





हे परम आराध्य सद्गुरुदेव! आप जैसा युगपुरुष पहली बार ही इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ है, जिसकी चरणधूलि को पाने के लिये उच्चकोटि के योगीराज भी व्यघ्र रहते हैं।
शांत अवस्था में बैठते ही आपके स्मरण मात्र से ही ये आँखें अश्रुपूरित हो जाती हैं। एक अलग प्रकार की बेचैनी, तड़प, व्याकुलता सी व्याप्त होने लगती है। ध्यानावस्था में हर बार आपका ही बिम्ब दिखाई देता है। घण्टों आपके प्रतिमा के समक्ष एक टक देखने के बावजूद भी न जाने क्यों ये मन नहीं भरता।
हमने उनको इतना देखा, जितना देखा जा सकता था
फिर भी दो आँखों से कितना देखा जा सकता था
प्रेम एक धधकता हुआ अंगारा है, जिस पर माया की राख पड़ी हुई होती है। आपके फूँक मारने मात्र से ही राख उड़ जाती है और नीचे से उपासना रुपी अंगार चमकता हुआ निकल आता है। मेरा छोटा सा हृदय, आपके हाथों के स्पर्श से अपने आनन्द की सीमा को खो देता है और उसमें से ऐसे उद्गार मिलते हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता। और उसी आनन्द गीत के आनन्द में मस्त होकर मैं अपने स्वरुप को भूल जाता हूँ और स्वामी को सखा पुकारने लगता हूँ।
हे नारायण! मैं तुम्हारे समक्ष गाना चाहता हूँ किन्तु तुम्हारे समक्ष आते ही मेरी वाणी गीत के रुप में प्रकट नहीं हो पाती। प्रयत्न करने पर भी और मैं अपनी हार मान लेता हूँ। मुझे जीवन के हर क्षेत्र में विजय की अकांक्षा है, सिवाय प्रेम के। क्योंकि प्रेम में परास्त होना ही जीवन की सबसे बड़ी जीत है। प्रेम ही एक ऐसा भाव है जिसकी व्यंजना हँसकर भी की जाती है और रोकर भी।
गीत लिखे भी तो ऐसे के सुनाए न गए
ज़ख़्म यूँ लफ़्ज़ों में उतर के दिखाए न गए
इस मृत्यु लोक का सौभाग्य था कि आप गृहस्थ शिष्य और शिष्याओं के बीच में आये। उच्चकोटि के पारमेष्ठी तत्व होते हुए भी, सम्पूर्ण वेद-पुराण-शास्त्रों को अपने कण्ठ में धारण करते हुए भी आपकी वाणी अत्यन्त सरल व मधुर है, आपका रोम-रोम मधुर है, जिसकी पुष्टि ये श्लोक करता है-
वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरं,
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं।
वे बड़े सौभाग्यशाली ही होंगे जो निरंतर आपके चरणों में सेवारत हैं या आपने उनकी सेवा स्वीकार की है। आपने निरंतर प्रेम का ही दान किया है क्योंकि आपका सारा जीवन ही प्रेममय है, शिवमय है। प्रत्येक शिष्य के जन्म-जन्मांतरों के पापों को भी आप सहज प्रसन्नता से ग्रहण कर लेते हैं। ये दुर्भाग्य ही होगा कि हमनें आपको समझा नहीं। आपके द्वारा बनाये गये माया के आवरण में हम पूर्णतः घिर जाते हैं।
हे अखिलेश्वर! जितना दुःख, जितनी वेदना और जितनी आलोचना-प्रत्यालोचना आपने सहन की, उतना एक मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है। आपने जो भी दृढ़ निश्चय कर लिया, उसे पूरा कर लेने की क्षमता है फिर वह इस युग के विपरीत ही क्यों न हो। धधकते हुए अंगारों के बीच भी आपने शांति का सन्देश सुनाया है। आप सही अर्थो में चौसठ कला पूर्ण हैं, पुरूषोत्तम हैं, तपोपिष्ठ स्वरुप हैं, वेदो की ऋचाएं और ब्रह्माण्ड का उज्ज्वलतम पक्ष हैं, कोई भी विशेषण आपके लिए न्यून है, जिसने आपको भुजाओें में भर लिया, वह अपने आप में ही सर्व सिद्धिप्रद बन गया।
ये सोचकर के वो खिड़की से झाँकले शायद,
गली में खेलते बच्चे लड़ा दिये मैंने
मंत्रों के निरंतर मनन करने से, विद्वानों द्वारा माननीय होने से, समर्पित एवं श्रद्धालु शिष्यों और साधकों की खोज करके उन्हें शरणागति प्रदान करने के कारण, मुनिवत् सतत् वन्दनीय हैं। आप योगी हैं, योगेश्वर हैं, मंगलमय हैं, देवपुरूष हैं और अनन्त सौन्दर्यमय हैं, आप शिष्यों और साधकों के हृदय रूपी मानसरोवर में विचरण करने वाले राजहंस हैं। आपको बारम्बार प्रणाम स्वीकार हो।
महावक्त्रः महावक्ता मांगलिकः महामुनिः।
मुनिमानस हंसोऽयं मार्तण्डः मधुराकृतिः।।
आप तो ज्ञान की अजस्त्र वर्षा करते ही रहते हैं, प्रहार पर प्रहार करके। जो ज्ञानवान होते हैं, जो चेतनावान होते हैं वे आपकी इस अलौकिक कृपा का लाभ प्राप्त कर लेते हैं; लेकिन जो मूर्ख होते हैं, जो आलसी होते हैं, वे ओट में छुपकर खड़े हो जाते हैं। गंगा तो अपने स्थान पर बह रही है, किन्तु गंगा की सार्थकता तभी है, जब उसमें डुबकी लगाकर पवित्र होना चाहेगा। यदि कोई गंगा में नहाकर पवित्र न होना चाहेगा, तब भी गंगा बहेगी ही और बहते-बहते एक दिन उसके पहुँच से इतनी दूर चली जाएगी…, कि कोई चाहकर भी गंगा में स्नान तो क्या…., उसके दर्शन तक नहीं कर पायेगा।
हे परमआराध्य पारमेष्ठी! सांसारिक जनों का प्रेम मुझे सब तरफ़ से बाँधने का यत्न करता है और स्वतंत्रता छीनने का प्रयास करता है। परंतु आपका प्रेम उनसे बढ़कर है, वह मुझसे दासता के श्रृंखला में नहीं बाँधता अपितु मुझे स्वतंत्र रखता है। समाज मुझे अकेला नहीं छोड़ता कि कहीं मैं उन्हें भूल न जाऊँ। इसका परिणाम यह है कि एक-एक दिन निकलते जा रहे हैं और आप दिखाई नहीं देते।
जैसे रात्रि, प्रकाश के लिये की गई प्रार्थना को आपने अंधकार में छिपाये रखती है अर्थात् रात्रि के अंधकार में प्रकाश जैसे अप्रगट रुप में विद्यमान रहता है। वैसे ही अचेतन अवस्था में भी मेरे अन्तःकरण में ये पुकार उठती है कि तेरी चाह है, मुझे बस तेरी चाह है। आँधी जब शान्ति पर बलिष्ठ आघात करती है अर्थात् जब शान्ति को भंग करती है तब भी वह अपना अन्तिम आश्रय शान्ति में ही ढूंढती है, वैसे ही मेरा द्रोह मेरे प्रेम पर आघात करता है, फिर भी मेरी पूर्णता बस आप में ही है।
इक तरफ जहां सारा, इक तरफ प्रेम रे।
दौलते जहां बस नाम की, सांचा बस इक प्रेम रे।।
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