





हिन्दू धर्म में कई दार्शनिक और धर्मसाहित्यों का उल्लेख मिलता है। भारत की धरती कई महान दार्शनिकों की जन्मदायिनी है। इसी क्रम में रामानुजाचार्य जैसे महान दार्शनिक ने भी इसी धरा पर जन्म लिया। रामानुजाचार्य वैष्णव परम्परा के सबसे महान दार्शनिक के तौर पर जाने जाते हैं। हिन्दू धर्म में ‘‘विशिष्ट अद्वैत’’ के प्रतिपादक रामानुजाचार्य को भी जगद्गुरू शंकराचार्य और गुरू माधवाचार्य के समान ही आदर और सम्मान दिया जाता है।
रामानुजाचर्य के जीवन से जुड़ी सबसे आश्चर्य की बात यह है कि रामानुजाचार्य के मूल शरीर को आज भी तिरूचिरापल्ली के श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर में संभाल कर रखा गया है। यह शरीर करीब 1000 वर्ष पूर्व का है। जिसे आज तक संजोकर रखा गया है। वैष्णव आचार्यो में प्रमुख ‘‘रामानुजाचार्य”केशिष्यपरम्परामेंही‘‘रामानन्द’’हुएजिनकेशिष्यकबीरदास, रैदास और सूरदास हुए।
रामानुजाचार्य का जन्म दक्षिण भारत के एक साधारण से परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता धनी नहीं थे परन्तु अत्यन्त विद्वान थे। रामानुजाचार्य बचपन से ही विलक्षण बालक थे। कुछ लोग उन्हें लक्ष्मण का अवतार भी मानते हैं। बचपन में उन्होंने कांची जाकर मायावदी (वह सिद्धांत जो मानता है कि समस्त विविधता और वैयक्तिकता भ्रम है) गुरु “यादवप्रकाश”सेवेदोंकीशिक्षाली।
एक दिन उनके गुरु ने श्री कृष्ण के आँखों की सुन्दरता के बारे में अपनी समझ समझाना शुरु किया। इस संदर्भ में छान्दोग्य उपनिषद में “कप्यसम्”शब्दकाप्रयोगकियागयाहै।उन्होंनेसमझायाकि‘कपि’काअर्थबन्दरहैऔरबंदरकापिछलाभाग (कपि-आसम्) दोनोंओरसेलालहोताहै।अन्ततःउन्होंनेयहनिष्कर्षनिकालाकि‘कृष्णकीकमल जैसी आँखें बंदर के पिछले भाग के समान हैं।’ यह सुनकर रामानुज रोने लगे।
बाद में, जब रामानुज अपने गुरु “यादवाचार्य”कीसेवाकररहेथे, तो उन्होंने उनसे कहा, आपने ‘कप्यसम्’ की जो व्याख्या दी है, वह गलत है। ‘कपि’ का अर्थ ‘वह जो हर जगह से जल ग्रहण करता है’, समझा जा सकता है। जल कौन ग्रहण करता है? सूर्य। ‘आसम’ शब्द का अर्थ ‘खिलना’ भी होता है, इसलिए ‘कपि-आसम्’ का अर्थ ‘वह जो सूर्य के नीचे खिलता है’ या दूसरे शब्दों में,‘कमल का फूल’ समझा जा सकता है। इस प्रकार, हम श्लोक का अर्थ यह समझते हैं कि भगवान कृष्ण की आँखें कमल के फूल के समान सुन्दर हैं।”
रामानुज के गुरू यह देखकर चकित रह गये, यदि यह बालक इतनी कम उम्र में इतना ज्ञानी है, और कुशल व्याख्या करने वाला है तो बड़ा होकर क्या करेगा? यदि यह जीवित रहा, तो ‘‘मायावाद’’ की शिक्षा समाप्त हो जायेगी। यह भविष्य में वेदों से सभी निराकार शिक्षाओं को उखाड़ फेंकेगा। इसलिये मुझे इसे मार देना चाहिये।
रामानुज को धोखा देने के इरादे से यादवाचार्य ने कहा कि वे अपने सभी छात्रों के साथ प्रचार-प्रसार करने के लिये यात्रा पर जा रहे हैं और रामानुज को भी उनके साथ चलना चाहिये। भोले-भाले होने के कारण रामानुज कुछ समझ न सके। जंगल में चचेरे भाई ने उन्हें सारी योजना बताई और रामानुज को भाग जाने को कहा। आधी रात को रामानुज शौचालय जा रहे हैं, बहाना बनाकर भाग गये।
अकेले ही भागते हुए उन्होंने अचानक एक शिकारी को अपनी पत्नी के साथ तूफानी रोशनी लिये हुये देखा। उस आदमी ने पूछा ‘‘तुम कहा जा रहे हो?’’
रामानुज ने उत्तर दिया- “मैंकांचीपुरमजारहाहूं।”
उस आदमी ने पुनः जवाब दिया, “हम भी वहीं जा रहे हैं, इसलिये तुम भी मेरे साथ आओ।’’
बहुत दूर कांचीपुरम पहुंचे तो वे लोग गायब हो गये। तब रामानुज रोने लगे। वे समझ गये कि वह निश्चित रूप से स्वयं भगवान नारायण और उनकी शाश्वत संगिनी लक्ष्मी देवी ही थीं जिन्होंने आकर उनकी जान बचाई थी।
कुछ समय बाद रामानुज के गुरू गाँव लौट आये। उन्हें लगा कि शायद किसी शेर या बाघ ने उन्हें खा लिया होगा। लेकिन जब वे पहुँचे तब उन्होंने देखा कि रामानुजाचार्य अभी जीवित हैं।
कुछ वर्ष पश्चात् वे दक्षिण भारत के महान वैष्णव गुरू “श्रीयमुनाचार्यजी”केशिष्यबनगये।बादमेंरामानुजकाविवाहहुआ।विवाहकेबादरामानुजएकसंस्कृतस्कूलमेंपढ़ानेलगे।उनकेकुशलशिक्षणनेसभीविद्यार्थियोंकोसम्मोहितकर रखा था। पत्नी का व्यवहार ठीक न होने के कारण रामानुज ने गृह त्याग करने का फैसला लिया। घर त्याग करके उन्होंने अपने वैष्णव गुरू यमुनाचार्य जी की तीव्र याद आई तथा वह उनसे मिलने के लिये व्याकुल हो उठे। रामानुज, यमुनाचार्य के साथ बहुत कम समय व्यतीत कर पाये थे। जब तक वह यमुनाचार्य जी के पास पहुंचते तब तक उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया था। अपने गुरू की इच्छानुसार उन्होंने तीन विशेष कार्य करने का संकल्प लिया। ‘ब्रह्मसूत्र’, ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ और ‘दिव्य प्रबन्धन’ का टीका लिखना। गृहस्थ आश्रम का त्याग करने के बाद उन्होंने श्रीरंगम प्रान्त के ‘यतिराज’ नामक सन्यासी से सन्यास की दीक्षा ली। तत्पश्चात् उन्होंने वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रचार करने के लिये पूरे भारत वर्ष का भ्रमण किया।
रामानुजाचार्य के अनुसार-“भक्तिकाअर्थध्यानकरनातथाईश्वरकीप्रार्थनाकरनाहै।” इसी गहन भक्ति के तहत संत रामानुजाचार्य को माता सरस्वती के दर्शन भी प्राप्त हुये थे। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में संत रामानुजाचार्य ने भक्ति को जाति एवं वर्ग से पृथक तथा सभी के लिये संभव माना है। इसके अलावा रामानुजाचार्य ने भक्ति को एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर उसके लिये दार्शनिक आधार भी प्रदान किया कि जीव ब्रह्म में पूर्णतया विलीन नहीं होता है, बल्कि भक्ति के द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करके जीवन-मृत्यु के बंधन से छूटना यही मोक्ष है।
‘‘नृसिंह, राम, शेषनाग और कूर्म जैसे लीलाओं के विस्तारों की पूजा करने से व्यक्ति संकर्षण चतुर्भज की पूजा की ओर अग्रसर होता है। उस अवस्था से व्यक्ति वासुदेव, परम ब्रह्म की पूजा के स्तर तक पहुँच जाता है। पौष्कर-संहिता में कहा गया है, ‘‘यदि कोई व्यक्ति नियमों के अनुसार पूर्णतः पूजा करें, तो वह भगवान वासुदेव को प्राप्त कर सकता है।’’ यह स्वीकार किया जाना चाहिये कि संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न और अनिरूद्ध भगवान वासुदेव के समान हैं क्योंकि वे अकल्पनिय शक्ति रखते हैं और वासुदेव के समान दिव्य रूप धारण कर सकते हैं। संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरूद्ध कभी जन्म नहीं लेते, परंतु वे शुद्ध भक्तों के समक्ष विभिन्न अवतारों में प्रकट हो सकते हैं। यही समस्त वैदिक साहित्य का निष्कर्ष है। ’’
रामानुजाचार्य ने सत्ता या परमसत् के संबंध में तीन स्तर माना है- ब्रह्म अर्थात् ईश्वर, चित्त अर्थात् आत्मतत्व और अचित् अर्थात् प्रकृति तत्व।
वस्तुतः ये चित् अर्थात् आत्मतत्व तथा अचित् अर्थात् प्रकृति तत्व, ब्रह्म या ईश्वर से पृथक नहीं हैं। बल्कि ये विशिष्ट रूप से ब्रह्म के ही दो स्वरूप हैं एवं ब्रह्म या ईश्वर पर ही आधारित हैं। जिसे रामानुजाचार्य ने ‘विशिष्टा द्वैत’ का नाम दिया। जैसे शरीर एवं आत्मा पृथक नहीं हैं तथा आत्मा के उद्देश्य की पूर्ति के लिये शरीर कार्य करता है। उसी प्रकार ब्रह्म या ईश्वर से पृथक चित् एवं अचित् तत्व का कोई अस्तित्व नहीं है। वे ब्रह्म या ईश्वर का ही शरीर है तथा ब्रह्म या ईश्वर उनकी आत्मा सदृश्य हैं।
रामानुजाचार्य ने वैष्णव धर्म के प्रचार-प्रसार के लिये पूरे भारतवर्ष का भ्रमण किया। गुरुआज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने तीन विशेष कार्य करने का जो संकल्प लिया था, उसे अपने जीवन में सर्वोपरि मानते हुए पूरा किया। वस्तुतः हम धीरे-धीरे गुरूत्वीय चेतना से विमुख होते जा रहे हैं। शायद यही कारण है कि हमारे समाज से योग्य और श्रेष्ठ लोगों का लोप होता जा रहा है। यह भी सत्य है कि आज के युग में शंकराचार्य और रामानुजाचार्य जैसे युगपुरूषों को प्राप्त करना कठिन है। अगर सद्गुरू के चरणों में बैठकर भावपूर्ण तरीके से प्रार्थना किया जाये तो उनके द्वारा निश्चित रूप से ही युगपुरूषों का निर्माण किया जा सकता है। जिससे हम वास्तव में विश्व गुरू के संकल्पों तथा दायित्वों पर खरे उतर सकते हैं और जगत् को प्रकाशमय बना सकते हैं।
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