





किसी भी वर्ग अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र किसी भी जाति से उत्पन्न हुये पुरुष से यदि ज्ञान मिलता है तो उसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण करना चाहिये।
कल किया जाने वाला काम आज और सांयकाल किया जाने वाला काम प्रातः काल में ही पूरा कर लेना चाहिये, यह तनाव, चिंता और जीवन में दबाव वाली स्थितियों का अंत करता है।
अनेक कार्य उपस्थित होने पर बुद्धिमान मनुष्य कार्य को आवश्यक और अति आवश्यक कार्य में विभाजित कर शीघ्रता से अति आवश्यक कार्य को पूर्ण कर, आवश्यक कार्य करता है। अंततः निश्चिंतता पूर्वक पीछे के कार्य करता है।
कोई भी कार्य खूब सोच-विचार कर करना चाहिये। जल्दबाजी में किसी काम का आरंभ नहीं करना चाहिये। अविवेकपूर्ण हठात कार्य करने से महान विपत्तियां आ पड़ती हैं और सोच-विचार कर कार्य करने से सम्पत्ति एवं समृद्धि स्वयं दौड़कर आती है।
गन्ध, पुष्प, कुश, गौ, दूध, दही, मधु, जल, फल और दक्षिणा-ये वस्तुयें निकृष्ट मनुष्य से भी प्राप्त हो तो भी ग्रहण की जा सकती है।
अग्निशाला, गौशाला, देवता और उपदेशक के समीप तथा जाप, स्वाध्याय और भोजन व जल ग्रहण करते समय जूते उतार देने चाहिये।
ऋण, अग्नि, रोग तथा शत्रु-इनमें से कुछ भी शेष रह जाये तो वह निरन्तर बढ़ता रहता है, इसलिये इनमें से किसी को भी शेष नहीं छोड़ना चाहिये, शीघ्र इनको नष्ट करने में प्रयासरत हो जाना चाहिये।
स्वजनों के साथ विरोध, बलवान के साथ स्पर्धा और स्त्री, बालक, वृद्ध या मूर्ख के साथ विवाद कभी नहीं करना चाहिये। पति-पत्नी अथवा पिता-पुत्र के आपसी झगड़े में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये।
कलह करने से आयु, धन, मित्र, यश तथा सुख का नाश होता है। अतः कभी कलह ना करें।
विद्या का अर्जन करने वालों को क्षण का और धन की चाह करने वालों को कण का त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्येक क्षण विद्या का अभ्यास और कण-कण धन का संग्रह करना चाहिये।
अति साहस, क्रोध, अभिमान, अधिक शयन, अधिक जागरण, अधिक स्नान और अधिक भोजन कभी न करें। साथ ही अधिक बैठना, खड़े रहना, घूमना, कूदना, लाँघना, अधिक विवाद करना, बोलना, हंसना, अधिक व्यायाम करना-ये कार्य भी नहीं करने चाहिये।
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