

नवरात्रि का यह विशेष पर्व अपने भीतर से अज्ञानता, दोष, कमियां निकाल बाहर कर अपने भीतर शक्ति भरने का पर्व है, यदि संसार विपत्ति सागर है, तो उसमें से पूर्ण रूप से बाहर निकलने के लिये शक्तिमान होना ही पड़ेगा, अपने भीतर शक्ति सामर्थ्य भरनी पड़ेगी, यह शक्ति ही अपने अलग-अलग रूप में विद्यमान हो कर मनुष्य के कार्य सम्पन्न करती है।
शक्ति प्राप्ति का तात्पर्य बल से नहीं लगाया जा सकता यद्यपि व्यवहार में शक्ति का प्रयोग इसी रूप में व्यवहृत किया जाता है। भगवती शक्ति के तीन विशिष्ट स्वरूपों का वर्णन है कि चित्तस्वरूपिणी महासरस्वती, सम्पूर्ण द्रव्य, धन-धान्य रूपिणी महालक्ष्मी तथा कालविजयी आनन्दरूपिणी महाकाली की अभ्यर्थना-आराधना सम्पन्न करता है, उसके जीवन में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं रहती।
नवरात्रि के चैतन्य दिवसों पर सद्गुरूदेव जी द्वारा त्रि-शक्ति दीक्षा ग्रहण करने पर महाकाली चेतना युक्त शत्रु नाश, रोग नाश, भय बाधा नाश जैसी असुरमय कुस्थितियों का शमन होता है। जिसके फलस्वरूप सांसारिक जीवन ऐश्वर्य प्राप्ति, धन सुख, आयु सुख परिवार सुख युक्त महालक्ष्मीमय सुस्थितियों की वृद्धि होती है। इसके साथ ही देवी सरस्वती जीवन को उन्नति के ओर ले जाने वाली, पवित्रता, शांति, विद्या, कला, सम्मान की सुस्थितियां प्राप्त होती है।
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