





कालीदास के शब्दों में शिव परम दरिद्री होकर भी समस्त सम्पत्तियों के उद्गमकर्त्ता हैं, सब सम्पत्तियां वहीं से प्रकट होती हैं, वे श्मशानवासी होकर भी तीनों लोकों के नाथ हैं, भयानक रूप में रहने पर भी उनका नाम ‘‘शिव’’ है, और सच तो यह है कि वे क्या हैं, यह तत्व कोई नहीं जानता, इसको जान लेना शिव कृपा पर ही अवलम्बित है।
शिव जगन्नियन्ता जगदीशवर हैं, एक प्रसंग में पार्वती जी कहती हैं, कि ‘‘भगवान शंकर जगद्गुरू हैं और मंगलशिरोमणी हैं’’। उनके दिव्य चरणों का ब्रह्मा जी, भृगु, नारदादि महर्षिगण भी ध्यान करते हैं, वस्तुतः यदि सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाये, तो समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में ‘‘शिव तत्व’’ ही व्याप्त है।
भगवान शिव एक है, पर अनेक रूप भी उन्हीं के हैं- कभी ‘‘आशुतोष’’, तो कभी ‘‘महादेव’’ या कभी ‘‘रूद्र’’, तो कभी ‘‘महामृत्युंजय’’ अपने अलग-अलग नामों से वे इस संसार में विराजमान हैं, और उनका एक भी नाम निरर्थक नहीं है, प्रत्येक नाम के अलग-अलग गुण और प्रयोजन है, जिनके प्रचलित होने का यदि मूल देखा जाये, तो अधिकांश नामों से भ्रम-निवृत्ति, मोह-नाश और सौभाग्य लाभादि हो सकते हैं, जो इस प्रकार है-
1 शिव- जो भक्तों के समस्त पाप और त्रिताप को नाश करने में सदैव समर्थ हैं।
2 पशुपति- शिव सबको ज्ञान देने वाले हैं और अज्ञान से बचाने वाले हैं, तथा पशुवत जीवन से मुक्ति दिलाने के कारण ही वे ‘‘पशुपति’’ कहलाते है।
3 मृत्युंजय-यह सुप्रसिद्ध बात है कि मृत्यु को कोई जीत नहीं सकता, किन्तु जिन्होंने मृत्यु पर भी जय प्राप्त की है और जिनके आगे हर बार मृत्यु की ही पराजय होती है, वे ‘‘मृत्युंजय’’ कहलाते हैं।
4 महेश्वर- जो वेदों के आदि में ओऽम्कार रूप में माने गये हैं, और वेदान्त में निर्गुण रूप में स्थित रहते हैं, और जो सम्पूर्ण देवताओं में प्रधान होने से भी ‘‘महेश्वर’’ नाम से विख्यात हैं।
5 रूद्र- दुःख और उनके समस्त कारणों के नाश करने से तथा संहारादि में क्रूर रूप धारण करने से शिव को ‘‘रूद्र’’ कहा जाता है।
6 आशुतोष – अपने आनन्दित और उल्लासित स्वरूप के कारण ही वे ‘‘आशुतोष’’ कहलाते हैं।
जिस समय वे जैसा स्वांग भरते हैं, उस समय उनका वैसा ही नाम पड़ जाता है। संसार का सृजन करने पर वे ‘‘ब्रह्मा’’ कहलाते हैं, पालन करने पर ‘‘विष्णु’’, तो संहार करने पर वे ‘‘शिव’’ कहलाते हैं।
तारक देव महेश हैं, सबका तारनहार।
तम, सत, रज के रूप में, व्यापित है संसार।।
शिव की ऐसी ही विराट महिमा है। इस व्यापक जगत में जो लोग नाना दुःखों से पूर्ण संसार रूपी समुद्र के प्रवाह में पतित होकर पुनः उससे निकलना चाहते हैं, उन्हें शिव की ही आराधना करनी चाहिये।
इसीलिये वर्ष में एक दिन शिव- आराधना, पूजन-अर्चन आदि के लिये विशेष रूप से निर्धारित है, जिसे ‘‘महाशिवरात्रि’’ के नाम से जाना जाता है, जो आदि देव भगवान शिव के ही उल्लास का पर्व है।
यह पर्व पूरे भारतवर्ष में बड़ी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान शिव का पार्वती जी के साथ विवाह सम्पन्न हुआ था, अर्थात् इस दिन शिव की उपासना-साधना करने से भक्त को या साधक को एक विशेष प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है, क्योंकि उसे शिवरात्रि के दिन ‘‘शिवलिंग’’ का विधिवत् पूजन करने से शिव और शक्ति दोनों का ही सायुज्य प्राप्त होता है, और अपने इस शिव-शक्ति स्वरूप के कारण ही वे ‘‘अर्द्धनारीश्वर’’ भी कहे जाते हैं।
शिव के समान अन्य कोई देवत्व नहीं है, क्योंकि योग और भोग को एक साथ धारण करने की सामर्थ्य किसी भी अन्य देवता में नहीं है।
यों तो किसी भी सोमवार के दिन इस पूजन को सम्पन्न किया जा सकता है, किन्तु समय की अपनी एक विशेषता होती है, जिस प्रकार काल के सिर पर आगे बाल होते हैं, और पीछे से वह गंजा होता है, यदि मनुष्य उसे आगे से पकड़ लेता है, तो उसके बाल उसके हाथ में आ जाते हैं, और वह काल पर विजय पा लेता है, किन्तु जो मनुष्य उसे पीछे से पकड़ने की कोशिश करता है, उसके हाथ में कुछ नहीं आता, और उसके पास पछताने के अलावा कुछ शेष नहीं रह जाता।
इसी प्रकार समझदार व्यक्ति यदि उन विशेष क्षणों को शीघ्रता से पकड़ लेता है, तो वह जीवन में कभी पराजित नहीं होता, और यदि वह उस महत्वपूर्ण क्षण को गंवा बैठता है, तो उसके पास पछताने के अलावा और कुछ नहीं रहता, फिर उससे बड़ा दुर्भाग्यशाली कोई नहीं होता, इसीलिये समय का अपना विशेष महत्व होता है, और उसका प्रत्येक व्यक्ति को लाभ उठाना ही चाहिये।
‘‘शिवरात्रि’’ अर्थात् शिव की रात्रि, जो जगत-गुरू है, जो समस्त कष्टों को दूर करने वाले हैं, जिनके चिन्तन मात्र से ही समस्त सुखों की प्राप्ति हो जाती है, और जो मनुष्य के समस्त पापों को दूर कर उसे मोक्ष प्रदान करने वाले हैं, उनकी उपासना व आराधना प्रत्येक व्यक्ति या साधक को इस शिवरात्रि के दिन अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिये।
‘‘शिवरात्रि’’ जो आनन्द की रात्रि है, जो मनुष्य के अन्धकारमय व घोर कालिमा युक्त जीवन को प्रकाशवान कर देने की रात्रि है, जो आत्मा को परमात्मा में लीन कर देने की रात्रि है, जो पूर्णता की रात्रि है, जो श्रेष्ठता की रात्रि है, जो शिव-शक्ति के सामंजस्य की रात्रि है, जो शिवत्व को प्राप्त कर लेने की रात्रि है… और ऐसे शिवत्व को प्राप्त कर लेना ही तो जीवन का परम सौभाग्य है, परम आनन्द है, जीवन की सर्वोच्चता है।
और यह सर्वोच्चता, यह आनन्द, यह सौभाग्य प्राप्त हो सकता है उस दिन शिव के विधिवत पूजन द्वारा, क्योंकि शिव समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने में सक्षम है।
शिव पूजन में ध्यान देने योग्य बातें-
सिद्ध महात्माओं, प्रकाण्ड विद्वानों एवं शास्त्र ग्रंथों के आधार पर शिव पूजन में ध्यान देने व सावधानी रखने योग्य बातें स्पष्ट की जा रही हैं, जिससे कि साधकों को शीघ्र ही फल प्राप्ति हो –
1 शंकर की पूजा स्नान करके ही करनी चाहिये और नीचे धोती धारण करना आवश्यक है, धोती लांगदार पहिने, तहमत की तरह धोती लपेटकर पूजा करना ठीक नहीं माना गया है।
2 भगवान शिव की पूजा के साथ ही साथ माँ पार्वती की पूजा भी आवश्यक मानी गयी है, इससे पूर्व गणपति पूजन भी आवश्यक है।
3 शिव पूजन उत्तर की तरफ मुंह करके करना चाहिये।
4 जो साधक शिव की पूजा करे उसे त्रिपुण्ड अवश्य लगाना चाहिये और यदि रूद्राक्ष की माला पहिन कर पूजा करे तो ज्यादा उचित माना गया है।
5 बिल्व- पत्र शुद्ध ताजे हों, वे टूटे-फूटे न हो।
6 साधक को अपने महीने की कमाई में एक दिन की कमाई अवश्य ही पूजा या साधना में व्यय करनी चाहिये।
7 जहां तक हो सके स्वयं ही शंकर की पूजा करनी चाहिये, किसी ब्राह्मण आदि द्वारा इस कार्य के लिये कम से कम करें।
8 गणेश जी को तुलसीदल तथा माँ पार्वती को दूर्वा नहीं चढ़ानी चाहिये।
9 पत्र, पुष्प, फल ये सभी मुख नीचे करके नहीं चढ़ाने चाहिये। बिल्व पत्र डंठल तोड़कर उल्टे करके चढ़ाने चाहिये।
10 भगवान शंकर कमल, गुलाब, कनेर, सफेद आक या मदार पुष्प से ज्यादा प्रसन्न होते हैं, धतूरा उन्हें सबसे अधिक प्रिय है।
11 बिल्व पत्र, खेजड़ी, आँवला, तमाल पत्र और तुलसी इनके पत्ते टूटे-फूटे होने पर भी पूजा में ग्रहण करने योग्य माने गये हैं। बिल्व पत्र, कुंद, तमाल, आमला, तुलसी, कमल पुष्प आदि एक दिन पहले लाकर भी पूजा में प्रयोग किये जा सकते हैं क्योंकि इनको बासी होने का दोष नहीं लगता।
12 भगवान शिव की पूजा में संस्कृत पढ़ना आवश्यक नहीं है, अपितु अपनी मन की भावनाओं से भी उनकी पूजा की जा सकती है।
13 जो स्त्रियां शिवपूजन करती हों, यदि उनके बालक का जन्म हो तो उनको दस दिन तक सूतिकागृह में ही भगवान शिव की मात्र मानसिक पूजा करनी चाहिये।
14 कुमारी कन्यायें सुन्दर वर प्राप्ति हेतु बाल्य काल से ही शिव पूजा कर सकती हैं।
15 शिव की आधी परिक्रमा ही की जाती है, भूल करके भी शिव मन्दिर में शिव की पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिये।
16 शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ प्रसाद ग्रहण नहीं करना चाहिये, पर शिव के सामने जो फल या प्रसाद रखा हो उसे ग्रहण किया जा सकता है।
17 लक्ष्मी प्राप्ति के लिये भगवान शंकर की कमल या बिल्व पत्र से पूजा की जानी चाहिये। एक लाख बिल्व पत्र चढ़ाने पर साधक को कुबेर के समान सम्पत्ति प्राप्त होती ही है।
18 मोक्ष की इच्छा रखने वाले को एक लाख दर्भ के द्वारा शिव पूजा करनी चाहिये।
19 सन्तान की इच्छा रखने वाले को भगवान शंकर पर एक लाख धतूरे के पुष्प चढ़ाने का विधान शास्त्रों में बताया गया है।
20 भोग व मोक्ष दोनों प्राप्त करने वाले को आक के एक लाख पत्ते भगवान शंकर को चढ़ाने चाहिये।
21 जो व्यक्ति एक हजार कनेर के पुष्प भगवान शंकर पर चढ़ाता है, वह अवश्य ही रोग मुक्त होता है।
22 जो व्यक्ति एक हजार बिल्व पत्र शिव को चढ़ाता है उसके जीवन की प्रत्येक इच्छा पूरी होती है और उसे जीवन में किसी भी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता।
23 जो व्यक्ति एक लाख चावल चढ़ाता है उसे लक्ष्मी प्राप्त होती है, पर इसमें एक भी चावल खण्डित नहीं होना चाहिये।
24 शरीर पुष्टि हेतु एक लाख उड़द के दानों से भगवान शिव की पूजा करनी चाहिये।
25 यदि साधक गंगाजल से भगवान शंकर का अभिषेक करता है, तो उसे निश्चय ही पुत्र सुख प्राप्त होता है।
26 प्रदक्षिणा शंकर के दाहिनी तरफ से प्रारंभ की जानी चाहिये।
इस प्रकार साधक को यथा संभव शिव पूजा में सावधानी बरतनी चाहिये और उपरोक्त नियमों का पालन करना चाहिये।
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