





आकाश के विभिन्न पिण्डों में सूर्य का अपना अलग ही अस्तित्व है। चन्द्र तारे यदि मिट भी जायें तो भी हमारे लिये कोई विशेष खतरे की बात नही है, पर सूर्य का एक घण्टे के लिये भी अलग रहना प्राण संकट उत्पन्न कर देगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि आज सूर्य मिट जाये तो तीन दिन के भीतर ही पृथ्वी के चर-अचर सभी जीवों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, सूर्य समाप्त होने के दो दिन के भीतर ही वायुमण्डल का समस्त जल वाष्प ठण्डी होकर पानी या बर्फ के रूप में गिर पड़ेगी। उस बर्फ की भीषण सर्दी से कोई प्राणी बच ना सकेगा। इसीलिये सूर्य की प्रचण्ड शक्ति की दैवीय शक्ति के रूप उपासना की जाती है।
सूर्य में कितनी ऊर्जा शक्ति है, इसका अनुमान लगाना कल्पना से परे है। फिर भी वैज्ञानिकों ने जो जानकारियां अर्जित की हैं, उस आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि पृथ्वी के दो वर्ग गज जमीन पर सूर्य की जितनी ऊर्जा आती है, उसकी शक्ति एक ‘अश्व शक्ति’ के बराबर होती है। इस ऊर्जा शक्ति का उपयोग करने का यदि कोई सुगम तरीका मिल जाये, तो सभी इंजन केवल सौर ऊर्जा से ही चलाये जा सकते हैं।
सोलर पैनल का विकास इस दिशा में एक बड़ा कदम माना जा सकता है। जो संसार को नई क्रांति की ओर अग्रसर कर रहा है। इसके द्वारा बिजली आपूर्ति की अधिकांश समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यदि देखा जाये, तो सूर्य को प्राण ऊर्जा का महत् स्त्रोत कहा गया है। ऋग्वेद में सूर्य को जगत की आत्मा बताया गया है। इसका तात्पर्य है, कि पृथ्वी पर जो चेतना एवं हल-चल है, उसका उद्गम स्त्रोत सूर्य ही है। सूर्य से केवल गर्मी या रोशनी ही नहीं मिलती, इसके अतिरिक्त वह भी मिलता है जो चेतना शक्ति से सम्बन्धित है।
पौराणिक कथाओं में गायत्री को ब्रह्मा की पत्नी कहा गया है, जो ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं, इनकी उपासना से साधक संयम और सम्वर्धन का मार्ग प्राप्त करता है। आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार करता है। जीवन के लक्ष्य पूर्णता तक पहुंचता है, महामानव, ऋषि, देवात्मा, अवतार की श्रेणी में, इनकी उपासना के द्वारा ही पहुंचा जा सकता है। साधक प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूप से ऊचांई पर अग्रसर होता है। गायत्री उपासना से आत्मशोधन होता है, आत्म-सत्ता पर चढ़े जन्म-जन्मान्तरों के कुसंस्कारेां और जन सम्पर्क से मिलने वाले दोष-दुर्गुणों का निराकरण होता है। मानव जीवन के लिये जिस समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी की आवश्यकता है, सरल शब्दों में सन्मार्ग की प्राप्ति होती है।
वास्तव में भगवती गायत्री उस परम शक्ति का ही एक स्वरूप हैं, जिनकी उपासना से साधक आत्म बल से युक्त होता है, साधक के जीवन में शक्ति उपासना की अनिवार्यता से कौन असहमत हो सकता है? बिना शक्ति के न तो आध्यात्मिक क्षेत्र में उच्चता प्राप्त की जा सकती है और न ही भौतिक क्षेत्र में व्यक्ति कुछ करने में समर्थ हो पाता है। गायत्री महामंत्र की गरिमा सर्वविदित है, जो प्रज्ञा, सद्भावना और सद्विचार से सम्बन्धित है, सन्मार्ग प्राप्ति का माध्यम है। गायत्री मंत्र जप से जिस शक्ति सम्पदा की प्राप्ति होती है, वह अवर्चनीय है।
वहीं सूर्य उपासना के माध्यम से शरीर की अलौकिक शक्तियों को सुप्त अवस्था से उठाकर जागृति में लाया जाता है और यह जागरण इतना अनुकूल होता है कि उसके माध्यम से अपने सारे कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं। सूर्य ही समस्त चराचर जगत में प्राणों का संचार करते हैं। सूर्य की उपासना सम्पन्न करने से साधक के व्यक्तित्व में स्वतः ही परिवर्तन आने लगता है और उसके अन्दर अडिगता तथा दृढ़ संकल्प जैसे गुणों का समावेश होने लगता है, वह रोगों से मुक्त हो जाता है और एक अद्वितीय तेजस्विता साधक की देह में समाहित होकर समस्त विषम परिस्थितियों को समाप्त कर देती है।
जिस प्रकार भौतिक जगत में विभिन्न कार्य के सम्पादन के लिये शरीर में ऊर्जा की आवश्यकता होती है, उसी तरह ऊर्जा शक्ति के सृजन और वर्धन करने के लिये प्राणों को चेतना की आवश्यकता होती है, उसकी सुप्त अवस्था को समाप्त करने की या और अधिक क्रियाशील बनाने की आवश्यकता होती है। शरीर के भीतर अन्न से उर्जा सृजन की क्रिया भी प्राणों द्वारा होती है। प्राण ही हमारे क्रिया शक्ति के मूल हैं।
उस प्राण शक्ति को ऊर्जावान और चेतनावान बनाने की क्रिया जब साधक सम्पन्न कर लेता है, तो उसमें एक विशिष्ट परिवर्तन होने लगता है। सूर्य की तेजस्विता ग्रहण करने का तात्पर्य यही है कि हम अपनी प्राण शक्ति को और अधिक सुदृढ़ बना सकें और जब प्राण शक्ति में सुदृढ़ता, मजबूती आयेगी, जब वह शक्ति और ऊर्जा के भण्डार से आपूरित होगा, तो सांसारिक क्रियाओं में स्वतः ही सफलता मिलनी प्रारम्भ हो जायेगी। समस्याओं का निराकरण हमारे प्राण शक्ति की प्रेरणा से निरन्तर प्राप्त होता रहेगा और साधक निरन्तर उन्नति- प्रगति करता हुआ अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सकेगा। सांसारिक जीवन में सुख-सौभाग्य, आनन्द, प्रेम, उल्लास की प्राप्ति करने मे सफल होगा और इसी के साथ गायत्री शक्ति के माध्यम से जीवन में सन्मार्ग की प्राप्ति होगी। जीवन के जो भी कुसंस्कार है, वे समाप्त हो सकेंगे, पाप-ताप दोष से जीवन मुक्त होगा।
गायत्री जयन्ती अथवा सूर्य ग्रहण की दिव्य चेतना में स्वयं को व अपने प्राणों को ऊर्जा शक्ति से आपूरित करने की क्रिया सूर्य गायत्री प्राण चैतन्य दीक्षा प्रत्येक साधक को ग्रहण करनी ही चाहिये। यह जीवन और प्राणों की मूल आवश्यकता है, जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है।
मानव शरीर प्राण की चेतना पर आधारित है, मनुष्य देह जितनी अधिक सक्रिय होगी, उसकी क्रियाशीलता में उतना ही अधिक निखार आता रहता है। प्राणों के माधयम से ही शरीर अन्न से ऊर्जा प्राप्त कर कर्मशील होता है, साधनात्मक क्रिया या शक्तिपात दीक्षा की चेतना को आत्मसात करने की क्रिया प्राणों के द्वारा ही संभव हो पाती है, इसलिये मानव देह के साथ-साथ प्राणों की चैतन्यता की भी अनिवार्यता है, जिससे हमारे प्राण अत्यधिक ऊर्जा का सृजन कर सकें और उस ऊर्जा स्रोत के माधयम से हमारे शरीर में जागृति व चैतन्यता का भाव उत्पन्न होता रहे, जिसके माध्यम जीवन की गंभीरता को अनुभव करते हुये व्यक्ति उचित दिशा में क्रियारत रहे है। जब व्यक्ति उचित दिशा में क्रियारत होता है तो भौतिक या आध्यात्मिक कोई भी पक्ष जीवन में अधूरा नहीं रह सकता है क्योंकि जीवन की मूलभूत आवश्यकता सही दिशा का निर्धारण ही होता है, यदि सही दिशा के साथ-साथ कार्य करने के लिये असीम ऊर्जा का स्रोत भी मिल जाये तो असफ़लता का नामो- निशान मिटना निश्चित है।
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