





यह सही है कि आत्मा अविनाशी होती है, पर आत्मा का निवास देह में होता है और मनुष्य जन्म में आत्मा जिस देह को धारण करती है उस देह के साथ-साथ आस-पास के वातावरण, परिवार, सगे-सम्बन्धियों, संतान इत्यादि से लगाव होना स्वाभाविक है। मनुष्य की कामनाएं, देह की कामना के साथ-साथ, मन की कामनाएं भी होती है, क्योंकि मन, प्राण, आत्मा ही देह को संचालित करते है। मूल रूप से संचालक तो मन, प्राण, आत्मा है।
हर व्यक्ति के जीवन में सारी ईच्छायें पूर्ण नहीं होती है। वह अपने जीवन में अतृप्त रहता है, कई बार सांसारिक दुःखों, व्याधियों के कारण उसकी मन-आत्मा पर एक बोझ आ जाता है। यह बोझ किसी न किसी कमी का हो सकता है, व्यवहार अर्थात् झगड़े का हो सकता है अथवा अपने से जुड़े हुये लोगों के साथ अतिप्रेम का भी हो सकता है।
जब यह बोझ मुक्त नहीं होता है तो मनुष्य मरते समय असीम पीड़ा का अनुभव करता है और उसकी आत्मा मुक्त नहीं हो पाती। न तो वह परमात्मा में मिल पाती है और न ही कोई नया गर्भ या जीव को धारण करती है।
ऐसी अतृप्त आत्मा सूक्ष्म रूप में निरन्तर भटकती रहती है और उनकी क्रिया के कारण, उनके परिवार में कई बार विचित्र स्थिति, विचित्र घटनाएं उत्पन्न होने लगती है। जिसे वे समझ नहीं पाते, इसके कारण परिवार में कलह भी हो सकता है, बीमारी भी आ सकती है अथवा असंयत व्यवहार भी हो सकता है। ये स्थितियां अन्य लोगों को स्वाभाविक जीवन जीने नहीं देती।
आपके पितेृश्वर भी अतृप्त आत्मा हो सकते है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में कर्म बंधन बांधे थे। उनका प्रभाव उनके परिवार पर अवश्य पड़ता है। ऐसी अतृप्त पितरेश्वरों को मुक्ति दिलाना, उनके संतानों का कर्तव्य है। यदि वे अपने इस कर्त्तव्य को पूरा नहीं करते है तो उन्हें जीवन भर परेशानी उठानी पड़ती है।
हमारे शास्त्रों में श्राद्ध, पितेृश्वर मुक्ति और पितृपक्ष के पन्द्रह दिन इसीलिये नियत किये गये है कि आप इन दिनों में उन पितरों के लिये तर्पण, साधना, पूजा इत्यादि द्वारा कोई ऐसी क्रिया अवश्य करें, जिससे वे मुक्त आत्मा बन सके, उनकी अतृप्त भावना समाप्त हो सकें। इसीलिये हर व्यक्ति को श्राद्ध कर पितेृश्वर मुक्ति साधना, पूजन, तर्पण अवश्य करना चाहिये ताकि उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति प्राप्त हो।
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