





देवाधिदेव महादेव भगवान् आशुतोष शिव जी ने जगज्जननी जगदम्बिका पार्वती को ‘श्रीरामरक्षास्तोत्र’ का उपदेश देते हुये बताया कि हे गिरिराज किशोरी! श्रीराम की सर्वदा विजय ही होती है-
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर।।
भाव यह है कि राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम जी सदा विजयी होते हैं। मैं लक्ष्मीपति भगवान राम का भजन करता हूं, जिन रामचन्द्र जी ने सम्पूर्ण राक्षस सेना का ध्वंस कर दिया था, मैं उनको प्रणाम करता हूं। राम से बड़ा और कोई आश्रय नहीं है। मैं उन रामचन्द्र जी का दास हूं। मेरा चित्त सदा राम में ही लीन रहे, हे राम! आप मेरा उद्धार कीजिये।
राजाओं के जय-पराजय के आख्यानों से इतिहास भरा पड़ा है। एक से बढ़कर एक राजा हुये। उनमें समय-समय पर भिन्न-भिन्न कारणों और उद्देश्यों से परस्पर युद्ध भी हुये। युद्ध में किसी की जीत हुई तो कोई युद्ध हार गया। एक ही राजा कभी विजयी हुआ तो कभी पराजित। प्रायः प्रत्येक राजा को उत्कर्षापकर्ष के उच्चावच से गुजरना पड़ा। कोई भी राजा ऐसा नहीं हुआ, जिसकी सर्वदा विजय हुई हो, किंतु श्रीराम ऐसे राजा हुये जिनकी सदा विजय ही हुई और सर्वदा विजय ही होती है।
श्रीराम राजाओं के मुकुटमणि हैं। वे भूपाल चूड़ामणि हैं। श्रीराम नर श्रेष्ठ हैं। वे राजाओं में भी राजमणि हैं। श्रीराम में ऐसे-ऐसे अद्भुत गुण हैं कि वे समस्त नागरिकों, विशिष्ट जनों, गुरूजनों, आबालवृद्धजनों, महिलाओं, निर्बलों, रसिकों, वैरागियों, योगियों तथा वीरों को भी अत्यन्त प्रिय लगते हैं। श्रीराम इनके मन को अपने गुणों से अपने में आकर्षित कर लेते हैं। श्रीराम के सद्गुणों पर शत्रु भी विमुग्ध हो जाते हैं।
एक बार महर्षि वाल्मीकि जी ने देवर्षि नारदजी से पूछा- मुने! इस समय इस संसार में गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्यवक्ता, दृढ़प्रतिज्ञ, सदाचारी, समस्त प्राणियों का हितसाधक, सामर्थ्यशाली तथा प्रियदर्शन कौन है? इस पर देवर्षि नारदजी ने बड़ी ही प्रसन्नता से कहा- महर्षे! इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न एक ऐसे पुरूष हैं जो राम के नाम से विख्यात हैं, वे ही मन को वश में रखने वाले, महाबलवान्, कान्तिमान्, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय हैं। वे बुद्धिमान, नीतिज्ञ, वक्ता, शोभायमान तथा शत्रु संहारक हैं। वे धर्म के ज्ञाता, सत्य प्रतिज्ञ तथा प्रजा के हित साधन में लगे रहने वाले हैं। वे यशस्वी, ज्ञानी, पवित्र, जितेन्द्रिय, मन को एकाग्र रखने वाले, प्रजापति के समान पालक, श्री सम्पन्न, वैरिविध्वंसक और जीवों तथा धर्म के रक्षक हैं। सम्पूर्ण गुणों से युक्त वे श्रीरामचन्द्र जी अपनी माता कौशल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले हैं, गम्भीरता में समुद्र और धैर्य में हिमालय के समान हैं।
अनन्तानन्त गुणावलियों के मूर्तरूप- श्रीराम ने अपने जीवन में पूर्णतया नैतिक आचरणों का प्रयोग करके संसार के समक्ष ऐसा अनुपम उदाहरण रखा कि प्रजा उनके आचरणों पर मुग्ध हो गयी। श्रीराम का माता-पिता एवं गुरूजनों में भक्ति भाव, प्रजावात्सल्य, अदम्य वीरता, साहस और पराक्रम आदि ऐसे अद्भुत गुण हैं जो सबको सहज ही आकृष्ट कर लेते हैं। मिथिला की पुरवासिनी स्त्रियां श्रीराम के इन गुणों पर इतनी विमुग्ध हैं कि वे अपने राजा (जनक) की प्रतिज्ञा को भी उनकी मूढ़ता करार देती हैं तथा श्रीराम के साथ सीता का विवाह बिना धनुर्भंग किये ही कर देने का प्रस्ताव रख देती हैं। इन परवासिनियों की यह उत्कट अभिलाषा है कि यदि सीता के संग इनका विवाह हो गया तो ये जब-जब जनकपुर में आया करेंगे तब-तब इन्हें देख कर हमें आनन्द प्राप्त होता रहेगा।
गुणार्णव श्रीराम सर्वथा गुणातीत हैं। वे सर्वथा अमानी हैं। उन्हें अपने गुणों का किचिंदपि अभिमान नहीं है अपतिु वे अपने गुणों से उपार्जित विजयश्री का श्रेय भी दूसरों को दे देते हैं। तीनों लोकों संत्रास दे रहे रावण पर जब उन्होंने विजयश्री प्राप्त की तो उन्होंने विजयश्री का श्रेय वानरों, गुरूजनों आदि को इस प्रकार सौंप दिया कि मानो वे ही इसके सच्चे अधिकारी हैं। अपने पिता दशरथ से उन्होंने इस प्रकार निवेदन किया-
तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ।।
श्रीराम ने वानरों को विदा करते समय उनसे कहा-
तुम्हरें बल मैं रावनु मार्यो। तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार्यो।।
श्रीराम ने विभीषण आदि सखाओं से गुरू वशिष्ठ का परिचय देते हुये कहा-
गुरू बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे।।
राजा दशरथ ने देखा कि अपने चरित्र से श्रीराम ने पुरवासियों का मन आकृष्ट कर लिया है, लोग श्रीराम में अनुरक्त हैं। तब उन्होंने सम्पूर्ण जनपद वासियों से सुनकर तथा स्वयं निरीक्षण एवं परीक्षण करके श्रीराम को राज्य देने का संकल्प किया। सम्पूर्ण प्रजा ने भी उनकी इच्छा को सिर-माथे लगाया और उत्साह पूर्वक राजा दशरथ की इच्छाओं का समर्थन भी किया, किंतु इतनी लोक प्रतिष्ठा प्राप्त करके भी श्रीराम ने यही माना कि अभी नीति पूरी नहीं हुई है। इसलिये वे राजगद्दी पर तब तक नहीं बैठे जब तक कि उन्होंने रावणादि शत्रुओं के भावी भय से अयोध्या की जनता को मुक्ति न दिला दी। इसीलिये भगवान् शिव कहते हैं कि श्रीराम की सर्वदा विजय ही होती है।
लोक में पूज्य होना अलग बात हैं और लोक द्वारा आराधित होना अलग बात है। लोक में पूज्यत्व की स्थिति प्राप्त करके भी कोई व्यक्ति लोकाराध्यत्व तब तक नहीं प्राप्त कर सकता जब तक कि वह लोक पूज्यत्व गुण में प्रतिबन्धक (बाधक) और मदान्ध बना देने वाले भार्यादि परिजनों में स्नेह, दया, सौख्यादि मूलक राग-द्वेष से मुक्त नहीं हो जाता। इन राग-द्वेष के दुर्गुणों को समाप्त करने के लिये श्रीराम ने गुरू और पुरोहित आदि को मर्यादा के रूप में सम्मुख रखा, जिसके कारण वे राग-द्वेष से मुक्त रह सके। इस लोकाराधना के संदर्भ में भगवान श्रीराम स्वयं कहते हैं-
स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि।
आराधनाय लोकानां मुंचतो नास्ति मे व्यथा।।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि लोक में वास्तविक पूज्यत्व और आराध्यत्व की स्थिति प्राप्त करना कितना कठिन है। इसमें केवल परमार्थ हित साधन का भाव ही निहित रहता है। हमें राजाओं के राजा भगवान् श्रीरामचन्द्र की इस अद्भुत एवं चिरस्थायी विजय परम्परा एवं गुणावली का अनुशीलन करना चाहिये, जिससे सब प्रकार का कल्याण सध जाता है। श्रीराम सबके लिये सर्वथा अनुवर्तनीय हैं- ‘रामादिवत् वर्तितव्यम्’।
जीवन में भौतिक रूप से उतार-चढ़ाव आते ही है, उथल-पुथल होती ही हैं, लड़ाई-झगड़े होते ही है, लाभ-हानि होती ही हैं, अमीरी-गरीबी होती है, परन्तु मनुष्य वही है, जो हर स्थिति में सम रहे, प्रसन्न रह सके, आनन्दित रह सके और इसके लिये आवश्यक है कि वह मनश्चेतना के स्तर पर काफी ऊपर उठा हुआ व्यक्ति हो, तभी वह जीवन का आनन्द प्राप्त कर सकता है, अन्यथा सकल सम्पदा होते हुये भी सब व्यर्थ है।
श्रीराम हमारे सनातन धर्म में श्रद्धा रखने वाले लोगों के जीवन की धड़कन हैं। वे जन-जन में विद्यमान हैं। सामाजिक दृष्टि से देखें तो श्रीराम के जीवन में असत्य एवं सत्य, अन्धकार एवं प्रकाश का युद्ध चलता ही रहा। उनके समस्त जीवन में अनैतिकता एवं अधर्म के विरूद्ध प्रबल संघर्ष हुआ। अन्त में विजय सत्य एवं प्रकाश की ही होती है, यह भी सत्य है। श्रीराम ने रावण रूपी आसुरी प्रवृत्तियों का नाश किया।
असत्य, अधर्म, शत्रु, रोग, छल, विश्वासघात, आसुरी प्रवृत्ति, राजनीति, कूटनीति, धनहीनता, गरीबी का यह युद्ध हमारे वर्तमान जीवन में भी चल रहा है। आसुरी प्रवृत्तियां प्रबल हो रही हैं। अभाव से जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है। मर्यादा पुरूषोत्तम की भांति अपने जीवन में विजयश्री प्राप्त कर पुरूषोत्तमय बनने की क्रिया सम्पन्न कर, गृहस्थ जीवन के सभी दायित्व को पूर्ण करने की ऊर्जा शक्ति से युक्त होने हेतु पुरूषोत्तम श्रीराम सर्व विजयश्री प्राप्ति दीक्षा ग्रहण करें। जिससे जीवन की सभी बाधाओं, शत्रु, झूठ, छल, विश्वासघात, षड़यंत्र से बचाव हो सकेगा। साथ ही गृहस्थ में, शिक्षा में, आर्थिक उन्नति में आ रही बाधाओं से जूझते हुये प्रगति को प्राप्त करने की समर्थता आप में आ सकेगी। आपका गृहस्थ जीवन सभी श्रेष्ठता से युक्त हो सकेगा।
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