





धन की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी हैं, जिनकी कृपा से जीवन में धन की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता होती है अर्थात् श्री ही इस युग में सर्व पूज्य हैं। श्री से युक्त व्यक्ति पूर्ण माना जाता है। धनाढ्य व्यक्तियों को अपने आप में ज्ञानी, शिक्षित, सम्मानित माना जाता है। भले ही उनके पास जीवन का सामान्य सा भी ज्ञान ना हो।
भगवती महालक्ष्मी प्रत्येक व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन की आराध्या हैं, वे सांसारिक जीवन की आधार शक्ति हैं, जो धन, यौवन, प्रभुता, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य, स्वास्थ्य व मनोकामना प्रदाता है। यदि शुद्ध सात्विक मनोभाव और सुक्रियाओं से लक्ष्मी के सम्पूर्ण स्वरूप की साधना चैतन्य रूप में सम्पन्न की जाये, तो निश्चिन्त रूप से उक्त सुस्थितियां प्राप्त होती ही है।
भगवती लक्ष्मी सांसारिक जीवन में साधकों को पालन शक्ति की चेतना व क्रियाभाव प्रदान करती हैं। जिससे साधक अपने जीवन को सही स्वरूप में निर्मित करने की ऊर्जा से युक्त होता है और यही सांसारिक जीवन की अहम क्रिया भी है कि व्यक्ति अपने जीवन को सर्व स्वरूपों में श्रेष्ठता से युक्त कर सके। भगवती लक्ष्मी को सृजन शक्ति की अधिष्ठात्री अर्थात् नवनिर्माण व वृद्धि का भाव और चेतना महालक्ष्मी शक्ति से ही प्राप्त होती है। भगवती लक्ष्मी की साधना से कर्म भाव के प्रति निष्ठा जाग्रत होती है और यही कर्म भाव हमें सुफल की ओर क्रियाशील करता है। साथ ही इन्हें विष्णुप्रिया भी कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है कि भगवती लक्ष्मी-नारायण की ही भांति साधक जीवन में भरण-पोषण व सर्व सुस्थितियों का निर्माण करने में सहायक है। महालक्ष्मी साधना साधक के जीवन से दरिद्रता, कायरता, कटुता और हीनता समाप्त करने की प्रक्रिया है। इस साधना से व्यक्ति का अभावहीन, धनहीन व दरिद्र बना रहना संभव ही नहीं है, जिस प्रकार पदमगंध छुपाये नहीं छुपता और आस-पास का समस्त वातावरण अपनी मधुर सुगंध, श्रेष्ठता और दिव्यता से भर देता है, उसी प्रकार महालक्ष्मी साधक के जीवन को श्रेष्ठमय सुस्थितियों से युक्त सभी प्रकार से सम्पन्न व समृद्धि बनाती है। इस साधना का एक स्वरूप सौभाग्य जागरण का भी है, जिसके माध्यम से दुर्भाग्य व दरिद्रता को समाप्त कर साधक सर्व सम्पन्न बनाना है।
प्रत्येक वर्ग के लोगों ने धन की पूर्णता को स्वीकार किया है। हमने अक्सर श्री का बहिष्कार करने वालों को पीडि़त, अपेक्षित और दयनीय स्थिति में देखा है, जिनके पास धन ना हो समाज तो उनका बहिष्कार करता ही है, परिवार, पुत्र-पुत्री, बंधु-बांधव किसी का भी सहयोग उसे प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है। आज व्यक्ति की महत्ता उसके शिक्षा, ज्ञान, विचार से अधिक उसके धनी होने पर होती है। सभी व्यक्ति धनाढ्य व्यक्ति का ही सम्मान करते हैं। वर्तमान में सम्मान, स्नेह का अधिकारी उसी को माना जाता है, जो धनाढ्य है, अर्थात् यदि आप निर्धन, धनहीन हैं, तो आपकी उपयोगिता और आपको सम्मान उसी के अनुसार मिलेगा। सुलझे से सुलझे व्यक्तियों को भी हमने धनवान और धनहीन के बीच भेद करते हुये देखा है।
तात्पर्य कहने का केवल इतना ही है कि वर्तमान युग की क्रिया-कलापों को ध्यान में रखकर हमें धन की महत्ता व उपयोगिता को समझना होगा और उससे अधिक उसकी महत्ता को स्वीकार करते हुये, ऐसी क्रियात्मक चेतना को आत्मसात करना होगा, जिससे श्री की प्राप्ति हो सके और हम भी धन से पूर्ण हो सकें।
धन, सुख-समृद्धि, वैभव प्राप्ति का दिव्यतम अवसर दीपावली महापर्व है, यह अवसर जीवन में श्री की पूर्णता का सबसे चैतन्य, प्रभावी, पूर्ण फलदायी अवसर है, इसी विशेष दिवस पर प्रत्येक घर में, प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा श्री का, लक्ष्मी का आह्नान करने हेतु विभिन्न पूजा, अर्चना सम्पन्न की जाती है।
परन्तु वर्तमान में औपचारिकता का वातावरण अधिक है, मूल तत्व को आत्मसात करने की क्रियायें नाम मात्र ही की जाती है। जबकि यह अवसर श्री से पूर्ण होने का अवसर है, लक्ष्मी को आबद्ध रूप स्थायित्व प्रदान करने का अवसर है। जिससे लक्ष्मी का वास आपके जीवन में स्थायी रूप से बना रहे, धन की उपलब्धता बनी रहे। अनेक व्यक्ति परेशान रहते हैं कि धन आने से पहले ही उसके जाने का मार्ग बन जाता है, घर में पैसा रूकता ही नही। कारण इसका यही है कि हमने महालक्ष्मी को मूल रूप से आत्मसात करने की क्रिया सम्पन्न नही की।
औपचारिक क्रियाओं से केवल और केवल बाहरी आवरण को प्रदर्शित किया जा सकता है। आवश्यकता है कि हम मूल तत्व को, मूल क्रियाओं को सम्पन्न करें और सहस्त्र लक्ष्मी की पूर्णता से युक्त हों।
जिस तरह से शुद्ध जल को जिस पात्र में भी डालते हैं, वह उसी के अनुसार रूप ग्रहण कर लेता है। पौधा में वह रस प्रदान स्वरूप में, सांसारिक मनुष्यों में रक्त और साधक व ज्ञानियों में चेतना स्वरूप धारण कर लेता है। ठीक उसी तरह से अपने संस्कार व गोत्र अनुसार चैतन्य साधना को ऐसे श्रेष्ठ महोत्सव पर क्रियान्वित करने से जीवन में कर्मफल का भाव सुस्थितियों के स्वरूप में प्राप्त होता ही है।
साधक-साधिका ध्यान, चिंतन के माध्यम से इन सभी भावों को पूर्णता से आत्मसात कर सकें और अपने जीवन को लक्ष्मी के सहस्त्र रूपों की चेतनामय ज्योति से प्रकाशित करने में सफल हों क्योंकि अष्ट सिद्धि-नव निधि युक्त जीवन प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ महापर्व दीपावली ही है।
इन विशिष्ट पूजन मुहुर्त में अपनी सुविधा
अनुसार किसी भी एक मुहुर्त काल में पूजन सम्पन्न करें।
मुहुर्त अनुसार दीपावली दिवस पर स्नानादि कर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख कर पूजा स्थान में आसन पर बैठ जायें। सामने लाल या श्वेत वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर स्टील की थाली रख कर उस पर कुंकुम से अष्ट दल निर्मित करें। अष्टदल के मध्य भाग पर गणपति कुबेर लक्ष्मी चित्र स्थापित कर दें।
इसके बाद पूजन प्रारम्भ करें। पवित्रीकरणः दायें हाथ में जल लेकर मंत्रेच्चारण के साथ स्वयं पर छड़कें-
ऊँ अपवित्रः पवित्रे वा सर्वाऽवस्थां गतोऽपि वा
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं सः बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।
आचमनः निम्न मंत्र बोलते हुये तीन बार आचमन करें-
ऊँ केशवाय नमः। ऊँ नारायणाय नमः। ऊँ माधवाय नमः।
फिर हाथ धो लीजिये।
संकल्पः दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें-
ऊँ विष्णवे नमः। ऊँ विष्णवे नमः। ऊँ विष्णवे
नमः। हरिः ऊँ तत्सत् अद्य एतस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे
अष्टाविंशति कलियुगे जम्बूदीपे भरतखण्डे पुण्यक्षेत्रे
मासानाम उत्तमे मासे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस्या
तिथौ सूर्यवासरे अमुक गोत्रः (अपना गोत्र बोलें) अमुक
शर्माऽहं (नाम बोलें) श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थ महालक्ष्मी
प्रीत्यर्थ सकल दुःख दारिद्रड्ढ नाश निमित्तं च महालक्ष्मी
पूजनं करिष्ये। (जल को भूमि पर छोड़ दें)
आसनः आसन के लिये एक पुष्प अर्पित करें-
श्री महालक्ष्म्यै नमः आसनं समर्पयामि नमः ।।
पाद्यं अर्घ्यं आचमनीयं स्नानं च समर्पयामि ।।
गणपति पूजनः सुपारी पर मौली बांध कर गणपति के रूप में किसी पात्र में स्थापित करें। निम्न ध्यान मंत्र बोलकर गणपति को पुष्प चढ़ायें-
गजाननं भूत गणाधि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणं ।
उमासुतं विनाशककारकं, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजं ।।
गुरु पूजनः अपने सामने गुरु चित्र स्थापित करें और लक्ष्मी पूजन दीपावली के शुभ अवसर पर उनके आशीर्वाद की कामना करें-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः ।
ऊँ मंगलमूर्ति निखिलेश्वराय नमः ।
पाद्यं, अर्घ्यं, स्नानं, धूपं, दीपं, पुष्पाणि,
नैवेद्यं निवेदयामि श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः।
कलश स्थापन- एक अलग बाजोट पर चावल से स्वस्तिक बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। कलश में शुद्ध जल भर दें, उसके बाद उसमें चन्दन अक्षत, सुपारी डालें, गंगा जल मिलायें।
कलश पर मौली बांधें और निम्न मंत्र का पाठ करें-
युवा सुवासा परिवीत आगात् स उश्रेयान, भवति जायमानः,
तं धीरासः कवयः उन्नयन्ति साध्यो मनसा देवयन्तः।
इसके बाद नारियल में मौली बांध लें और कुंकुम का तिलक करें, पांच आम या अशोक के पत्ते कलश में डालकर नारियल कलश पर स्थापित कर दें। इसके बाद दाहिने हाथ से कलश का स्पर्श करते हुये निम्न मंत्र का पाठ करें-
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः,
मूले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृ गणास्थिता ।
कुक्षौ तु सागरा सर्वे सप्त द्वीपा वसुन्धरा नमः।।
इसके बाद राज-राजेश्वरी लॅाकेट व लक्ष्मी रक्षा सूत्र पर कुंकुम का तिलक लगायें व लॅाकेट गले में धारण कर लें, पश्चात् रक्षा सूत्र दाहिने हाथ में बांधकर लक्ष्मी पूजन प्रारम्भ करें।
महालक्ष्मी पूजन विधन-
ध्यानः हाथ जोड़ कर महालक्ष्मी का ध्यान करें।
ऊँ अम्बेऽअम्बिके अम्बालिके न मा नयति कश्चन ।
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् ।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः ध्यानं समर्पयामि ।।
आह्वान दोनों हाथों में पुष्प लेकर भगवती का आह्वान करें।
महापप्र वनान्तस्थे कारणानन्दविग्रहे ।
सर्वभूतहिते मातरह्येहि परमेश्वरि ।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः आवाहनं समर्पयामि ।।
आसनः आसन के लिये एक पुष्प अर्पित करें।
श्री महालक्ष्म्यै नमः आसनं समर्पयामि नमः ।।
पाद्यः पाद्य के लिये दो आचमनी जल चढ़ायें।
श्री महालक्ष्म्यै नमः पाद्यं समर्पयामि ।।
अर्घ्यं आचमनीयं स्नानं च समर्पयामि ।।
धूपः धूप दिखायें।
श्री महालक्ष्म्यै नमः धूपं आघ्रापयामि ।।
दीपः दीप प्रज्ज्वलित करें।
श्री महालक्ष्म्यै नमः दीपं दर्शयामि ।।
नैवेद्यः प्रसाद चढ़ायें।
नाना विधानि भक्ष्याणि व्यञ्जनानि हरिप्रिये।
यथेष्टं भुघ्क्ष्व नैवेद्यं षड्रसं च चतुर्विधम् ।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः नैवेद्यं निवेदयामि ।।
ताम्बूः लौंग इलायची युक्त पान समर्पित करें।
श्री महालक्ष्म्यै नमः ताम्बूलं समर्पयामि ।।
दक्षिणाः दक्षिणा द्रव्य समर्पित करें।
श्री महालक्ष्म्यै नमः दक्षिणां समर्पयामि ।।
इसके बाद धनदा लक्ष्मी माला से पांच माला मंत्र जप सम्पन्न करें।
इसके बाद लक्ष्मी सूक्त का एक बार पाठ करें।
पद्मानने पद्म अरू पद्माक्षि पद्म सम्भवे ।
तन्मे भजसि पद्माक्षि, येन सौख्यं लभामहे ।।1।।
अश्वदायी गोदायी धनदायी महा धने ।
धनं मे जुषतां देवी सर्वकामांश्चदेहि मे ।।2।।
पुत्र-पौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादि गवे रथम् ।
प्रजानां भवती माता, आयुष्मन्तं करोतु में ।।3।।
धनमग्नि र्धनमवायुर्धनं सूर्योधनं वसुः ।
धनमिन्दी बृहस्पति वरूणं धनमश्विना ।।4।।
वेनतेय सोमं विप सोमं पिवतु दृत्रहा ।
सोमं धनस्थ सोमिनो मह्मं ददातु सोमिनः ।।5।।
न क्रोधीन च मात्सर्यं न लोभोनाशुभामतिः
भवन्तिकृत पुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत् ।।6।।
सरसिज निलये सरोज हस्ते,
धवलतरांशुक गन्ध माल्य शोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे,
त्रिभुवन भूतिकारी प्रसीदमह्मम्।।7।।
विष्णुपत्नीं क्षमां देवी माधवीं माधवप्रियाम् ।
विष्णोः प्रिय सखीं देवी नमाम्यच्युत वल्लभाम् ।।8।।
महालक्ष्मीं च विद्महे विष्णुपत्नीं च धीमहि
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ।।9।।
पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे,
पद्मप्रिये पद्मह्नदि सन्निधत्स्व ।।10।।
आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इव विश्रुताः ।
ऋषयः श्रिय पुत्रश्च श्री देवी देवता श्रिया ।।11।।
श्री वर्चस्वमायुष्य मारोग्य माविधात् पवमानं महीयते ।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्र लाभं शत संवत्सरं दीर्घमायुः ।।12।।
भय शोक मनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ।।13।।
लक्ष्मी आरती सम्पन्न कर तीन बार आचमनी से जल लेकर दीपक के चारों ओर घुमायें व निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
ऊँ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष (गूं) शान्तिः पृथिवी
शान्तिरापः शान्ति रोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः
शान्ति र्विश्वे देवाः शान्तिः ब्रह्म शान्तिः सर्व (गूं)
शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।
पुष्पांजलिः दोनों हाथों से पुष्प अर्पित करें-
नाना सुगन्ध पुष्पाणि यथा कालोद्भवानि च।
पुष्पांजलिर्मया दत्ता गृहाण जगदम्बिके।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः पुष्पांजलि समर्पयामि।।
समर्पणः इसके बाद समर्पण मंत्र का उच्चारण करें, जिससे भगवती लक्ष्मी युक्त फल आपको प्राप्त हो सके-
ऊँ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु, अनेन कृतेन पूजाराधन कर्मणा।
श्री महालक्ष्मी देवता परासंवित् स्वरूपिणी प्रीयन्ताम्।।
प्रणामाञ्जलिः दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें।
नमो दैव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्ः ।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः नमस्करोमि ।।
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