





यह युग है विध्वंश का और प्रक्षेपण शब्द का पर्याय बन चुका है, उन प्रक्षेपास्त्रों का जो पूरे विश्व का कभी भी विनाश कर सकते हैं….. किन्तु साधनाओं के क्षेत्र में इसी शब्द का विशेष अर्थ है, जिसे प्राप्त कर साधक निरापद कर सकता है अपना आगामी जीवन। पूज्यपाद गुरूदेव के एक संन्यस्त शिष्य की अनुभूतियों पर आधारित, साधना के नवीन क्षेत्र को स्पर्श करता, चौंकाने वाला विवरण…….
यद्यपि उस उत्तुंग पहाड़ी के शिखर पर पहुंचने के लिये कोई मार्ग दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था, किन्तु जैसा कि कहते हैं कि जहां चाह होती है, वहा राह होती है-उसी को मन ही मन सूत्र मानकर मैं आगे बढ़ता चला जा रहा था। ऊबड़-खाबड़ और रपटीली मेड़ों से होता हुआ तलहटी का मार्ग कब का समाप्त हो चुका था और अब जो मार्ग मैंने पकड़ा था उसे मार्ग की संज्ञा देना भी गलत होगा, क्योंकि मैं पेड़ों और न जाने कौन-कौन सी झाड़ियों के मध्य से होता हुआ केवल पर्वत शिखर की ओर स्वनिर्मित मार्ग से आगे बढ़ता चला जा रहा था।
सूर्योदय का काल सम्मुख आ चुका था और भगवान भास्कर अपनी सिंदूरी आभा के साथ यदा-कदा वृक्षों के झुरमुट से, पहाड़ी की ओट से प्रकट व लुप्त होकर कोई कौतुक सा रच रहे थे। उनकी उद्दीप्त आभा से वितान पर स्वप्निल संसार जैसा मनोहर दृश्य उपस्थित हो गया था जो बरबस ही दृष्टि को बांध ले रहा था, किन्तु आज मुझे अवकाश न था कि मैं पटल पर फैले उस मनोरम जगत में नित्य की भांति स्वयं को विस्मृत कर देता और न ही पक्षियों की रून-झून घंटियों जैसे बजते स्वरों में मैं कोई गीत सुनने के लिये प्रस्तुत हो पा रहा था। मैं तो स्वयं एक पंछी बन मानों पांवों में पंख लगाकर जल्दी से जल्दी उस पर्वत श्रृंखला की सीमा को पार कर चोटी की पिछली ओर उस गुप्त साधना स्थली तक पहुंचने के लिये उतावला हो रहा था जहां के विषय में मुझे वायवीय रूप से संदेश प्राप्त हुआ था, कि प्रातः स्मरणीय परम श्रद्धेय पूज्यपाद गुरूदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी किसी विशिष्ट कारण से उपस्थित हुये हैं और उन्होंने मुझे उपस्थित होने को कहा है। यद्यपि मुझे वरिष्ठ गुरू भ्राताओं से ज्ञात हुआ था, कि उस स्थान पर पूज्यपाद सद्गुरूदेव का एक विशिष्ट साधना स्थल रहा है, किन्तु गुरू आज्ञा के अभाव में मैंने कभी उस स्थान का अपने पैरों से स्पर्श करने का दुःसाहस नहीं किया था… किन्तु आज तो स्वयं पूज्यपाद गुरूदेव की आज्ञा थी और आज्ञा से भी कहीं अधिक मेरे सौभाग्य का अंकन था, इससे मैं मन ही मन अपने सौभाग्य पर इठलाता हुआ आगे बढ़ा जा रहा था।
लक्ष्य का मुझे ठीक-ठाक ज्ञान नहीं था, केवल एक वरिष्ठ भ्राता से प्राप्त सूत्रों के आधार पर कुछ आभास व अनुमान मात्र ही था। इसके उपरांत भी मुझे यह किंचित भान नहीं हो रहा था, कि मैं गलत मार्ग पर चल रहा हूं अथवा सही मार्ग पर। कोई चुम्बकीय शक्ति जैसे मुझे अपने ओर खींचती चली जा रही थी और मैं नितांत आत्मलीन होता हुआ एक अनोखी सी पुलक को मन में भरे मानों उन पक्षियों से होड़कर रहा था जो अपने पंखों को फैलाकर अनंत आकाश का ओर-छोर नापने के लिये निकल पड़े थे।
मेरे मन में निरंतर उन स्मृतियों का आवागमन हो रहा था जो मैंने पूज्यपाद गुरूदेव के सानिध्य में रहकर पायी थी और दो वर्ष हुए उनकी ही आज्ञा के अनुक्रम में, जिस पर्वत पर मैं चढ़ रहा था उसकी तलहटी में बसे एक अत्यन्त छोटे से ग्राम के समीप रहकर किन्हीं साधनाओं में निमग्न था। यह दो वर्ष का समय मैंने कैसे व्यतीत किया था, यह या तो मैं जानता था अथवा मेरे गुरूदेव। पूज्यपाद गुरूदेव ने जिस साधना को सम्पन्न करने की आज्ञा दी थी, उसका विधान और मंत्र जप तो एक ओर रह गया था….. मैं तो केवल उनसे विछोह की घड़ियों को आंसू बहा-बहाकर ही काट रथा था, जिसमें मेरा सम्बल था पूज्यपाद गुरूदेव का चित्र! मैं मन ही मन प्रार्थना करता कि गुरूदेव यह आपने किस साधना सिद्धि के जाल में उलझा दिया? मैंने तो कभी आपसे किसी सिद्धि की कामना ही नहीं की थी। मेरे लिये तो आपका साहचर्य, आपका नित्य दर्शन ही समस्त साधना सिद्धि थी।
और जहां मन में एक ओर पूज्यपाद गुरूदेव के श्रीचरणों में उपस्थित होने के इस अनपेक्षित सौभाग्य से मन हर्षित होकर नर्तन कर रहा था, तो वहीं भय का एक अंश भी साथ-साथ चल रहा था, कि कहीं पूज्यपाद गुरूदेव ने साधना के विषय में पूछ लिया तो क्या उत्तर दूंगा? बार-बार ऐसा भी लग रहा था, कि मैं जो साधना का क्रम पूर्ण मनोयोग से नहीं कर रहा हूं सम्भवतः उसी पर प्रताड़ना देने के लिये तो कहीं नहीं बुलाया जा रहा हैं? क्योंकि पूजयपाद गुरूदेव की यह विशेषता है, कि वे अंतः पक्ष से जितने अधिक मृदुल व शीतल हैं, तो वहीं साधना व अनुशासन के प्रति निर्ममता की हद तक कठोर भी हैं। फिर भी गुरूदेव के दर्शन होने का जो उल्लास था वह समस्त भय एवं आशंकाओं पर शीतल फुहार बनकर पड़ता जा रहा था। इन्हीं ऊहापोहों में खोया हुआ मैं पर्वत का शिखर पारकर दूसरी ओर पहुंच चुका था।
वहां मुझे एक आयुलब्ध संन्यासी के दर्शन हुये और सच कहूं, तो इन्हें देखकर ही मेरी तंद्रा भंग हुई। मेरा अनुमान सही था। वे पूज्यपाद गुरूदेव की आज्ञा प्राप्त कर मुझे उस स्थान तक ले जाने के लिये उपस्थित हुये थे जहां पूज्यपाद गुरूदेव का अल्पकालीन प्रवास निश्चित हुआ था और कुछ ही क्षणों में मैं पूज्यपाद गुरूदेव के श्री चरणों में उपस्थित भी था।
इस अंतराल में पूज्यपाद गुरूदेव की देह यद्यपि कुछ कृशकाय अवश्य हो गई थी, किन्तु उनके श्री मुख पर जो अलौकिक आभा पहले की अपेक्षा कहीं अधिक द्युतिमान हो रही थी, उससे यह निश्चित था, कि पूज्यपाद सद्गुरूदेव इस मध्य किन्हीं विशिष्ट साधनाओं में संलग्न रहे थे। उनके नेत्र यद्यपि ध्यान की मुद्रा में अर्द्धनिमीलित थे, किन्तु महायोगियों के समक्ष निद्रा, तंद्रा, जाग्रत अथवा सुषुप्ति जैसी अवस्थाओं का अर्थ ही क्या? उन्हें मेरे आगमन का ज्ञान हो ही चुका था, इस बात को लेकर मेरे मन में कोई भी संशय नहीं था।
मैं कुटिया से प्रस्थान करते समय, हर्ष के अतिरेक में, उनकी अभ्यर्थना हेतु कोई सामग्री अथवा पुष्प अपने साथ न ला सका था, जिसका बोध मुझे उनके श्री चरणों में उपस्थित होने के पश्चात् ही हो रहा था। मैंने मन ही मन अपनी इस त्रुटि पर कुछ झुंझलाते हुये, अंजलि मुद्रा को धारण कर मानों शून्य से पुष्प प्राप्त करने की भावना करते हुये उसे निवेदित कर साष्टांग प्रणाम किया। मेरे स्वर्श से पूज्यपाद गुरूदेव की अर्द्धनिमीलित आँखें उन्मीलित अवस्था में आयीं और क्षणांश में ही उन कमल नेत्रों में वात्सल्य, करूण, प्रेम, वर, अभय जैसे कई भाव झिलमिला उठे तथा एक जैसी मधुर और शीतल स्वर अत्यंत क्षीण ध्वनि से मेरे कानों में वीणा की भांति गुंजरित हो उठा- ‘‘कल्याण हो!’
……. किन्तु जब कानों से होकर हृदय तक पहुंचे इस गुंजरण को मैं अपने-आप में समाहित कर पाता, तब तक प्रहार से लगते स्वर ने सहसा मुझे भावविह्ल होने से रोक, सचेतन होने की अवस्था में लाकर पटक सा दिया। पूज्यपाद गुरूदेव का मुखमंडल क्रोध से लाल भभूका हो चला था और जो कुछ उन्होंने मेरे साथ आये उन संन्यासी बंधु से कहा था वह प्रकटतः उन्हें सम्बोधित होते हुये भी मेरे लिये कहा गया वाक्य था-
‘दो तमाचे तूने इसे मार्ग में ही क्यों नहीं लगाये अचलानंद? बहुत बड़ा संन्यासी बनता है यह? मूर्ख! धृष्ट! निकम्मा! आलसी …..!’
बेचारे अचलानंद जी क्या कहते! उन्होंने तो साष्टांग प्रणाम कर मेरी ओर अर्थ पूर्ण स्मित के साथ दृष्टिपात करके प्रस्थान करने में ही अपन भलाई समझी और उनकी अर्थपूर्ण स्मित का भाव समझ मैं भी मुस्करा उठा। संन्यायी शिष्य गुरू के समक्ष उपस्थित हो और गुरू दो चार वाक्यों की प्रताड़ना दुत्कार के साथ उसकी अभ्यर्थना न करे तो बात पूरी ही कहां होती है? एक प्रकार से मुझे पूर्ण गुरू आशीर्वाद मिल गया था और प्रसन्न मन से जब मैंने पुनः दृष्टि को उठाया, तो पूज्यपाद गुरूदेव का मुखमंडल देखकर चौंक गया। पूज्यपाद गुरूदेव वास्तव में ही अत्यंत क्रोध के साथ पुनः समाधिस्थ अवस्था में जा चुके थे और देखते ही देखते उनकी उस क्रोध मुद्रा से उनका पूरा शरीर आप्लावित हो गया। उनकी नासिका क्रोध से फूल गई थी तथा माथे की एक-एक रेखा स्पष्ट व प्रगाढ़ होती प्रतीत हो रही थी। यह तो अच्छा था, कि उनके नेत्र नहीं खुले थे अन्यथा मैं एक पल भी वहां नहीं खड़ा रह सकता था। सहसा मुझे भान हुआ, कि पूज्यपाद गुरूदेव की यह मुद्रा केवल मेरे प्रति क्रोध के कारण उत्पन्न नहीं हुई है वरन् इसी क्रोधयुक्त मुद्रा के साथ वे समाधिस्थ अवस्था में जाकर किन्हीं विशेष आलोड़न-विलोड़न की अवस्थाओं में संलग्न हो गये हैं। इस बात का भान होते ही मैंने निःशब्द रूप से प्रणाम कर वहां से बाहर प्रस्थान कर दिया।
पूज्यपाद गुरूदेव के अन्तःकक्ष के बाहर फूस से घिरे एक प्रागंण में वे प्रौढ़ संन्यासी जिन्हें पूज्यपाद गुरूदेव ने कुछ क्षणों पहले ही अचलानंद के नाम से सम्बोधन किया था, वे एक मृग चर्म पर गंभीर व कुछ चिंतित मुद्रा में बैठे हुये थे। मुझे बाहर आया देख उन्होंने संकेत से मुझे अपने समीप बैठने को कहा। मैंने वैसा ही किया। वे कुछ क्षणों तक मुझे अत्यंत स्नेह से देखते रहे और सहसा बोल पड़े-‘गुरूदेव के आगमन का संदेश मिलने पर हर्षित होना तो स्वाभाविक है लेकिन यदि कोई संन्यासी भी गृहस्थों की तरह भावातिरेक में डूबने-उतरने लगे तब तो….
और तब उनके अधूरे वाक्य से मुझे लगा कि अवश्य ही मुझसे कोई त्रुटि हो गई है, अवश्य ही कोई आसन्न संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है, तभी तो पूज्यपाद गुरूदेव को इस प्रकार से ध्यानस्थ होने के लिये विवश होना पड़ा है। मैं वस्तुस्थिति को यथावत समझने में असमर्थ था, अतः मैंने प्रश्नवाचक मुद्रा से उन्हें एकटक निहारना प्रारम्भ कर दिया।
स्वामी अचलानंद जी ने आगे मुझे जो कुछ बताया वह संक्षेप में यह था, कि मैं पूज्यपाद गुरूदेव के आगमन का संदेश प्राप्त कर जिससे हड़बड़ी में, बिना अपनी साधना स्थली को मंत्रों से कीलित किये चला आया हूं उससे न केवल मेरा, वरन् मेरी उस साधना स्थली के समीप का ग्राम भी किसी घोर संकट में पड़ सकता था।
तंत्र के जहां अनेक रचनात्मक उपयोग हैं, वहीं यह गलत हाथों में पड़कर विनाशकारी भी बन सकता है तथा ऐसी ही रूग्ण प्रकृति के व्यक्तियों का यह प्रयास होता है कि जहां कहीं कोई इस ज्ञान के माध्यम से शुभ कर्मो में संलग्न हो, तो उसमें व्यवधान करें। सच ही तो है, कि भले ही गजराज अपनी मस्ती में अपनी राह चल रहे हों, किन्तु श्वानों को पता नहीं क्या बेचैनी हो जाती है।
स्वामी अचलानंद जी ने मुझे आगे बताया, कि जब मैंने वहां से प्रस्थान किया, तभी से कोई ओछी प्रकृति का तांत्रिक उस क्षेत्र को इस प्रकार से आबद्ध करने के प्रयासों में संलग्न होता तो दो विरोधी मतों के परस्पर घर्षण से ऐसा विस्फोट सा होता, जिससे मेरा तो सर्वनाश निश्चित था ही, साथ ही सपीपस्थ ग्राम भी किसी घोर संकट में जा घिरता।
विस्फोट केवल बारूद या परमाणविक शस्त्रों के माध्यम से ही नहीं अपितु मंत्रों से भी किये जा सकते है जो कहीं अधिक भयावह होते हैं। जिनमें व्यक्ति विक्षिप्त भी हो सकता है, जड़ भी हो सकता है अथवा किसी कुप्रवृति में घिर, कामुक या व्याभिचारी बन समाज में उपहास का पात्र भी बन सकता हैं।
स्वामी अचलानंद जी विस्तार से मुझे बताते रहे, कि किस प्रकार से पूज्यपाद गुरूदेव प्रातः काल से कुछ खिन्नता में थे और उनसे मेरी इस त्रुटि की चर्चा करने के बाद ध्यानस्थ हो गये थे। मैं मन ही मन अपनी त्रुटि पर अत्यंत लज्जित था और पूज्यपाद गुरूदेव के समक्ष जाने का साहस नहीं कर पा रहा था, कि तभी गुरू गंभीर वाणी में गूंज उठा-अचलानंद!
थोड़ी ही देर में पूज्यपाद गुरूदेव के समक्ष उनकी ही आज्ञा से मैं भी उपस्थित था। पूज्यपाद गुरूदेव के श्री मुख पर अब न कोई क्रोध रेखा थी, न खेद अथवा विषाद का चिन्ह। मैंने झिझकते हुये उनके चरणों में प्रणाम किया तो मेरे सिर पर हाथ फेरते हुये वे स्नेह सिक्त वाणी में बोल उठे-सावधान रहा कर!’’ मेरा आशीर्वाद हर क्षण तेरे साथ है, साधना विषयक कुछ आवश्यक सूत्र प्रदान कर उन्होंने मुझे उसी समय प्रस्थान करने की आज्ञा भी प्रदान कर दी। सायंकाल तक मैं अपनी कुटिया के समीप था।
वहां मेरी कुटिया को अनेक स्थानीय निवासियों ने घेर रखा था । उनसे मुझे ज्ञात हुआ कि, मेरे प्रस्थान के कुछ समय बाद ही वहां एक वयोवृद्ध संन्यासी का आगमन हुआ था, जो अपनी झुकी कमर और दंतविहीन मुख के साथ पता नहीं क्या बुदबुदाते हुए, ग्राम के चारों और घूमते हुये, जल को छिड़क रहे थे किन्तु जब उनका पीछा किया गया, तो वे पता नहीं कहां अदृश्य हो गये। ग्रामवासी किसी अनिष्ट की आशंका से भयभीत होकर मेरे पास सूचना व समाधान हेतु आये थे। जब ग्रामवासियों से मैंने विस्तार से पूछा, तो ज्ञात हो सका कि वास्तव में पूज्यपाद गुरूदेव ही एक जर्जर वृद्ध का रूप धारण कर ठीक उन्हीं क्षणों में जब वे स्वामी आचलानंद जी के समक्ष थे, उस ग्राम तक आये थे।
मैंने उन ग्रामवासियों से क्या कहता?
बस भरे कण्ठ और अश्रुपूरित नेत्रों से कर रहे थे, प्रणाम करता हुआ यही बोल सका-‘अनेक रूप रूपायै तस्मैं श्री गुरूवे नमः’ और तत्क्षण एक मौन, आश्वस्ति बनकर समस्त वातावरण में व्याप्त हो गया…….
समस्त भावी संकटों का निवारण करने में सक्षम प्रक्षेपण साधना
एक ही नहीं अनेक अर्थों को समाहित किये होती है स्वयं में कोई भी साधना और यही सत्य है ‘प्रक्षेपण साधना’ के संबंध में भी। जहां संन्यस्थ क्रम में सम्भव होते हैं इस साधना पर आधारित विशिष्ट क्रम में इसी साधना को सम्पन्न करने के पश्चात् ही आ सकती है कोई भी साधना अपने क्रियाशील स्वरूप में।
रक्षात्मक रूप में बगलामुखी अथवा भैरव साधना सम्पन्न करना तो फिर भी एक बार सहज कहा जा सकता है, किन्तु जब तक इन साधनाओं के साथ बल न हो ‘प्रक्षेपण साधना’ का तब तक कठिन ही नहीं प्रायः असम्भव भी होता है, कि साधक अपेक्षित लाभ प्राप्त कर सके। पूर्व में की गई किसी भी साधना की ऊर्जा को एकत्र करना और उसे अपने लक्ष्य पर प्रक्षेपित कर देना, यही इस साधना का सामान्य अर्थों में सार है चाहे वह बगलामुखी साधना हो अथवा महालक्ष्मी साधना।
इस उच्चकोटि की सिद्धाश्रम प्रणीत साधना को सम्पन्न करने के लिये आवश्यक है, कि साधक के पास प्रक्षेपण यंत्र एवं हकीक माला आवश्यक उपकरण के रूप में हो जो पूर्णत्यः मंत्र सिद्ध एवं प्राण प्रतिष्ठित भी हो।
इस साधना को 12 अगस्त सूर्य ग्रहण अथवा किसी भी रविवार की रात्रि में सम्पन्न किया जा सकता है। इस साधना में काले रंग के वस्त्र पहन काले ही रंग के ऊनी आसन पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें तथा तेल का एक बड़ा दीपक जलाकर निम्न मंत्र की 25 माला मंत्र जप को सम्पन्न करें। सम्पूर्ण मंत्र जप एक ही बार में पूर्ण करना आवश्यक है।
मंत्र
।। ऊँ ऐं क्लीं ह्रौं संप्रेक्षणायाय ऊँ ऊँ फट्।।
Om Ayeim Kleem Hroum Samprekshannaay Om Om Phat
मंत्र जप के पश्चात् रात्रि शयन साधना स्थान पर ही करें तथा अगले दिन यंत्र व माला को घर से दूर दक्षिण दिशा में विसर्जित कर दें।
मानसिक दौर्बल्य से ग्रस्त व्यक्तियों अथवा अकारण भय लगने की स्थितियों में यह एक अत्यंत श्रेष्ठ एवं अनुभव सिद्ध साधना है। साथ ही इस साधना को सम्पन्न करने से जहां पूर्व में की गई साधनाओं के प्रति एक जाग्रत अवस्था प्राप्त होती है, वहीं एक ऐसा अदृश्य सुरक्षा चक्र भी प्राप्त हो जाता है जो भावी जीवन में अनेक ज्ञात-अज्ञात संकटों से निरंतर सुरक्षित करता ही है।
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