





छोटे-छोटे कोषों से मिलकर बना है मानव शरीर। इन कोषों के विभाजन के फलस्वरूप ही मानव शरीर का विकास होता है, कुछ निश्चित क्रम पूरा होने के बाद कोषों का विभाजन रूक जाता है और मानव शरीर की एक विशेष आकृति निर्धारित हो जाती है, इस निर्माण-प्रक्रिया के साथ ही साथ विनाश क्रम में कुछ ऐसे तत्वों का निर्माण हो जाता है, जो कोषों के आवरण को भेद कर अन्दर प्रवेश कर जाते हैं व क्रोमोसोम को नष्ट करके अनेक कोषों को समाप्त कर देते हैं।
इन्हीं कारणों से मानव देह की जैविक शक्ति क्षीण होने लगती है और मानव शरीर यौवन काल में भी वृद्ध जैसा प्रतीत होने लगता है, जो व्यक्ति युवावस्था में ही वृद्ध दिखने लगे उस को अपने आप में ग्लानि महसूस होने लगती है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो या पुरूष, उस की सबसे बड़ी इच्छा रहती है कि वह पूर्ण यौवन युक्त बना रहे। भले ही वह प्रौढ़ावस्था में कदम रख चुका हो, किन्तु अपने आप को ज्यादा से ज्यादा आकर्षक व यौवन युक्त प्रदर्शित करने का प्रयास करता है। बचपन में आनन्द के हिंडोले में झूला हुआ, यौवन के सुगन्ध से सरोबार व्यक्ति 40 वर्ष के बाद जब इस अवस्था में पहुंचता है तो वह जीवन से अवश्य ही थोड़ी निराशा महसूस करने लगता है।
इसके लिये कई उपाय करते हैं, योग कक्षाओं में भाग लेते हैं। इसके अलावा कभी किसी समाचार पत्र या पत्रिका में विज्ञापन (यौवन पुनः प्राप्त करें चेहरे की झुर्रियां मिटायें) पढ़ता है। तो व्यक्ति उन्हें भी अपनाने में पीछे नहीं रहता। इन सबका परिणाम होता है शरीर में कुछ नयी बीमारियां, चेहरे पर कुछ भद्दे दाग, इन्हें दूर करने के लिये व्यक्ति फिर प्रयासरत होता है।
अन्त में हार कर असमय ही बुढ़ापे के चुंगल में फंस जाता हैं पहले तो यह समझना आवश्यक है कि यौवन शब्द का तात्पर्य क्या है? गुलाब की एक कली से पुष्प बनने के बीच का समय, एक ऐसा समय ऐसा स्वरूप जिसे बार-बार निहारने को जी चाहता है उस पुष्प में होती है ताजगी, सुगन्ध, ऐसे पुष्प को तो देख कर ही आनन्द आ जाता है।
यौवन शब्द का यही अर्थ है, यौवन केवल जवानी के आयु से ही सम्बन्धित नहीं है, यह तो शरीर के भीतर उत्पन्न हुये विविध भावों का शरीर के माध्यम से प्रकटीकरण है, यदि यौवन काल को प्राप्त करने के बाद भी व्यक्ति के शरीर में ताजगी नहीं है, रूप माधुर्य प्रेम और आनन्द नहीं है तो ऐसे व्यक्ति का जीवन नीरस, उदास, खिन्न, तनाव युक्त, आलस से भरा होता है।
चाहे संस्कृत के काव्य हों अथवा तंत्र के ग्रन्थ, उपनिषद् हो या पुराण प्रत्येक में स्त्री स्वरूप को रति तथा पुरूष स्वरूप को कामदेव की शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक पुरूष और स्त्री जन्म से ही आकर्षक और सौन्दर्य युक्त हों, लेकिन ऐसा संभव है कि रति-प्रिया साधना द्वारा कामदेव व रति के समान सम्मोहन युक्त बना जा सकता है? असम्भव व नहीं प्राप्त होने वाले को संभव करना ही साधना का मूल उद्देश्य होता है। इस साधना द्वारा पुरूष कामदेव के समान ओजस्वी-तेजस्वी, पौरूष शक्ति से पूर्ण होते हैं, वही स्त्रियां सौन्दर्य, सम्मोहन, आकर्षण व कामिनी युक्त यौवन से किसी को भी मंत्र मुग्ध करने में समर्थ होती हैं।
ऐसी अनेक परिस्थितियां जहां दवा या योग के द्वारा लाभ नहीं मिलता है, तब हमें साधनाओं का सहारा अवश्य लेना चाहिये। क्योंकि यही वह शक्ति, चेतना होती है, जो देह के अणु-अणु को चैतन्य कर सम्मोहन शक्ति, आकर्षण, यौवन, सौन्दर्य से भर देती है।
इस साधना हेतु रति प्रिया यंत्र तथा सौन्दर्य शक्ति माला पहले से प्राप्त कर लें, अनंग त्रयोदशी 29 मार्च दिन बृहस्पिवार सांय 7 बजे के पश्चात् कभी भी स्नान करके अपनी इच्छानुसार सुन्दर व आरामदायक वस्त्र पहन लें। साधना कक्ष का वातावरण अगरबत्ती जलाकर सुगन्ध युक्त बना लें। एक चौकी पर गुलाब के फूल की पंखुडि़यों से स्वस्तिक बना कर रति प्रिया यंत्र स्थापित करें। दोनों हाथों में इत्र लगा कर माला पर इत्र मलें और रति प्रिया यंत्र के चारों तरफ रख दें। हाथ जोड़ कर कामदेव व रति के रूप का ध्यान करें और उनसे आप अपनी इच्छा पूरी करने के लिये प्रार्थना करें। फिर माला उठा लें और निम्न मंत्र की 9 माला मंत्र जप करें। ऐसा 3 दिन तक करें, प्रत्येक दिन यंत्र के नीचे रखी पंखुडि़यों को बदलते रहें।
साधना पूर्णता पर सभी सामग्री गुरु चरणों में अर्पित कर, गुरुदेव से आशीर्वाद् प्राप्त करें।
सम्मोहन वशीकरण युक्त जीवन प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, जिसे उसे प्राप्त करना ही चाहिये। सौन्दर्य, सम्मोहन भाग्य से नहीं क्रियाओं द्वारा प्राप्त होता है। इसके लिये यदि हम सही दिशा में प्रयास करें, तो यह निश्चित है, आकर्षण शक्ति की चेतना हमारे भीतर अवश्य विद्यमान होगी और हम किसी को भी अपने आकर्षण में बांधने में सफल होंगे। आज के समय में आकर्षण, सम्मोहन हमारी अनिवार्यता है, क्योंकि इस चेतना पर हमारा सामाजिक, पारिवारिक, व्यापारिक, प्रशासनिक आदि अनेक नित्य आने वाले कार्यो की सफलता-असफलता का रहस्य छिपा होता है, आकर्षण शक्ति सफलता के लिये आधार रूप में होती है।
यदि हम प्रभावशाली व्यक्तित्व से भरे नहीं हैं, भयभीत, नर्वस, संकोच से युक्त हैं, तो हम अपनी बात भी किसी को सही ढ़ग से बता नहीं पाते। वहीं आकर्षण युक्त व्यक्ति अपनी बात तो रखता ही है, असमंजस्य की स्थिति में भी अपनी सूझ-बूझ का प्रयोग कर लोगों को चुप करा देता है, और अपने सारे कार्य सरलता से सम्पन्न कर सफ़लता की उच्च स्थिति पर पहुचने में समर्थ हो पाता है। सम्मोहन, सौन्दर्य शक्ति पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, अध्ययन आदि अनेक स्थानों पर इसकी परम आवश्यकता होती है, जिसके माधयम से व्यक्ति अपने जीवन को सही रूप में जी पाता है, और अपने व्यक्तित्व की प्रस्तुति सही ढंग से कर सकता है।
पति- पत्नी का सम्बन्ध मार्धुय युक्त आत्मीय बना रहता है। सम्मोहन सौन्दर्य प्रदाता रति प्रिया शक्तिपात दीक्षा आत्मसात कर स्त्री-पुरूष कामदेव-रति युक्त चेतना को अपने रोम-रोम में स्थापित करने में सफ़ल होते हैं, जिनके माधयम से उनका जीवन प्रसन्नता, उमंग, उत्साह, सौन्दर्य, सम्मोहन, आकर्षण, काम शक्ति, ओज-तेज युक्त व्यक्तित्व से पूर्ण होता है और जीवन के प्रति एक नये दृष्टिकोण के स्वामी बन जाते हैं।
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