूँ। तो पत्नी ने कहा, फिर असली संपदा की खोज में मुझे भी ले चलें। इस कचरे को मेरे लिये क्यों छोड़ जाते हैं? और अगर आपको पता ही चल गया है कि यह संपदा नहीं है तो मुझे देने की बात ही क्यों उठाते हैं?
संपदा जिनके पास है, वे भलीभांति जान लेते हैं, उससे कुछ भी मिलता नहीं है, जो मूल्यवान है। जो भी उससे खरीदा जा सकता है, वस्तुतः उसका कोई मूल्य नहीं है। संपत्ति से जो खरीदा जा सकता है, उसका कोई भी ऐसा मूल्य नहीं है जो शाश्वत हो, नित्य हो, ठहरने वाला हो। लेकिन हम अपने खाली मन को भर लेते हैं।
ऋषि कहता है, संन्यासी की संपदा क्या है? उसकी संपदा को वह कहता है, एक तो ब्रह्मचर्य है। उसका आचरण ऐसा होगा, जैसे स्वयं परमात्मा उसके भीतर विराजमान होकर आचरण करता हो।
यह ब्रह्मचर्य शब्द बहुत कीमती है। इसे तथाकथित नीतिवादियों ने बुरी तरह विकृत किया है। क्योंकि जब भी कोई कहता है ब्रह्मचर्य, तो हमें तत्काल ख्याल आता है, कामवासना का नियंत्रण। ब्रह्मचर्य बहुत बड़ा शब्द है और कामवासना का नियंत्रण क्षुद्र और साधारण सी बात है। ब्रह्मचर्य शब्द का अर्थ होता है, ब्रह्म जैसी चर्या। ऐसे जीना, जैसे परमात्मा ही जी रहा हो। ब्रह्मचर्य बहुत विराट शब्द है। लेकिन हमने इस विराट शब्द को बुरी तरह बिगाड़ा है।
अगर परमात्मा की कोई चर्या होगी, तो वैसी ही चर्या संन्यासी की चर्या है। असल में संन्यासी इस बोध से ही उठता है कि परमात्मा उठा मेरे भीतर, इस बोध से ही चलता है कि परमात्मा चला मेरे भीतर, इस बोध से ही बोलता है कि परमात्मा बोला मेरे भीतर, इस बोध से ही जीता है कि परमात्मा जीया मेरे भीतर। संन्यासी स्वयं को तो विदा कर देता है और परमात्मा को प्रतिष्ठित कर देता है। उसका जो भी है, वह सब परमात्मा का है।
ऐसे अपने भीतर परमात्मा को जिसने प्रतिष्ठित किया हो, जो परमात्मा का मन्दिर ही बन गया हो, उसके आचरण का नाम ब्रह्मचर्य है। निश्चित ही, उसमें काम-नियंत्रण तो आ ही जाता है। उसकी चर्चा करने की भी कोई जरूरत नहीं रह जाती। लेकिन ब्रह्मचर्य मात्र काम नियंत्रण नहीं है, काम नियंत्रण एक छोटा सा अंग है, ब्रह्मचर्य बहुत बड़ी बात है।
ऋषि कहता है, ब्रह्मचर्य संपदा है। क्योंकि जिसने यह अनुभव कर लिया कि मेरे भीतर परमात्मा है, उससे अब कुछ भी छीना नहीं जा सकता। एक ही है सत्व, जो हमसे छीना नहीं जा सकता। वह सत्व ऐसा होना चाहिये, जो हमारा स्वरूप भी हो। जिसे हमसे अलग करने का उपाय ही नहीं है, वह केवल परमात्मा है। बाकी सब हमसे अलग किया जा सकता है। मित्र हो, पत्नी हो, बेटा हो, सब हमसे जुदा किये जा सकते हैं। अपना शरीर भी अपने साथ नहीं होगा। अपना मन भी अपने साथ नहीं होगा। सिर्फ एक ही सत्य है, एक ही अस्तित्व परमात्मा का, जो हमसे छीना नहीं जा सकता। तो हमारा होना ही है, उसे अलग करने का कोई मार्ग नहीं है। उसे यह ऋषि कहता है, संपदा है।
आचरण ब्रह्म जैसा! लेकिन आचरण तो बाहर होता है। आचरण का अर्थ ही होता है, बाहर। चर्या का अर्थ ही होता है, बाहर। चर्या का अर्थ ही होता है, दूसरों के संबंध में। अकेले कोई आचरण नहीं होता।
एक बदमाश व्यक्ति था कालिया, वह एक बार जुए में पकड़ा गया था। एक राजधानी में धर्मगुरूओं की एक बड़ी समिति थी। एक यहूदी धर्मगुरू, एक ईसाई धर्मगुरू, एक हिंदू धर्मगुरू और कालिया एक ही होटल में ठहराये गये थे। लेकिन रात जुए में पकड़े गये चारों। सुबह जब अदालत में मौजूद किये गये, तो मजिस्ट्रेट भी थोड़ा संकोच से भर गया। कल सांझ ही इनके प्रवचन उसने सुने थे। और बड़ा प्रभावित हुआ था। लेकिन पुलिस का आदमी ले आया था अदालत में, तो अब मुकदमा तो चलता ही। फिर भी उसने सोचा, जल्दी निपटा देने जैसा है। इसे आगे खींचने जैसा नहीं है।
पूछा उसने ईसाई पुरोहित से कि क्या आप जुआ खेल रहे थे? तो पुरोहित ने कहा, क्षमा करें, यह बहुत सी बातों पर निर्भर करेगा कि आप जुये की व्याख्या क्या करते हैं। ऐसे तो पूरी जिंदगी ही जुआ है। मजिस्ट्रेट जल्दी मुक्त करना चाहता था। उसने कहा साफ-साफ कहिये, आप जुआ नहीं खेल रहे थे? ईसाई पुरोहित ने कहा, पूरी जिंदगी ही जुआ है जहां, वहां जुए से बचा कैसे जा सकता है। फिर भी जज ने कहा, मैं समझ गया कि आप जुआ नहीं खेल रहे थे, आप बरी किये जाते हैं।
यहूदी रबी से पूछा गया, आप जुआ खेल रहे थे? क्योंकि आपके सामने टेबिल पर रूपये रखे थे और ताश पीटे जा रहे थे। यहूदी रबी ने कहा, क्षमा करें, अभिप्राय अपराध नहीं है। अभी जुआ शुरू नहीं हुआ था, अभी सिर्फ आशय था। हम शुरू करने को ही थे जरूर, लेकिन अभी शुरू नहीं हुआ था। और जो शुरू नहीं हुआ है, अभी अदालत के कानून के बाहर है। जज ने कहा, माना। आप बरी किये जाते हैं, आप जुआ नहीं खेल रहे थे, सिर्फ अभिप्राय पर कोई कानून नहीं लग सकता।
हिंदू धर्मगुरू से पूछा, आप भी इसमें सम्मिलित थे? तो उन्होंने कहा, यह जगत माया है। जो दिखाई पड़ता है, वैसा है नहीं। कैसा जुआ? कैसे पत्ते? कौन पकड़ा गया? किसने पकड़ा? मजिस्ट्रेट ने कहा, मैं समझ गया। आप जायें। जब जगत ही असत्य है, तो कैसा जुआ? बिलकुल ठीक कहते हैं।
लेकिन कालिया बहुत मुसीबत में था, क्योंकि उसी के हाथ में पत्ते पीटते हुये पकड़े गये थे, और उसी के सामने पैसों का ढेर भी लगा था। मजिस्ट्रेट ने कहा कि इन तीनों को छोड़ देना तो आसान था, कालिया तुम्हारे लिये क्या करें? तुम क्या जुआ खेल रहे थे? कालिया ने पूछा, क्या मैं पूछ सकता हूं, किसके साथ? क्योंकि वे तीनों तो जा ही चुके थे, बरी हो चुके थे। कालिया ने कहा, अकेले भी जुआ अगर खेला जा सकता है, तो जरूर खेल रहा था। इस बात को सुन कर मजिस्ट्रेट को कालिया को भी बरी करना पड़ा।
हमारा सारा आचरण दूसरे के संबंध में है। अकेले के आचरण को कोई अर्थ नहीं है। सत्य बोलें तो किसी से, झूठ बोलें तो किसी से, चोरी करें तो किसी की, अचोर रहें तो किसी के संबंध में। हमारा सब आचरण दूसरे से संबंध है। इसलिये ऋषि ने पहले तो कहा, ब्रह्मचर्य संपदा है संन्यासी की। ब्रह्मचर्य, दूसरे के साथ ऐसा संबंधित होना, जैसे ईश्वर संबंधित होता हो।
और दूसरी बात कही, भीतर, शांति! आचरण तो बाहर है। भीतर परम मौन, सन्नाटा, शांति। वहां कोई तरंग भी न उठे, वहां कोई लहर न उठे, वहां जीवन की जो ऊर्जा है, चेतना है, वह कंपित न हो। ऐसी निष्कंप मौन शांति, जहां हवा का एक झोंका भी नहीं, उसे आंतरिक संपदा कहा है।
आचरण ईश्वर जैसा, अंतस निर्वाण जैसा- शून्य, शांत, मौन। ऋषि कहता है, यही संपदा है, जो छीनी नहीं जा सकती। इसके अतिरिक्त जो किसी और चीज को संपदा समझकर बैठे हैं, वे अति दीन है, दरिद्र है। उनकी दरिद्रता को वे कितना ही छिपाने की कोशिश करें, वह जगह-जगह से प्रकट होती रहती है। धन उनके पास होता है, वे स्वयं धनी नहीं हो पाते, क्योंकि धन उनसे किसी भी क्षण छीना जा सकता है। और धन न भी छीना जाये, तो भी धन सिर्फ धनी होने का धोखा है। क्योंकि भीतर की दीनता तब तक नहीं मिटती, जब तक तनाव न मिट जाये। जब तक अशांति न मिट जाये, तब तक भीतर समृद्धि का जन्म नहीं होता। जब तक इतना भीतर सघन परमात्मा प्रकट न होने लगे कि चारों तरफ उसकी किरणें बिखरने लगें, तब तक व्यक्ति सम्राट नहीं है। तब तक व्यक्ति हजार-हजार रूपों में गुलाम ही होता है। संन्यासी तो सम्राट है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,