





एक शिष्य-साधक जब पूर्णता प्राप्त कर लेता है, जब वह गुरुमय हो जाता है, जब शिष्य के विचार, कर्म पूरी तरह से अपने आत्मीय, अपने गुरु के आदर्शों पर, अपने गुरु की चेतना पर केन्द्रित हो जाते हैं, उसे आस पास और कुछ नजर नहीं आता। वह केवल गुरु को ही देखता है, गुरु को महसूस करता है, गुरु के हर बोल माँ सरस्वती की मधुर वीणा की धुन प्रतित होती है, गुरु के समक्ष होना सिद्धाश्रम में होने से भी अमुल्य लगता है। उस समय साधक को कोई लोभ, जलन, ईर्ष्या, व्याकुलता का भाव नहीं आता, साधक पूर्णरुपेण परिपूर्ण हो जाता है, जीवंत होता है, आनंदित होता है।
इस आनन्द के अभाव का मुख्य कारण साधक स्वयं को भुल गया है। वह अपने अंतर्मन से विमुख हो गये हैं, उसे आनन्द का आभास तो है पर उसे महसूस करना, भोगना भूल गये हैं। क्यों – इसलिये क्योंकि साधक विनय होना, साधना करना भूल रहे हैं। केवल आलस्य-उन्माद को ही अपना लिया है, इसलिये आनन्द की खोज, वास्तविकता की खोज, स्वयं अपने अंदर छोड़ व्यर्थ में बाहर खोजने लगे हैं।
एक सच्चा गुरु सदैव साधक को सामंजस्य का, सद्भाव का, एकता का, साधनात्मक और गृहस्थ जीवन के तालमेल का पथ प्रशस्त करते हैं। वे कभी नहीं चाहते कि आप सब कुछ त्याग कर केवल साधना करें। वे तो आपको हर क्षेत्र में ‘विजय श्री’ बनाना चाहते हैं, इस सांसारिक जीवन के हर सुखों को भोगने योग्य आपको बनाना चाहते हैं।
सामंजस्य सम्भव तब होगा जब आपके विचारों का व कर्म का सही मेल होगा। केवल सोच लेने से आप विजयी नहीं बनेंगे। उसके लिये तो कर्म का सहारा लेना होगा। पाना आप बहुत कुछ चाहते हो पर कर्म रहित रह कर उसे नहीं पा सकते हो-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
‘‘आपको तो केवल कर्म करना है, फल आपको आपके ईश्वर-गुरु अवश्य देंगे।’’
एक पूर्ण साधक, एक गुरुतत्व से परिपूर्ण साधक ही पूर्ण रुपेण उस आनन्द को प्राप्त कर सकता है और यह करना कोई अत्यधिक कठिन कार्य नहीं।
उस पूर्णता को, उस सद्भाव को पूर्ण आनन्द रूप में प्राप्त करने हेतु 27-28-29 जुलाई को निखिल चेतना भगवती महामाया आत्मसात् कुबेर श्री साधना गुरू पूर्णिमा महोत्सव – रायपुर, छ.ग.में अवश्य सम्मिलित हों।
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