





प्रत्येक व्यक्ति को सद्गुरू मिलने चाहिये, वे भले ही अपने आपको सद्गुरू न कहें। एकलव्य भील ने द्रोणाचार्य को गुरू बना ही लिया। अच्छे पुरूष कम होते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-
मनुष्याणां सहस्त्रेष कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः।।
हजारों आदमियों में कोई एक ही मुक्ति के लिये प्रयत्न करता है। उन प्रयत्न करने वालों में कोई एक ही परमात्मा को प्राप्त होता है। बात यह है कि जो परमात्मा को प्राप्त है, वह दूसरों को शिष्य नहीं बनाता और जो शिष्य बनाते हैं, उनमें योग्यता कम रहती है। एकलव्य भील ने द्रोणाचार्य को अपना गुरू बना लिया, वैसे ही हम भी बना सकते हैं। मन से गुरू बना लिया, उसी से सब विद्या सीख ली। महाभारत आदिपर्व की कथा है। वह इतना कुशल हो गया कि अर्जुन से भी बढ़कर हो गया। हमारे में श्रद्धा होगी तो हमारा जो काम होगा, वह हो ही जायेगा। द्रोणाचार्य को पता नहीं कि एकलव्य ने उन्हें अपना गुरू बनाया है। वास्तव में श्रद्धा ही प्रधान है। गुरू चाहे स्वीकार करें, चाहे न करें। अच्छे पुरूष गुरू बनना नहीं चाहते। यही तो उनका अच्छापन है। उनके लिये यह बात नहीं कि वे गुरू बन जायँ तो उनका पतन हो जायेगा। पर स्वाभाविक बात है कि वह क्यों गुरू बनें? यदि कोई योग्य हो और वह शिष्य बना ले तो दोष की बात नहीं।
बहुत अच्छे पुरूष होते हैं, वे एकलव्य की भाँति मिसाल भी नहीं देते। जो पुरूष गुरू बनना नहीं चाहते, वे ऐसी मिसाल नहीं देते। जो शिष्य बनाना चाहता है वह तो ऐसा कह सकता है। बहुत-सी ऐसी बातें हैं जो शास्त्र के अनुकूल होते हुए भी आजकल प्रचार करने की नहीं है। समय के अनुसार देखा जाता है। नहीं तो उस बात को लेकर दम्भ फैल जाता है। भाव से शिक्षा लेनी चाहिये। जैसे- दत्तात्रेय जी ने चौबीस गुरू बनाकर सबसे शिक्षा ली। वैसे ही मनुष्य सारी दुनिया से अपने भाव के अनुसार शिक्षा ले सकता है। शास्त्र भी कहता है जिससे हमें थोड़ी भी शिक्षा मिले वह गुरू है। शास्त्र विधि के अनुसार गृहस्थ को यज्ञोपवीत दे, वह गुरू है। विद्यागुरू, दीक्षागुरू होते ही हैं। गुरू-शिष्य की प्रणाली शास्त्र की है ही।
स्त्रियों के लिये पति गुरू है और किसी को गुरू बनाने की जरूरत नहीं है। महापुरूषों की कसौटी बड़ी कड़ी है। उसके अनुसार नहीं है। ईश्वर की कृपा से मनुष्य ऊँचा उठता है। इस जमाने में कठिनाई है।
‘मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।’
जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है। यह साधारण बात नहीं है। जैसा मान वैसा अपमान। जैसी निन्दा वैसी स्तुति। मान अपमान में समानता होने से अहंकार का नाश होता है। अहंकार के नाश के लिये यह संखिया है। मान को सब चाहते हैं, अपमान को कोई नहीं, यह तो सारी दुनिया की रीति है। अपमान को चाहे किंतु मान को नहीं- यह साधन-अवस्था है। इस साधन का यह नतीजा होता है कि वे दोनों समान हो जाते हैं। यह बात युक्ति से ठीक जँच जायेगी। पर जब आकर प्राप्त हों तो मान को स्वीकार करेगा, अपमान को नहीं। युक्तियों से, शास्त्रों से ठीक प्रतीत होता है, पर आकर प्राप्त हो जाय तो विषमता आ जाती है, वैसे ही पर स्त्री की बात है। स्त्री में सुखबुद्धि होने से आसक्ति है। सुखबुद्धि अज्ञान से। अज्ञान का नाश अन्तः करण की शुद्धि से होता है, अन्तःकरण सत्संग, भजन, नाम जप से शुद्ध होता है। साधन करने की जरूरत है। सत्संग से यह लाभ है कि निराशा नहीं आती। निराशा ही मृत्यु है। रोगी आदमी वैद्य से सुनकर, पुस्तकों से पढ़कर यह समझ लेता है कि यह कुपथ्य है, फिर भी आसक्ति के कारण से कुपथ्य कर लेता है। इसी प्रकार साधक परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग में जिसे कुपथ्य समझता है, उसको उसमें आसक्ति के कारण, अज्ञानता के कारण स्वीकार कर लेता है।
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरूषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।
हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाववाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुये बुद्धिमान पुरूष के मन को भी बालात् हर लेती हैं।
समझदार है, परमात्मा की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करता है, परंतु प्रमथन स्वभाववाली इन्द्रियाँ उसके मन को बलात् हरण कर लेती हैं। इसके लिये भगवान बताते हैं-
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
इसलिये साधको को चाहिये कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे, क्योंकि जिस पुरूष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। विषयों से इन्द्रियों को हटाकर वश में करके मेरे परायण हो जाये।
साधन-अवस्था में जो विचारशील बुद्धिवाला है, वह स्थितप्रज्ञ नहीं है। उसकी बुद्धि विवेकशील है। यह विवेक है कि मान नहीं चाहता, मान को विष के समान मालूम पड़ता है। पर जब ये आकर प्राप्त हों तो अधिक प्रिय लगने लग जायँ, वह स्थितप्रज्ञ नहीं है। कुछ विवेकशील तो है। जो विचार, विवेक है, उसके ऊपर खूब जोर डालना चाहिये। बुद्धि के द्वारा अच्छी तरह समझकर प्रयास करे तो यह भी विशेष सहायक है। यह बात ऐसी है, इस पर डटा रहे। जैसे भक्ति के मार्ग में ईश्वर के ऊपर निर्भर रहना, ईश्वर के अस्तित्व पर जितना जोर दिया जाय, उतना उसकी बुद्धि में धीरता, वीरता आयेगी। भगवान हैं इस पर विश्वास करे, इसमें कोई शंका नहीं। यह बड़े काम की चीज है। स्थिर बुद्धि में इससे सहायता मिलेगी। हमारे में आत्मबल नहीं है, जिसके कारण हम जिस बात को छोड़ना चाहें, उसको नहीं छोड़ पाते। आत्मबल के लिये श्रद्धा की आवश्यकता है। यदि हमारी मान्यता, समझ, ज्ञान दृढ़ हो जाय तो काम सिद्ध हो जाता है। हमें विश्वास हो जाय कि इस वन में बाघ रहता है तो हम उस वन में नहीं जाते। अमुक वस्तु में विष है तो वह वस्तु नहीं खाते, अमुक जगह खतरा है तो वहाँ नहीं जाते। जब हमें श्रद्धा-विश्वास हो जायेगा तो हम कुपथ्य का सेवन नहीं करेंगे। विश्वास से आत्मबल बढ़ेगा। ईश्वर में जितनी श्रद्धा बढ़ेगी, उतना वह परमात्मा के निकट पहुँचेगा। परलोक, महात्मा में जितना विश्वास होगा, उतना साधन तेज होगा। गीता के वचन इत्थंभूत है, सत्य हैं, इनको एकदम सत्य मानकर चले तो आत्मबल बढ़ेगा। शास्त्र गीता आदि, महापुरूष, ईश्वर और परलोक यानी मरने के बाद आत्मा का होना- इन चारों में किसी एक में विश्वास हो तो आत्मबल बढ़ेगा।
इनमें जितना विश्वास होगा उतना आत्मबल बढ़ेगा। हमारे में यही बड़ा भारी रोग है कि शास्त्र की बात सुनते हैं, मान लेते हैं कि ठीक है, पर जब काम पड़ता है तो फिसल जाते हैं, काम में नहीं ला सकते। यह बड़ा भारी दोष हैं, क्योंकि विश्वास की कमी है। हमारा पूर्व का संस्कार है, अभ्यास है, जिसके बल पर हमारा इन पर विश्वास नहीं जमता। विश्वास जमाने के लिये ही सत्संग करना पड़ता है। श्रद्धा कमजोर है, इसलिये हमारी श्रद्धा दब रही है। जब श्रद्धा बलवती हो जायेगी तो उस बात को खा जायेगी। काम ने ज्ञान-विज्ञान को दबा रखा है। पर जब ज्ञान-विज्ञान जोर पकड़ेंगे तो काम को खा जायेंगे, अतएव ज्ञान-विज्ञान जोर पकड़ेंगे तो काम को खा जायेंगे, अतएव ज्ञान-विज्ञान बढ़ाना चाहिये। आत्मा-जैसी चीज को काम ने ढक रखा है। सूर्य को अन्धकार ग्रास गया, कितने आश्चर्य की बात है। हममें जन्मसिद्ध अज्ञान है, नास्तिकता है। सूर्य नहीं उदय होने से ही अन्धकार है। सूर्य के उदय होने में अन्धकार ने अटकाव डाल रखा है। अज्ञान इतना बलवान् है कि ज्ञान को उत्पन्न ही नहीं होने देता। हमें यह चेष्टा करनी चाहिये कि ज्ञान उदय हो।
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।
इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात् सूक्ष्म, बलवान् और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल।
यह बात समझकर बुद्धि के द्वारा जोर लगाकर काम को मार डाले। ये काम, क्रोध भी मर सकते हैं, भगवान् विशेष प्रयास करने के लिये कह रहे हैं। अधिक संख्या वाले कम संख्या वाले को दबा देते हैं, इसलिये संख्या बढ़ाने की बात कही जाती है। अज्ञान सदा से है, परन्तु दूर हो सकता है, ज्ञान होने पर अज्ञान मिट सकता है।
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