





मनुष्य का एक जन्म जो उसके माता-पिता द्वारा प्राप्त होता है। फिर उसका अगला जन्म है, जो उसे सद्गुरु से दीक्षा द्वारा प्राप्त होता है; वह वास्तविक जन्म है, वह शिष्य का जन्म है, वह जागरण का उदय है, वही अहोभाव है। चाहे सद्गुरु पूर्णिमा हो या सद्गुरु जन्मोत्सव; सद्गुरुदेव ने तो हमेशा न्यौछावर ही किया है, सदैव लुटाया ही है। पारमेष्ठि तत्व से युक्त उच्चकोटि के ब्रह्मऋषि, तपोनिष्ठ स्वरुप तथा ब्रह्माण्ड के समस्त शक्तियों व ज्ञान-विज्ञान को अपने हृदय में धारण करते हुये भी सद्गुरुदेव सदैव ही सरल, सहज तथा आसान शब्दों का प्रयोग करते हैं।
पत्रिका के पिछले अंक में सद्गुरुदेव ने शिष्य के आत्म जागरण के बारे में विस्तृत रुप से बताया था तथा किस प्रकार से शिष्य अपने जीवन में व्याप्त अपूर्णता को समाप्त कर शक्ति से युक्त हो सके और शुद्ध चिंतन के माध्यम से अपने मन के विष को विगलित कर अमृतत्व को प्राप्त कर सके। इस विषय पर भी सद्गुरुदेव जी ने विस्तृत प्रकाश डाला था।
भक्ति का उचित समय क्या है? भक्ति के माध्यम से शक्ति का जागरण कैसे हो? साधक के अन्दर संकल्प शक्ति कैसे विकसित हो? तथा किस प्रकार से वह अपने अन्दर स्व-परिवर्तन के भाव को जागृत कर सके? क्या भौतिक-सांसारिक क्रियाकलापों में रच-बस जाना ही जीवन का मुख्य ध्येय है? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर समेटता हुआ इस विशेषांक का सारगर्भित प्रवचन, पूज्य सद्गुरुदेव के मधुर तथा प्रहारपूर्ण वाणी में –
आषाढ़ी पूर्णिमा का महोत्सव और प्रत्येक पूर्णिमा तिथि पर किसी न किसी का अवतरण महोत्सव-पर्व सम्पन्न किया जाता है। जिस तरह से इस आषाढ़ी पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा के रुप में भागवत कथा के, महाभारत के रचयिता वेदव्यास जी का अवतरण पर्व, श्रावण पूर्णिमा पर रक्षाबंधन का महोत्सव, कार्तिक पूर्णिमा पर गुरु रुप में गुरु नानक जी का अवतरण महोत्सव, सन्यास महोत्सव, फाल्गुन पूर्णिमा में होलिका का महोत्सव और उसके बाद चैत्रिय पूर्णिमा में बल-बुद्धि-ज्ञान प्रदाता हनुमान का अवतरण महोत्सव तथा वैशाखी पूर्णिमा में भगवान बुद्ध का अवतरण महोत्सव सम्पन्न करते हैं अर्थात् ये सभी, चाहे वेदव्यास जी हों, गुरु नानक अथवा भगवान हनुमान हों या महात्मा बुद्ध हों; इन सभी को ज्ञान के रुप में, चेतना के स्वरुप में और शक्ति के स्वरुप में पूर्णता दाता कहा गया है अर्थात् ये हर स्वरुप में हमें पूर्णता प्रदान करते हैं। यह पूर्णता सर्वप्रथम शारीरिक देह से नहीं आती है कि मेरी कर्मेंद्रियां, ज्ञानेंद्रियां मुझे प्राप्त हैं। मैं अच्छी तरह से देख, सुन सकता हूँ, बोल सकता हूँ, महसूस कर सकता हूँ; यह पूर्णता किसी देह की पूर्णता नहीं है। पूर्णता का तात्पर्य कि हम अपने ज्ञान-चेतना के माध्यम से, भावों के माध्यम से दूसरों को चैतन्यता प्रदान कर सकें। दूसरों को श्रेष्ठ ज्ञान के माध्यम से जीवन में उत्तरोत्तर किस तरह से वृद्धि करना है वह चिन्तन प्रदान कर सकें।
मैनें कल भी बताया था कि चिंता सही प्रकार के चिन्तन से समाप्त होगी। हजारों प्रकार की चिन्तायें होती हैं जीवन में। चाहे वह धन की कमी हो, घर में रोग हो, कलह हो या नौकरी तथा व्यापार की समस्या हो। चिन्तायें किसी न किसी स्वरुप में बराबर बनी रहती हैं। सब कुछ ठीक ठाक होते हुये भी परिजनों तथा परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों के द्वारा अनर्गल क्रियायें होती रहती हैं। साथ ही डर-भय, हर समय व्यथित होकर रहना, ये भी चिन्ता के कारण होते हैं। ये सभी चिन्तायें केवल सही चिन्तन से ही समाप्त होती हैं और मैनें यह भी बताया था कि “चिन्ता, कर्ज और प्रेम किसी के कहने से नहीं प्राप्त होता है।”
कर्ज से मुक्ति कर्म करने से ही संभव है। संसार में कोई ऐसा तरीका नहीं है जिससे मेरे ऊपर का कर्ज समाप्त हो सके। केवल परिश्रम से ही समाप्त हो पाता है। जब किसी को देखने से, महसूस करने से, बातचीत से स्वतः ही एहसास हो जाता है कि सामने वाले में कुछ न कुछ विशेष हो रहा है और स्वतः ही भीतर से प्रेम का अंकुरण फूट पड़ता है। उसके लिये कहने की आवश्यकता नहीं है कि मैं आपसे प्यार करता हूँ या तुम मुझसे प्यार करते हो। धीरे-धीरे प्रस्फुटन होता है जिससे प्रेम में विस्तार होता रहता है और जितना प्रेम में विस्तार होता रहता है उतना ही एक दूसरे के प्रति समर्पण का भाव आता है, स्नेह का, आत्मियता का, अपनत्व का भाव आने लगता है। ठीक वैसे ही हम अपने भगवान से, ईष्ट से, गुरु से प्रेम करते हैं तो केवल हमारे अन्तसः में चिन्तन रहता है कि मैंने इनको दूर से भी देखा तो यह महसूस किया है कि कुछ न कुछ मेरा और इनका आत्मिय जुड़ाव है और वह आत्मियता का जुड़ाव किसी भी तरह के व्यक्ति से, स्त्री से, पुरुष से, बालक-बालिका से, भगवान से, जिस रुप में भी एक-दूसरे के विचार जहाँ सम्मिलित हो जाते हैं, वहाँ मिलन हो जाता है, वहाँ प्रेम का भाव प्रकट हो जाता है।
तो विशेषतः हमारे जीवन में मुख्य दुविधा है-‘चिन्ता’। और प्रेम का अंकुरण तब ही होगा जब हम चिन्ता रहित होंगे और चिन्ता रहित कैसे होंगे…? जब हम चिन्तन करते रहेंगे। चिन्ता करने से कोई समस्या समाप्त नहीं होती। मैंने यह भी बताया था कि “चिन्ता, चिता के समान होती है।”
चिता चिन्ता समाप्रोक्ता बिन्दु मात्रं विशेषता।
सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिता।।
अर्थात् ‘चिंता जीवंत व्यक्ति को जलाती है, जबकि चिता मृत शरीर को जलाती है।’ इसलिये चिन्तन करने से और उस चिन्तन को क्रियान्वित करने से, वे व्यथा, परेशानियाँ समाप्त होती हैं। क्योंकि हम चिन्ता, व्यथा, परेशानियों में ही पूरी-पूरी आयु समाप्त कर देते हैं। आपको विचार तो आता है कि मुझे चिन्ताओं से निवृत्ति प्राप्त कर चिन्तन करना है परन्तु उस चिन्तन के मार्ग पर चल नहीं पाते। क्योंकि ईश्वर ने सांसारिक मनुष्यों में एक भाव-चिन्तन डाला है कि परिश्रम, बुद्धि, चेतना से होने वाले कार्य में वह स्वयं को असमर्थ महसूस करता है। यदि वही कार्य बिना किसी श्रम के आसानी से हो जाय तो उसे रस, आनन्द की प्राप्ति होती है इसलिये हमारी अधिकांश समय और लालसा भोजन के प्रति, वासना, आलस्य-प्रमाद के प्रति बनी रहती है। वैसे अनर्गल कार्य जिसे हम जल्दी प्राप्त कर ले। हमें ज्ञात भी रहता है कि यह अहितकारी है फिर भी हमेशा उसे करते रहते हैं और उसी में हम रच-बस जाते हैं इसीलिये परिवर्तन का योग नहीं बन पाता।
बुरी लत इसी कारण से जल्दी लग जाती है क्योंकि उसमें एक रस का, आनन्द का भाव होता है। भले ही वह आनन्द हमारे जीवन को कष्टकारी बनाने का हो परन्तु हम उसके ओर खिंचे चले जाते हैं जिसके कारण हम व्यथित और परेशान हो जाते हैं। इसी कारण हम जीवन में जल्दी परिवर्तन नहीं कर पाते। एक व्यथा से छुटते हैं तो दूसरी और परेशानी आ जाती है। सात्विक खान-पान से जुड़ते हैं तो भोग-विलास की भावनायें प्रबल हो जाती हैं तथा वासनाओं का चिन्तन आने लगता है, आलस्य-प्रमाद की वृद्धि होने लगती है और जब आलस्य-प्रमाद आता है तो हमें और अधिक रस की, आनन्द की प्राप्ति हो और हम इसी प्रकार के रस में लिप्त होकर फँस जाते हैं जो कि जीवन को अधोगति की ओर क्रियाशील करती है।
इन सबको महसूस करने के बाद भी हम परिवर्तन नहीं कर पाते इसीलिये जो महसूस करते हुये अपने आप में परिवर्तन कर लेते हैं वे स्वयं के जीवन में दिव्य व्यक्तित्व से युक्त होते हैं। इसलिये जितने भी सन्त-महात्मा, शक्तियाँ और महापुरुष हुए वे सब इन्हीं स्थितियों से निकले हैं क्योंकि उनके परिवार में भी ऐसा ही माहौल था इसलिये जब उनके भीतर से चिन्तन आया तब उन्होंनें अपने जीवन में परिवर्तन की क्रिया प्रारम्भ की और सदैव अग्रसर रहे। तब जाकर जीवित, योगी-सन्यासी, महापुरुष के रुप में अपने आप के व्यक्तित्व को निर्मित किया। जन्म से कोई भी सन्त नहीं बना, महापुरुष या देवता नहीं बना।
मैनें बताया था कि अयोध्या में श्रीराम भगवान का जन्म हुआ। भले ही राजगुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र नें कुंडली देखकर घोषणा कर दिया कि वे राजयोगमय व्यक्तित्व बनेंगे, पुरुषोत्तममय महापुरुष बनेंगे। भले ही उनके कुण्डली में योग था फिर भी उन्हें ज्ञान प्राप्ति हेतु वशिष्ठ, विश्वामित्र के पास जाना पड़ा। शंकराचार्य पंडित, पुरोहित का काम करते थे; वे हर तरह से प्रकाण्ड पंडित थे क्योंकि उनके परिवार में कर्मकाण्ड बराबर पुरखों से चली आ रही थी। फिर भी उन्हें ज्ञान प्राप्त करने के लिये 8 वर्ष की उम्र में अपने गुरु के पास जाना पड़ा; लगभग दो हजार किमी दूर, केरल से ओंकारेश्वर नर्मदा नदी के तट पर। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म होने से पूर्व ही उनके सात भाई समाप्त कर दिये गये और योगमाया द्वारा भविष्यवाणी भी कर दी गई कि इस राक्षस का वध भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण के बाद ही हो पायेगा। वे ज्यों-ज्यों बाल्यावस्था से युवावस्था की तरफ अग्रसर हुये, भीतर में एक चिन्तन था कि असुरों का संहार करना है परन्तु ज्ञान नहीं था और वह ज्ञान उन्हें सांदीपनि ऋषि से प्राप्त हुआ। बहुत अधिक मोह, प्रेम और प्यार था अपने क्षेत्रवासियों से, पुरुषों से, बालकों से, स्त्रियों से, गोपियों से, परन्तु वे उसमें रच-बस नहीं गये,उनका परित्याग कर दिया। भले ही हम उन्हें रणछोड़ कहें या किसी अन्य नाम से पुकारें।
हम ज्योंहि कोई परिवर्तन की क्रिया करते हैं, तो समाज के द्वारा, परिवार के द्वारा, अपने परिजनों के द्वारा ऐसी ही तिरस्कार वाली, व्यथा वाली स्थितियों की प्राप्ति होती है। यह केवल इसी कलयुग की बात नहीं है, चाहे भगवान श्रीराम का सत्युग रहा हो, श्रीकृष्ण का त्रेतायुग रहा हो, द्वापर युग रहा हो; सभी युगों में ऐसा ही समाज था। ऐसा नहीं है कि ये कलयुग है तो यहाँ का समाज बहुत ज्यादा खराब है, उस समय भी समाज की वैसी ही कुदृष्टियाँ थीं। और उन कुभावों को, कुदृष्टियों को समाप्त करने के लिये समय-समय पर योगी-सन्यासी-युगपुरुष आये और उन्होंने इस संसार को सद्मार्ग प्रदान किया। जो सद्मार्ग पर चलता है उन्हें श्रेष्ठता की प्राप्ति होती ही है।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
परन्तु उसके लिये सदैव उत्साह होना चाहिये। आपको बार-बार कोई आगाह नहीं करेगा कि आप सदैव भक्ति, मंत्र जाप करते रहें, कर्मशील बनें रहें। बार-बार भगवान श्रीकृष्ण आकर नहीं कहेंगे कि अपने जीवन में सर्व स्वरुप में योग का निर्माण करें। बार-बार सद्गुरु आकर नहीं कहेंगे कि अपने ज्ञान शक्ति को, ऊर्जा शक्ति को, चेतना शक्ति को बराबर जीवन्त जागृत रखें। हनुमान नहीं कहेंगे कि आप बल-बुद्धि से युक्त बनें। आपके भीतर से परिवर्तन की ज्वाला प्रज्वलित होना चाहिये।
एक दरिद्र व्यक्ति था। वह सदैव भगवान की भक्ति में लीन रहता था। मैनें बताया कि चलते-फिरते, उठते-बैठते बराबर लीन रहना ही… पूजा स्थान में बैठ जाना कोई महानता की बात नहीं है। हमेशा कर्म करते हुये अपने ईश्वर के, गुरु के, ईष्ट के उपासना में जो निमग्न रहता है; वह भक्ति का भाव होता है। इसी प्रकार से वह दरिद्र व्यक्ति निरन्तर भक्ति में, अपने ईश्वर की उपासना में और अपना कर्म करते हुये जीवन यापन कर रहा था। उस व्यक्ति से भगवान प्रसन्न हो गये। वह गरीब, दरिद्र अवश्य था परन्तु अपने आप में बहुत खुश था। वह यही चिन्तन करते हुए स्वयं को सांत्वना देता था कि “कोई बात नहीं शायद यह मेरे भाग्य में होगा।” मुझे तो अपने जीवन-यापन के लिये लघु रुप में साधन प्राप्त हो ही रहे हैं। तो उसके कारण से मैं अपनी भक्ति को क्यों त्याग दूँ…? निरन्तर वह इसी तरह से उपासना करता था।
एक दिन भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन दिया। स्वप्न में उन्हें देखकर वह विचलित हो गया। उसने तो कभी चिन्तन तक नहीं किया था कि मेरी भक्ति से भगवान प्रकट होंगे और मेरे सामने आयेंगे।
ईश्वर ने कहा कि “मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ और भक्ति के फलस्वरुप तुम कुछ वरदान मांग लो।”
वह गरीब व्यक्ति केवल ईश्वर का चिन्तन करता था और परिवार का भरण-पोषण करता था। कोई चालाकी, धूर्तता तो थी नहीं उसमें। हड़बड़ा गया कि क्या मांगू? फिर बोला- “हे प्रभू! मैं आपको देखकर बहुत हकबका गया हूँ; अब कल आना।”
भगवान ने कहा- “जैसी तुम्हारी ईच्छा।” (ये कहकर भगवान विलिन हो गये।)
वह दिन भर सोचता रहा। क्या मांगू..? भगवान पुनः प्रकट होंगे। घर में बहुत गरीबी है। रोज कमाता हूँ, जिससे थोड़ा-बहुत आटा-दाल आ जाता है। जीवन यापन हो जाता है। तब धन मांग लेता हूँ। उसने फिर सोचा कि धन माँगकर क्या होगा? जमींदारी माँग लेता हूँ, जागीरदारी मांग लेता हूँ। बहुत बड़ा लैंडलार्ड बन जाता हूँ। मेरे पास बहुत सारी जमीन हो। चुकि जब किसी श्रेष्ठ महापुरुष, या देवी-देवता से प्राप्त करना होता है तो इसी तरह के भाव-चिन्तन आते हैं। फिर उसने सोचा कि केवल जमींदारी से ही क्या होगा…? मैं तो सम्राट का पद मांग लेता हूँ। राजा का तो बहुत बड़ा महल भी होता है और सैकड़ों नौकर-चाकर होते हैं। हर तरह से पूरा आनन्द प्राप्त होता रहता है, अच्छे भोज्य पदार्थ प्राप्त होतें हैं, सैकड़ों दास-दासियां सेवा में बराबर निमग्न रहती हैं। इसी सोच-विचार में पूरा दिन निकल गया और आधी रात बीत गई परन्तु वह निर्णय नहीं कर पाया। भोर काल भी हो गया तब भी वह चिन्ता में ही रहा। पुनः भगवान भोर काल में प्रगट हुये। “कहो वत्स! तुम्हारी क्या कामना है….” कल भी मैं आया था और तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर मैनें कहा भी था कि मुझसे कुछ वरदान मांग लो और तुमने कहा कि अभी तो मैं कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ; आप कल आना। तुम्हारे भक्ति से प्रसन्न होकर मैं पुनः तुम्हारे पास आया हूँ।
पूरे चौबिस घण्टे तो व्यतित हो गये थे परन्तु वह कुछ सोच नहीं पाया तो हाथ जोड़ लिये उसने और कहने लगा कि भगवान केवल आपके इन वचनों से कि मैं कुछ वरदान मांग लूं और दिन-रात मैं इसी उधेड़ में रहा जिससे कारण मेरा दिन का चैन, और रात की निद्रा पूर्ण रुप से समाप्त हो गई। मैं एक क्षण के लिये भी सामान्य रुप में नहीं रहा। “केवल मुझे आपकी भक्ति चाहिये।” क्योंकि अभी तो आपने चौबीस घण्टों में वरदान प्राप्त करने के लिये कहा है। यदि ये वरदान मुझे प्राप्त हो गया। मैं जमींदार, जांगीरदार या राजा बन गया तो बहुत अधिक परेशानियों से युक्त हो जाऊँगा। अभी तो आपकी भक्ति से मेरा जीवन बहुत प्रसन्नता से चल रहा है। अत: मेरे ऊपर कृपा करें कि मैं निरन्तर आपकी सेवा, उपासना, भक्ति करता रहूँ; जिससे कि मेरे भीतर में जो एक उधेड़बुन वाला भाव है, निर्णय करने का भाव नहीं है, मेरी निन्द्रा समाप्त हो गई है तो ऐसा वरदान लेकर मैं कैसे जीवन चला पाउंगा। इसलिये मुझे आपकी भक्ति चाहिये, इससे ही मैं जीवन में सब कुछ प्राप्त कर लूंगा। ये उस साधक नें, उस शिष्य ने प्रार्थना किया। भगवान ने कहा “तथास्तु ऐसा ही होगा।” मतलब जो सदा अपने ईष्ट, अपने भगवान, अपने सद्गुरु की भक्ति में निमग्न रहता है तो वहाँ संवाद का, अपनत्व का वातावरण बनता है। अतः यह तो स्पष्ट है कि भक्ति के माध्यम से ही हम सुस्थितियों को प्राप्त करते हैं।
इसलिये जो निरन्तर भक्ति से युक्त रहता है उसे ही जीवन में चेतनाओं की, सुक्रियाओं की प्राप्ति हो पाती है; चाहे वह भक्ति शबरी के द्वारा राम की हो या हनुमान ने, केवट ने की हो। जब वे भक्ति में निमग्न हुये तब ही दिव्यतम बन पाये। शबरी के परिजनों ने तो उन्हें त्याग ही दिया था, जंगल में मतंग ऋषि के आश्रम में रहती थी परन्तु अपने निर्धनता के लिये, समाजिक विकृतियों के द्वारा प्रताड़ित किये जाने के फलस्वरुप भी कभी भगवान से शिकायत नहीं किया, बराबर भक्ति में लीन रही।
जूठे फल सबरी के खाये, बहुबिधि प्रेम लगाई।
सबसे ऊँची प्रेम सगाई।।
महावीर हनुमान पशुवत होते हुये अपने भक्ति के बल पर ही राम से अधिक श्रेष्ठ बन पाये। तो आशय यही है कि “भक्ति में ही इतनी अधिक शक्ति होती है कि वह अपने सद्गुरु को, अपने भगवान को, अपने इष्ट को भी वशीभूत कर लेता है।” जब साधक अपने सद्गुरु को, अपने इष्ट को वशीभूत कर लेता है तो उसे किसी तरह की कमी या न्यूनता नहीं रहती है। हम भी सर्वश्रेष्ठता को प्राप्त कर सकते हैं बस आपका और सद्गुरु का, सद्गुरु और आपका जुड़ाव होना चाहिये।
वह जुड़ाव खून के रिश्ते से नहीं होता, ऐसा नहीं है कि खून का रिश्ता बहुत ज्यादा शक्तिशाली होता है, बिल्कुल भी शक्तिशाली नहीं होता। भावों का, विचारों का, चिन्तन का, सोच का जुड़ाव; जहाँ ये सब स्थितियाँ अपने सद्गुरु से जुड़ जाती हैं तो भक्ति और शक्ति के भावों में वृद्धि होती है, जीवन में और अधिक सर्मपण, आस्था तथा प्रेम का विस्तार होता है और इसके विपरित यदि हमारा खून का रिश्ता है चाहे पति-पत्नी, पिता-पुत्र अथवा माता-पिता का रिश्ता हो। ज्यों-ज्यों उमर बढ़ती है धीरे-धीरे वह रिश्ता कमज़ोर होने लगता है। शुरु-शुरु में तो पत्नी में रस-आनन्द आता है फिर धीरे-धीरे हमें उस आनन्द से विरक्ति होने लगती है। उसे त्यागने की भावना आती है। शुरु में तो हमारा संतान के प्रति मोह होता है। परन्तु जब संतान अवज्ञाकारी हो जाय, इच्छा अनुसार कार्य नहीं करे तो धीरे-धीरे वह मोह समाप्त होने की ओर अग्रसर हो जाता है। परिवारजनों से, रिश्तेदारों से, सभी के साथ इसी तरह की गतिविधियां चलती हैं तो उनसे जो मोह है, प्रेम है वह शुष्क हो जाता है, विरक्त जाता है। परन्तु अपने भगवान की, ईष्ट की, गुरु की भक्ति में जब अधिक जुड़ते हैं तो भीतर से प्रकाश की स्थिति व्याप्त होती है।
कहाँ से आती हैं ये प्रकाश पुंज वाली स्थितियाँ….?
आपका सद्गुरु से जुड़ाव हुआ है, इसलिये प्रकाशमय स्थितियाँ आती हैं, जीवन में एक चिन्तनशीलता व्याप्त होती है, एक चेतना का विस्तार होता है और उस चेतना के कारण ही हमें दिखाई देता है कि हमारे सद्गुरुओं नें, हमारे इष्ट नें, हमारे देवी-देवता ने हमें क्या संदेश दिया है, हमें क्या मागदर्शन दिया है और हम स्वतः ही उस मार्गदर्शन से क्रियाशील रहते हैं।
और इसी के विपरित सामाजिक, पारिवारिक या कुछ बिगड़े लोगों के द्वारा हम उसमें जकड़ जाते हैं तो हमारे ईष्ट के प्रति, गुरु के प्रति जो जुड़ाव वाली भावनायें होती हैं वे धीरे-धीरे समाप्त होनी प्रारम्भ हो जाती हैं। और तब हम न तो अपने परिवार में सही ढंग से सामंजस्य बना पाते हैं और न ही अपने ईष्ट के साथ, अपने गुरु के साथ में सही तरह से तारतम्य बैठा पाते हैं। धीरे-धीरे हर रुप में हम विचलित और व्यथित से हो जाते हैं और एक तरफ से देखें तो पागलपन की स्थिति या जीवन में कोई मार्ग प्राप्त नहीं हो रहा होता है, चेतना प्राप्त नहीं होती है, कोई आनन्द प्राप्त नहीं हो रहा होता है, कोई कार्य करने का मन भी नहीं रहता है। मनस में द्वन्द्व होता है कि पारिवारिक बंधनों में बंधे या अपने भीतर के जो इष्ट हैं, गुरु हैं उनकी बात सुनें। वह द्वन्द्वात्मक रुप से क्रियाशील रहता है। इस कारण से उसके जीवन में व्यथायें-परेशानियां बराबर बनीं रहती हैं।
माया मुई न मन मुवा, मरि-मरि गया सरीर।
आसा त्रिष्णाँ नाँ मुई, यौं कहै दास कबीर।।
इस गुरु पूर्णिमा पर्व पर संकल्प करना है कि क्या हमें बराबर पारिवारिक बेड़ियों में ही जकड़े हुये रहना है। ये बेड़ियां, ये जंजीर हमारे लिये और कठिन से कठिनतम होती रहेंगी। परिवार से क्यों भाग रहे हो, जिम्मेदारियों से क्यों भाग रहे हो, अभी तो बच्चे छोटें हैं, अभी तो शादी-विवाह का ही समय हुआ है, तभी तो समाज के तरफ भी देखना है, अभी लोग क्या कहेंगे, अभी तो समाज वाले क्या कहेंगे, अनेकों तरह के लांछन, विरोध सुनने को प्राप्त होता है। यह सब सुनकर ही साधक व्यथित और परेशान सा हो जाता है जिसके कारण वह भक्ति के मार्ग से दूर हो जाता है। न तो वह अपने परिवार को सही ढंग से जोड़ पाता है और न ही भक्ति मार्ग से और न ही अपने गुरु से, अपने देवी-देवता से, अपने इष्ट से जुड़ाव कर पाता है। इसी कारण वह अपना व्यक्तित्व और अपना जीवन पूर्ण रुप से समाप्त कर देता है।
इसीलिये हमें निर्णय लेना है संकल्प करना है कि मुझे अपने कर्तव्यों का पालन करना है, उसमें रच-बस नहीं जाना है। हम अपने कर्तव्यों में रच-बस जाते हैं। हम अपने आप से दुःखी नहीं हैं। दूसरों के परिवार के सदस्यों को साथ में रहते हुये देखकर उनसे हम ज्यादा दुःखी हैं। हर तरह के व्यक्ति की कोई न कोई डिमांड है। पत्नी की अलग डिमांड है, पति का अलग डिमांड है, बच्चों का, माता-पिता की अलग डिमांड है, परिवार-परिजनों की, रिश्तेदारों की अलग डिमांड हैं। और वह डिमांड पूरी करते-करते हम स्वयं की जो डिमांड है, अपने अंदर जिस भक्ति के भाव का मैनें जागरण किया था, वह शुष्क होता चला जाता है, मृत होता चला जाता है। पूरी आयु समाप्त हो जाती है और हम उस डिमांड को पूरा करने के बारे में कभी चिंतन भी नहीं करते।
कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति।
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम्।।
अर्थात्, ‘‘जिस प्रकार लोग नदी पार करने के बाद नाव को भूला देते हैं, उसी प्रकार अपना काम पूर्ण होने तक लोग दूसरों की तारीफ़ करते हैं और काम पूर्ण होने के उपरान्त दूसरे को भूल जाते हैं।’’
60 वर्ष में रिटायर्ड हो गये फिर सोचते हैं अरे अड़तीस-चालीस साल नौकरी किया हमनें; मिला क्या…… मैं तो पचास हजार कमा रहा था, लाखों रुपये कमा रहा था परिवार के लिये; और आज मेरे पास क्या है….? कुछ नहीं है मेरे पास। फिर भी हम वह बोझ छोड़ नहीं पाते, जो रस वाला जुड़ाव होता है, उसे छोड़ नहीं पाते। आनंद वाला जुड़ाव नहीं है बस केवल मोह वाला जुड़ाव है। जिस प्रकार से शहद, नित्य मधुमक्खियों को अपनी तरफ खिंचता रहता है उसी प्रकार से हमारा जुड़ाव है। थोड़ा सा खान-पान अच्छा कर लिया, कपड़े अच्छे मिल गये तो खुश हो गये। थोड़ा सा खाने-पीने में कमी रह गई, नमक ज्यादा हो गया, कम हो गया, पसंद की सब्जी नहीं बनी तो क्रोध युक्त हो गये। किसी ने थोड़ा सा तारीफ कर दिया तो फुलकर कर हम बहुत ज्यादा बड़े बन गये। थोड़ा सा किसी ने कोई Comment कर दिया, आलोचना कर दिया तो हम बहुत ही परेशान से हो गये।
क्या हमारे जीवन का मूल्य इतना ही है…? किसी ने प्रशंसा कर दिया तो इसका मतलब वह कुछ न कुछ काम करवाना चाहता है, मतलब निकालना चाहता है और काम निकलने के बाद उसकी हमें जरुरत नहीं है। जब पुनः उसकी आवश्यकता होगी तो फिर से उसकी तारीफ कर लेंगे। पत्नी के साथ भी ऐसा ही होता है पति ने थोड़ा खुश कर दिया तो बहुत आनन्द युक्त हो गये। पत्नी ने अच्छा बना कर दे दिया बहुत खुश हो गये और कभी थोड़ा देर कर दिया तो अप्रसन्न से हो गये। क्षण में हम परिवर्तीत हो जाते हैं। पढ़े-लिखे तो हैं परन्तु सोच-विचार की क्षमता एकदम नहीं है। किसी कारण से देरी हो गई होगी या उसे कुछ हो गया होगा। रोज यही क्रिया-प्रतिक्रिया होता रहता है। मतलब एक आंतरिक प्रसन्नता हम अपने जीवन में प्राप्त ही नहीं कर पाते हैं।
सभी साधकों से मिलूंगा अभी। तो वे अपनी दुःख-परेशानी नहीं बतायेंगे। गुरुजी! बच्चे की नौकरी नहीं है। मुझे संतान की प्राप्ति नहीं हो रही है। मेरे परिवार में कलह की स्थितियां हैं। स्वयं की कोई परेशानी नहीं है। जब तक हम इस रुढ़ मानसिक विचारों से नहीं निकल पायेंगे कि ये परेशानियां तो बराबर लगी रहेगी। मेरे माता-पिता भी ऐसे परेशानी से निकले और वे भी संसार से चले गये। मैं भी ऐसी परेशानियों से त्रस्त हूँ क्योंकि उनके खून से हमें ऐसे ही भाव-विचार-चिन्तन प्राप्त हुये। क्योंकि हम जीवन में परिवर्तन करना ही नहीं चाहते। सोचते जरुर हैं कि गुरु पूर्णिमा से हम संकल्प लेंगे कि मुझे ये परिवर्तन करना है। परन्तु परिवर्तन हमारा स्थायी नहीं रह पाता है। हम टिक नहीं पाते उस पर। अपने संकल्प को पूर्ण करने हेतु टिकाव नहीं है हमारा। सही रुप से जुड़ाव-गठबंधन नहीं हो पाया है, गुरु-शिष्य का, शिष्य-गुरु के विचारों का, उनके साथ जो गठबंधन की भावना होती है उसे बराबर नियोजित नहीं रख पाते। जब स्वार्थ वाली भावना आयेगी, कामना पूर्णता वाली भावना आयेगी, तब-तब हम अपने गुरु के पास चले जायेंगे। प्रार्थना कर लेंगे, मंदिरों में धूप लगा लेंगे, प्रसाद चढ़ा देंगे, फूल-माला चढ़ा देंगे। और जब कामना हमारी पूर्ण हो गयी तो भाड़ में गये भगवान, देवी-देवता, गुरु; वो कहीं खड़े-पड़े हों तो हमें क्या करना है। और जब जरुरत होगी तो वापस अपने गुरु के शरण में, भगवान के चरण में चले जायंगे ।
खुद की बुद्धि का उपयोग भी नहीं करते हम। हम सदैव दूसरों की बुद्धि से नियंत्रित रहते हैं। यदि अस्वच्छता के वजह से बीमारियां भी हों तो ये डॉक्टर अच्छा नहीं है, एक साल हो गया इलाज करवाते हुये अब उस डॉक्टर के पास चलते हैं। वो डॉक्टर अच्छा नहीं है, वहाँ का डॉक्टर बहुत अच्छा है उसके पास चलते हैं। वो गुरु अच्छा नहीं है, वो गुरु तो अच्छा है, साधना कराता है उसके पास चलते हैं। वो देखो वो गुरु पर्ची निकालते हैं, वो ऐसा बताते हैं, ऐसी क्रिया करते हैं अतः वे बहुत श्रेष्ठ हैं।
आपको तत्क्षण चमत्कार चाहिये जो वास्तव में होता भी नहीं है। किसी भी तरह का चमत्कार नहीं होता है ऐसा नहीं है कि कलयुग समाप्त हो जायेगा, प्रलय आ जायेगा तो पूरी सृष्टि समाप्त हो जायेगी; चमत्कार कहीं नहीं होता। जो गतिशीलता है वो बराबर बनी रहती है। चमत्कार करना है तो अन्तःकरण में शक्ति का भाव आना चाहिये, चेतना का भाव आना चाहिये और वो शक्ति और चेतना आयेगी ‘भक्ति’ के माध्यम से। भक्ति से ही शक्ति की प्राप्ति होती है। आप प्रयास करके तो देखिये।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।
नित्य-प्रतिदिन आप गुरु-गीता, निखिल स्तवन का पाठ करें। बस 11-11 श्लोक ही पढ़े। ऐसा नित्य करने से स्वतः ही महसूस होगा कि मैं ऊर्जा से, शक्ति से युक्त होता जा रहा हूँ। मेरा मन और मस्तिष्क शांत हो रहा है। जीवन में एक परिवर्तन अवश्य ही आयेगा परन्तु हम उसे कर नहीं पाते। कभी समय नहीं है, कभी बाद में कर लेंगे, अभी कमाने-खाने की उमर है। फिर भी हम निरन्तर भाग-दौड़ करते हैं परन्तु उसके बाद भी हमारे कार्य-मनोरथ पूर्ण नहीं हो पाते हैं। और जब वृद्धावस्था आती है तो शरीर असहाय सा हो जाता है, जर्जर हो जाता है। उठ-बैठ नहीं पाते, पचास तरह की बीमारियां लग जाती हैं। फिर घर से पचास कदम दूर मन्दिर है वहाँ नहीं जा पाते हैं। वो अच्छे तरीके से भक्ति कर भी नहीं पाते। उस उम्र में भक्ति करके फायदा भी क्या होगा….? 60-62 साल की उम्र में आप भक्ति करोगे या कोई भी साधना करोगे तो प्राप्त भी क्या हो जायेगा? शरीर में तो कोई ऊर्जा-चेतना ही नहीं है तो आपकी साधना-भक्ति क्या उपयोग में आयेगी।
भक्ति का उचित समय तो युवावस्था है। जैसे-जैसे युवावस्था की ओर बढ़ोत्तरी हो रही है वैसे-वैसे ही हम भक्ति की ऊर्जा से और अधिक आप्लावित हो सकें। बुद्ध को कोई 60-62 वर्ष की आयु में भक्ति का, घर त्यागने का भाव नहीं आया। उन्होनें किसी अच्छे नक्षत्र का इंतजार नहीं किया। युवावस्था में ही उन्होंने अपने परिवार का त्याग कर दिया। समाज से गालियां खानी पड़ी उन्हें, बहुत सारी प्रताड़नाओं को झेलना पड़ा, बहुत से जगहों से उन्हें दुत्कारा भी गया। ऐसा नहीं है कि भगवान राम के पास सब लोग हाथ जोड़ के खड़ा हो गये कि भगवान रामजी आप आ गये, आपको प्रणाम है। किसी ने सम्मान नहीं किया। कृष्ण ने भी मथुरा-वृन्दावन छोड़ दिया तो लोगों ने उनसे ये नहीं कहा कि द्वारिका आकर अच्छा किया आपने। सब रच-बस गये मथुरा-वृन्दावन में, हजारों गोपियां उनके लिये मर रही थी, प्रेम में पागल हो रही थी; उनके अंदर भी कुछ समय बाद कोई मोह वाला भाव नहीं रहा। चला गया भगवान कृष्ण, अब तो सांसारिकता में ही लिप्त रहना है। द्वारका चले गये, कुरुक्षेत्र चले गये तो वहाँ भी कोई सम्मान वाला भाव नहीं। राम ने भी चौदह वर्ष वनवास काटा कौशल्या-सुमित्रा-कैकेयी में भी कोई चिन्तन नहीं, भाईयों में कोई चिन्तन नहीं, न लक्ष्मण, न भरत, न शत्रुघ्न; किसी में कोई चिंतन नहीं कि भईया आप बड़े हो क्यों जा रहे हो। छोड़ दिया बस। तात्पर्य यह है कि जब तक व्यक्ति सामने हैं हमारे और हमारा कार्य मधुरता से हो रहा है तब तक हमारा परिवार से मोह है, प्रेम है और ज्योंहि वह व्यक्ति परिवार के सामने नहीं है, परिवार में भी ऐसी स्थिति होती है न कि जब हमारा पिता चला जाता है, मृत्यु को प्राप्त कर लेता है और हम कुछ दिन रुदन करते हैं समाज को दिखाने के लिये, परिवार वालों को दिखाने के लिये कि हमारा कितना प्रेम था।
यह हमारी एक प्रक्रिया है, हमारी परिपाटी है जो तेरह दिन हमें निभाना है, और हम निभाते हैं। फिर वापस पुनः वैसे ही स्थितियों में हो जाते हैं। ऐसा तो नहीं है न कि पत्नी मर जाती है या खान-पान छोड़ देती है। कौन सा पति उसके वियोग में सन्यास धारण कर लेता है, वह तो 6 महिने में दूसरी शादी कर लेता है क्योंकि केवल सामने से हमें प्रसन्नता की प्राप्ति होते रहना चाहिये। इसीलिये हम जुड़े हुये तो बहुत समय से हैं, गुरु दीक्षा लिये हुए भले ही हमें 15 साल, 20 साल, 25 साल, कुछ लोगों को 30 साल भी हो गये होंगे। परन्तु जो वास्तविक जुड़ाव होना चाहिये वो 30 साल में भी नहीं आ पायी। इसी कारण से जीवन घिसे-पिटे स्थितियों में चल रहा है, हमारे अन्दर आनन्द नहीं आ पाया। मेरा शरीर जर्जर कष्ट से युक्त सा हो गया, जीवन के रस-वीर्य-ओस में शुष्कता सी आ गई, अब वह क्रियाशील नहीं रही, फिर भी वह आत्मीयता का, प्रेम का भाव-चिन्तन नहीं हो पाया।
क्यों नहीं हो पायी? क्योंकि उसने निरन्तरता बनाकर नहीं रखी। जब-जब मेरा मतलब रहा, तब-तब मैनें जुडाव किया। इसी कारण से जीवन में हम श्रेष्ठताओं से युक्त नहीं हो पाते हैं। इसलिये हम समय का सही तरह से नियोजन नहीं कर पाते हैं। किस प्रकार से हमें समय का सदुपयोग करना चाहिये और किस प्रकार से उचित, शुभ दिवस पर्वों को आनन्द से सम्पन्न करना चाहिये। हम उसे सम्पन्न नहीं कर पाते हैं।
यह गुरु पूर्णिमा का उत्सव तथा श्रावण मास भी प्रारम्भ हो चुका है और मैनें बताया कि जो हमें सद्मार्ग प्रदान करते हैं उस इष्ट, उस सद्गुरु की पूर्णिमा का महापर्व है और ऐसे निमित्त महापर्व पर अपने आप को और अधिक आत्मिय स्वरुप में, आनन्द और प्रसन्नता स्वरुप में स्वयं का अभिषेक सम्पन्न कर सकेंगे। रुद्रमय, महादेवमय, महामृत्युंजयमय। हमारा स्वयं का अभिषेक हो ही, साथ में प्रत्येक स्त्री-पुरुष, बालक-बालिका को अभिषेक से सुशोभित कर सकें। अपने संकल्पों की प्राप्ति हेतु, जीवन के नकारात्मकता को विसर्जित करने हेतु ही निखिल विग्रह, नारायण विग्रह का पूर्ण रुप से पंचद्रव्य से तथा वैदिक मंत्रों के माध्यम से अभिषेक की क्रियायें सम्पन्न करें जिससे कि हम अपने आप को निखिलमय, नारायणमय बना सकें। चूकि यह महोत्सव अपने आप में साधुता की प्राप्ति का महोत्सव है।
एक साधु अपनी पत्नी के साथ जंगल में कुटिया बनाकर रहते थे। छोटी सी कुटिया थी। आराम से अपने जीवन में भक्ति करते हुये और सात्विक रुप से जैसा भी खान-पान मिल जाये उसी से अपना भरण-पोषण करते थे तथा आनन्द में रहते थे क्योंकि भोजन के लिये तीन-चार रोटी और सब्जी ही तो चाहिये। मिठाइयां या और कुछ तो केवल जिह्वा के स्वाद को शांत करने के लिये है और जिह्वा का स्वाद कभी शांत नहीं होता। क्योंकि हमारी जो कर्मेंद्रियां हैं वे सदैव रस लेने में लालायित रहती हैं। कान हमेशा अच्छा-अच्छा, अपनी प्रसन्नता वाली, अपने गर्व वाली बातों को सुनने के लिये उत्सुक रहते हैं। आँखें नित्य अच्छी-अच्छी चीजों को, चाहे वह वासनात्मक रुप में हों या नग्नता के रुप में हों, देखनें के लिये लालायित रहती हैं। नासिका सुगंधित पदार्थों को ग्रहण करने में कि अच्छे सुगंधित वातावरण को हम अपने अंदर ले सकें। और जिह्वा तो स्वाद के लिये लालायित रहती ही है। थोड़ी देर शांत रहने के बाद में पुनः क्षुधा जागृत होती है और हम फिर से लालायित हो जाते हैं। नित्य हम कर्मेन्द्रियों के माध्यम से, ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ऐसा ही आत्मसात करते हैं। गीता में श्रीकृष्ण, अर्जुन को समझाते हुये कहते हैं कि –
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।
अर्थात्, इंद्रियों को वश में करना अत्यंत कठिन है। हमारी कर्मेन्द्रियाँ इतनी प्रबल और अशांत होती हैं कि ज्ञानी और साधना करने वाले ‘विपश्चित’ अर्थात् बुद्धिमान, विवेकशील व्यक्ति को भी विचलित कर उसे जबरदस्ती भोगों-विषयों में लगा सकती हैं।
होना तो चाहिये एकरुपता वाला भाव। कि किस तरह से हम अपने जिह्वा का उपयोग सही तरीके से बोलने के लिये करें। मुख का उपयोग अच्छे शब्द बोलने, संत-महात्माओं के प्रवचन या जो उपनिषद तथा पुराण हैं उनको पढ़ने और पढ़कर जीवन में उतारने की क्रिया करें। जिससे जीवन में और अधिक……. जितना हम भक्ति में, अपने सद्गुरु में लीन रहेंगे उतनी ही जीवन में व्याप्त दुविधाओं से निवृत्ति प्राप्त कर सकेंगे। हम व्यथित और परेशान से क्यों रहते हैं? क्योंकि हमसे भक्ति नहीं हो पाती है, हमसे मंत्र जप नहीं हो पाता है। और जितना हम मंत्र जप करते हैं, मैनें क्या बताया; अविरल रुप से, चलते-फिरते मंत्र जप करते रहें। तो अकारण ही मन में जो द्वन्दता, क्रोध, उन्माद रहता है वह स्वतः ही शांत होने लगाता है।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
बुद्धिमान व्यक्ति को, अपनी इंद्रियों को भोग-विलास से हटाकर, एकाग्रचित्त होकर, मेरे अर्थात् अपने ईश्वर में, अपने सद्गुरु में समर्पित होना ही एकमात्र उपाय है और जब इंद्रियां नियंत्रण में आ जाती हैं, तब ज्ञान स्थिर (प्रतिष्ठित) हो जाता है। परन्तु हम खुद का समर्पण, मंत्र जप आदि कुछ कर नहीं पाते।
वे साधु और उनकी पत्नी पूर्ण आनन्द भाव से उनकी कुटिया में रहते थे। रात्रि का समय था। धीरे-धीरे हवा तेज चलने लगी और प्रचण्ड तुफ़ान जैसा वातावरण निर्मित होने लगा। उसी अंधेरे रात में एक मुसाफिर चलता जा रहा था, बाहर तो कुछ दिखाई दे नहीं रहा था। कटीली झाड़ियां भी थी। बहुत दूर देखने पर उसे लाईट की टिमटिमाहट दिखाई दिया। उसने सोचा शायद वहाँ कोई घर होगा। वह उसी दिशा की ओर चलता रहा। वहाँ पहुँचने के बाद उसने देखा कि एक छोटी सी घास-फूस की झोपड़ी है। उसमें साधु और उनकी पत्नी आराम से सो रहे थे।
आवाज लगाई- “मैं पथिक हूँ और इस प्रचण्ड तूफ़ान और बारिश में मैं बहुत भीग गया हूँ। मुझे थोड़ा सा आश्रय चाहिये।”
साधु ने अपने पत्नी को उठाया और कहा-“दरवाजा खोलो। कोई भीगा, भटका हुआ मुसाफिर आया है।”
तो पत्नी ने कहा-“इस छोटी सी झोपड़ी में बड़ी मुश्किल से हम दो लोग आराम कर रहें हैं। अगर वह यहाँ आ जायेगा तो कहाँ रह पायेगा?”
“जहाँ पर दो लोग सो सकते हैं वहाँ पर तीन लोग आराम से बैठ भी सकते हैं। दरवाजा खोल दो।”
वह पथिक अन्दर आ गया। पहले तो दोनों पति-पत्नी सो रहे थे। फिर बैठ गये तीनों और अब सोने की जगह भी नहीं थी।
साधु ने कहा कि “साधु की झोपड़ी है, कोई राजा का महल नहीं है। इसलिये कोई पथिक आया है तो ये हमारा कर्तव्य है कि हम उसे आश्रय दें।”
बैठे थे तीनों। दो-तीन घण्टे व्यतित हो गये, थोड़ी देर में एक और कोई भटका हुआ मुसाफिर आ गया। उसने भी दूर से देखा कि एक मद्धिम सी, टिमटिमाहट सी आ रही है। तो वह भी उस प्रकाश की ओर गया और कहा कि “मैं रास्ता भटक गया हूँ, यह तूफ़ान वाली रात्रि निकल जाये और मैं प्रातः निकल जाऊंगा। मुझे कुछ समय के लिये थोड़ा शरण चाहिये।”
साधु ने मुसाफिर से कहा कि-“दरवाजा खोल दो।”
मुसाफिर ने कहा कि “हे आश्रयदाता! यहाँ पर तीन लोग भी बड़ी मुश्किल से बैठे हैं। चौथा व्यक्ति आ गया तो कहाँ बैठेगा….?”
साधु ने कहा कि “यह साधु की कुटिया है, कोई राजा का महल नहीं है। यदि तीन लोग बैठे हैं तो चार लोग खड़े भी रह सकते हैं।”
खोल दिया दरवाजा उसने। चौथा मुसाफिर भी आ गया अन्दर। अब किसी तरह से रात्रि व्यतित होने का इंतजार करना था।
भोर काल होते ही दोनों मुसाफिर चले गये। साधु की पत्नी ने कहा कि हे तात्! मैं समझी नहीं कि जब हम दोनों आराम से सो रहे थे फिर एक मुसफिर आया और आपने कहा कि “जब दो व्यक्ति सो सकते हैं तो तीन व्यक्ति बैठ भी सकते हैं।” सोने के लिये तो पाँच-छः फिट जगह चाहिये और आपने कहा कि “साधु की कुटिया है कोई राजा का महल नहीं है।” मैं समझी नहीं। जब तीसरा मुसाफिर भी आ गया तो आपने कहा कि “ये साधु की कुटिया है कोई राजा का महल नहीं है। तीन व्यक्ति बैठ सकते हैं तो चार व्यक्ति खड़े भी रह सकते हैं।” मैं इसका प्रयोजन नहीं समझा पा रही हूँ। आपने ऐसा क्यों कहा कि “ये राजा का महल नहीं है साधु की कुटिया है।”
तब साधु ने कहा कि “राजा के महल में अजनबियों के लिये जगह नहीं होती है, मुसाफिरों के लिये जगह नहीं होती है।” महल भले ही बहुत बड़ा हो परन्तु उस महल में आने-जाने वालों के लिये स्थान नहीं है और साधु की कुटिया में स्थान मिल जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि “जो व्यक्ति अपने धन से साहुकार होता है, जितना उच्च पद पर होता है; उसका दिल उतना ही छोटा होता है और जो सदैव भक्ति-भाव में लगा रहता है, साधुता से युक्त रहता है उसका व्यक्तित्व बड़ा होता है।”
साधु जन संसार में, शीतल चन्दन बास।
दादू केते उद्धरे, जे आये उन पास।।
राजा का दिल बड़ा नहीं होता है इसीलिये राजमहल में किसी भटके हुये मुसाफिर को जगह नहीं मिलती है और जो साधुता और सात्विकता से युक्त होता है उसका दिल बहुत बड़ा और गहरा होता है और वह सबको आश्रय प्रदान कर देता है। हमारे जीवन में भी ऐसा ही होना चाहिये कि ‘सदा हमारे भीतर में साधुता का भाव आये।’ साधुता का मतलब सात्विकता का विचार आये अर्थात् हम किसी भी व्यक्तित्व को शरण दे सकें। इससे हमारे व्यक्तित्व का भी पता चलता है कि हमने किसी व्यक्ति को शरण दिया है। इसीलिये प्रत्येक साधक को अपने अन्दर यह विचार पल्लवित-पुष्पित करना चाहिये।
ज्यों-ज्यों हमारे पास अत्यधिक धन आने लगता है तो दान वाली प्रवृत्ति बहुत ही संकुचित हो जाती है। और अधिक धन कमाने का विचार आता है। आज गल्ले में पाँच हज़ार रुपये आ गये, फिर सोचेंगे कुछ दिनों में दीपावली पर्व भी आ जायेगा तो कमाई कम से कम चालीस हजार रुपये तो होनी ही चाहिये। भले ही उपयोग में उतना न आये परन्तु हमारे अन्दर कमाने की लालसा बनी रहती है। तब हमारे भीतर साधुता का विचार नहीं आ सकता, लालच वाला विचार ही पनाह लेगा। राजा की मनसा क्या होती है कि मेरे साम्राज्य का और अधिक विस्तार हो। वह उसका उपयोग तो कुछ नहीं कर पाता है। वह भ्रमण थोड़ी करता है कि पाँच सौ किलोमीटर तक मेरा साम्राज्य है तो मैं हर जगह भ्रमण कर रहा हूँ। रहेगा तो हमेशा सैनिकों के घेरे में संकुचित भाव से ही। साधुता से युक्त रहने वाले व्यक्ति को आनन्दपूर्ण निद्रा भी आती है। इसलिये मैं बार-बार कहता हूँ कि हमारा लघु परिवार है, चाहे बड़ा परिवार है; खुद हमारे भीतर में प्रसन्नता का भाव-चिन्तन होना चाहिये। मैं आपने आप में कैसे प्रसन्न रहूँ? इस बात पर विमर्श करना है। बच्चे की शादी कर देने से प्रसन्नता नहीं मिलेगा, मेरे पोती-पोते हो जायेंगे उससे प्रसन्नता नहीं होगा, मुझे धन प्राप्ति से भी प्रसन्नता नहीं मिल सकता।
मैं अपने आप में आनन्द से कैसे रहूँ? इसका ज्ञान तो प्रत्येक साधक-शिष्य को प्राप्त है परन्तु हम कर नहीं पाते हैं। मैं सदैव, बार-बार कहता हूँ कि हमारे जीवन में परिवर्तन नहीं हो पाता है। हमेशा साधक मुझसे मिलकर बोलते हैं- “गुरुजी! बहुत कुछ करना तो चाहता हूँ परन्तु कर नहीं पाता हूँ।”
‘करना तो चाहता हूँ पर कर नहीं पाता हूँ।’ आप तो दोनों बातें कर रहे हैं। क्यों नहीं हो पाता है? अगर करना चाहते हो तो कदम क्यों नहीं बढ़ाते उसकी ओर। आपके अन्दर न्यूनता है, कमजोरी है या नपुंसकता है, क्या तकलीफ है? तकलीफ तो कुछ नहीं है। तो फिर क्यों आप करना चाहते हैं और कर नहीं पाते? क्योंकि आपके अन्दर करने की ईच्छा शक्ति नहीं है, चेतना का प्रवाह नहीं होता है। हमें ज्ञान भी है कि ये कार्य मुझे उन्नति की ओर अग्रसर करेगा, प्रगति की ओर क्रियाशील करेगा परन्तु उसी कीचड़ के दायरे में बराबर घुसे हुये रहते हैं। ज्ञान चाहे जितना मिले, पढ़ाई हम चाहे जितना भी कर लें परन्तु उस ज्ञान का सही रुप से सदुपयोग नहीं कर पाते।
इन सब अवगुणों का निर्माण तब होता है जब हमारे अन्तःकरण में भक्ति का भाव शुष्क और रिक्त हो जाता है। और जब भक्ति का स्थान रिक्त हो जाता है तो शक्ति की प्राप्ति नहीं हो पाती, तब निर्णय लेने की क्षमता समाप्त हो जाती है। ज्यों हि भक्ति का भाव जागृत होता है तो हम निर्णय लेने में चैतन्य हो जाते हैं। यदि भक्ति के योग से हमें शक्ति की प्राप्ति हो गई तो जो हमारे जीवन के जो भी आयाम हैं, भावना हैं, ईच्छा-कामना है, वह पूर्ण होते ही हैं। अक्सर हम क्या करते हैं- “मैं कामना कर रहा हूँ और गुरुजी आप पूर्ण कर दो।”
“बेटा! तुम्हारे अन्दर तो शक्ति है, मैं तुम्हें चेतना दे रहा हूँ, शक्तिपात कर रहा हूँ, दिव्यता दे रहा हूँ। तुम उसका उपयोग तो करो।”
फिर बोलेंगे-“गुरुजी मैं आपकी शरण में हूँ बस।”
मैनें तो शक्ति प्रदान कर दिया है, दिव्यता प्रदान कर दिया है, दीक्षा प्रदान कर दिया। परन्तु कर्म तो तुम्हें ही करना है न। और हम वह भी नहीं करना चाहते तो वह शक्ति, वह दिव्यता निर्मूल सी हो जाती है। भक्ति का मतलब यह नहीं है कि मैं आपको दास बना रहा हूँ, हर समय केवल “ऊँ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः” करते रहें। दास बनाने की भावना मेरी नहीं है। मेरी सोच इतनी है कि उस भक्ति के माध्यम से हमारे अन्दर शक्ति जागृत होती है और यह गुरु पूर्णिमा का पर्व शक्ति जागरण का पर्व है। हमारे अन्दर संकल्प शक्ति कहाँ से आयेगी? अपने जीवन के संकल्प को हम शक्ति के माध्यम से पूर्ण कर पायेंगे। केवल हाथ में जल लेकर संकल्प करने से शक्ति प्राप्त नहीं हो पायेगी। आपको सद्गुरुदेव ने जो शक्ति प्रदान किया है, उस शक्ति का सही ढ़ंग से उपयोग करने पर, जीवन में उतारने पर ही जो विषम स्थितियाँ हैं, जो भी काँटें हैं, वह स्वतः ही विलगित होना प्रारम्भ हो जायेगी।
प्रत्येक महापुरुष को, प्रत्येक देवी-देवता को, प्रत्येक संत-महात्मा को अपने जीवन में दिव्यता को प्राप्त करने के लिये हजारों तरह की इन कठिनाईयों से निकलना पड़ा है। यकायक किसी को राज-पाठ नहीं मिला, किसी को सिद्धि प्राप्त नहीं हुई, यकायक कोई पोस्ट प्राप्त नहीं हुई। जिनको भी अच्छे पोस्ट को, नौकरी को प्राप्त करना है वो अपने संकल्प शक्ति के माध्यम से, ज्ञान-बुद्धि के माध्यम से, भक्ति के माध्यम से अपने लक्ष्य की प्राप्ति में निमग्न रहते हैं तब हम अच्छे पोस्ट को प्राप्त कर पाते हैं। कोई थाली लेकर नहीं आयेगा कि आप इस पोस्ट पर विराजमान हो जाओ।
यह गुरु पूर्णिमा का विशेष दिवस अपने संकल्प को पूर्णता देने का दिवस है। भक्ति और शक्ति के योग का दिवस है। भक्ति अपने भीतर में विराजमान देवपुरुष के प्रति, शक्ति के प्रति। जिससे हमारे जीवन में ओज-यौवन-जागरण वाले दिव्यताओं की वृद्धि हो। नहीं तो समय तो धीरे-धीरे बीतता ही जा रहा है। 20 साल, 25 साल बाद हम अपने अंतिम अवस्था तक पहुँच जायेंगे, मृत्यु आनी है ही। आप कामनाओं से युक्त होकर आये हैं तो आपका भी एक विचार होना चाहिये कि मैं उन कामनाओं की पूर्ति हेतु शक्तियों से युक्त हो सकूँ। इसके लिये हम ‘सद्गुरुदेव नारायण’ का अभिषेक पारद विग्रह के माध्यम से सम्पन्न करेंगे। तब हमें जीवन में दूग्ध के रुप में धवलता, उज्ज्वलता की प्राप्ति होगी। जीवन में शहद जैसी आनन्द और मिठास की प्राप्ति होगी और घृत के सदृश हमारे जीवन में जर्जरता नहीं आ पायेगी, जीवन में युवावस्था और क्रियाशीलता बनी रहेगी। हमें मधुर रस की प्राप्ति हो सकेगी जिससे हमारे जीवन के विष समाप्त हो सकेंगे। इन विषमताओं की समाप्ति के लिये ही हम अभिषेक सम्पन्न करते हैं।
सरल-सरल भाषा में अनुरोध है कि यथाशीघ्र हमारे ईष्ट, हमारे सद्गुरुदेव नारायण का विग्रह प्राप्त करके आप मेरे सामने विराजमान हो जायें और पूर्ण वैदिक मंत्रों के माध्यम से, रुद्राष्टाध्यायी और पूर्ण लक्ष्मी मंत्रों के माध्यम से हम अभिषेक की क्रिया सम्पन्न करेंगे। स्व-अभिषेक सम्पन्न करने में हम जिन मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं वह हमारे हृदय में स्थापित होती है। किसी पंडित से, पुजारी से या पुरोहित से करवाने से उतनी शक्ति की प्राप्ति नहीं हो पाती है जितनी हमें स्व ही करने से प्राप्त होती है। टुटी-फूटी भाषा में ही सही, महत्व हमारे भावों का है, भाषा उपयोग में नहीं आता है कि संस्कृत भाषा ही आनी चाहिये या उड़िया, तमिल भाषा ही आनी चाहिये। “भाषा नहीं, भावना उपयोग में आती है।” , “जहाँ भाषा समाप्त हो जाती है वहीं से भावना का उदय होता है।”
हमारा सम्पर्क सद्गुरु की दिव्यता से हो सके और जब सद्गुरु की दिव्यता हमारे जीवन में व्याप्त हो सकेगी तब यह पूर्णता का दिवस, पूर्णिमा का दिवस हर रुपों से परिपूर्ण हो सकेगा। इन्हीं पूर्णता के तत्वों को आत्मसात करने के लिये हमें पारद निर्मित ‘सद्गुरुदेव नारायण’ के विग्रह पर अभिषेक सम्पन्न करना है। ताकि जिस तरह से निखिल परिपूर्ण हैं, जिस तरह से नारायण परिपूर्ण हैं उसी तरह से उनका भक्त भी, उनका शिष्य भी हर रुप से परिपूर्ण हो सके।
प्रत्येक साधक पारद निर्मित ‘चैतन्य नारायण विग्रह’ को अवश्य ही प्राप्त कर लें और विशेष शुभ अवसर-मुहुर्त में उनका अभिषेक सम्पन्न करें।
जीवन में बाधाओं, परेशानियों को समाप्त करने हेतु ‘गुरु पूर्णिमा’ से बढ़कर और कोई पर्व नहीं है। मैनें बताया था कि गणपति को भी मंत्रात्मक रुप से गुंजरण करना पड़ा तथा वेदव्यासजी ने उन्हें लिखित रुप प्रदान किया और अट्ठारह पुराणों की रचना की। उन्हीं पुराणों को श्रवण-गुंजरण करते हुये हम स्वयं को भक्ति के द्वारा शक्तिमय बनाते हैं। इसीलिये शक्ति, भक्ति के माध्यम से प्राप्त करनी है। जिससे जीवन में पिशाच दोष, तंत्र बाधा या प्रेत बाधा की शिकायत समाप्त हो और आपके भीतर में जो डर-भय है, तनाव-चिंता है वह भी उस शक्ति के माध्यम से अवश्य ही समाप्त हो सके। यही मैं आप सभी के लिये मंगलकामना करता हूँ, कल्याण कामना करता हूँ।
परम पूजय सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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