





संसार में जीना और कर्म से लिप्त न होना बड़ी ही बुद्धिमत्ता की बात है। करीब-करीब ऐसे ही है, जैसे कोई काजल की कोठरी से निकले और उसे काजल न लगे। फिर घड़ी दो घड़ी की बात नहीं है, अगर एक जीवन को भी पूरा लें, तो कम से कम सौ वर्ष। और अगर अनेक जीवन को स्मरण करें, तो अनेक सौ वर्ष। लाखों वर्ष की यात्रा है।
एक ही जीवन की बात की है इस सूत्र में कि जहां कम से कम सौ वर्ष जीवन है, सौ वर्ष काजल की कोठरी से कोई गुजरे निरन्तर- जागे, सोये, उठे, बैठे, जीये- और काजल से अछूता रह जाये, बड़ी ही बुद्धिमत्ता, बड़े योग की बात है। अन्यथा यही आसान और सहज है कि काजल पकड़ ले। इतना ही नहीं कि काजल छू जाये, यही साधारणतः संभव है। छूना तो स्वाभाविक मालूम होता है, लेकिन सौ वर्ष काजल के साथ रहना पड़े, तो कठिन लगती है यह बात कि व्यक्ति ही काजल न हो जाये, काला न हो जाये।
जो भी हमें करना पड़े उससे हम अछूते गुजर कैसे पायेंगे? करते हैं तभी, तभी हम उससे जुड़ जाते है। क्रोध करते हैं तो क्रोध से जुड़ जाते हैं। प्रेम करते हैं तो प्रेम से जुड़ जाते हैं। लड़ते हैं तो लड़ने से जुड़ जाते हैं। भागते हैं तो भागने से जुड़ जाते हैं। भोग करते हैं तो भोग पकड़ लेता है। और मजा तो ऐसा है जकड़न का कि त्याग करते हैं तो त्याग भी पकड़ लेता है। वह उससे भी काजल ही हाथ में आता है।
भोग की तो अकड़ होती ही है कि मेरे पास इतना धन है, त्याग की भी अकड़ होती है कि मैंने इतना धन त्यागा! वह अकड़ काजल बन जाती है, वह अकड़ अहंकार है। मनुष्य एक जीवन के सौ वर्ष भी कैसे भी गुजारे, कुछ तो करेगा। जो भी करेगा, वहीं उसके काले होने का रास्ता बन जायेगा।
व्यक्ति कुछ भी करे तो काजल तो लग जायेगा- कर्ता हुआ कि काला हुआ। एक ही रास्ता रह जाता है कि व्यक्ति कर्ता ही न बने। कर्म से तो बचा नहीं जा सकता। जीयेंगे तो कर्म तो होगा ही। इसलिये अगर कोई कहता है, कर्म को छोड़ दें, तो फिर तो कोई लेप नहीं होगा! लेकिन जीना है, तो कर्म तो होगा ही। श्वास भी लेनी है तो कर्म हो जायेगा।
दुकान जो करता है वही कर्म करता है, ऐसा नहीं है, जो भिक्षा मांगता है वह भी कर्म करता है। और जो घर बसाता है वही कर्म करता है, ऐसा नहीं है, जो घर छोड़कर वन में चला जाता है वह भी कर्म करता है। उनके कर्म भिन्न हो सकते हैं, लेकिन एक कर्म और दूसरा अकर्म है, ऐसा नहीं, दोनों ही कर्म है।
यहां तो जीना ही जहां कर्म है, छोड़ना भी जहां कर्म बन जायेगा, वहां कर्म को छोड़कर अगर कोई सोचता हो कि हम काले काजल से बच जायेंगे, तो व्यर्थ सोचता है। उस सोचने से कभी भी कोई घटना घटने वाली नहीं है। कर्मों को छोड़कर कोई भाग सकता है, और तब पलायन ही उसका कर्म बन जाता है। भागना ही उसका कर्म बन जाता है। वह भी पकड़ लेता है।
एक ही रास्ता दिखाई पड़ता है, वह यह कि कर्म से तो छूटने का उपाय नहीं है, लेकिन कर्ता से छूटा जा सकता है। लेकिन अगर कर्म जारी रहेंगे तो कर्ता से कोई छूटेगा कैसे? जब मैं कर्म करूंगा, तो कर्ता तो हो ही जाऊंगा।
कर्म तो कर सकते हो, कर्ता से छूट सकते हो। साधारणतः हमें दिखाई पड़ता है कि कर्म से छूट जाऊं तो शायद कर्ता से छूट जायें हम। न करूंगा कर्म, न बनूंगा कर्ता। लेकिन यह संभव नहीं है। संभव इससे उलटी बात है। और वह यह है कि कर्म तो तुम करते रहो और कर्ता से छूट जाओ। यह कैसे होगा?
ऐसे कर्म से हम थोड़ा-बहुत परिचित है। जब भी हम अभिनय करते हैं तब हमें खयाल में आती है बात कि कर्म हो सकता है और कर्ता नहीं हो। राम की सीता खो जाये तो राम रोते हैं वन में, वृक्षों को पकड़-पकड़कर चिल्लाते हैं, पूछते हैं, सीता कहां है? रामलीला के मंच पर भी किसी राम की सीता खो जाती है। वह भी रोता है। वह भी वृक्षों से पूछता है, सीता कहां है? और शायद राम से कहीं ज्यादा ही जोर से चिल्लाकर पूछता है। शायद राम से ज्यादा कुशलता से भी पूछता है, क्योंकि उसने काफी अभ्यास किया होता है। कर्म तो करता है वही जो राम ने किया- पूछता है, सीता कहां है? लेकिन पीछे कोई कर्ता नहीं होता, अभिनेता होता है।
ध्यान रहे, कर्म दो तरह से हो सकता है- कर्ता होते हुये भी हो सकता है, अभिनेता होते हुये भी हो सकता है। कर्ता की जगह अभिनेता आ जाये तो कर्म तो बाहर जारी रहेगा, लेकिन भीतर कर्ता की जगह अभिनेता हो जाये तो समस्त रूपांतरण हो जाता है। अभिनय बांधता नहीं है। अभिनय बाहर ही बाहर रह जाता है, भीतर उसका प्रवेश नहीं होता। अभिनय गहरे में नहीं उतरता, सतह पर घूमता है और विदा हो जाता है। कितना ही रोता हो अभिनेता राम, और कितना ही आंसू टपकाता हो, उसके आंसू प्राणों से नहीं आते। अक्सर तो उसे आंखों में अंजन लगाना पड़ता है कि आंसू आ जायें। अंजन न भी लगाये, अभ्यास से भी ले आता हो, तो भी आंसू सतह से आते हैं, गहराई से नहीं आते। चिल्लाता है। आवाज आती है पर कंठ से ही आती है, हृदय से नहीं आती। भीतर सब अछूता रह जाता है। भीतर कुछ भी छूता नहीं। भीतर अस्पर्शित रह जाता है। निकलता है काजल की कोठरी से, लेकिन भीतर कर्ता नहीं है, अभिनेता है। ध्यान रहे, कर्ता पकड़ता है काजल को, कर्म नहीं पकड़ता।
कर्म को अगर पकड़ता हो वह जो काजल है जीवन का, अगर कर्म पर लेप चढ़ जाता हो उसका, तब तो असंभव है। लेकिन जो गहरे खोजते हैं, वे कहते हैं, कर्म को नहीं कर्ता को पकड़ता है। जब भी कोई कहता है, मैं कर्ता हूं, बस तभी। जब कर्म और मैं का जोड़ होता है, तभी। जब मैं कर्म के साथ अपने को एक कर लेता हूं और कहता हूं, मैं कर्ता हूं, बस तभी, तभी वह काजल पकड़ लेता है। और तभी जीवन अंधेरे से और कालितमा से भर जाता है।
अगर भीतर कोई कहने वाला न हो कि मैं कर्ता हूं, और भीतर अगर कोई जानने वाला हो कि अभिनय हो रहा है, कि मंच पर नाटक के इकट्ठे हुये हैं- होगी, बड़ी मंच होगी, पूरी पृथ्वी मंच हो सकती है, मंच के बड़े होने से कोई अंतर नहीं पड़ता, और पर्दा एक ही बार उठता होगा जन्म के वक्त और मृत्यु के वक्त गिरता होगा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, एकांकी है, लंबा है, एक ही बार पर्दा गिरता है, इससे अंतर नहीं पड़ता- लेकिन अगर भीतर अभिनय का खयाल है, ऐक्टिंग का खयाल है, ऐक्टर का नहीं, भीतर करने वाले का खयाल नहीं है, अभिनय का खयाल है, तो सारा जगत एक लीला, एक नाटक, जीवन एक मंच, एक कथा, एक कहानी हो गयी। फिर हम पात्र हैं और पात्रों को कुछ भी नहीं छूता है।
एक ही मार्ग है कि मनुष्य जीते जी कर्म से गुजरते हुये भी कर्म में लिप्त न हो। वह मार्ग है, जीवन को एक अभिनय में रूपांतरित कर लेना। हम अभिनय को तो जीवन में रूपांतरित कर लेते हैं, लेकिन जीवन को अभिनय में रूपांतरित नहीं कर पाते। अभिनय को जरूर हम बहुत बार जीवन बना लेते हैं। बहुत बार तो हमारा जीवन, हमारे सीखे हुये अभिनय का बहुत मजबूती से हमारे ऊपर लद जाना होता है।
अभिनय को तो अभिनय जानो ही, ऐसी कोई भी घटना नहीं है जगत में जिसके लिये तुम कर्ता बनने के पागलपन में पड़ो। पागल हो तुम जो कर्ता बनो। कर्ता तो तुम परमात्मा को ही बनने दो। उस पर ही छोड़ दो- जो सदा है, तुम नहीं थे तब भी था, तुम नहीं होओगे तब भी होगा। उस पर ही छोड़ दो। करना उस पर ही छोड़ दो। तुम करने के बोझ को मत लो। वह बोझ बहुत ज्यादा पड़ जायेगा, तुमसे ज्यादा पड़ जायेगा। तुम्हारी सामर्थ्य से ज्यादा है वह पत्थर, वह बोझ बड़ा है। उसके नीचे दबोगे और मर जाओगे। उससे उबर न पाओगे।
जिसने सारा कर्तव्य परमात्मा पर छोड़ दिया। जो कहता है, मैं तो हूं ही नहीं, है तू। कर्ता है तो तू। मैं ज्यादा से ज्यादा तेरे खेल का एक मोहरा हूं। तू जहां चल दे चाल। तू जो बना ले, तू जो करवा दे। तू हरा दे तो हार जाऊं, तू जिता दे तो जीत जाऊं। न जीत मेरी है, न हार मेरी है। हार भी तेरी, जीत भी तेरी। ऐसा जिसका पूरा समर्पण है, जो कहता है, सब परमात्मा का है- मैं भी उसी का, सब कृत्य उसका। फिर भी जीयेगा, श्वास लेगा, चलेगा, उठेगा, बैठेगा, काम भी करेगा, खाना भी खायेगा, रात सोयेगा भी। यह सब होना, लेकिन भीतर कर्ता नहीं होगा। और यह एक ही मार्ग है।
और मैं भी कहता हूं कि यह एक ही मार्ग है। आज तक पृथ्वी पर जो लोग भी सच में ही पूरी तरह इस जीवन से अलिप्त गुजर गये हैं- अछूते, ताजे के ताजे, जैसे के तैसे, आये थे वैसे ही सरल, वे वे ही लोग हैं, जिन्होंने किसी तरह के अहंकार को बीच की यात्रा में अर्जित नहीं किया। जो बिना अहंकार के जी लिये। और अहंकार अर्थात कर्ता का भाव। और निरहंकार अर्थात समर्पण, उस प्रभु के चरणों में दे देने की भावना ।
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