





पितर अर्थात हमारे पूर्वज, जिनके हम वंशज हैं, पुत्र हैं, पौत्र हैं, उनका अलग लोक होता है और यदि वे किन्हीं कारणों से भटकते रहते हैं, तो यह उनकी संतानों का कर्त्तव्य हो जाता है, कि वह उनके परलोक को सुधारें और उन्हें मुक्ति प्रदान करवायें।
आधुनिकता के रंग में रंगा समाज इस प्रभाव को स्वीकार नहीं कर पाता तथा इसके कारण घटने वाली घटनाओं को नहीं समझ पाता और दिन-प्रतिदिन तनाव, चिन्ता, व्याधि में उलझता चला जाता हैं।
पितृ दोष या प्रेतात्मा का प्रभाव होने के फलस्वरूप घर में ऐसी घटनायें घटने लगती है, जिसके कारण घर में निरन्तर तनाव और लड़ाई होने लगती है और घर-परिवार के सदस्य इसके मूल को नहीं समझ पाते, वे यह नहीं सोच पाते, कि जो सदस्य आज तक उनके अनुकूल था, वह अचानक उनके विपरीत कैसे हो गया है?
इनके कारणों को समाप्त करने के लिये व्यक्ति विविध उपाय करता है तथा बाह्य कारणों में ही उलझा रहता है। ये तनाव किसी विशेष कारणों में ही उलझा रहता है। ये तनाव किसी विशेष घटना को लेकर नहीं, वरन छोटी-छोटी घटनाओं के कारण होते हैं। घर के सदस्य इन्हें सुलझाने में अधिक उलझ जाते हैं।
इन परिस्थितियों में यदि व्यक्ति किसी प्रकार इन घटनाओं के मूल तक पहुँच पाता है, तो उसे ज्ञात होता है, कि यह पितृ दोष या प्रेतात्मा का प्रभाव है। ज्यादादर यही देखने में आता है, कि व्यक्ति इनके अस्तित्व को स्वीकार करता तो है, परन्तु इनके निराकरण के अनुकूल उपाय को नहीं ढूंढ़ पाता।
पाश्चात्य देशों में भी अनेक प्रकार के शोध इस विषय पर हुये हैं और उन्होंने पाया है, कि प्रेतात्मा से पीड़ित व्यक्ति के पूरे परिवार पर इसका प्रभाव व्याप्त होता ही है।
लेकिन इसका निराकरण क्या है, वे अभी तक नहीं जान पाये हैं और इसके लिये वे भारतीय मंत्रों की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
हमारे विभिन्न ग्रंथों में इसके प्रभाव को समाप्त करने हेतु विशद रूप से वर्णन है। यदि व्यक्ति अपनी गौरवमयी साधनाओं को पुनः अपने जीवन में उतार ले, तो वह अपनी नाना प्रकार की समस्याओं का समाधान कर सकेगा।
यद्यपि लोग श्राद्ध करने से पितृ दोष की समाप्ति समझते है, परन्तु त्रुटि रह जाने के कारण ऐसे प्रभाव उत्पन्न हो जाते है, जिनका विधिवत उपाय न किया जाय, तो घर अव्यवस्थित हो जाता है।
यदि आप चाहें, तो स्वयं अपने घर पर व्याप्त इस प्रभाव को समाप्त कर सकते हैं, आप स्वयं इस प्रयोग को सम्पन्न करिये, किसी अन्य के भरोसे नहीं, वरन स्वयं करके देखिये।
यदि आपके घर में चिंता, कष्ट, व्याधि, तनाव समाप्त नहीं हो रहे है और आप विविध उपाय कर चुके है, तो आप इस श्राद्ध पक्ष में सम्पन्न होने वाली धूर्जटा साधना को, जो इसका अचूक उपाय है, सम्पन्न करिये।
साधना विधान
इस साधना में आवश्यक सामग्री है- ‘‘धूर्जटा यंत्र’’ व धूर्जटा माला’’।
यह एक दिवसीय रात्रिकालीन साधना है, जो श्राद्ध पक्ष के किसी मंगलवार को की जानी चाहिये।
साधक श्वेत वस्त्र धारण कर यह साधना अत्यन्त शारीरिक व मानसिक पवित्रता के साथ सम्पन्न करें।
साधना के दिन अत्यन्त पवित्रता पूर्वक मानसिक रूप से गुरू मंत्र जप करते रहें।
लकड़ी के बाजोट पर ताम्रपात्र में धूर्जटा यंत्र स्थापित कर, उसका पूजन धूप, दीप, कुंकुम, अक्षत तथा पुष्प से करें।
साधक यंत्र के समक्ष स्तुति करें-
विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुदेवता।
पाहि नस्त्वेन तस्मादाजन्ममरणान्तिकात्।।
तिस्त्र कोटयोऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुमब्रवीत्।
दिवि भूम्यन्तरिक्षे च तानि ते सन्ति जाह्नवि।।
नन्दिनीत्येव ते नाम देवेषु नलिनीति च।
क्षमा पृथ्वी च विहगा विश्वकाया शिवामृता।।
विद्याधरा सुप्रसन्ना तथा लोकप्रसादिनी।
क्षेम्या तथा जाह्नवि च सर्वदा शान्तिदायिनी।।
हाथ में जल लेकर यह भावना दें, कि ‘‘ मैं यह जलांजलि समस्त पितरों को दे रहा हूं’’ तथा जल धरती पर छोड़ दें।
अपने समस्त पितरों को भी इसी प्रकार से निम्न मंत्र बोलते हुये जलांजलि दें-
ये बान्धवाऽबान्धवा वा अन्यज्जन्मनि बान्धवाः।
ते तृप्तिमखिला यान्तु यश्चास्मतोऽभिवांचति।।
तत्पश्चात् निम्न मंत्र की 21 माला मंत्र जप करें-
मंत्र
।। ऊँ धूं धूं धूर्जटायै सर्वदारणायै फट्।।
इसके बाद निम्न स्तुति करें-
नमस्ते विश्वरूपाय नमस्ते विष्णुसुखाय वै।
सहस्त्ररश्मये नित्यं सर्वतेजसे।।
नमस्ते सर्ववपुषे नमस्ते सर्वशक्तये।
जगत्स्वामिन् नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित।।
पद्माभ नमस्तेऽतु कुण्डलांगदधारिणे।
नमस्ते सर्वलोकेश सर्वासुरनमस्कृत।
सुकृतं दुष्कृतं चैव सम्यग्जानासि सर्वदा।
सत्यदेव नमस्तेऽस्तु सर्वदेव नमोऽस्तुते।।
दिवाकर मनस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तुते।।
साधना समाप्त करने के बाद यंत्र व माला के साथ दो काली मिर्च के दाने और थोड़ी सी हींग रख कर किसी साफ कपड़े में बांधें तथा उसे नदी में प्रवाहित कर दें।
इस प्रकार यह साधना पूर्ण होती है तथा साधक को इच्छित फल की प्राप्ति होती है।
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