





न्याय पूर्वक अर्जित धन का दसवां भाग बुद्धिमान, धार्मिक मनुष्य को दान कार्य में व्यय करना चाहिये, आध्यात्मिक कार्यो में लगाना चाहिये, जिससे उसे ईश्वरीय अनुकम्पा प्राप्त होती है।
कलियुग में दान प्रधान धार्मिक कर्म है। कलियुग में धर्म केवल एक पैर अर्थात् दान पर आधारित है। ईमानदारी, परिश्रम तथा धर्म अनुसार अर्जित धन, सम्पत्ति का दान सर्व पुण्यदायक होता है। अर्थ अमृत है, पर असावधानी से वह जहर भी बन जाता है। जो नीति से आये और जिसका उपयोग रीति से हो, वह अर्थ अमृत है, पर अनीति से अर्जित धन विष समान है।
शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है- जो सिर्फ अपने लिये कमाता-खाता है, वह अन्न नहीं पाप कर्म खा रहा है। यदि धर्म की मर्यादा ना हो तो धन अनर्थ का कारण बनता है। धन अर्जित करना कठिन नहीं है, उसको उपयोगी बनाना कठिन कार्य है, धन का सेवा, सहायता, दान आदि में सदुपयोग करना कठिन है। धन का धार्मिक कर्तव्यों में उपयोग हो, तो वह सुख देता है, भोग-विलासिता देता है, अनर्गल व्यय पर दुःख, विषाद, पीड़ा, रोग आदि कष्ट देता है। दान देने का अधिकार गृहस्थ को दिया गया है।
बहुत पुरानी बात है, मनको जी बोधला भगवान कृष्ण के परम भक्त थे। उनका जन्म बरार प्रान्त के धामन गाँव में हुआ था। उनके पास धन की कमी न थी। वे दीन-दुःखियों की खुले मन से सहायता करते थे। उनके हृदय में दया का सागर लहराता रहता था। वे सदा भगवान श्रीकृष्ण से यही प्रार्थना किया करते थे कि प्रभो! संसार में कोई भी दुःखी न रहे, सब आनन्दपूर्वक अपना-अपना जीवन बितायें। बोधला जी की धर्म पत्नी सती मामाताई भी अपने पति का अनुसरण करती थीं। उनके हृदय में भी प्राणि मात्र के लिये अपार करूणा थी।
एक बार बरार प्रदेश में भयंकर अकाल पड़ा। लोग दाने-दाने के लिये तरस गये। बोधला जी के पास जितना अन्न था, उन्होंने सब भूखे मनुष्यों को बाँट दिया। अन्न के समाप्त हो जाने पर उन्होंने अपनी सम्पत्ति बेचकर दूर प्रदेशों से अन्न मँगाया और भूखों को भोजन दिया। पति के इस शुभ कार्य में उनकी पत्नी मामाताई बड़े उत्साह से उनका हाथ बँटाती थीं। उन्होंने अपने सारे आभूषण बेच दिये और वे दिन-रात भूखें लोगों की सेवा में जुटी रहतीं। दान करते-करते बोधला जी दरिद्र हो गये। अब उनके पास अपने खाने तक के लिये एक दाना भी न रहा। अन्त में वे दूसरे प्रदेश में जाकर मजदूरी करने लगे और अपने परिवार का पालन करते रहें। इस अवस्था में पहुँच कर भी उन्हें जो आत्म सन्तोष प्राप्त होता, वह अनिर्वचनीय है।
बोधला जी प्रत्येक एकादशी को पण्ढर पुर जाकर भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करते थे, पूजन करने के पश्चात् वे भूखे ब्राह्मणों को अन्न दान दिया करते थे। ऐसा उनके जीवन का नियम था। इस बार भी एकादशी आयी, किन्तु बोधला जी के पास तो कुछ भी शेष नहीं रह गया था। फिर भी मजदूरी करके उन्होंने कुछ पैसे कमाये। उन पैसों से उन्होंने भगवान के पूजन की सामग्री खरीदी और बाकी बचे पैसों से दान देने के लिये आटा खरीदा। भगवान का पूजन करने के बाद वे नदी के किनारे पर दान लेने वालो की प्रतीक्षा में खड़े हो गये, किन्तु केवल सूखे आटे को देखकर उनसे दान लेने कोई भी नहीं आया। वे सोचने लगे ठीक ही तो है, केवल सूखा आटा लेकर कोई क्या करें, मेरे पास न नमक है, न सब्जी और न घी है, न दाल।
बोधला जी यह सोच ही रहे थे कि इतने में भक्त की प्रेम आपूरित भेंट लेने के लिये स्वयं भगवान नारायण बूढ़े ब्राह्मण के वेश में प्रकट हो गये, बोधला जी ने बड़े आदर से ब्राह्मण देवता को अपना आटा अर्पण कर दिया। भगवान उस कच्चे आटे को बड़े आनन्द से फाँकने लगे–! वास्तव में परमात्मा को श्रद्धा, प्रेम, समर्पण, भक्ति से अर्पित किया हुआ एक तुलसी का पत्ता भी बहुत प्रिय होता है।
उन्होंने स्वयं भगवद् गीता में कहा है-
अर्थात् पत्र, पुष्प, फल, जल जो कुछ भी भक्त प्रेम पूर्वक अर्पण करता है। उस श्रद्धावान भक्त का श्रद्धा पूर्वक अर्पण किया हुआ, मैं स्वयं प्रकट होकर भोग लगाता हूँ।
प्रभु को सूखा आटा फाँकते देख भगवती लक्ष्मी से रहा नहीं गया, वे भी वृद्धा ब्राह्मणी वेश बनाकर आ गयीं और हाथ जोड़कर बोलीं- देव! यदि आप आज्ञा दें तो अभी आपके लिये आटा गूँथकर बाटियाँ बना दूं। प्रभु ने अनुमति दे दी। बोधला जी तुरन्त आग ले आये और बाटियाँ बनने लगीं, जब बाटियाँ बन गयीं, तो परम दयालु भगवान और वृद्धा ब्राह्मणी बनी लक्ष्मी जी दोनों ने भोग लगाया। धीरे-धीरे दोनों लोग सब बाटियाँ खा गये, केवल एक बाटी पत्तल में छोड़ दी।
बोधला जी सुबह के भूखे थे। जाते-जाते वृद्ध ब्राह्मण अर्थात् स्वयं नारायण प्रभु उनसे कह गये, पत्तल में जो एक बाटी बची है, उसे तुम खा लेना, बोधला जी ने ब्राह्मण के आज्ञा अनुसार पत्तल में बची बाटी खा ली, उस बाटी के खाते ही पत्तल में दूसरी बाटी आ गयी। यह देख बोधला जी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, भूखे तो थे ही, उन्होंने वह बाटी भी खा ली। उस बाटी के खाते ही दूसरी बाटी फिर पत्तल में आ गयी। इस प्रकार बोधलाजी ने भरपेट भोजन कर लिया, फिर भी पत्तल की बाटी समाप्त न हुई। यह देख उन्हें विश्वास हो गया कि ब्राह्मण वेश धारी साक्षात् प्रभु और माता जगत् जननी ने ही मुझ पर कृपा की है। प्रभु का स्मरण करते ही उनके नेत्रों से आँसू बहने लगे। वे मन्दिर में पहुँचे, प्रेम आवेश में पाण्डुरंगजी की मूर्ति के समीप चले गये चरणों में गिर पड़े। प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें अपने हृदय से लगा लिया–!!
मनुष्य जीवन में दान एक नित्य कर्म है। मनुष्य को प्रति दिन कुछ दान अवश्य करना चाहिये। दान चाहे श्रद्धा से दे अथवा लज्जा से दे या भय से दे, पर दान किसी भी प्रकार से अवश्य करना चाहिये। दान के बिना मानव की उन्नति अवरूद्ध होती है, उसके धन का दुष्प्रभाव भी पड़ता है, कहते हैं धन के साथ अनेक दोष भी आते हैं अर्थात् धन पार्जन के लिये जो आप कर्म कर रहें हैं, उससे आपको जो धन प्राप्त होता है, वह धन कैसा है? किस रूप में आ रहा है, वह धन जो आपके पास आया है, उसे देने वाला व्यक्ति कहां से लाया है, कहीं वे धन चोरी का तो नहीं, या अन्य किसी गलत तरीके से अर्जित किया हुआ तो नहीं, ऐसे अनेक कारण होते हैं?
जिनके कारण धन के साथ दोष भी जाने- अनजाने हमारे पास चले आते हैं। उनकी शुद्धि के लिये धन दान करना अति आवश्यक है। यदि दान के द्वारा धन दोष दूर ना किया जाये तो, वही रोग, कुसंस्कार, विपत्ति, शत्रु के रूप में हमारे सामने प्रकट होते हैं।
इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में दान-कर्म सम्मिलित करना चाहिये। दान के द्वारा मन में आत्म संतुष्टि का भाव उत्पन्न होता है। यदि आप किसी गरीब को भोजन कराते हैं, किसी निर्धन को अन्न दान करते हैं, तो आपका वह कार्य भगवान पालनकर्ता के सहयोगार्थ है, अर्थात आप ईश्वर के कार्य में उसकी सहायता कर रहे हो, और वह ईश्वर अपने पास आपका कुछ भी रखेगा नहीं, वह उसका सहड्ड गुणा आपको वापस कर देगा।
इसी प्रकार आप किसी धार्मिक कार्य में अपना धन व्यय करते हैं, तो आपके इस कार्य से ईश्वर की महिमा का गुणगान कर, उसकी स्तुति, भजन, पूजन कर हजारों-हजारो लोग लाभ प्राप्त करते हैं, अर्थात् ईश्वर की संतानों को ईश्वर के निकट लाने में आपने अपनी भूमिका निभायी। जो कार्य ईश्वर को करना चाहिये था, वह आपने किया, तो वह भी आपकी सभी सुमनोकामनाये निश्चित ही पूरा करेगा, उसकी कृपा निश्चय ही आप पर होगी। लेकिन ध्यान रहे यह सब कार्य अहं और आसक्ति रहित होने चाहिये, अन्यथा सब व्यर्थ जायेगा।
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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