





यह संसार भी विष का सागर ही है, जो छल, झूठ, कपट, हिंसा, व्यभिचार, समस्या रूपी विष की बूंदों से भरा हुआ है……. प्रत्येक मनुष्य चाहे-अनचाहे इनका पान करता ही रहता है और इसमें उलझ कर उत्साह, उमंग और जीवन का अर्थ भूल कर मृत्यु की ओर अग्रसर हो जाता है और तब अमृत्यु की ओर कोई ले जा सकता है, तो वे गुरू ही होते है जो कि शिव का साकार रूप होते हैं।
मन ही मनुष्यों के लिये बन्धन और मोक्ष का कारण है। व्यक्ति का मन अर्थात् चित्त जैसी इच्छा करता है, उसे वैसा ही प्राप्त होता है। मन के साथ ही मान, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, भय, पीड़ा, कष्ट की स्थितियां संलग्न हैं, अतः प्रत्येक मनुष्य इन स्थितियों का अनुभव करता है। मन पर नियन्त्रण हुए बिना पूर्णता सम्भव नहीं होती। मन जब कामासक्त होता है तो उसे कामान्ध बना देता है। जब मन क्रोधयुक्त होता है तो व्यक्ति क्रोध में कुछ नहीं देख पाता ओर अनिष्ट कर बैठता है। जब मन में लालच समा जाता है, तो अच्छे बुरे का ज्ञान समाप्त हो जाता है। जब मन आलस्य से ग्रस्त होता है, तो व्यक्ति को कर्महीन बना देता है। जब मन नियंत्रित हो सकेगा, तभी वह साधनाओं में या यौगिक क्रियाओं में पूर्णता प्राप्त कर सकेगा, तभी वह शिष्यत्व प्राप्त कर सकेगा, तभी वह गुरू में निमग्न हो सकेगा।
गुरू को परब्रह्म कहा गया है, उसी विराट गुरू तत्व की ही तीन शक्तियां हैं-ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्मा को जिस प्रकार सृष्टि का निर्माता कहा गया है, उसी प्रकार शिव को संहारक कहा गया है। गुरू की शिव रूप में साधना करने से वे संहार ही तो करते हैं, शिष्य के संसार (उनकी आंतरिक पीड़ाएं) का, शिष्य के अंतः में चल रहे द्वन्द्वों का, उसके मन के विकारों का, वासनाओं का, तृष्णाओं का, दुःख, विषाद और चिन्ताओं का अपने त्रिनेत्र से वे शिष्य के पाप, संशय, काम, क्रोध, अहंकार, आलस्य, भय आदि व्याधियों को भस्म कर स्वयंवत ही तो बना लेते हैं।
सद्गुरू के इस संहारक स्वरूप द्वारा शिष्य के जीर्ण मन व चिन्तायुक्त चित्त का जहां नाश होता है तो वही एक नवीन शिष्य का प्रादुर्भाव होता है, जिसमें गुरू पूर्ण शिवस्वरूप में उसके रोम-रोम में विद्यमान होते हैं, जहां फिर चिन्ता नहीं होती, जहां तनाव नहीं होता, जहां वैभव तो होता है, जहां सम्पन्नता तो होती है, परन्तु किसी प्रकार की कोई लिप्सा नहीं होती, व्यक्ति के पास सब कुछ होते हुये भी वह निर्लिप्त रहता है और यही तो इस साधना का सार है, और पूर्णता का यही तो सोपान है।
जब हम भगवान शिव के मन्दिर में जाते हैं, तो दोनों हाथ जोड़कर, दसों उंगलियों को परस्पर जोड़कर के अपने सिर को झुकाकर प्रणाम करते हैं। यह इस बात का चिन्तन है, कि मैं अपनी पांच कमेंन्द्रियों और पांच ज्ञानेन्द्रियों- इन दसों इन्द्रियों को आबद्ध करके और अपने सिर में जो बुद्धि है, जो अहंकार है, उसको गिराता हुआ मैं आपको प्रणाम करता हूं, यह प्रणाम करने की वृत्ति विनीत होने की वृत्ति है, यह समर्पण का प्रतीक है।
यदि हमें उस परमात्मा में लीन होना है, सद्गुरू के चरणों में निमग्न होना है, तो हमें समर्पण होने की क्रिया सीखनी पड़ेगी। समर्पण होने के लिये अपनी पांच कर्मेन्द्रियों और पांच ज्ञानेन्द्रियों को एक साथ आबद्ध करना पड़ेगा, ज्ञान को कर्म पर हावी करना पड़ेगा। इसलिये जब हाथ जोड़ते हैं, तो पांच ज्ञानेन्द्रियां पांच कर्मेन्द्रियों पर हावी होती हैं, दोनों परस्पर जुड़ जाती है, और फिर जुड़ कर हम दोनों हाथ को सिर पर टिका देते हैं, तो इसका अर्थ है कि हम अपनी बुद्धि को ज्ञानेन्द्रियों के हवाले कर देते हैं।
‘अब मेरे पास कोई तर्क नहीं है, मेरे पास किसी प्रकार का संशय नहीं है, मैं अपने आप में झुकने की क्रिया कर रहा हूं, मैं अपने आप में प्रमाणित होने की क्रिया कर रहा हूं।’ जब ऐसी क्रिया होती है, तब ज्ञान का उदय होता है।
संसार में जो कुछ है, उसे तोड़ना-मरोड़ना नहीं है, तुम्हें उसके अनुरूप बनना है, तुम्हें अपने अहंकार को समाप्त करना है, और सारी चित्त वृत्तियों को, सारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को एकत्र कर उस संसार के प्रवाह में निमग्न कर देता है। गुरू के शिवस्वरूप को समझना है, तो धारा के अनुरूप बहकर समुद्र में लीन होना होगा, अपने को समाप्त करना है और सारी चित्त वृत्तियों को सारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को एकत्र कर उस संसार के प्रवाह में निमग्न कर देना है। गुरू के शिवस्वरूप को समझना है, तो धारा के अनुरूप बहकर समुद्र में लीन होना होगा, अपने को समाप्त करना होगा।
चित्त की तीन प्रवृत्तियां-
प्रथम वृति-पहली यह कि जब हमें कोई दुःखद समाचार मिलता है, तो हम दुःखी हो जाते है, जब हमें कोई सुखद समाचार मिलता है, तो हम खुश हो जाते हैं। यदि कहीं थोड़ी सी परेशानी आती है, तो हम परेशान हो जाते है। यदि कुछ प्राप्त हो जाता है, तो हम बहुत आनन्द अनुभव करने लग जाते है, यह अनुभव करना अलग चीज है और अनुभव युक्त होना अलग चीज है। भगवान शिव आनन्दयुक्त हैं। पहले तल पर व्यक्ति सुख में सुखी होता है, दुःख में दुःखी होता है, जैसा जीवन चल रहा है, उसे वैसे ही जीता है। जीवन के अनुरूप बनने की कोशिश करता है। शिवत्व प्राप्त करने के लिये हमें पूर्ण रूप से नमन युक्त और समर्पण युक्त होना पड़ेगा, तभी शिव के उस आनन्द में लीन हुआ जा सकता है।
भगवान शिव तीनों लोकों के स्वामी हैं, कुबेराधिपति हैं, फिर भी श्मशान में बैठे हुये है, निर्लिप्त हैं, वे धन सम्पदा को भोगने में लगे हुये नहीं है, धन सम्पदा तो उनके सामने बिखरी हुई है, पर वे समझते हैं कि जीवन में अनुरक्त होने से अनुकूलता प्राप्त नहीं हो सकती। भगवान शिव भगवती शक्ति के पति हैं, फिर भी कोई अंहकार नहीं है, बिल्कुल निश्चिंत, निर्भिक बैठे है। संसार की घटनाओं से प्रभावित नहीं है। उनके चेहरे पर जो मस्ती है, जो आनन्द है वह प्राप्त हो। जीवन तो वही है, जहां मृत्यु नहीं आ सकती, लोभ, क्रोध और मोह जिसे स्पर्श नहीं कर सकता। निरन्तर मुस्कुराहट की वर्षा होती रहती है।
जीवन के उस तथ्य को केवल शिव के माध्यम से ही समझा जा सकता है और कोई देवता इतना निर्द्वन्द्व और निश्चिंत नहीं है। इतनी धन सम्पदा कुबेरवत होने के बाद भोग में लिप्त हुआ जा सकता है लेकिन यह बस होते हुये भी निर्लिप्त तटस्थ होना केवल शिव द्वारा ही सम्भव है।
द्वितीय वृति-ज्ञान का ‘दूसरा तल’ गुरू है। शिवतत्व को प्राप्त करने का मतलब मृत्यु पर विजय प्राप्त करना, हम निश्चिंत हो सकें, रोगमुक्त हो सकें, परन्तु यह तब सम्भव है जब विनीत भाव होकर गुरू चरणों में पहुंचा जाये, जो मार्गदर्शन कर सकता है, जो शिवत्व प्रदान कर सकता है। ‘शिवोऽहं गुरूर्वै गुरूर्वै शिवोऽहं’ शिव को गुरू के रूप में ही देखा जा सकता है, गुरू के माध्यम से ही शिवत्व प्राप्त किया जा सकता है। गुरू में ही शिव के दर्शन किया जा सकता है, परन्तु उसके लिये नम्रता होना आवश्यक है।
यदि अहंकार है, तो गुरू तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता। यदि पूर्ण नम्र भाव से शिष्य उपस्थित हो, तभी गुरू शिष्य को शिवत्व दे सकता है। ‘गुरूर्देवो महेश्वर:’ गुरू स्वयं महेश्वर है, हमारे सामने शिव तो नहीं है, पर शिव का मूर्तिमंत स्वरूप गुरू के रूप में हमारे सामने है, इसीलिये गुरू को शिव कहा गया है।
मैं नमस्कार करता हूं उस कुबेर के अधिपति शिव स्वरूप गुरू को, उस अमृतमय शिवरूप गुरू को, उस मृत्युंजयी शिव स्वरूप निखिलेश्वर को, परन्तु अभी मैं उनके इस स्वरूप को पहचान नहीं सका हूं। यदि हम शिव तक पहुंचे ही नहीं तो हम मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ही नहीं सकते, संसार में शिव के अलावा कोई दूसरा देवता है नहीं जो मृत्यु पर विजय प्रदान कर सकता है।
जीवन की अष्ट बाधाएं है-
आठों प्रकार की बाधाओं से मुक्ति को गुरू की शिव स्वरूप साधना द्वारा ही सम्भव है। शास्त्र इस बात को स्वीकार करता है, भगवान शिव कोई अलग सत्ता नहीं है, गुरू को ही भगवान शिव माना गया है।
जिस समय शिष्य में यह साधना आ जाती है, कि जब मैं बैठूं तो गुरू का बिम्ब मेरे सामने स्पष्ट हो, जब मैं चिन्तन करूं तो केवल गुरू शब्द ही मेरे चिन्तन में हो, गुरू में पूर्णतः लीन हो सकूं। गुरू कहते हैं- ‘‘मैं शिव हूं और जब मेरे पास चिन्ता नहीं है, तो तुम्हें भी चिन्ता नहीं होनी चाहिये, तुम्हारी जो चिन्ताएं हैं, वह तो मुझे अर्पित कर देनी चाहिये, तुम्हें तो मस्ती से निश्चिंत हो जाना है, तुम्हें तो अपना हाथ गुरू के हाथों में सौंप देना है।’’
गुरू दो टूक शब्दों मे समझा रहा है, कि शिष्य कोई अलग सत्ता नहीं है, अलग रह कर तुम तो समाप्त हो जाओगे, चिन्तामुक्त हो जाओगे, तुम्हें तो पूर्ण समर्पित होना है, गुरू इस शरीर का क्या उपयोग करे यह गुरू जाने। जब शिष्य गुरू से दूर नहीं रह सकता। फिर गुरू का कर्त्तव्य है, कि वह शिष्य को कैसे अग्रसर करे। शिष्य को समर्पण सिखाया नहीं जाता, कोयल को सिखाया नहीं जाता कि कैसे कूकना है, नदीं को सिखाया नहीं जाता, कि कैसे समुद्र में विसर्जित हुआ जाता है। फिर गुरू का सारा ज्ञान अपने आप में शिष्य में आ जाता है।
तृतीय वृति-तीसरा तल है पूर्ण रूप से शिवमय, आनन्दमय होने की क्रिया, पूर्ण रूप से निश्चिंत और निर्भीक होने की क्रिया। रोम-रोम में गुरू को अंकित कर देने की क्रिया। फिर शिष्य का अलग कुछ नहीं है, फिर वह पूर्ण रूप से गुरूमय, पूर्णरूप से शिवमय हो जाता है। तब उसमें नया ज्ञान, नया चिन्तन प्राप्त हो पाता है, तब अकेले बैठे हुये भी हवा में मंत्रों को सुन सकेंगे, अकेले बैठे हुए भी आनन्दमग्न हो सकेंगे, रोम-रोम से कोई आवाज उठी रही है, उसे सुन सकेंगे।
इसके लिये शरीर के रोम-रोम को चेतनायुक्त बनाना पड़ेगा और यह हो सकता है इस साधना से। तब चित्त में किसी प्रकार की व्याकुलता नहीं आती, तब बुढ़ापा नहीं आ सकता। पंच विकारों एवं अष्ट बाधाओं का संहार करता हुआ शिष्य प्रथम तल से तीसरे तल की यात्रा सम्पन्न कर सके, इसी हेतु यह ‘गुरू शिव सायुज्य साधना’ प्रस्तुत है।
साधना विधान
इस साधना को किसी भी सोमवार को सम्पन्न किया जा सकता है। शुद्ध भाव से मन के सभी विकारों एवं विचारों को दूर रखते हुए एकाग्रचित होकर उत्तर दिशा की ओर मुख कर शुद्ध वस्त्र धारण कर बैठें। सामने गुरू चित्र को स्थापित कर धूप, दीप, पुष्प, कुंकुंम, अक्षत से संक्षिप्त पूजन करें। फिर ‘निखिल चैतन्य मंत्रों से सिद्ध पारद गुरू यंत्र’ को किसी पात्र में पुष्पासन देते हुए स्थापित करें। यंत्र के पास ‘अघोर गुटिका को स्थापित करें। हाथ में जल लेकर साधना में प्रवृत्त होने का संकल्प लें।
अंगन्यास
ऊँ हृदयाय नमः (हृदय)
ऊँ भूः शिरसे स्वाहा (सिर)
ऊँ भुवः शिखाये वषट् (चोटी)
ऊँ स्वः कवचाय हुं (दोनों बाहें)
ऊँ भूर्भुवः स्वः नेत्रत्रयाय वौषट् (दोनों नेत्र, आज्ञा चक्र)
ऊँ भुर्भूवः स्व अस्त्राय फट् (3 बार ताल बजाएं)
इसके बाद गुरूदेव का शिव रूप में ध्यान करें-
ऊँ नमः शिवाय गुरवे सच्चिदानन्द मूर्तये।
निश्प्रपंचाय शान्ताय निरालम्बाय तेजसे।।
देवाधिदेव सर्वज्ञ सच्चिदानन्द लक्षण।
उमा रमण भूतेश प्रसीद करूणानिधे।।
ऊँ गुरूदेवाय तत्पुरूषाय नमः।।
निम्न संदर्भ बोलते हुए यंत्र, गुटिका को स्नान कराएं।
ऊँ आपो हिष्ठा मयो भुवस्तान ऊर्जे दधातन
महेरणाय चक्षसे। यो वः शिवतमो रसस्तस्य
भाजयते हनः उशतीरिव मातरः तस्मा अरंग मामव
यस्य क्षयाय जिन्वय आपो जनयथा च नः।
श्री गुरूदेवाय स्नानं समर्पयामि नमः।
वस्त्रं समर्पयामि नमः तिलकं समर्पयामि नमः।
अक्षतान् समर्पयामि नमः धूपं दीपं दर्शयामि नमः।
नैवेद्यं
भालचन्द्र नमस्तुभ्यं विघ्नहृत मंगलप्रद,
नानाविधं गृहाणेदं नैवेद्यं कृपया प्रभो।
श्रीगुरूदेवाय नैवेद्यं निवेदयामि नमः।
फिर आचमन कराएं एवं दक्षिणा द्रव्य अर्पित करें-
इदं आचमनीयं, दक्षिणा द्रव्यं समर्पयामि श्री गुरू चरणकमलेभ्यो नमः।
अपने जीवन की समस्त बाधाओं एवं मन के विकारों, दोषों, पापों की समाप्ति व आनन्द की स्थिति प्राप्त करने हेतु कुंकुंम एवं अक्षत को निम्न मंत्र बोलते हुए यंत्र पर चढ़ाएं-
ऊँ अघोराय नमः। ऊँ पशुपतये नमः। ऊँ शर्वाय नमः। ऊँ विरूपाक्षाय नमः। ऊँ विश्वरूपिणे नमः। ऊँ त्र्यम्बकाय नमः। ऊँ कपर्दिने नमः। ऊँ भैरवाय नमः। ऊँ शूलपाणये नमः। ऊँ ईशानाय नमः। ऊँ सच्चिदानन्दाय नमः। ऊँ निखिलेश्वराय नमः।
फिर ‘सफेद हकीक माला’ से निम्न मंत्र की 1 माला 14 दिन तक करें-
।। ऊँ शं शंकराय लोकरंजनाय निखिलेश्वराय नमः।।
मंत्र जप के पश्चात् नीचे दिये स्त्रोत का पाठ करें।
मनो बुद्धयहंकार चित्तानि नाहं,
न च श्रोत्रजिह्वे न च घाणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
निखिल सत्य रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।।1।।
न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायु
र्न वा सप्तधातुर्न वा पंचकोषः।
न वाक् पाणिपादं न चोपस्थापायू,
निखिल सत्य रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।।2।।
न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ,
मदो नैव मे नैव मात्सर्य भावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
निखिल सत्य रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।।3।।
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भौक्ता।
निखिल सत्य रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।। 4।।
न मृत्युर्न शंका न मे जाति भेदः,
पिता नैव मे नैवमाता च जन्म।
न बन्धुर्न मित्रं गुरूर्नैव शिष्य,
निखिल सत्य रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।। 5।।
अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो,
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेयं,
निखिल सत्य रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।। 6।।
दो सप्ताह तक इस क्रम को नित्य करें, फिर यंत्र को पूजा स्थान में स्थापित कर अन्य सामग्री को जल में विसर्जित कर दें।
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