





इसके अनेक कारण हैं, असुरक्षा की भावना दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। समाज ऐसे घृणित, महापाप युक्त क्रियाओं की ओर बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है, जो कल्पना में भी डरावना लगता है। पीडि़त मानव, अबला नारी, दहेज प्रताड़ना, बलात्कार और समाज तो इतना घृणित हो गया है कि हमारी छोटी-छोटी बच्चियां भी सुरक्षित नहीं रहीं, समाज व्यभिचारिता की जंजाल में इस तरह जकड़ गया है, कि वह मर्यादा की सभी हदें पार कर चुका है।
इसका मूल कारण काम व अर्थ की महत्ता को आवश्यकता से अधिक महत्व देना, भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिये अंधी दौड़, ये सभी क्रियायें बाधक है, हमारे समाज के श्रेष्ठ निर्माण में, हमारे संतानो के संस्कार में, मानव जीवन के सर्वतोन्मुखी विकास में, जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से परिपूर्ण होना बताया गया है।
हम इस समाज को बदल नहीं सकते, हम मानवीय मूल्यों में होते ह्रास को रोक नहीं सकते, परन्तु हम अपना जीवन, अपने बच्चों, परिवार का जीवन सुरक्षित कर सकते हैं। हमें अपने बच्चों में श्रेष्ठ संस्कार, उच्च शिक्षा के साथ-साथ उनकी सुरक्षा पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करना होगा, अपने परिवार की स्त्रियों पर जो एक कुशल गृहिणी के साथ-साथ कार्य क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं हैं, उनके जीवन को सुरक्षा प्रदान करने के दायित्व का हमें निर्वाह करना होगा। सर्व स्वरूपों में हमारी सुरक्षा महत्वपूर्ण आवश्यकता है, जिसे हम नजर-अंदाज नहीं कर सकते।
पवन-पुत्र हनुमान को विघ्नहर्ता, भय, बाधा, अड़चन टालने वाला कहा गया है, जो अपने भक्त की हर स्थिति में रक्षा करते हैं, उसे पूर्ण सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। श्री हनुमान की अनंत महिमा है, उनमें हजारो गुणों की खान है, जो आज के मानव की आवश्यकता है। जिन गुणों, चितनों और बजरंग बली की चेतना की आत्मसात कर व्यक्ति अपने जीवन को सुरक्षित तो करता ही है, साथ ही वह बल, पराक्रम, ओज, तेज, पौरूष शक्ति से आपूरित होकर विद्यार्थी ज्ञान, बुद्धि, स्मरण शक्ति से युक्त होते हैं, महिलायें निर्भय होती हैं और सबसे महत्वपूर्ण उनके जीवन मूल्यों की रक्षा होती है।
इस तरह से श्री हनुमान पूरे परिवार को एक सूत्र में बांधते हुये सभी के जीवन की रक्षा करते हैं और उन्हें उनके प्रकृति अनुरूप जो उनके विकास को गति प्रदान करे, उन गुणों से विभूषित करते हैं। इसलिये वर्तमान में प्रत्येक परिवार में श्री हनुमान की उपासना, आराधना आवश्यक रूप से होनी चाहिये। जिससे परिवार के सभी सदस्यों का जीवन सन्मार्ग पर गतिशील रहे और वे समाज के विकृत, घृणित, हिंसात्मक विचारो-क्रियाओं से सुरक्षित रह सकें। क्योंकि आज के समाज में जितनी कष्टकारी, यातना देने वाली अदृश्य शक्तियों का डर है, उससे कई गुना अधिक मनुष्य के भीतर मन में स्थित पैशाचिक विचारों व क्रियाओं का भय है। सबसे पहले हमें इन्हीं विकृत नजर वालों से स्वयं को, अपने परिवार को सुरक्षित करना है।
श्री हनुमान की उपासना दुर्गम जीवन पथ को सरल व सहज बनाती है। इसी हेतु पारद हनुमान विग्रह है, जो विशिष्ट मंत्रे व अनेक विशिष्ट साधनात्मक क्रियाओं द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित किया गया है, जो साधक की भौतिक कामनाओं की पूर्ति, सुख-समृद्धि, सम्पन्नता प्रदान करने में समर्थ है, जिसकी चेतना से जीवन भौतिक रूप से व अदृश्य मलिन शक्तियों आदि स्वरूप में सुरक्षित होता है।
इस विग्रह को प्रत्येक साधक-साधिका को अपने पूजन स्थान में स्थापित कर प्रत्येक दिन एक बार संकट मोचक अष्टक का पाठ करना चाहिये। यदि संभव हो तो परिवार का प्रत्येक सदस्य विग्रह के समक्ष बैठकर एक बार अष्टक का पाठ करें, अन्यथा जो भी कर सकता है, एक से पांच बार पाठ कर सभी सदस्यो की रक्षा, सुखमय सफल, शिक्षित, कुशल जीवन की श्री हनुमान से प्रार्थना करें।
यदि आप महिला हैं और समाजिक रूप से काम-काजी हैं, यदि आपकी संतान युवा हो रही है, वह आपसे दूर रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहा है, तो यह पारद हनुमान विग्रह सदा अपने साथ रखें और प्रातः अथवा सांय काल में विग्रह को दोनों हाथों में लेकर एक बार संकट मोचन अष्टक का पाठ करें। इससे आपका जीवन सफल, समृद्ध, श्रेष्ठ व सुरक्षित होगा।
हनुमान जयन्ती 31 मार्च दिन शनिवार को प्रातः हनुमान पारद विग्रह किसी ताम्र पात्र में स्थापित कर केवल सिन्दूर, अक्षत, पुष्प अर्पित करें व धूप जलायें पश्चात् अष्टक का पांच बार पाठ करें, नित्य अथवा मंगलवार-शनिवार को अष्टक का एक बार पाठ अवश्य करें।
बाल समय रवि भक्षि लियो तब, तीनहुं लोक भयो अंधियारो ।
ताहि सो त्रस भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो ।
देवन आनि करी विनती तब, छांडि़ दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।।1।।
बाली की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि शाप दियो तब, चाहिए कौन बिचार बिचारो ।
के द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के शोक निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।।2।।
अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीश यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौं हम सों जु, बिना सुधि लाए इहां पगु धारो ।
हेरि थके तट सिन्धु सबै तब, लाय सिया सुधि प्राण उबारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।।3।।
रावण त्रास दई सिय को तब, राक्षसि सों कहिं सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो ।
चाहत सीय असोक सों आगिसु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।।4।।
बान लग्यो उर लक्ष्मण के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो ।
लै गृह वैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोन सुवीर उपारो ।
आनि सजीवन हाथ दई तब, लक्ष्मण के तुम प्राण उबारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।।5।।
रावण युद्ध अजान कियो तब, नाग की फांस सबै सिर डारौ।
श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो ।
लाए खगेस तबै हनुमान जु, बन्धन काटि सुत्रास निवारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।।6।।
बंधु समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पाताल सिधारो ।
देवहिं पूजि भली विधि सों, बलि देऊँ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।
जाय सहाय भये तब ही, अहिरावण सैन्य समेत संहारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।।7।।
काज किए बड़ देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि विचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसो नहीं जात है टारो ।
बेगि हरो हनुमान महा प्रभु, जो कछु संकट होय हमारो ।
को नहिं जानत है जग में, कपि संकट मोचन नाम तिहारो ।।8।।
।। दोहा ।।
लाल देह लाली लसे, अरू धरि लाल लंगूर ।
ब्रज देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर ।।
यह अष्टक हनुमान को, विरचित तुलसीदास ।
प्रेम सहित जो कोई पढ़े, पूर्ण होय सब आस ।।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,