





यह साधना सिर्फ धन प्राप्ति की साधना ना होकर जीवन की सभी न्यूनताओं रोग, ऋण, शत्रु बाधा, नपुंसकता, काम शक्ति की क्षीणता आदि नकारात्मक ऊर्जा को भस्मीभूत कर जीवन के सभी सकारात्मक ऊर्जा का विकास करना है। चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति होती है। यही मां भगवती जगदम्बे के त्रिगुणात्मक स्वरूप का विस्तार दस महाविद्याओं में कमला महाविद्या उन्हीं के महालक्ष्मी स्वरूप की साधना है। और यही आद्या शक्ति भगवान कृष्ण की योगमाया राधा हैं। इनसे ही जगत में काम, रस, प्रेम, सौन्दर्य, आकर्षण, वशीकरण, सम्मोहन का प्रादुर्भाव होता है। भगवान नृसिंह के साथ रमा रूप में सभी आसुरी शक्तियों का यही विनाश करती हैं। जब भगवान विष्णु बैकुण्ठधाम में विराजमान होते हैं तो उनके साथ कमलवासिनी के रूप सारे सृष्टि को संचालित करती हैं। इस साधना के बाद यह असंभव है कि व्यक्ति के जीवन में दरिदता अथवा हीनता रह जाये। जिस प्रकार पद्मगंधा छुपाये नहीं छुपती और दिव्यता से भर देती है उसी प्रकार कृष्णत्व साधना भी व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को आलोकित एवं सुगंधित कर देती है।
यह तो एक ऐसी अद्भुत साधना है, जो कि अपनी सम्पूर्णता से व्यक्ति के जीवन में व्याप्त दरिद्रता, कायरता, कटुता और हीनता को समाप्त करने की शक्तिमय प्रक्रिया है और लक्ष्मी के अभाव में व्यक्ति का यही स्वरूप शेष रह जाता है, हताश, निराश, चिंतित, चिड़चिड़ा और उदास, जो केवल शक्ति की विशिष्ट कृपा से ही समाप्त हो सकता है। इसे केवल एक साधना के रूप में नहीं, जीवन की अनिवार्यता के रूप में समझना ही श्रेष्ठ होगा और इससे व्यक्ति के जीवन में आ सकती है पूर्ण निर्भीकता, पूर्ण निश्चिंतता। मानसिक शांति प्राप्त करने की इससे श्रेष्ठ कोई साधना ही नहीं।
जगत के पालन कर्ता भगवान विष्णु है और विष्णु शुद्ध तत्व युक्त निराकार-साकार स्वरूप हैं। और भगवती लक्ष्मी उनका माया स्वरूप हैं, प्रकृति स्वरूप है यह लक्ष्मी ही है जो कि अपनी शक्ति द्वारा संसार को इच्छा मोहमाया, भौतिकता प्रदान करती है योगियों के लिए यह विद्या कमला लक्ष्मी है, जो उनमें कुण्डली जागरण की क्रिया प्रदान करती है वहीं सांसारिक व्यक्तियों के लिये यह सौन्दर्य, भाग्य, श्रेष्ठ, दृश्य, प्रकृति, माधुर्य प्रेम, उन्नति, संगीत, पंचतत्व और उनका समायोजन, मन, प्राण चेतना का स्वरूप है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जगत में मनुष्य के पंच तत्व, पंच इन्द्रियां बाह्य रूप से और आंतरिक रूप से लक्ष्मी की कृपा से ही क्रियाशील रहती हैं और लक्ष्मी के कारण से ही उसके जीवन में मधुरता आती है। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि लक्ष्मी की आवश्यकता केवल गृहस्थ व्यक्तियों को ही पड़ती है, संन्यासियों को लक्ष्मी की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में तो संन्यासियों को गृहस्थ व्यक्तियों से अधिक लक्ष्मी की आवश्यकता पड़ती है।
गृहस्थ व्यक्ति इसी शक्ति के माधयम से अपने घर-परिवार का पोषण करता है और स्व उन्नति की ओर अग्रसर होता है, जबकि श्रेष्ठ योगी, सन्यासी भी इसी साधना से समाज में चेतना देने का कार्य करते हैं। उन्हें महान् कार्य करने पड़ते हैं और अपने कार्यों का विस्तार केवल एक स्थान पर नहीं अपितु हजारों स्थानों पर करना होता है इसलिये योगियों, संन्यासियों, गृहस्थियों के लिये भगवान कृष्ण की सोलह कलाओं से आपूरित लक्ष्मी की आवश्यकता जीवन के प्रत्येक मार्ग पर होती है। प्रत्येक गृहस्थ के लिये भगवान श्री कृष्ण प्रेरणा स्रोत हैं जिन्होंने गृहस्थ और समाज के प्रत्येक धर्म को श्रेष्ठता के साथ निभाया और मानव समाज को श्रीमद्भागवत के ज्ञान से आलोकित किया।
वर्तमान में जहां व्यक्ति एक पत्नी, एक-दो बच्चे, व्यापार को ही सही ढंग से संभाल नहीं पाता, वहीं कृष्ण ने हजारों रानियों, प्रेमिकाओं के साथ ऐश्वर्य, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा से पूर्ण जीवन व्यतीत किया। उनके जीवन में भी बाधायें पग-पग पर खड़ी रहीं। पर वे कभी विचलित नही हुये। कर्मरूपी अर्जुन का संदेश उन्होंने पूरे जगत को दिया। और संसार को यह बताया कि धर्म, यश, सम्मान, प्रेम, ज्ञान, नीति से भी जीवन जिया जा सकता है, यदि व्यक्ति उस मूल शक्ति को समझे तो, भगवान कृष्ण के उसी मूल शक्ति को आत्मसात कर व्यक्ति गृहस्थ के प्रत्येक धर्म का सुन्दर ढंग से निर्वाह कर सकता है।
अपने सभी अभावों और धन हीनता को दूर कर सकता है। इसके लिये आवश्यकता है कृष्णत्व के भाव को ग्रहण कर आद्याशक्ति राधा स्वरूपा लक्ष्मी के माध्यम से नीति, धर्म, यश, सौभाग्य, सम्मान, अर्थ, आरोग्यता प्राप्त करने की। और यह संभव है कृष्णत्व कमला शक्ति धनदा साधना के माध्यम से। जिससे भौतिक जीवन की सभी न्यूनताओं, पारिवारिक कलह, निर्धनता, बच्चों का आज्ञाकारी न होना, घर में किसी न किसी प्रकार का दोष बना रहना आदि विपदाओं से सरलता से मुक्ति के साथ योगेश्वरमय जीवन प्राप्त होता है।
5-9-2015 या किसी भी शुक्रवार को साधक स्नानादि से निवृत्त होकर अपने पूजा स्थान को स्वच्छ करें और श्वेत आसन बिछाकर पूर्व की ओर मुंह करके बैठें। पृथ्वी पर स्वास्तिक बनाकर पूजन करें और उस पर आसन बिछाकर स्थान ग्रहण करें। अपनी दाहिनी ओर घी का दीपक प्रज्ज्वलित करें जो सम्पूर्ण साधना काल में जलते रहना आवश्यक है। फिर भगवती कमला व कृष्ण का ध्यान करें।
ध्यान
उद्यन्मार्तण्ड कान्ति विगलित कवरीं कृष्ण
वस्त्रवृतांगीम् दण्डं लिंग कराब्जैर्वरमथ भुवनं
सन्दधतीं त्रिनेत्रम्।। नाना रत्नैर्विभांति स्मित मुख
कमलां सेवितां देव देव सर्वै। र्भार्या राज्ञीं नमो भूत स
रवि कुल तनुमाश्रये ईश्वरीं त्वाम्।।
विनियोग
ऊँ अस्य श्री सिद्ध मंत्रस्य हिरण्यगर्भ ऋषिः।
अनुष्टुप छन्दः। श्रीं महाकाली महालक्ष्मी महा
सरस्वत्यों देवताः श्री बींज ह्रीं शक्तिः क्लीं कीलकं।
सर्व क्लेश पीड़ा परिहार्थ सर्व-दुख दारिद्रय नाशार्थ
सर्व कार्य सिद्धयर्थं च श्री सिद्ध लक्ष्मी मंत्र जपे
विनियोग।
न्यास
हाथ में पुष्प लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
ऊँ ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि। गायत्रीश्छन्दसे नमः
मुखे। श्री जगन्मातृ महालक्ष्म्यै देवतायै नमः हृदि।
श्रीं बीजाय नमः गुहये। सर्वेष्ट सिद्धये मम धनाप्तये
ममाभीष्ट प्राप्तये जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
अब सामने बाजोट पर स्थापित मां भगवती महालक्ष्मी के चित्र का संक्षिप्त पूजन करें एवं किसी पात्र में धन प्रदायिनी कमला महायंत्र को स्थापित करें व यंत्र के चारों ओर 4-4 यानि 16 हकीक पत्थर स्थापित कर (जो भगवान कृष्ण के 16 कला स्वरूप है) पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें।
पश्चात् यंत्र का कुंकुंम, पुष्प, पुष्प माला, अक्षत से पूजन कर नैवेद्य का भोग लगावें। सामने ताम्बूल, फल और दक्षिणा समर्पित करें। इसके बाद साधक सामने शुद्ध घृत का दीपक लगावें, व अगरबत्ती प्रज्ज्वलित करें। पहले पृष्ठ पर दिय गये लक्ष्मी के 16 शक्तियों के नाम का उच्चारण करते हुये 16 बिन्दी कुंकुंम से यंत्र पर लगायें। इसके पश्चात् कृष्णतत्व योगेश्वर माला से लक्ष्मी सायुज्य कृष्ण मंत्र का 11 माला जप करें।
इसके पश्चात् भगवती लक्ष्मी की आरती एवं गुरू आरती सम्पन्न करें। यंत्र को पूजा स्थान में रहने दें व माला को यंत्र के सम्मुख स्थापित कर दें। भविष्य में जब भी कभी आर्थिक प्रतिकूलता का अनुभव हो तो इस माला से एक माला उपरोक्त मंत्र का जप करें।
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