





सुवर्ण गौरी साधना से साधक के जीवन में अक्षय धन, वैभव, आनन्द, सौभाग्य की निरन्तरता बनी रहती है, जिससे साधक अपने पारिवारिक जीवन को सुख, शान्ति, अनुकूलता से व्यतीत करता है, साथ ही सुवर्ण गौरी साधना का प्रभाव जीवन में सदैव बना रहता है।
साधक जब साधना के धरातल में प्रवेश करता है, तो उसका पहला उद्देश्य साधना में तुरन्त सफलता प्राप्त कर, अपने जीवन की परेशानियों को हटा कर जीवन में एक नवीनक्रम का निर्माण करना होता है, साधक की यही इच्छा रहती है, कि उसे अपने कार्यो में तुरन्त सफलता मिले, अपने जीवन का आनन्द पूर्ण रूप से प्राप्त हो, यदि वह पुरूष हो तो सदैव यही चाहता है, कि उसका गृहस्थ जीवन विशिष्ट हो, पत्नी विचारों के अनुकूल, उसकी सहयोगी और उसे पूर्ण आनन्द प्रदान करने वाली हो, इसी प्रकार प्रत्येक स्त्री यही चाहती है, कि उसे श्रेष्ठ संतान हो, उसका पति, पति होने के साथ-साथ उसका मित्र भी हो, जो उसकी भावनाओं को पूर्ण रूप से समझे, उसके जीवन में न्यूनता न आने दे और जीवन बढ़ने के साथ-साथ सुख बढ़ता रहे।
पूज्य गुरूदेव की लीला को भी हर कोई समझ नहीं पाता है, जब वे अच्छे प्रसन्नचित होते हैं, तो फिर बात ही कुछ और होती है, फिर वे यदि ‘दुर्गा’ के सम्बन्ध में कुछ बोलने का मानस बनाया तो वे इस सम्बन्ध में हजारों मन्त्रों सहित ऐसी साधनायें, ऐसा ज्ञान प्रकट करते हैं, कि आश्चर्य शब्द भी छोटा पड़ जाता है, कृष्ण के सम्बन्ध में उनका व्याख्यान, उनका ज्ञान शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है, एक बार उनके एक प्रिय शिष्य ने कहा, कि गुरूदेव मेरे जीवन में उत्साह नहीं है, मैं कोई भी काम करने का विचार करता हूं, तो मुझे पहले असफलता का ही ध्यान आता है, जिन लोगों को मैंने बार-बार सहयोग दिया, वे लोग समय पड़ने पर थोड़ा भी सहयोग मांगता हूं, तो कन्नी काट जाते हैं, घर-परिवार के लोग भी असंतुष्ट ही रहते हैं, और तो और मेरी पत्नी भी मुझे नकार-बेकार समझती है, हम दोनों के विचारों में कोई सामन्जस्य नहीं है, मेरे लिये सुबह कोई नया उत्साह नहीं लेकर आती है। जीवन एक प्रकार का बोझ बन गया है।
शिष्य ने पूछा मैंने ऐसे कौन से दोष किये हैं कि मेरे जीवन में ऐसी स्थिति बन गई है? क्या इसका कोई उपाय हैं, अथवा मुझे अपना जीवन इसी प्रकार काटना पड़ेगा?
इस पर गुरूदेव ने कहा कि तुम जो कह रहे हो, वह केवल तुम्हारे ऊपर ही लागू नहीं होता है, सब के ऊपर लागू होता है। जीवन जीना और काटना दोनों अलग-अलग बातें है, सौ में अस्सी लोग तो जीवन का भार उठाते हुये चल रहे हैं, कभी-कभी कोई प्रसन्नता की किरण आ जाती है, इसमें दोष तो उसका खुद का ही है, साधना में सबसे पहले आवश्यकता इस बात की है, कि जीवन में उत्साह का निर्माण हो, हर सुबह नवीन लगे, मन में आनन्द की लहर बने।
पूज्य गुरूदेव ने सुवर्ण गौरी साधना का जो विधान बताया, उसे बहुत से शिष्यों ने इसे सामान्य रूप से सम्पन्न करके भी अपने जीवन को एक नया आयाम दिया, उसके बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है।
‘सुवर्ण गौरी’ शक्ति का सौभाग्य स्वरूप है, जो कि अप्सरा कही जाती है, सुवर्ण गौरी का विशेष नाम ‘शिवदूती’ भी है, जो कि भगवान शिव की कृपा एवं वर प्राप्त कर अपने सर्वांग स्वरूप में प्रिया है आनन्द मंदाकिनी शिव की शक्तियों के सम्बन्ध में एक प्रामाणिक ग्रन्थ है, जिसमें इस साधना के सम्बन्ध में पूर्ण विधि-विधान सहित लिखा गया है, इस ग्रन्थ में सुवर्ण गौरी के स्वरूपों के सम्बन्ध में लिखा है, कि इसके सोलह स्वरूपों की सिद्धि जो साधक प्राप्त कर लेता है, वह संसार का अधिपति होने का सौभाग्य प्राप्त कर लेता है, सुवर्ण गौरी के ये सोलह स्वरूप हैं-
इन सोलह स्वरूपों में से यदि एक स्वरूप की सिद्धि भी प्राप्त हो जाय, तो साधक के जीवन का अन्धकार दूर हो जाता है और आगे जीवन में किसी प्रकार की कमी नहीं रहती। साधना क्रम में सम्पूर्ण रूप से पूजन का विधान दिया जा रहा है। यदि साधक श्रेष्ठ चिंतन भाव के साथ साधना सम्पन्न करें तो निश्चित ही सफलता प्राप्त होती है।
प्रिया का तात्पर्य है, जो आपको प्रिय हो, जिसके कहे अनुसार आप कार्य करें, और वो आपके अनुसार कार्य करें, जिसके पास रहने से आपको आनन्द का अनुभव हो, जो आपके जीवन में उत्साह एवं प्रेम भरे, आपकी कमियों को हटाये और आपके प्रति समर्पण का भाव हो।
‘आनन्द मंदाकिनी’ ग्रन्थ में लिखा है कि, सुवर्ण गौरी साधना सम्पूर्ण रूप से तो सिद्ध प्रिया रूप में ही हो सकती है, तब यह विशिष्ट शक्ति जीवन में हर स्थिति में आपके कार्यों को उचित परिणाम, अभीष्ट फल प्राप्त करा सकती है, सिद्धि होने पर आपको हर समय यह ध्यान रहता है, कि यह शक्ति आपकी सहयोगी रूप में विद्यमान है, आप अपने मन के भावों को प्रकट कर सकते हैं, अपनी इच्छाओं को बिना संकोच बता सकते हैं और अपनी इच्छाओं की पूर्ति का सरल सहज मार्ग प्राप्त कर सकते है।
ज्यादातर व्यक्ति प्रेम और काम को एक ही रूप में देखते हैं, सोचते हैं, जो कि बिल्कुल गलत है, प्रेम मन की अभिव्यक्ति है, और काम शरीर की अभिव्यक्ति, और मन हमेशा शरीर से ऊपर है इस कारण सुवर्ण गौरी साधना, काम वासना भाव से कभी भी सिद्ध करने का प्रयास न करें, इसे प्रेम भाव से प्रिया रूप में ही सिद्ध करने का प्रयास करें।
इस साधना से निम्न प्रकार की अनुकूलता प्राप्त होती है-
साधना विधान
यह साधना सायंकाल के पश्चात् की जाने वाली साधना है और शुक्रवार को सम्पन्न करनी चाहिये, साधना के लिये आवश्यक है, कि चित्त में प्रसन्नता, उत्साह का भाव होना चाहिये।
इस साधना के लिये हरियाली सिद्धि जीवट, सुवर्ण गौरी शक्ति युक्त काम्य फल तथा सुवर्ण गौरी अनंग माला आवश्यक है, साधना में पीले रंग का प्रयोग विशेष रूप से होता है, अतः साधक-साधिका पीले रंग की धोती/साड़ी धारण करें, पीले आसन पर बैठ कर साधना करें।
इसके अतिरिक्त साधना हेतु शुद्ध घी का दीपक, अष्ट गन्ध, सिन्दूर, चन्दन जल, चावल, पीले पुष्प, ताम्रपात्र, नैवेद्य हेतु लड्डू इत्यादि की व्यवस्था पहले से कर लें, पूजा स्थान में अर्थात् जहां आप साधना कर रहे हैं, वहां घी का दीपक तथा सुगन्धित अगरबत्तियां जला दें, अपने आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुंह कर बैठें, तथा सामने एक पात्र में जीवट व काम्य फल स्थापित करें और सुवर्ण गौरी का ध्यान करते हुये आह्वान करें, यह मूल रूप से सुवर्ण गौरी का स्वागत मन्त्र है-
गौरी दर्शनमिच्छन्ति देवाः स्वामीष्टसिद्धये।
तस्ये ते परमेशायै स्वागतं स्वागतं च ते।।
कृतार्थोनुग्रहीतोऽस्मि सकलं जीवितं मम।
आगता देवि सुस्वागतमिदं पुनः।।
इस स्वागत मन्त्र का पांच बार उच्चारण के पश्चात् एक-एक कर सोलह काम्य फल स्थापित करें, ये स्वर्ण गौरी के सोलह शक्ति स्वरूप हैं, इस हेतु सोलह चावल की ढेरी बना कर प्रत्येक शक्ति का नाम लें और आह्वान काम्य फल के सामने निम्न आह्वान करें।
ऊँ सुवर्ण गौरी अमृताकर्षणिका पूजयामि नमः।
ऊँ सुवर्ण गौरी रूपाकर्षणिका पूजयामि नमः।
ऊँ सुवर्ण गौरी सर्वासाधिनी पूजयामि नमः।
ऊँ सुवर्ण गौरी अनंगकुसुमा पूजयामि नमः।
ऊँ सुवर्ण गौरी सर्वदुखविमोचनी पूजयामि नमः।
ऊँ सुवर्ण गौरी सर्वसिद्धिप्रदा पूजयामि नमः।
ऊँ सुवर्ण गौरी सर्वविघ्ननिवारणी पूजयामि नमः।
ऊँ सुवर्ण गौरी सर्वस्तम्भनकारिणी पूजयामि नमः।
ऊँ सुवर्ण गौरी चित्ताकर्षणिका पूजयामि नमः।
इस प्रकार प्रत्येक शक्ति का आह्वान करते हुये सुवर्ण गौरी सिद्ध शक्ति काम्य फल पर अष्ट गन्ध, सिन्दूर, चन्दन, इत्र, पीले पुष्प, अक्षत, चढ़ायें और सामने एक पात्र में नैवेद्य अर्पित करें।
जब यह स्थापना क्रम पूरा हो जाये तो सात दीपक जलायें तथा मन्त्र का जप सुवर्ण गौरी अनंग माला से प्रारम्भ करें।
मंत्र
युं क्षं ह्रीं सुवर्ण गौरी
Yam Ksham Hreem Survana Gauri Sarvaankaamaandehi Yam Kum Hreem Yum Namah
अब इस मन्त्र की सात माला जप करना है और जप प्रारम्भ करने से पहले दायें हाथ में जल ले कर संकल्प लें, ‘‘त्रैलोक्यमोहने चक्रे इमाः प्रकट सुवर्ण गौरी’ इस प्रकार प्रत्येक माला मन्त्र जप के पश्चात् यह संकल्प जल लेकर करना है, जब सात माला मन्त्र जप पूरा हो जाये, तो एक थाली में सात दीपक ले कर आरती सम्पन्न करें तथा प्रसाद ग्रहण करें।
साधना क्रम के विधान में यह आवश्यक है, कि साधक रात्रि को वहीं भूमि पर शयन करें, कई साधकों को तो प्रथम बार साधना में ही रात्रि में विशेष अनुभूति होती है, स्वप्न एक साकार रूप में सिद्ध हो कर सुवर्ण गौरी उपस्थित होती है, कमरे में एक पीला प्रकाश फैल जाता है, ऐसे समय साधक तत्काल उठ खड़ा हो, और मन चाहा वर मांग लें।
यह साधना तीन शुक्रवार तक नियमित रूप से अवश्य करना चाहिये। साधना के उपरान्त जीवन और काम्य फल को किसी पवित्र जलाशय में विसर्जन करें तथा माला को 21 दिन तक धारण कर जलाशय में विसर्जित करें। प्रत्येक साधना क्रम में सुन्दर अनुभव प्राप्त होता है, एक बार सुवर्ण गौरी सिद्ध होने पर पूरे जीवन भर सहयोग प्राप्त होता रहता है, साधक के मन में एक प्रिय भाव हमेशा बना रहना चाहिये, जो साधक सिद्धि प्राप्त होने पर गर्व, घमंड अभिमान से भर जाते हैं और गलत कार्यो की कामना करने लगते हैं, उनकी सिद्धि उतनी ही नष्ट भी हो जाती है।
सुवर्ण गौरी साधना तो मन उपवन का ऐसा सुगन्धित पुष्प है, जिसकी आनन्द गन्ध एक बार पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाय, तो पूरे जीवन प्राणों में आनन्द का संचार हो जाता है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,