





विभूति, नम्रता, कान्ति, तुष्टि, कीर्ति, सन्नति, पुष्टि, उत्कृष्टि तथा ऋद्धि, लक्ष्मी की ये नौ पीठ, नौ कलाएं है, जिस व्यक्ति में इन पीठ शक्तियों का विकास होता है, वहीं लक्ष्मी विराजमान होती है।
सांसारिक कर्त्तव्य करते हुए दान रूपी कर्त्तव्य जहां विद्यमान होता है, अर्थात् शिक्षा दान, रोगी सेवा, जल दान इत्यादि कर्त्तव्य लक्ष्मी की ‘विभूति’ नामक लक्ष्मी पीठिका है, यह लक्ष्मी निवास की पहली शक्ति है, दूसरी शक्ति ‘नम्रता’ है, जितना व्यक्ति नम्र होता है लक्ष्मी उसे उतना ही ऊँचा उठाती है। जब ‘विभूति’ व ‘नम्रता’ दोनों कलाएं आ जाती है तो वह लक्ष्मी की तीसरी कला ‘कान्ति’ का पात्र हो जाता है, चेहरे पर एक तेज आता है और इन तीनों कलाओं की प्राप्ति होने पर ‘तुष्टि’ नामक चतुर्थ कला का आगमन होता है, वाणी सिद्धि, व्यवहार, गति, नये-नये कार्य पुत्र प्राप्ति, नई दिव्यता सब उसमें एकरस होती है। इसके बाद आगमन होता है लक्ष्मी की पांचवीं पीठ अधिष्ठात्री कला ‘कीर्ति’ की उपासना करने से साधक अपने जीवन में धन्य हो जाता है, संसार के आधार का अधिकारी हो जाता है।
कीर्ति साधना से लक्ष्मी की छठी कला ‘सन्नति’ मुग्ध होकर विराजमान होती है, और इसके बाद आगमन होता है ‘पुष्टि’ नामक सातवीं कला का, जिससे साधक जीवन में एक संतुष्टि अनुभव करता है। उसे अपने जीवन का सार मालूम पड़ता है, फिर उसकी साधना से उत्पन्न होती है आठवी कला जिसे ‘उत्कृष्टि’ नाम प्राप्त है, जिसके जीवन में जो क्षय दोष होता है, वह समाप्त हो जाता है। केवल वृद्धि ही वृद्धि होती है, और इसके पश्चात् सबसे महत्त्वपूर्ण सर्वोत्तम ‘ऋद्धि’ नामक पीठाधिष्ठात्री अपने आप आ ही जाती है।
इन नौ पीठों, नौ कलाओं से हीन व्यक्ति के पास लक्ष्मी नहीं आ सकती और न ही स्थायी रहती है, लेकिन इन नौ पीठ शक्तियों का आधार है ‘दया’ और जहां दया की साधना है वहां सब कुछ है, क्योंकि दया के गर्भ में ही तो महालक्ष्मी और विष्णुपद विराजमान है।
जो आपत्ति झेलने में, कष्ट उठाने में, परिश्रम करने में सहनशील नहीं है, उस पर भगवती लक्ष्मी कभी प्रसन्न नहीं रहती।
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