





कहा जाता है-
अर्थात् जब गुरु अपने शिष्य के अन्यथा भान रूपी अज्ञान का निवारण करते हैं, तब वह संहार स्वरूप में रूद्र का काम करते हैं। प्रामादिक ज्ञान को काटते हुये, साथ ही साथ जब वह शिष्य के मन में जो यथार्थ ज्ञान है, उसकी रक्षा करते हैं, तब वह पालन कर्ता विष्णु का काम करते हैं, और जब अज्ञान को हटाते हुये और ज्ञान की रक्षा करते हुये शिष्य को नवीन ज्ञान सिखाते हैं, तब वे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का काम करते हैं।
इसी प्रकार सांसारिक जीवन में किसी व्याधि की चिकित्सा में वैद्य अथवा डाक्टर का पहला कर्तव्य होता है, व्याधि का मूल रूप से संहार। अतः उस समय पर वह वैद्य रूद्र का काम करता है। परन्तु रूद्र का यह काम करते हुये व्याधि को जड़ से काट डालने के समय उसे अत्यन्त जागरूकता और सावधानी के साथ काम करना पड़ता है। जिससे सिर्फ बीमारी ही नष्ट हो, न कि साथ-साथ बीमार भी चल बसे। इस कारण वह पालनकर्ता विष्णु का भी काम करता है। और जब व्याधि जड़ से कट गयी और जान बच जाये तब शरीर में खूब ताकत लाने वाली औषध, पोषक आहार आदि को देते हुये वही वैद्य सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा का भी काम करता है।
ये सभी क्रियायें ब्रह्मा, विष्णु, महेश के कार्यो के अर्न्तगत आते हैं, जो सम्पूर्ण संसार का एक क्रम है। इसी क्रम के आधार पर निरन्तर सृष्टि, पालन और संहार का कार्य पूर्ण होता है। कहने का तात्पर्य है कि इन त्रिमूर्ति स्वरूप में ही वह परम शक्तिमान परमात्मा सबसे पहले न्यून पक्ष का संहार करता है, साथ ही शुद्ध, सात्विक संस्कारों की रक्षा और जब बुरी शक्तियों की समाप्ति हो जाती है, तब सात्विक चेतना का पोषण व वर्धन करता है। सम्पूर्ण सारांश यह है कि संहार, पालन और सृष्टि की शक्ति सभी प्रकार के साधकों के लिये अनिवार्य है।
ब्रह्मा ही सृष्टि के रचयिता हैं। उन्होंने ही विचार शक्ति से सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है, संसार में व्याप्त सभी वस्तुओं के वे स्वामी हैं, वे ही समस्त जन का पोषण एवं वर्धन का कार्य पूर्ण करते हैं।
ब्रह्मा की आयु प्रमाणों के अनुसार सौ वर्ष है, अतः इनकी साधना करने से साधक स्वतः ही दीर्घायु प्राप्त कर लेता है। अगर ग्रह दोषों से जीवन में कोई दुर्घटना होनी होती है या फिर यदि आकस्मिक दुर्घटना का योग होता है, तो वह नष्ट हो जाता है। जब-जब भी देवताओं पर कोई विपदा आई, जब-जब भी देवतागण किसी परेशानी में उलझे हैं, उन्होंने ब्रह्मा से ही परामर्श लिया, ब्रह्मा द्वारा ही उन्हें अपनी परेशानियों को दूर करने की युक्ति भी प्राप्त हुई। इसलिये जो व्यक्ति ब्रह्मा की आराधना करता है, उसके जीवन में हर प्रकार की बाधा, राज्य बाधा, शत्रु बाधा, रोग आदि दूर हो जाते हैं और वह इन सभी पर विजय प्राप्त कर आगे की ओर अग्रसर होता रहता है।
ब्रह्मा की साधना के बल पर ही ब्रह्मा के मानस पुत्र वशिष्ठ ने काम और क्रोध पर पूर्ण विजय प्राप्त कर, उन दोनों को अपने चरण दबाने के लिये विवश कर दिया था और वशिष्ठ सर्वत्र ब्रह्मर्षि के रूप में सुविख्यात हुये।
भारतीय शास्त्रों में कहीं पर भी किसी भी साधना के सम्बन्ध में, समाप्ति या अन्त का उल्लेख नहीं आता है, आदि देव को अनन्त माना गया है, अर्थात् जो प्रारम्भ से सीमारहित, अनन्त तक विस्तृत हो, वही अनन्त देव हैं। भगवान विष्णु ही सम्पूर्ण सृष्टि का पालन करते हैं।
जो आदि है वही अनन्त हो सकता है, और भगवान विष्णु आदि देव हैं तथा अनन्त देव भी, जिन्हें समय काल की सीमा में बांधा नहीं जा सकता, जिनके स्वरूप को किसी एक रूप में स्थिर नहीं किया जा सकता, जिनके तेज से उत्पन्न सहस्त्रों देवी देवताओं को नित्य प्रति पूजा जाता है, उस अनन्त देव विष्णु के तेज का अंश भी प्राप्त हो जाये, तो फिर जीवन में कोई न्यूनता रह जाये यह असंभव है, श्री विष्णु आकाश तत्व के अधिष्ठाता हैं, आकाश का तात्पर्य हैं- विशालता, गहनता, महानता, ऊंचाई, जो इनकी आराधना द्वारा संभव है।
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहता है। अपने जीवन में अनन्त सिद्धियां प्राप्त करना चाहता है। इसके लिये उस व्यक्ति में विष्णु तत्व तो प्रबल होना आवश्यक ही है। विष्णु तो वह केन्द्रीय बिन्दु हैं, जहां से शक्तियों का, देवों का उद्भव हुआ, विष्णु के ही तो अवतारों का परिवर्तन हम नित्य देखते हैं, चाहे वह राम हो, कृष्ण हो, नृसिंह हो अथवा वाराह अवतार हो।
विष्णु की साधना, अनन्त की साधना है, जो साधक के शरीर ही नहीं, मन के ऊपर आये दोषों का भी निराकरण कर उसमें तेज, कर्मशीलता का उद्भव कर, उसकी शक्ति को जागृत कर, शक्ति का विकास कर, साधक को अनन्त की ओर अर्थात विशालता की ओर, उठने की ओर ले जाती है, सूक्ष्म से विराट की ओर, धरती से आकाश की ओर उठने की क्रिया है। भगवान विष्णु की आराधना से अनन्त देवों के प्रभाव का फल मिलता है।
विष्णु मूल रूप से रजोगुण अर्थात राज्य तत्व के देव हैं, इस कारण इनकी पूजा से व्यक्ति को राज्य लाभ, राज्य उन्नति, राज्य बाधा से निवृत्ति, प्रतिष्ठा विशेष रूप से प्राप्त होती है।
यदि कोई परम तत्व है, परम स्थिति है, परम प्रकाश है, और परमेश्वर है तो वह शिव ही है, जो जाग्रत, स्वप्न और सुप्त तीनों अवस्थाओं से परे हैं- वह शिव ही है, जो ऊँ कार स्वरूप हैं, दिव्य ज्ञान है, समस्त शक्तियों के मूल आश्रय हैं, वह शिव ही हैं, जो सबके रक्षक, सब सिद्धियों के स्वरूप, ज्ञान, बल, इच्छा, क्रिया शक्ति के सम्पूर्ण तत्व, देवों के देव महादेव हैं- वह शिव ही हैं।
जो स्वयं साकार निराकार दोनों स्वरूपों में है, पृथ्वी तत्व के स्वामी हैं, अर्थात् किसी भी प्रकार का भार उठाने में समर्थ हैं, जो मंत्र तथा तंत्र के चरम स्वरूप हैं सृष्टि के नियन्ता हैं, तथा अपने पास कुछ भी नहीं रखते हुये अपने साधकों, भक्तों पर परम प्रसन्न हो कर सभी ऐश्वर्य, सौभाग्य प्रदान कर देते हैं, वह शिव ही तो हैं, जो गणों, भूतों-पिशाचों में भी पूज्य हैं, और योगियों व देवताओं में भी आराध्य हैं, जो महामृत्युंजय हैं, शक्ति के स्वरूप हैं, क्योंकि जहां शिव हैं वही शक्ति है, वे शिव ही तो हैं, ऐसी कोई सिद्धि नहीं, ऐसा कोई ज्ञान नहीं ऐसा कोई निर्वाण नहीं, जो शिव साधना से प्राप्त न होता हो।
जिनकी आराधना से कुबेर ने धनपति पद प्राप्त किया, इन्द्र ने अमोघ वज्र, ब्रह्मा ने पूर्ण चैतन्य सिद्धि, रावण ने स्वर्ण लंका।
शिवत्व है पुरूषार्थ, प्रेम, शक्तिमान, सौभाग्य, बल, साहस, सिद्धि, सभी तांत्रिक साधनायें शिव साधना का स्वरूप ही हैं, शिव की कृपा से कोई अधूरा नहीं रह सकता, चाहे वह किसी भी अवस्था में हों, किसी भी स्वरूप में हो, किसी भी रूप से उसने साधना भक्ति की हो, शिव अर्द्धनारीश्वर हैं, त्रिनेत्र हैं और साकार भी, पार्थिव स्वरूप में शिवलिंग रूप में पूजित होते हैं और साकार रूप में मूर्ति, चित्र, यंत्र स्वरूप में पूजित होते हैं, शिव के साधक को न तो अपमृत्यु का भय होता है, और न ही रोग का, और न ही शोक का, क्योंकि जहां शिव हैं वहां यमराज भी नहीं आ सकते, शिवत्व तो एक रक्षा चक्र है, शक्ति चक्र है, ब्रह्म चक्र है, जो साधक को हर प्रकार से सुरक्षित कर देता है।
इस साधना से साधक के सभी अभीष्ट पूर्ण होते हैं, साथ ही उसमें सृष्टि, पालन व संहार की शक्ति विद्यमान होने लगती है। जिससे वह अपने जीवन के सभी न्यून पक्षों को समाप्त कर जीवन की प्रगति व वृद्धि को पूर्णतः आत्मसात कर पाता है। यह साधना जीवन के सभी पक्षों को पूर्ण करता है। क्योंकि इसी के आधार पर ही मानव जीवन गतिशील होता है।
यह साधना मौनी अमावस्या 27 जनवरी अथवा किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न कर सकते हैं। अपने सामने एक बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर चावल की ढ़ेरी बनायें, उस पर गणपति स्वरूप में एक सुपारी स्थापित करें। पश्चात् पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें।
अब एक ताम्र पात्र में सिद्धाश्रम चैतन्य यंत्र व त्रिदेव गुटिका स्थापित रखकर उसका पंचामृत स्नान करायें, फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर एक पात्र में स्थापित कर दें। अबीर, कुंकुंम, केसर, चंदन, मौली से पूजन कर धूप, दीप दिखायें व खीर का प्रसाद अर्पित करें।
अब निम्न मंत्र का 11 माला मंत्र जप त्रिशक्ति माला से पूर्ण करें।
सम्पूर्ण पूजन पूर्ण होने पर साधक दोनों हाथों में सुगंधित पुष्प को अंजलि में लेकर भगवान को अर्पित करें, कि अपनी अभीष्ट सिद्धि हेतु अपनी सम्पूर्ण पूजा समर्पित करता हूं। साधना समापन पर सभी सामग्री किसी पवित्र सरोवर अथवा नदी में विसर्जित कर दें।
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