





बाहर की रोशनी से ही आदमी चलता रहता है। इंद्रियां जहां ले जायें, चल देता है। ऐसे पराश्रित काल में इन्द्रियों की कामना मनुष्य की कामना बन जाती है। वह पूर्ण रूपेण इन्द्रियों के मकड़ जाल में बंध जाता है, स्वयं का पता होता ही नहीं, मन ने, इन्द्रियों ने जो सुझाया वही आपका जीवन है। अपने स्वरूप का कोई बोध नहीं होता, जो लोग समझाते हैं, जो आपको किसी ने बताया वही आप सत्य समझते हैं और आदमी चल पड़ता है। उसे तो यह भी पता नहीं होता वह क्यों चल रहा है और चल रहा है तो इस चलने से क्या वह पा सकेगा जिसकी उसे तलाश है!
कुछ इस तरह का जीवन होता है, जैसे नदी में लकड़ी का टुकड़ा बहता है। जहां लहरें ले जाती हैं, चला जाता है। जहां धक्के हवा के पहुंचा देते हैं, वहीं पहुंच जाता है। अपना कोई व्यक्तित्व नहीं, जीवन मात्र एक भटकाव बनकर रह जाता है और ऐसी ही जीवन की स्थितियां संसार में करोड़ो-करोड़ो व्यतीत करते हैं।
निश्चित रूप से ऐसी भटकाव भरी जिन्दगी में कभी मंजिल नहीं आ सकती। मंजिल तो सुविचारित कदमों से पूरी करनी पड़ती है। भटकाव बहुत हो सकता है यात्रा नहीं हो सकती। यात्रा का तो अर्थ है कि तुम्हें पता हो तुम कौन हो, कहां हो! कहां जा रहे हो! क्यों जा रहे हो! होश पूर्वक ही यात्रा हो सकती है। होश पूर्वक ही तीर्थयात्रा हो सकती है। इसलिये ज्ञानियो ने होश को ही तीर्थ कहा है।
अमूर्च्छित चित्त, जागा हुआ चित्त बिलकुल दूसरे ही ढंग से जीता है। उसके जीवन की व्यवस्था भिन्न होती है। वह दूसरों के कारण नहीं चलता, वह अपने कारण चलता है। वह सुनता सबकी है। वह मानता भीतर की है। वह गुलाम नहीं होता। भीतर की मुक्ति को ही जीवन में उतारता है। कितनी ही अड़चन हो, लेकिन उस मार्ग पर ही यात्रा करता है जो मंजिल पर पहुंचायेगा और कितनी ही सुविधा हो, उस मार्ग पर नहीं जाता, जो कहीं नहीं पहुंचायेगा।
क्योंकि उस सुविधा का क्या अर्थ? मार्ग कितना ही सुन्दर हो, कण्टकाकीर्ण न हो, चोर-लुटेरे न हो, मार्ग पर सब सुरक्षा हो, सुविधा हो लेकिन अगर मार्ग कहीं पहुंचाता ही न हो तो उस मार्ग की सुविधा और सौन्दर्य का क्या करियेगा? मार्ग कण्टकाकीर्ण हो, राह लुटेरो से भरी हो, जंगली जानवरो का भय हो, लेकिन कहीं पहुंचाता हो, तो जाने योग्य है। अमूर्च्छित व्यक्ति का जीवन भटकाव नहीं, एक सुनियोजित यात्रा है और यह सुनियोजित यात्रा अमूर्च्छित व्यक्ति स्वयं ही निर्मित करता है, समाज उस नियोजन को नहीं देख सकता। समाज तो अंधों की भीड़ है। वह तो मूर्च्छित लोगों का समूह है। अगर तुमने समाज की सुनी, तो तुम अंधेरे में ही भटकते रहोगे। भीड़ बोधपूर्ण नहीं है। हो भी नहीं सकती। कभी-कभी कोई एकाध व्यक्ति अनेकों में बोध को उपलब्ध होता है। भीड़ बुद्धों की नहीं है, भीड़ में कोई एकाध ही बुद्ध होता है।
अमूर्च्छित व्यक्ति अपने भीतर अपने जीवन की विधि खोजता है। अपने होश में अपने आचरण को खोजता है। अपने अंतःकरण के प्रकाश से चलता है। कितना ही थोड़ा हो अंतः करण का प्रकाश सदा पर्याप्त है। इतना थोड़ा हो कि एक ही कदम दिखाई पड़ता हो, तो भी काफी है। क्योंकि दुनिया में कोई भी दो कदम तो एक साथ चलता नहीं। छोटे से छोटा दीया भी इतना तो दिखा ही देता है, कि एक कदम साफ हो जाए। एक कदम चल लो, फिर और एक कदम दिखाई पड़ जाता है। कदम-कदम करके हजारों मील की यात्रा पूरी हो जाती है।
अमूर्च्छित व्यक्ति विद्रोही होता है। अमूर्च्छित व्यक्ति का एक-एक क्षण, पल-पल एक ही बात को साधता है और वह बात यह है, कि कुछ भी मुझसे ऐसा न हो जाए, जो मूर्च्छा को बढ़ाए, मूर्च्छा को ग्रहण करे। ध्यान रखना, एक-एक बूंद पानी की गिरती है, चट्टाने टूट जाती हैं। एक-एक बूंद होश की गिरती है और तुम्हारी जन्मों-जन्मों की चट्टान हो मूर्च्छा की, निद्रा की टूट जाती है। लेकिन एक-एक बूंद गिरनी चाहिये। तो प्रतिपल अमूर्च्छित व्यक्ति की चेष्टा यही होती है, कि हर क्षण का उपयोग एक ही सम्पदा को पाने में कर लिया जाये। वह यह कि मेरे भीतर का विवेक प्रगाढ़ हो, जागे।
मूर्च्छित चित्त की तीन अवस्थाएं हैं, एक जिसे हम जाग्रत कहते हैं, जो कि शब्द उचित नहीं है। क्योंकि मूर्च्छित व्यक्ति जागेगा कैसे? उसका जागरण नाममात्र का जागरण है। कहने भर का जागरण है। सुबह सूरज उगता है, पशु-पक्षी जाग जाते हैं, पौधे जाग जाते हैं, तुम भी जाग जाते हो। क्या पशु, पक्षी जाग्रत हैं, क्या पौधे जाग्रत हैं? तुम भी नहीं हो। सिर्फ शरीर का विश्राम पूरा हो गया, इसलिये तुम उठते हो, चलते हो, बैठते हो। ऐसा लगता है, जैसे जागे हो। लेकिन यह सिर्फ लगना मात्र है। इसका वास्तविक जागरण से कोई दूर का भी सम्बन्ध मुश्किल से बनता है।
एक ग्रामीण को उसके परिचित ने एक मुर्गी भेंट दी। जो आदमी मुर्गी लेकर आया था, उसका ग्रामीण ने काफी स्वागत किया। शोरबा बनवाया, उसे शोरबा पिलाया। वह आदमी बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने अपने गांव जाकर खबर कर दी, आदमी बहुत अच्छा है और अतिथि को तो बिल्कुल देवता मानता है। फिर तो गांव से लोगों का आना शुरु हो गया।
दूसरे ही दिन दूसरा आदमी मौजूद हो गया। ग्रामीण ने पूछा, आप कौन? उसने कहा, कि जिसने मुर्गी भेजी थी, उसका दूर का रिश्तेदार हूं। उसका भी ग्रामीण ने स्वागत किया। घर आया आदमी फिर कितने ही दूर का रिश्तेदार हो, रिश्तेदार ही है उस ग्रामीण का जिसने मुर्गी भेजी थी। लेकिन फिर बात सीमा के बाहर होने लगी। रिश्तेदारों के रिश्तेदार आने लगे। रिश्तेदारों के रिश्तेदारों के मित्र आने लगे। रिश्तेदारों के रिश्तेदारों के मित्रों के मित्र आने लगे। पत्नी बेचैन हो गई। उसने कहा, यह मुर्गी तो एक अपशगुन सिद्ध हुई। हम इसे इनकार ही कर देते। यह तो पूरा गांव चला आ रहा है। ग्रामीण ने बहुत सोचा। कुछ करना ही पड़ेगा और दूसरे दिन सुबह फिर एक आदमी खड़ा मिला। आप कौन हैं? उसने कहा, कि जिसने मुर्गी भेजी थी, उसके रिश्तेदारों के रिश्तोदारों के मित्रों का मित्र हूं। ग्रामीण ने कहा, आइए स्वागत है।
लेकिन वह आदमी बड़ा हैरान हुआ, जब भोजन उसे कराया गया तो सिर्फ कुनकुना पानी था शोरबे के नाम पर। उस आदमी ने कहा और सब तो ठीक है, लेकिन मैंने बड़ी चर्चा सुनी थी आपके आतिथ्य की और यह तो कुनकुना पानी है। ग्रामीण ने कहा, माफ करिए, कुनकुना पानी नहीं है। शोरबे का शोरबे का शोरबे का शोरबे का शोरबा है। आपकी जागृति बस शोरबे का शोरबे का शोरबे का शोरबा है। अगर बुद्ध की जागृति जागृति है तो आपकी जागृति रिश्तेदारों के रिश्तेदारों के मित्रों का मित्र है। बहुत लम्बा फासला है। बुद्ध को हमने जागृत कहा है। बुद्ध शब्द का अर्थ है- जो जाग गया, जो होश से भर गया। अगर बुद्ध मापदण्ड हो जागरण के, तो तुम्हारा जागरण क्या होगा? एक खोटा सिक्का, जो सिक्के जैसा लगता है, लेकिन सिक्का है नहीं। एक झूठ, जो सत्य का दावा करता है, लेकिन सत्य है नहीं। एक मुर्दा लाश, जो ठीक जीवित आदमी जैसी ही मालूम पड़ती है, नाक-नक्श बिलकुल जीवित आदमी जैसा, लेकिन भीतर कोई प्राण नहीं है। एक बुझा हुआ दीया, जिसमें सब है, दीया है, बाती है, तेल है लेकिन ज्योति नहीं।
मूर्च्छा के तीन रूप हैं, एक जिसे हमें जागृति कहते हैं, जो बिलकुल खोटी है। क्योंकि जागे हुए भी तुम जागे हुए नहीं होते। जागकर भी तुम जो करते हो, वह खबर देता है कि तुम सोये हुये हो। तुमने हजार दफे तय किया है, कि अब दोबारा क्रोध नहीं करेंगे और फिर एक आदमी अपमान कर देता है या तुम्हें लगता है अपमान कर दिया या किसी आदमी का भीड़ में तुम्हारे पैर पर पैर पड़ जाता है और एक क्षण भी नहीं लगता। एक क्षण की देरी भी नहीं होती और आग उबल उठती है और तुमने अनेक बार तय किया है कि अब क्रोध न करेंगे। हजार बार कसमें लीं हैं। हजार बार पछताए हो। वह सब कहां चला गया पछतावा? वह याददाश्त इतनी जल्दी कैसे खो जाती है? होश होता, तो साथ रहती। बेहोशी में याददाश्त साथ कैसे रह सकती है? क्षण में आग जल उठती है। फिर वही क्रोध खड़ा है। फिर तुम पछताओगे घड़ी भर के बाद लेकिन न तुम्हारे पछतावे का कोई मूल्य है और न तुम्हारे क्रोध का कोई मूल्य है। तुम्हारा पछतावा भी झूठा है। क्योंकि तुम कितनी बार पछता चुके हो।
एक आदमी मेरे पास आया और उसने कहा, जिन्दगी भर हो गई, उसकी उम्र कोई पैंसठ साल होगी- बस, एक ही चीज मुझे कष्ट दे रही है, मेरा क्रोध। इससे मेरा पूरा घर पीडि़त है। मेरे बच्चे, मेरी पत्नी, मेरा जीवन एक कलह की लम्बी कहानी है। मगर यह क्रोध मुझसे नहीं जाता और अभी भी है, मौत करीब आई जा रही है। लेकिन यह क्रोध मुझे आग की तरह कंपाता रहता है। और मैंने हजार बार पश्चाताप कर लिया। कसमें खा लीं मंदिरो में जा कर, साधुओं के चरणों में सिर रख कर, कि शायद उनकी कृपा का साथ मिल जाए। भगवान को साक्षी रखकर मंदिरों में कसम खा ली। वह भी काम नहीं आती। जब क्रोध पकड़ता है तो भगवान का सामर्थ्य भी काम में नहीं आता। उस वक्त मैं सब भूल ही जाता हूं। एक क्षण को मैं होता ही नहीं। कौन आ जाता है मेरे भीतर भूत-प्रेत जैसा और मैं क्या कर गुजरता हूं, इसका मुझे खुद ही समझ नहीं आता। पीछे लौट कर देखता हूं, तो मानने का मन नहीं होता, कि मैंने ऐसा किया होगा। क्या करुं? आप साक्षी हो जाएं। मुझे संकल्प करवाएं।
मैंने कहा, कि मैं वह भूल न करुंगा जो दूसरों ने तुम्हारे साथ की है। तुमसे मैं सिर्फ एक प्रार्थना करता हूं कि तुम पश्चात्ताप का त्याग कर दो। क्रोध तो चलने दो। इतना तो कर सकते हो कि अब क्रोध आएगा तो पश्चात्ताप न करेंगे। वह आदमी हंसने लगा। उसने कहा कि यह तो मैं कर ही सकता हूं। इसमें क्या अड़चन? उसे पता नहीं, कि जो क्रोध नहीं छोड़ सकता, उससे पश्चात्ताप कैसे छूटेगा। पर उसने कहा मैं पश्चात्ताप करना छोड़ दूंगा। मैंने कहा ठीक है तुम पश्चात्ताप छोड़कर एक महीने बाद आ जाना। उसी दिन क्रोध भी छुड़वा दूंगा। महीने भर बाद वह आदमी वापिस आया और उसने कहा कि आपने धोखा दिया। पश्चात्ताप भी नहीं छूटता। इसमें तो कोई अड़चन नहीं है। यह तो किसी शास्त्र ने तुमसे कहा नहीं, यह तो छोड़ ही सकते हो। पश्चात्ताप के तो विरोध में कोई भी नहीं है। क्रोध के विरोध में तो सारी दुनिया है। तुम पश्चात्ताप छोड़ दो। उसने कहा, नही। बात मेरी समझ में आ गई। आप क्या समझाना चाहते थे, वह मुझे दिख गया। मैं कुछ भी नहीं छोड़ सकता। मैं हूं ही नहीं।
जब तक तुम जागे नहीं हो, तुम हो ही नहीं। तुम्हारा होना सिर्फ एक भ्रांति है। सिर्फ एक ख्याल है। जिसकी कोई जड़े नहीं हैं। सिर्फ एक सपना है, जिसकी कोई सार्थकता नहीं, जिसमें कोई पदार्थ नहीं, जिसमें कोई बल नहीं। न तुम पश्चात्ताप छोड़ सकते हो, न तुम क्रोध छोड़ सकते हो। करते जरूर हो। वह भी कहना ठीक नहीं है, कि तुम करते हो। उचित होगा कहना कि वह भी होता है। तुम यंत्रवत हो, नहीं तो छोड़ देते। जिस काम को तुम करते हो, उसे तुम छोड़ सकते हो, यह नियम है। जिस काम को तुम करते ही नहीं, उसको तुम छोड़ोगे कैसे? जो होता है, उसको तुम कैसे छोड़ोगे? बटन दबाते हो, बिजली का बल्ब जल जाता है। क्या बिजली के बल्ब के हाथ में यह बात है, कि वह न जले या जब चाहे तब जले? या जब उसका भाव न हो, तो कह दे अभी विश्राम कर रहा हूं? नहीं बटन दबाती है तो बिजली का बल्ब जल जाता है। शायद बिजली का बल्ब भी अपने भीतर सोचता होगा कि मैं जलता हूं, मैं बुझता हूं। वह गलती में है। तुम भी बुझते नहीं, जलते नहीं।
एक आदमी ने गाली दी, बटन दबा दी। जल गए! एक आदमी आया, कहने लगा कैसे देव पुरुष हो आप! प्रसन्न हो गए, एक आदमी ने कहा, कैसी सुन्दर मूर्ति है और भीतर फूल खिल गए और एक आदमी ने कह दिया, कि जरा देखों भी तो अपना चेहरा दर्पण में, ऐसी बेहूदी शक्ल कहीं नहीं देखी कि आग लग गई, बटन है, तुम नहीं हो। बुद्ध के पास एक आदमी आया और उसने कहा, कि मुझे कुछ शिक्षा दें। मैं संसार की सेवा करना चाहता हूं। बुद्ध उदास हो गये। वह आदमी कहने लगा, आप उदास क्यों हो गए हैं? बुद्ध ने कहा कि उदास इसलिये हो गया हूं क्योंकि तुम अभी हो ही नहीं। संसार की सेवा कौन करेगा? और तुम सेवा के नाम से दूसरों को सताने लगोगे। तुम कृपा करो। तुम पहले अपनी सेवा कर लो। पहले तुम हो तो जाओ।
गुरजिएफ- पश्चिम का एक बहुत बड़ा रहस्यवादी संत इस सदी का कहता था, कि आत्मा सभी के भीतर नहीं है। उसकी बात में थोड़ी सच्चाई है। क्योंकि आत्मा तो उन्हीं के भीतर है, जो जागे हुये है। बाकी तो सिर्फ मिट्टी के पुतले हैं बाकी तो सब पदार्थ हैं। उनके भीतर अभी आत्मा का कोई आविर्भाव नहीं हुआ है।
उसकी बात में सच्चाई है। क्योंकि आत्मवान होने का एक ही अर्थ है, कि तुम अपने मालिक हुये। अब तुम जो चाहो, वही होगा। तुम हवा में कंपते हुए पत्ते नहीं हो, कि जब झोंका आएगा तब कंपोगे और जब झोंका नहीं आएगा तो लाख चाहो, तो न कांप सकोगे। अब तुम यंत्रवत नहीं हो। तुम मनुष्य हो, मनुष्य का अर्थ है, कि अब तुम्हारे भीतर से निकलेंगे तुम्हारे कृत्य। बाहर की घटनाओं से पैदा न होंगे। परिस्थितियां नहीं, अब तुम मूल्यवान हो। तभी तो तुम आत्मवान होओगे। अन्यथा आत्मा तुम्हारे भीतर है, यह केवल एक सिद्धांत मात्र होगा।
कभी-कभी किसी व्यक्ति में आत्मा होती है। तुममे आत्मा ऐसे ही है, जैसे बीज में वृक्ष। हुआ न हुआ बराबर। हो सकता है, लेकिन है नहीं और हो सकता और होने में बड़ा फर्क है। वह केवल संभावना है बीज की, कि अगर ठीक समुचित भूमि मिले, समुचित खाद मिले, समुचित जल, समुचित सूर्य की किरणें मिलें, सुरक्षा मिले तो संभावना है, कि बीज वृक्ष हो सकेगा। लेकिन बहुत सी शर्तें पूरी हों तब। अन्यथा बीज, बीज की तरह ही मर जायेगा और वृक्ष न हो सकेगा। अधिकतम लोग शरीर की तरह ही जीते हैं और शरीर की तरह ही मर जाते हैं। बीज उनका ऐसे ही खो जाता है। अवसर आता है और चला जाता है। आत्मवान होने का अर्थ है- होश, विवेक, जागृति। तुम्हारे कृत्य तुम्हारे भीतर से निकलने लगेंगे। अभी तुम्हारे कर्म, कर्म नहीं हैं, प्रतिकर्म हैं। प्रतिकर्म यानि रिएक्शन। कोई कुछ करता है, उसकी प्रतिक्रिया में तुम्हारे भीतर कुछ होता है। अगर कोई प्रेम करता है, तो तुम प्रेम करते हो और कोई घृणा करता है, तो तुम घृणा करते हो।
जीसस का वचन है- शत्रु को भी प्रेम करो, इसका क्या मतलब हुआ? यह कोई नीति की शिक्षा नही है। जीसस जैसे व्यक्तियों को नीति में क्या उत्सुकता? यह धर्म का गहनतम सूत्र है। जीसस कहते हैं, शत्रु को प्रेम करो। वे यह कह रहे हैं, मित्र को तो प्रेम करना प्रतिक्रिया है, वह तो सभी करते हैं। शत्रु को घृणा करना भी प्रतिक्रिया है। वह तो सभी करते हैं। जिसने शत्रु को प्रेम कर लिया, वह मालिक हो गया। उसने प्रतिक्रिया तोड़ दी, वह अपने कर्म का खुद मालिक हो गया। शत्रु तो पूरी चेष्टा कर रहा है, कि तुम उसे घृणा करो। लेकिन तुमने उसकी चेष्टा तोड़ दी। वह तो बटन दबा रहा था तुम्हारे क्रोध की लेकिन तुमने प्रेम का प्रवाह पैदा कर दिया। अगर तुम अपने शत्रु को प्रेम कर पाओ तो तत्क्षण तुम यंत्र वत्ता से मुक्त हो गये। तब तुम्हारे प्रतिकर्म खो गए, अब तुम कर्मवान हुये।
प्रतिकर्म बांधते हैं, कर्म नहीं बांधता। असल में प्रतिकर्मों से ही कर्मों की श्रृंखला बनती है। जब कोई व्यक्ति होश पूर्वक कर्म करता है तो उससे कोई बंधन पैदा नहीं होता। तुमने कभी जीवन में कोई कर्म होशपूर्वक किया है? होशपूर्वक करने का अर्थ है, तुम्हारे शरीर का यंत्र जो करना चाहता हो वह नहीं, तुम्हारे भीतर का होश जो करना चाहता हो, वही तुमने कभी किया है? शरीर कहता था, करो क्रोध, मन कहता था, करो क्रोध। मन में तो गाली उठ आई थी, शरीर ने डंडा उठा लिया था। कभी ऐसा हुआ है, कि डंडा हाथ में रह गया हो, गाली मन में रह गई हो और तुम अछूते, अस्पर्शित भीतर खड़े रहे? तुम्हारी ज्योति पर छांव भी न पड़ी इस डंडे की। तुम्हारी ज्योति पर गाली का दंश भी न आया। तुम्हारी ज्योति निष्कलुष बनी रही कमलवत्। पानी छुआ ही नहीं।
अगर ऐसा तुमने कभी किया है, तो तुम्हें पहली दफा पता चलेगा कि अमूर्च्छा क्या है, जागृति क्या है, होश क्या है! उसी क्षण तुम परम आनन्द से भर जाओगे। तुम मुक्त हो गये। अब तुम्हें कोई चला नहीं सकता। अब तुम्हें कोई धक्का नहीं दे सकता। अब तुम अपने मालिक हो। यही तो मालकियत है, जिसकी तलाश चल रही है। अब तुम सम्राट हो गये। जब तक तुम बंधे हो यंत्रवत्ता से तब तक तुम एक भिखारी हो। तुम्हारा जागरण, नाम-मात्र का जागरण है। खोटा सिक्का है, मूर्च्छा का पहला रूप है- जागरण सुबह से सांझ तक जिसे तुम जानते हो, वह जागरण ऊपर-ऊपर है। भीतर तो निद्रा बरसती रहती है। तुमने कभी खयाल किया? आंखे बंद करके थोड़ी देर बैठ जाओ। तत्क्षण तुम सपना देखने लगोगे। आंख खुली थी, वृक्ष, लोग, रास्ता, दुकान, बाजार दिखाई पड़ रहा था। आंख बंद की सपना शुरु।
एक आदमी को फुटबाल का बहुत शौक था। शौक इतना ज्यादा हो गया था, जैसा कि अक्सर लोगों को हो जाता है। जब बाढ़ आती है तो कोई सीमाओं का खयाल रख कर थोड़े आती है् क्रिकेट के पागल हैं, कि अगर उनकी टीम हार जाये तो टीवी, जिससे वे पूरे मैच का लाइव मनोरंजन कर रहे थे उसको पटक देते हैं। तो वह आदमी फुटबाल का दीवाना था। पत्नी परेशान हो गई थी। क्योंकि वह दिन में बैठकर कुर्सी पर भी लातें फटकारता था, रात सोता तो सपने में भी लातें फेंकता और ऊधम मचाता। पत्नी डाक्टर के पास गई और उसने कहा, बहुत हो गया। अब यह फुटबाल का इलाज करना ही पड़ेगा। तो डाक्टर ने उसे दवा दी और कहा इसे ले जाओ। इसकी एक गोली दे दोगे, तो रात भर तुम्हारा पति शांत रहेगा। पत्नी घर आई, उसने अपने पति से कहा कि यह गोली मैं ले आई हूं। तुम शांति से सो सकोगे। रात सोते समय इसे लेना है। आदमी ने कहा, अगर आज न लूं और कल लूं तो कोई हर्ज? उसकी पत्नी ने कहा, क्यो? आज क्या मामला है? उसने कहा, आज फाईनल मैच है सपने में!
अगर तुम आंख बंद करो तो तुम पाओगे कि वहां न मालूम कितने तरह के मैच चल रहें हैं सपनों के। जरा आंख बंद की, कि सपना दौड़ने लगता है। सपना दौड़ ही रहा था। सिर्फ आंख खुली थी, तुम बाहर उलझे थे, इसलिए ख्याल नहीं था। सपना नींद का लक्षण है क्योंकि बिना नींद के सपना हो ही नहीं सकता। इसे तुम सूत्र की तरह याद रखना, सपना नींद का लक्षण है और अगर जागते-जागते भी तुम्हारे भीतर सपना चलता है तो उसका अर्थ है, तुम्हारे भीतर नींद ही चलती है। ऊपर-ऊपर सतह पर जरा से तुम जागे हुये लगते हो। भीतर सपना चल रहा है।
तुम रास्ते पर चलते लोगों को देखों। वे उस रास्ते पर चल रहें हैं- ऊपर-ऊपर। भीतर दूसरे ही रास्ते हैं, जिन पर उनका मन चल रहा है। लोगों को खाना खाते देखो। मुंह में खाना डाल रहें है। बिलकुल होश में लगते हैं। लेकिन जरा गौर से उनके चेहरे को देखो। भीतर कुछ और चल रहा है। शायद उन्हें पता भी न हो कि वे भोजन कर रहे हैं। वे किसी दूसरे लोक में किसी सपने में संलग्न है। उनके होंठ कांप रहे हैं। बात चल रही है किसी और से, जो वहां मौजूद नहीं है। लोग रास्ते पर चले जा रहें हैं और होंठ हिलते हैं। हाथ से मुद्राएं होती रहती हैं। जैसे वे किसी से चर्चा कर रहें हैं।
तुम अपना ही निरीक्षण करो। तुम पाओगे, तुम जो भी करते हो, वह ऊपर-ऊपर है। भीतर कुछ और भी चल रहा है। भीतर सपना चल रहा है। भीतर नींद भरी है। ऊपर जरा सी पतली सतह है जागरण की। वह काम चलाऊ है। उससे कोई आत्मा की उपलब्धि न होगी और न परमात्मा मिलेगा। वह इतनी धीमी मन्दी रोशनी है, कि उससे वह प्रगाढ़ अंधकार न टूटेगा, जो तुम्हारे जीवन के भीतरी तलों को घेरे हुये है।
परम पूज्य सद्गुरुदेव
कैलाश श्रीमाली जी
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