





‘‘गुरू कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोटा भितरी भीतरी सहाजी के बाहिर बाहिर चोट।।’’
यह कबीरदास जी का सुन्दर दोहा वर्ष पुराना है परन्तु कई दशक बीतने के बाद भी पूर्णता सत्य है, कबीरदास जी कहते हैं कि गुरू एक कुम्हार स्वरूप है और शिष्य एक ढलने योग्य माटी, जिसे गुरू भीतर से सहारा देकर बाहर से पीटते हैं या फिर समझ ले कि चोट मारकर शिष्यों की बुराई को निकालते हैं, परन्तु वहाँ केवल कुम्हार का कार्य समाप्त नहीं हो जाता वे तो उसे एक सुन्दर व मजबूत आकार देते हैं। उस कच्ची मिट्टी को एक सुन्दर व मजबूत घड़ा बनाते हैं, जो अपने अन्दर स्वच्छ-शीतल जल रख कईयों की तृष्णा-प्यास को तृप्त करता है, उसी भाती एक सामान्य व्यक्ति अपने गुरू के ज्ञान से एक साधक-शिष्य बनकर स्वयं को जान पाते हैं, व अपने अन्दर के साधनात्मक तप से अपने अन्दर उस ज्ञान रूपी जल को समाहित करते हैं व स्वयं और दूसरों के लिये हितकारी कार्य करते हैं। आप सब में वह सामर्थ तो है परन्तु व्यक्ति स्वयं के लिये तो दैनिक साधना के लिये समय ही नहीं दे रहे हैं। जब आप 24 घंटे, 7 दिन में से थोड़ा सा भी समय अपने लिये नहीं निकाल सकते तो आप कैसे कोई कार्य समाज कल्याण या उन्नति के लिये कर सकेंगे। दिन के 4-5 घंटे मोबाईल में सिर झुका कर बिताने से तो उत्तम है, दिन के 40-50 मिनट सिर उठाकर मंत्र-जप, ध्यान करें। जो आपको आत्म बल, विवेक, ज्ञान प्रदान करेंगे।
मंत्र-तंत्र-यंत्र वही ज्ञान है जिसे आप गुरू मुख से प्राप्त कर अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकते हो- यह ज्ञान कोई धोखा या छलावा नहीं अपितु सत्तत ज्ञान है, जिस पर चलकर स्वयं ईश्वर ने भी मनोवांछित फल की प्राप्ति की है, भगवान श्री कृष्ण ने अपने गुरू से ज्ञान प्राप्त कर कई कलाओं के स्वामी व वाक चातुर्यता प्राप्त की, उसी भांति गुरू वशिष्ठ से ज्ञान प्राप्त कर भगवान श्रीराम पुरूषोत्तममय, अस्त्र-शस्त्र के ज्ञाता व निपुण हुये।
एक सामान्य व्यक्ति के लिये यह आश्चर्यचकित या चौकाने वाली बात होगी परन्तु एक साधक के लिये यह एक सामान्य बात है कि मंत्र में, तंत्र में कितनी असीम शक्ति है। जिस प्रकार मात्र एक बटन दबाने से एक मशीन कई काम कर लेती है, जिस प्रकार एक छोटी सी गोली मानव की बीमारी का नाश कर देती है, एक छोटा सा कथन-वाक्य देशों को लड़ा देता है, तो एक मंत्र में कितनी असीम-असीम शक्ति होगी।
– ‘‘श्रीं’’ पुकारने से लक्ष्मी की प्राप्ति क्यों नहीं होगी।
– ‘‘ऊँ’’ पुकारने से क्यों नहीं महादेव कष्टों को हरेंगे।
जब राम के नाम मात्र से पत्थर तैर गये तो यह तो निश्चित है कि यह ज्ञान निरर्थक तो है नहीं।
यह ज्ञान को आप तभी आत्मसात कर सकेंगे जब पूर्णतः स्वयं को, अपने गुरू को सौंप दें, वे अवश्य ही आपको एक सुन्दर व मजबूत शिष्य अवश्य बना देंगे। आपको तो स्वयं को सौपना है।
इस 30-31 दिसम्बर व 01 जनवरी को कुल-वंश वृद्धि शिवत्व शक्ति शाकम्भरी सर्व सुखदा प्राप्ति नूतन वर्ष साधना महोत्सव, बिलासपुर (छ.ग.) में सम्मलित होकर आप भी स्वयं को एक सुन्दर व्यक्तित्व बनायें।
आपका अपना
विनीत श्रीमाली
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