





परमात्मा के पास सम्राट की तरह जायेगा ही कौन? जिसकी कोई मांग नहीं है। मांग ही इस जगत में भिखारी बनाती है। मांग के कारण ही हम भिखमंगे हैं। परमात्मा के पास वही जाता है जिसकी सारी मांगे समाप्त हो गयी है। जिसको यहां मांगने को कुछ नहीं बचा। जिसने मांगकर भी देख लिया और दुख पाया। पाकर भी देख लिया और दुख पाया। नहीं मिला तो पीड़ा हुई, मिला तो पीड़ा हुई। जिसने जीवन के सब रंग-ढंग देख लिये, जो जीवन से भलीभांति परिचित हो गया, जिसकी मांग खो गयी। मांग भिखारी बनाती है। मांग खो गयी तो वह सम्राट हो गया।
लेकिन जिसकी मांग खो गयी, जिसके पास कुछ मांगने को न बचा, स्वभावतः वह परमात्मा से भी कुछ नहीं मांगेगा। मांग ही संसार की होती है। तुम जो भी मांगते हो वही संसार का है। तुम जरा अपनी मांगों का निरीक्षण करना। जिन मांगों को तुम धार्मिक कहते हो, वे भी धार्मिक नहीं है। मांग धार्मिक होती ही नहीं। मांग ही संसार है, इसलिये मांग परालौकिक नहीं होती। तुम जब मोक्ष भी मांगते हो, तब भी तुम सुख ही मांग रहे हो, नाम बदल लिया। जब तुम स्वर्ग मांगते हो, तब भी तुम सफलता ही मांग रहे हो, नाम बदल दिया।
तुम्हारा स्वर्ग भी तो कल्पवृक्षों से भरा है। वहां सुंदर अप्सरायें हैं और शराब के चश्मे हैं। तुम्हारा स्वर्ग भी तो तुम्हारे ही मन का बिम्ब है। तुम अगर रोशनी मांगते हो, तुम अगर अमरत्व मांगते हो, तो भी तुम मांग ही रहे हो और मांग कैसे अमृत तक ले जायेगी? इसलिये सारी मांगे छूट जायें तो तुम भिखमंगे नहीं रहे, सम्राट हुये। इस अर्थ में मैंने कहा है कि परमात्मा के सामने सम्राट की तरह जाना, कुछ मांगते हुये मत जाना।
और मैंने यह भी कहा है कि परमात्मा के सामने भिखारी की तरह जाना, अर्थात् शून्य होकर जाना। भिक्षा के पात्र! मांग कुछ भी नहीं। सिर्फ एक शून्य! झोली फैली हो। झोली किस चीज से भरी जाये इसकी कोई आकांक्षा नहीं। झोली भरी जाये इसकी भी आकांक्षा नहीं, लेकिन झोली फैली हो। तुम्हारा हृदय खाली हो। तुम्हारे हृदय में मैं की अकड़ न हो। इस अर्थ में मैंने कहा है, भिखारी होकर जाना। मैं की अकड़ न हो, मैं न हो, मैं भाव न हो। इन दोनों बातों में विरोध नहीं है, ये दोनों बातें एक साथ घटती है। जिसकी मांग गयी उसका मैं भाव भी गया।
इस संसार में हम मांगते इसीलिये हैं ताकि मैं को सिद्ध कर दें। मेरे पास धन होगा तो मैं बड़ा होगा। मेरे पास पद होगा तो मेरा मैं बड़ा होगा। ये सारी चेष्टायें मैं को बड़ा करने की चेष्टायें हैं। जिसने मांग छोड़ी, जिसने मेरा छोड़ा, उसका मैं भी गया। मैं मेरे के भोजन पर जीता है। मेरे का जितना विस्तार हो उतना ही मजबूत मैं हो जाता है। छोटे मकान वाले का छोटा मैं होता है, बड़े मकान वाले का बड़ा मैं होता है। छोटी सम्पत्ति में छोटा मैं, बड़ी सम्पत्ति में बड़ा मैं। तुम्हारे पास जितना होगा परिग्रह, उतनी ही मैं की अकड़ होगी। इसलिये तो जब परिग्रह छूटता है या छोड़ना पड़ता है तो ऐसे लगता है जैसे मेरी मृत्यु हुई, जैसे मैं मरा। दिवाला निकल जाता है किसी का, वह आत्महत्या कर लेता है, जी नहीं सकता अब। क्योंकि धन ही उसका मैं था। अब धन ही न रहा तो अब दीन-हीन होकर सड़कों पर से गुजरना शोभा नहीं देता। इससे बेहतर मर ही जाओं। जैसे ही मांग गयी, परिग्रह गया, वासना गयी, वैसे ही भीतर से मैं भी चला जाता है।
तो एक बड़ी अपूर्व घटना घटती है। एक तरफ से व्यक्ति भिखारी हो जाता है क्योंकि मैं नहीं बचा। शून्य हो गया भिक्षापात्र और एक तरफ से सम्राट हो जाता है क्योंकि मांगे नहीं बची। इसलिये तो बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को सम्राट भी कहा और भिक्षु भी कहा। दो ही नाम उपयोग किये गये हैं संन्यासी के लिये- एक भिक्षु और एक स्वामी। यह इन दोनों बातों की वजह से। जिन्होंने इस परम दशा के सम्राट होने पर जोर दिया उन्होंने अपने संन्यासियों को स्वामी कहा। जिन्होंने इस परम दशा की शून्यता पर जोर दिया, निरहंकारिता पर जोर दिया, उन्होंने भिक्षु कहा। मगर ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो स्वामी है वह भिक्षु है। जो भिक्षु है वही स्वामी है। उसके दरवाजे पर हार जाना जीत जाना है। जीत और हार वहां भिन्न नहीं है। वहां वही जीतता है जो हारता है।
इसलिये इन दोनों बातों में कहीं कोई विरोध नहीं है। दोनों बातें एक साथ साधना, समझो फर्क। अगर दो में से एक साधे तो चूक जाओगे। अगर तुमने कहा कि ठीक है, सम्राट होकर जायेंगे और अकड़कर गये, अहंकार से भर गये तो उसके प्रसाद को न पा सकोगे। तुम्हारे भीतर जगह ही न होगी प्रसाद लेने की। तुम्हारे द्वार ही बंद होंगे। परमात्मा द्वार से प्रवेश भी करना चाहेगा तो न कर पायेगा। स्थान न होगा, तुम्हारे भीतर आकाश न होगा। अहंकार हो तो कहां आकाश! जगह कहां? प्रवेश का उपाय कहां? परमात्मा चाहेगा तो भी तुम्हारे भीतर आ न सकेगा। सम्राट से तुम यह मतलब मत लेना कि बड़े अकड़कर जाना, बैंड-बाजे के साथ जाना, हाथी घोड़ों पर सवार होकर जाना, दुंदुभी बजाते हुये जाना, नगाड़े पीटते हुये जाना। सम्राट होने का यह मतलब नहीं है।
सम्राट होने का इतना ही अर्थ है, वहां वासनायें लेकर मत जाना। निर्वासना से भरे हुये जाना और साथ ही भिखारी भी रहना। मैं समझाता हूं कि तुम्हें विरोधाभास क्यों दिखता है। क्योंकि सम्राट और भिखारी का शब्दकोश में विपरीत अर्थ है। लेकिन परमात्मा के सामने सब शब्दकोश व्यर्थ हो जाते हैं। वहां तर्क की सामान्य व्यवस्थायें नहीं चलतीं और शब्दों की सामान्य परिभाषायें काम में नहीं आती। वहां नये अर्थ, नयी अभिव्यंजनाओं को पकड़ना होता है। वहां शब्दों के पार उठना होता है। तो तुम भिखारी की तरह जाना, खाली, रिक्तपात्र, भिक्षापात्र। कि वह भरना चाहे तो तुम्हारे भीतर जरा भी अड़चन न हो। पूरा का पूरा भरना चाहे तो तुम पूरे के पूरे भरने को राजी हो। ऐसे जाना जैसे खाई-खड्डा होता है। ऐसे नहीं जैसे पहाड़ होता है। वर्षा तो होती है, पहाड़ पर भी होती है, खाई-खड्ड में भी होती है। पहाड़ वंचित रह जाता है। वर्षा तो होती है लेकिन पहाड़ भरता नहीं। खाई-खड्ड भरते है। क्योंकि खाली थे इसलिये भरते हैं। जो खाली है वह भरेगा।
तो जो खाली जायेगा वही परमात्मा से जुड़ेगा। भिखारी की तरह जाना और सम्राट की तरह भी। इन दोनों बातों की अर्थवत्ता को खूब ख्याल में ले लेना और ये दोनों बातें एक साथ सध जायें तो तुम्हारे जीवन का परम धन्यता का क्षण आ गया। न तो अहंकार हो और न वासना हो। ध्यान में झलक मिलती है तो जीवन में क्रातिकारी अंतर पड़ने शुरु होते हैं। क्योंकि जीवन के आधार बदल जाते हैं। अब तक तो पता ही न था कि ये झरोखे भी हैं। ऐसी हवायें भी बहती है। ऐसी रोशनी भी उतरती है, ऐसे दीये भी जलते हैं। अब तक तो पता नहीं था, ऐसा संगीत भी है।
जब तक पता नहीं था तब तक एक बात थी, जिंदगी का एक ढंग, एक दौर था, एक शैली थी। जब किसी नये अनुभव का पता चलता है तो जिंदगी की शैली को फिर से व्यवस्थित करना होता है। सब अस्त-व्यस्त हो जाता है। जीवन के भवन को फिर से रखना पड़ता है, फिर से निर्माण करना होता है। इस नये को जगह देनी होती है। तो ध्यान की झलकें जीवन में निश्चित ही अस्तव्यस्तता लाती है। कल तक जो सार्थक मालूम होता था, अब सार्थक नहीं मालूम होता और कल तक जिसके सम्बन्ध में सपना भी नहीं देखा था, वही आज प्राणों को पकड़ लेता है। उसी की पुकार, उसी की प्यास उठने लगती है।
जिसका हमें अनुभव नहीं हुआ है, उसकी आरजू भी नहीं होती। जिसने कभी मिठाई नहीं चखी उसे मिठाई की आकांक्षा भी नहीं होती और जो कभी महलो में नहीं सोया है और महल नहीं देखे है, उसे महलों का सवाल भी नहीं उठता। जो अनुभव में आ जाता है, उसकी आकांक्षा जगती है। और ध्यान अपूर्व अनुभव है। उसकी एक किरण भी ऐसी सम्पदा है कि इस सारी जगत की सम्पदायें फीकी पड़ जाती है। लेकिन सम्हलकर, बहुत होश सम्हालकर चलना। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी वासना ध्यान पर इतने जोर से पकड़ जाये कि ध्यान को नष्ट कर दे। इस नियम को ख्याल में लेना ध्यान फलता तभी है जब वासना नहीं होती। ध्यान की वासना भी ध्यान में बाधा बन जाती है।
इसलिये यहां रोज का अनुभव है। यहां जो लोग आते हैं, नये-नये आते है, ध्यान में उतरते हैं, तो पहली बार अनुभव बड़ी आसानी से हो जाता है। बस फिर अड़चन शुरु होती है। पहली झलक तो मिल जाती है। क्योंकि पहली झलक के पहले तो कोई वासना नहीं होती। प्रयोगात्मक होता है कि देखे क्या होगा। करके देखें क्या होगा। उतरें ध्यान में, नाचें, गायें, कीर्तन करें, नामस्मरण करें, कि शांत बैठें, कि मौन में उतरें। देखें क्या होता है। कुछ अनुभव तो नहीं है, इसलिये वासना नहीं होती। तो पहला अनुभव सुगमता से हो जाता है और दूसरे अनुभव में बड़ी झंझट होती है। क्योंकि पहले अनुभव के बाद वासना जग जाती है। फिर वासना कहती है, अब बार-बार हो। अब ऐसा ही फिर हो, अब ऐसा रोज-रोज हो। जब ध्यान को बैठूं तभी हो। और इतना ही न हो, और आगे, और आगे हो। बस वासना का जाल फैला।
वही वासना जो बाजार में भटकाती थी, वही ध्यान में भी भटका देगी। वही वासना जो धन के पीछे भटकाती थी, वही ध्यान के पीछे दौड़ा देगी। वासना का रूप क्या है, रंग क्या है? वासना का रूप और रंग है- और ! जो हुआ है यह और हो, फिर-फिर हो, ज्यादा हो। सौ रूपये हैं तो हजार हो जाएं। हजार हैं तो लख हो जाएं। इतनी प्रतिष्ठा है तो उतनी हो जाएं। इतनी ध्यान की झलक मिली तो अब और होनी चाहिये। अब इतने से चित्त राजी नहीं होता। अब तो परमात्मा मिलना चाहिए। नहीं मिलेगा तो हम जीवन ही गंवा देने को राजी हैं। तब तुम विक्षिप्त हुए, तब ध्यान के करीब आते-आते चूक गये।
और अक्सर ऐसा हो जाता है कि पहले अनुभव इतना कठिन हो जाता है। यह रोज का अवलोकन है। और जिसको अनुभव एक दफे हुआ है उसकी बेचैनी भी मै समझता हुं। क्योंकि वह कहता है, अब क्यों नहीं होता है? और मैं उसे लाख समझाता हूं कि अब इसीलिए नहीं होता है कि अब तु मांग कर रहा है, और पहली दफे जब दुबारा अनुभव आता है। दुबारा अनुभव तभी आता है, जब पहला अनुभव भूल चुका होता है। दुबारा अनुभव तभी आता है, जब पहले अनुभव की सतत आकांक्षा कर-करके आदमी थक जाता है और सोचता है जाने भी दो !
सोचने लगता है शायद कल्पना ही रही होगी। क्योंकि अब क्यों नहीं होता है? शायद किसी सम्मोहन में आ गया था। शायद परिस्थिति, वातावरण ऐसा था। और लोग नाचते थे, मग्न होते थे मैं भी उनकी रौ में बह गया। मैं भी उस धारा में बह गया था। अब नहीं होता है। वह सच बात नही थी, जो हुई थी। तब उसकी आकांक्षा फिर गिर गयी। और अगर आकांक्षा गिर जाने के बाद प्रयास जारी रहा तो फिर से होगा। दुबारा हो जाने के बाद तीसरी बार आसान होता है। क्योंकि तब तुम्हें यह भी समझ आ जाता है कि मेरी आकांक्षा बाधा बनती है।
इसलिए आकांक्षा न करूं। ध्यान तो करूं, आकांक्षा न करूं। ध्यान तो करूं, मांग न करूं। ध्यान में तो जाऊं और प्रतीक्षा करूं, आकांक्षा नहीं। राह देखूं, मांग नहीं। दावेदार न बनूं । यह न कहूं कि आज होना ही चाहिए। अब तुम्हारी अड़चन वही हो रही है। तुम कहते हो, ध्यान में झलक मिली, तब से एक ही विचार रह-रहकर मन में उठता है कि प्रभु-मिलन न हो तो अब मैं जीना भी नहीं चाहता। अब तुमने प्रभु-मिलन को अपने अहंकार की यात्रा बना लिया। अब प्रभु-मिलन जो है, वह वैसे ही तुम्हारे अहंकार को पुष्ट करने वाली बात बन रही है, जैसे कोई कहता है, जब तक मैं प्रधानमंत्री न हो जाऊं, मैं जीऊं ही ना, कि मैं राष्ट्रपति न हो जाऊं, तो मेरे जीने में कोई सार नहीं। मैं तो पूरी दुनिया को जीतूंगा तो ही जीयूंगा। मैं तो यह मकान खरीद लूगा तो जीऊंगा। नहीं तो जीने में क्या रखा है? तुमने जीने पर शर्त लगा दी।
जीने पर जिसने शर्त लगायी वही अधार्मिक है। और जो जीवन पर बिना शर्त जीता है, वही धार्मिक है। जो कहता है, जीवन उसकी भेंट है, मेरे हाथ मे क्या है? डोरा उसके हाथ! हम तो कागज की पुतलियां है। डोरा उसके हाथ है। तुम ऐसा कहो ही क्यों, कि मै जीऊंगा नहीं? यह तो फिर मैं की ही घोषणा हुई। यह तो तुम शिकायत करने लगे। यह तो अहंकार ने फिर नयी उद्घोषणा की। और ध्यान रखना, अहंकार बहुत चालाक है, बहुत सुक्ष्म है। नये-नये रास्ता खोज लेता है, अपनी घोषणा के। एक रास्ता तुम बंद करते हो, वह दूसरा रास्ता खोज लेता है। अब उसने एक नया लक्ष्य बनाया कि परमात्मा को पाकर रहूंगा मैं। मैं जैसा विशिष्ट आदमी जिसको ध्यान की झलकें भी मिली हैं, परमात्मा को नहीं पायेगा तो कौन पायेगा? और मजा यह है कि यह बात अच्छी भी लगेगी। और तुम इसे किसी से कहोगे तो वह भी कहेगा कि बड़ी धार्मिक बात पैदा हुई है। लेकिन मैं तुम्हें सावधान करूं, मैं का कोई दावा धार्मिक नहीं होता। फिर वह ध्यान का ही दावा क्यों न हो, समाधि का ही दावा क्यों न हो! इसलिए तो उपनिषद कहते हैं कि जो कहे, मैं नहीं जानता हूं, उसके पास बैठना। शायद उसे पता हो। क्योंकि जहां दावा है वहां अहंकार पीछे खड़ा मजा ले रहा है।
तुम कहो कि परमात्मा जैसे रखेगा, जिस हाल में रखेगा, वैसे ही रहूंगा मैं कौन हूं जो निर्णय करे? मैं कौन हूं जो कहे, ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए। जब मेरी पात्रता होगी, वह उतरेगा। और जब तक मेरी पात्रता नहीं है तब तक मेरे चीखने-चिल्लाने से कुछ भी न होगा। इतनी बात सदा ख्याल रखो, इसी का नाम श्रद्धा है- कि जब मैं पात्र होऊंगा, तो क्षण भर भी चूक नहीं होगी। श्रद्धा का और क्या अर्थ है? श्रद्धा का इतना ही अर्थ है कि जीवन सदा ही न्यायसंगत है। जो जिस चीज को पाने के योग्य होता है, वह उसे मिलती ही है। नहीं मिलती तो उसका एक ही अर्थ होता है कि अभी मेरी पात्रता नहीं। पात्रता होते ही मिलती है, तत्क्षण मिलती है। श्रद्धा का यही अर्थ है कि मुझे जीवन पर भरोसा है। कि जब मौसम आ जायेगा तो बीज टूटेगा, अंकुरित होगा। जब वसंत आयेगा तो फूल खिलेंगे, हवाएं सुवासित होंगी। जब रात बीत जायेगी तो सूरज निकलेगा। जो जब होना है तब होगा। और तभी होना चाहिये। हर चीज कच्ची घट जाए तो महंगी पड़ती है।
जैसे कोई पांच वर्ष का बच्चा यौन-दृष्टि से जवान हो जाए तो अड़चन में पड़ जायेगा। जैसे कोई नब्बे साल का बूढ़ा कामवासना की दृष्टि से जवान रह जाए, तो अड़चन में पड़ जायेगा। सब चीजें अपने समय पर। सब चीजें अपने मौसम में, अपनी ऋतु में। ऋतु का यह भरोसा ही धर्म का भरोसा है। जगत एक अर्पूव नियम से चल रहा है। वहां अन्याय नहीं है। तुमने कहावत सुनी न! कहते हैं देर हो, अंधेर नहीं है। देर भी नहीं है। हम देर लगाते हैं क्योंकि हमें बड़ी जल्दी पड़ी है। देर भी नहीं हैं छोटे-छोटे बच्चे आम की गुही को जमीन में गाड़ आते हैं। सांझ गाड़ देते है, सुबह उखाड़र देखते हैं कि अभी तक आम नहीं हुआ? अब तक वृक्ष पैदा नहीं हुआ? अब तक फल नहीं लगे? कहीं पत्ते भी नहीं दिखाई पड़ते, हो क्या रहा है? जमीन में गड़ी गुही को फिर निकालकर देख लेते हैं, अभी तक कुछ नहीं हुआ फिर गाड़ देते हैं। ऐसा अगर रोज-रोज उखाड़कर देखा तो वृक्ष कभी पैदा नहीं होगा। वृक्ष को पैदा होने का मौका ही नहीं मिलेगा।
जरूरत है, भरोसा करो। बीज को जमीन में डाल दिया है, अब प्रतीक्षा करो। ठीक समय पर, ठीक मुहर्त में अचानक एक दिन जमीन को तोड़कर अंकुर आ जायेगा। तुम पानी दो, प्रतीक्षा करो। ऐसे आग्रह मत करो कि मैं अब जीना भी नहीं चाहता हूं। कहते हो, मेरा प्रभु से मिलन करवा दें या जीवन से छुटकारा। मैं से छुटकारा करवाता हूं। जीवन से तो छुटकारा कभी होता ही नहीं। यहां रहोगे या कहीं और रहोगे, रहोगे जरूर। मृत्यु तो एक झूठी बात है, एक भ्रम है। मृत्यु न कभी घटी है और न कभी घटती है। मृत्यु घट ही नहीं सकती। जिसको तुम मृत्यु कहते हो वह बहुत से बहुत रूप का परिवर्तन है, देह का बदल लेना है। जैसे कोई आदमी घर बदल लेता है, एक पड़ोस से घर बदल लिया दूसरे पड़ोस में चले गये। इस पडोस के लोग सोचते हैं, शायद सज्जन मर गये हैं, वे कहीं मरते-धरते नहीं, वे किसी दूसरी जगह रहने लगे। यात्रा चलती जाती है, देहें बदलती हैं, वस्त्र बदलते हैं।
इसलिए कृष्ण ने कहा है, जैसे जीर्ण वस्त्र बदल जाते हैं, बस ऐसे ही अर्जुन, मूत्यु नहीं है, जीर्ण वस्त्र का गिर जाना है। और नये वस्त्रों की शुरूआत है। इधर मरे नहीं कि उधर जन्मे नहीं । तुम जब तक मरघट ले जाते हो किसी को, तब तक तो वह पैदा भी हो चुका। तुम्हें जितनी देर मरघट पहुंचने में लगती है और हो सकता है जब तक मुर्दे को जलने का मौका आये, तब जिन सज्जन को तुम विदा करने गये हो, पुनः जीवित हो उठे। उन्होंने कोई गर्भ धारण कर लिया। उन्होंने फिर सांसें लेनी शुरू कर दी। उन्होंने नये घर में वास कर लिया है। वे किसी और के पड़ोस में बस गये, किसी और रंग में, किसी और ढंग में ।
जीवन का कोई अंत नहीं है। यही थोड़े जीवन है, जो तुम आज जी रहे हो ! कल जो तुम जीते थे वह भी जीवन था। जन्म के पहले तुम जीते थे वह भी जीवन था। मुत्यु के बाद तुम जीओगे वह भी जीवन होगा। और ध्यान रखना, जो मुक्त हो गये हैं, जिनको हम जीवन मुक्त कहते हैं, वे भी वस्तुतः जीवन से मुक्त नहीं हो गये हैं, इस तथाकथित जीवन से मुक्त हो गये हैं । बुद्ध अब भी हैं, महावीर अब भी हैं। अब रूप में नहीं हैं, अब रंग में नहीं हैं, अब आकार में नहीं हैं, अब निराकार में हैं । अब विश्व सत्ता के साथ एक हो गये हैं। अब उन्होंने अपना भेद छोड़ दिया है। मिट्टी का घड़ा गल गया है और जल जल से मिल गया है।
तुम जीवन हो छुटकारा कैसे होगा? सिर्फ एक छुटकारा हो सकता है- ख्याल रखना, इसे बहुत ख्याल में ले लेना, सिर्फ उसी से छुटकारा हो सकता है जो तुम वस्तुतः नहीं हो। झूठ से छुटकारा हो सकता है, सत्य से कोई छुटकारा नहीं हो सकता। इसीलिए तो उसे सत्य कहते हैं जिससे छुटकारा न हो सके, जो शाश्वत हो। उसे झूठ कहते हैं जो क्षणभंगुर हो। अभी हैं, अभी नहीं हो जाए। जिससे छुटकारा हो सकता हो, वही झूठ है। इस जगत में दो झूठ है और दोनों जुडें हैं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उन्हें तुम समझ लो। इस जगत के दो झूठ हैं बड़े। एक झूठ है अहंकार- कि मैं हूं और दूसरा झूठ है मूत्यु और दोनों संयुक्त हैं। इस मैं के कारण ही मृत्यु का भाव पैदा होता है। यह मैं झूठ है इसलिए एक दिन इसे मरना पड़ता है। इसलिए मैं घबड़ाया रहता है कि मर न जाऊं। मै सदा कंपा रहता है कि मृत्यु आती है। आती ही होगी। मैं को कभी भरोसा नहीं आता कि मैं जीवित हूं। मैं इतना बड़ा झूठ है! मैं का अर्थ होता है, मै इस विराट अस्तित्व से अलग-थलग हूं। एक क्षण को भी अलग- थलग नहीं हो। सांस ले रहे हो और देखते नहीं कि अस्तित्व तुम्हारे भीतर जाता है, बाहर जाता है। एक क्षण को अलग होकर देखो और तुम पाओगे कितनी चिंता पैदा हो जाती है।
एक युवक मेरे पास आया, उसने पूछा कि मुझे बड़ी चिंता रहती है। मैं क्या करूं? मैंने उससे कहा कि पहले तू यह सोच, कि तू क्या करता है जिसके कारण चिंता रहती है। कुछ कर रहा होगा। क्योंकि वृक्षों को कोई चिंता नहीं है, पौधों को कोई चिंता नहीं है, पक्षियों को कोई चिंता नहीं हैं, तुझे चिंता है? तू एक छोटा-सा काम कर। मैंने उससे कहा कि तू सांस को, भीतर है उसको भीतर ही रोक ले। उसने कहा फिर क्या होगा? मैंने कहा, फिर तू आंख बंद करके भीतर देख कि भीतर क्या होता है।
मिनट भी बीतना मुश्किल हो गया। उसने एकदम आंख खोल दी- उसने कहा कि बहुत घबड़ाहट होती है। सांस को रोकोगे तो घबड़ाहट तो होगी ही। तो मैंने कहा अब तु सांस को बाहर रोक ले। भीतर देख लिया, घबड़ाहट होती है, अब बाहर रोक दे। उसने कहा, उससे क्या होगा? तू भीतर आंख बंद करके देख। उसने सांस को बाहर रोक दिया, मिनट भी मुश्किल से हो गया, पसीना-पसीना हो गया। आंख खोल दी और कहा कि आप मार डालेंगे। बड़ी घबड़ाहट पैदा होती है।
तो मैने कहा तूने देखा, चिंता पैदा करने का उपाय क्या है? अस्तित्व से अपने को तोड़ ले और चिंता पैदा हो जाती है। तूने सांस भीतर रख ली टूट गया, बाहर रख दी टूट गया। दोनों के बीच का सेतू टूट गया। चिंता पैदा हो गयी अब तू अपनी चिंताओं को गोर से देख। जहां-जहां तूने अस्तित्व से अपने को तोड़ लिया होगा, वहीं-वहीं चिंता पैदा होती है। इसलिए तो हम धार्मिक व्यक्ति को निश्चिन्त हो पाते हैं। अगर न पाओ निश्चित तो वह धार्मिक नही है।
अब मलूक को चिंता नहीं हो सकती। क्या चिंता? सबके दाता राम! डोरा उसके हाथ अब क्या चिंता है? सब भांति अपने को जोड़ दिया। जिये तो जियेंगे, मारे तो मरेंगे। चले तो चलेगें, बिठाये तो बैठेगें। अपने को बीच से हटा ही लिया। अब तुम इसे एक और तरह से भी देखो। हर बच्चे के जीवन में एक वक्त आता है। कोई तीन-चार साल, पांच साल की उम्र में, जब बच्चा अचानक आज्ञा का खंडन करना शुरू करता है। और हर बात में नहीं कहने लगता है। तुमने ख्याल किया, हर बच्चे की जिंदगी में वह घड़ी आती है। जब वह हां कहना कम कर देता है और ना कहना ज्यादा कर देता है। ना कहने से रस लेने लगता है। तुम कहो यह काम मत करना तो वह जरूर करेगा। तुम कहो कि उधर मत जाना तो वह जरूर जायेगा। यही तो ईसाइयों की मूल कथा है आदमी के पतन की। कि ईश्वर ने कहा था ज्ञान के वृक्ष के फल को मत खाना अदम, और अदम ने खाया। यह घटना हर एक के जीवन मे घटती है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह बच्चे के अहंकार की शुरूआत है। जिस दिन बच्चा कहता है नहीं उस दिन बच्चे का अहंकार जन्मा। यह थोड़ा सोचने जैसा मामला है। अहंकार नहीं के साथ जन्मता है। अहंकार का स्वर नकार का है। इसलिए जितना अहंकारी आदमी हो, उतना नास्तिक होता है वह आखिरी नकार है- कि ईश्वर नहीं है उससे बड़ा कोई नकार नहीं है। इसलिए जो बहुत अहंकारी होता है वह उतना ही नास्तिक हो जाता है।
अगर अहंकारी नहीं के साथ पैदा होता है तो फिर अहंकार के विसर्जन का उपाय क्या है? हां का जन्म-वही आस्तिकता है। आस्तिक का अर्थ यह है, वह कहता है, जैसी मर्जी। प्रभु जैसा रखें रहेंगे। हर हाल में हां कहेंगे। नहीं निकलेगा ही नहीं। यह जो हां का जन्म है, यही आस्तिकता है। इसका परम रूप है कि ईश्वर है। ईश्वर ही है, उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। मैं नही हूं ईश्वर है, यह आस्तिकता, मै हूं ईश्वर नहीं हैं यह नास्तिकता।
नास्तिक अति चिंतित हो जाता है। इसलिए जो देश नास्तिक होता है उतने ही मानसिक रोगों से ग्रस्त होता है। जो देश जितना आस्तिक होता है, उतने ही मानसिक रोगो से मुक्त होता है और कभी-कभी ऐसा हो जिनको बहुत मानसिक रोग होने चाहिए -भूखे हैं, बीमार हैं, दीन हैं वे मानसिक रूप से बीमार नहीं दिखाई पड़ते। मानसिक रूप से स्वस्थ मालूम होते हैं। और जिनके पास धन है, पद है, प्रतिष्ठा है, सब साधन हैं, सुविधायें हैं, वे एकदम मानसिक रूप से रुग्ण मालूम पड़ते हैं, मामला क्या है? असल में धन, पद, प्रतिष्ठा पाने वाला आदमी अहंकारी होता है। अहंकारी होता है तभी धन, पद, प्रतिष्ठा की दौड़ में दौड़ता है। फिर अहंकार की छायाएं है मानसिक रोग।
मैं को इस विराट के समक्ष खड़ा करना, चिंता लेना है। जीवन तो तुम्हारा उसके साथ है, उसमें है। उसकी सांस तुममें आती-जाती है। वही तुममें प्राणों को डालता है। वहीं फूंकता है, तुम उसकी ही भाव-भंगिमा हो। उसका ही एक ढंग हो।
परम पूज्य सद्गुरुदेव
कैलाश श्रीमाली जी
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