





दीपावली का पर्व पूर्ण ‘विजय पर्व’ है, इस पर्व का तात्पर्य दरिद्रता पर विजय, कष्टों पर विजय, अभावों, परेशानियों और पीड़ाओं, दुःख, दैन्य और दरिद्रता पर विजय प्राप्त करने का पर्व है। यह पर्व ऐसा है जिसे पूरा भारतवर्ष एक साथ उमंग और उल्लास के साथ मनाता है। विदेशों में भी इस पर्व को विजय पर्व के रूप में मनाते हैं।
दीपावली के दिन माता लक्ष्मी पृथ्वी पर आती है और भ्रमण करती है। इसलिये माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व हैं, जिससे प्रत्येक व्यक्ति के घर में सुख समृद्धि बनी रहे और धन की वर्षा होती रहे। देवी लक्ष्मी धन की देवी हैं। माता लक्ष्मी की कृपा से ही वैभव व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
माता लक्ष्मी वह शक्ति है जो व्यक्ति को उसके जीवन लक्ष्य तक ले जाती है। महालक्ष्मी महान धन को दर्शाती हैं जिसमें सभी आठ पहलू शामिल हैं – आदि लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, विद्या लक्ष्मी, धन्य लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, धैर्य लक्ष्मी, विजया लक्ष्मी और भाग्य लक्ष्मी। इसके अलावा, वह आध्यात्मिक संपदा को भी दर्शाती है जो तीनों लोकों – आदिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक – में एक व्यक्ति की भलाई का ख्याल रखती है।
भगवती महालक्ष्मी त्रिगुणात्मक स्वरूप में सम्पूर्ण विश्व में वन्दनीय है क्योंकि वे पूरे विश्व का आधार भगवती लक्ष्मी है। जो क्षीर सागर से उत्पन्न, समस्त संसार का पालन पोषण करने वाली, जीवन में सुख-सौभाग्य और आनन्द, पूर्णता प्रदान करने वाली महादेवी है। लक्ष्मी के बिना तो जीवन का आधार भूत सत्य समाप्त हो जायेगा। जीवन के दोनों पक्ष है, आध्यात्मिक और भौतिक। आध्यात्मिक जीवन का आधार भी लक्ष्मी ही है क्योंकि अध्यात्म रहेगा मनुष्य में और मनुष्य जीवित रहेगा जल से, अन्न से, आवास से पर इसके मूल में तो लक्ष्मी ही है। ठीक इसी प्रकार से सम्पूर्ण भौतिक सम्पदा की अधिष्ठात्री देवी महादेवी ही है।
लक्ष्मी प्राप्ति तो देवी कृपा या भगवती लक्ष्मी की साधना से ही संभव है और जो व्यक्ति अहंकार से ग्रसित है, जो व्यक्ति नास्तिक है, जो व्यक्ति देवताओं को, साधनाओं को, आराधनाओं को, सिद्धियों को, मंत्रों को नहीं पहचानता या विश्वास नहीं करते वे जीवन में बहुत बड़े अभाव को पाल-पोस रहे होते है। उनके जीवन में सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं होता। निर्धनता उनके चारों और मंडराती रहती है।
लक्ष्मी को पूर्णता से प्राप्त करने व अपने घर में स्थायी रूप से निवास कराने के लिये ऋषि मुनियों ने तंत्र की विशेष साधना पद्धति ढूंढ निकाली है, जो अभी तक अपने आप में गोपनीय और दुर्लभ रही है। यह एक ऐसी साधना है, जिसके माध्यम से हमेशा के लिये दुःख, दैन्य और कष्ट समाप्त हो जाता है। यह एक ऐसी साधना है, जिसके द्वारा लक्ष्मी से सम्बन्धित पूर्वजन्म के दोष नष्ट हो जाते हैं और यह एक मात्र ऐसी साधना है, जिससे घर में निरन्तर धन-धान्य, सुख-सौभाग्य तथा ऐश्वर्य की वृद्धि होती रहती है।
साधना –
यह तीन दिवस की साधना है, जो धन त्रयोदशी से प्रारम्भ होती है और दीपावली के दिन तक चलती है। इस प्रकार यह प्रत्येक वर्ष कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी से कार्तिक अमावस्या तक रहती है। इस अवधि में यह साधना सम्पन्न की जाती है। यह साधना पुरूष या स्त्री कोई भी अपने घर में सम्पन्न कर सकता है।
साधना विधि-
प्रातः काल उठ कर स्नान कर सफेद वस्त्र धारण कर सफेद आसन पर बैठकर पूर्व की ओर मुंह कर साधना सम्पन्न करनी चाहिये। इस साधना में स्फटिक या हकीक माला का प्रयोग किया जाता है, इस माला की विशेषता यह होनी चाहिये कि इस माला का प्रयोग किसी अन्य साधना में नहीं किया हुआ हो। इस माला से केवल इसी साधना को सम्पन्न किया जा सकता है।
इसमें घी का दीपक और तेल का दीपक साधना काल में अखण्ड रूप से जलता रहना चाहिये। नित्य 11 माला मंत्र जप आवश्यक है। यह साधना प्रातः काल या रात्रि को सम्पन्न की जा सकती है।
साधना काल में साधक के लिये यह जरूरी नहीं है कि एक समय भोजन करे, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करे, जमीन पर सोवे, वह जिस प्रकार से चाहे अपनी दिनचर्या व्यतीत कर सकता है।
साधना सामग्री-
इस साधना में सभी सामग्री पवित्र, दिव्य और अखण्ड लक्ष्मी मंत्र से सिद्ध होनी चाहिये, तभी साधना में सिद्धि प्राप्त हो सकती है।
विशिष्ट लक्ष्मी कुबेर मंत्रों से सिद्ध चैतन्य पारद कुबेर विग्रह।
तीन हकीक पत्थर, महालक्ष्मी, अखण्ड कुबेर लक्ष्मी और सौभाग्य लक्ष्मी।
रावणकृत कुबेर साधना से सिद्ध गोमेती चक्र।
लक्ष्मी मंत्र से सिद्ध अखण्ड लक्ष्मी माला
अन्य सामग्री-
इसके अलावा कुछ अन्य सामग्री पहले से ही व्यवस्था करके रख लेनी चाहिये- 1.आसन, 2.जल पात्र, 3.कुंकुम, 4.चावल, 5.पुष्प, 6.घी का दीपक तथा तेल का दीपक, 7.दूध का नैवेद्य।
साधना प्रयोग-
प्रातः काल स्वयं या अपनी पत्नी के साथ शुद्ध शांत चित्त भाव से आसन पर बैठ जायें और सामने सारी सामग्री रख दें। अपने सामने एक बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर कुबेर लक्ष्मी का चित्र स्थापित करें। इसके अलावा सारी सामग्री किसी पात्र में रख दें, फिर ‘‘महालक्ष्म्यै नमः’’ मंत्र का उच्चारण करते हुये इस सारी सामग्री को जल से स्नान करायें, फिर कच्चे दूध से धोयें और पुनः जल से या गंगाजल से धोयें, फिर सबको पोंछकर चांदी, स्टील या ताम्र के पात्र में स्थापित कर दें और सब पर कुंकुम या केसर का तिलक करें, फिर इत्र छिड़के, पुष्प चढ़ायें और अगरबत्ती जलायें। अब अखण्ड लक्ष्मी माला से निम्न मंत्र का जप करें। यह 11 माला मंत्र जप आवश्यक है। तीनों दिन के लिये अलग अलग मंत्र हैं।
मंत्र
प्रथम दिन ओऽम् हीं मणिभद्रे हुं।
दूसरे दिन ओऽम् ऐं विराट देव्यै हुं।
तीसरे दिन ओऽम् श्रीं तैवांग भद्रे हुं।
प्रतिदिन मंत्र जप सम्पन्न होने के पश्चात् कपूर से लक्ष्मी जी की आरती करें। तीसरे दिन साधना सम्पन्न होने के पश्चात् चैतन्य पारद कुबेर विग्रह को अपने पूजा स्थान में रखें। कभी-कभी साधना के समय माला को धारण कर लें। इसके अलावा बाकी सभी सामग्री को कार्तिक पूर्णिमा तक पूजा स्थान में ही रख दें और इसके दूसरे दिन या तो पूजा स्थान में ही रखी रहे या पीले वस्त्र में लपेटकर घर में पवित्र स्थान में रख दें।
चर्तुविघ्न स्वरूप में अष्ट सिद्धि नवनिधि धन लक्ष्मियों की प्राप्ति हो सके, इसी हेतु शनि प्रदोष युक्त धनवन्तरी पर्व, हनुमान जयंती, अर्नगल नारकीय स्वरूप दोष-संताप निवृत्ति चतुर्दशी व महालक्ष्मी दीपावली पर्व गुरू सानिध्य में महोत्सव रूप में सम्पन्न करने से पूरे परिवार में महालक्ष्मी की दिव्यता का विस्तार सभी सदस्यों को निरन्तर कामनापूर्ति युक्त बनाये रखता है। लक्ष्मीमय जीवन वृद्धि हेतु सपरिवार आना श्रेष्ठ रहेगा। इसी हेतु साधना सामग्री व दीक्षाओं युक्त अटूट कुबेर श्री ज्वालामालिनी महालक्ष्मी विग्रह प्रदान किया जायेगा।
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