





उपनिषद्कार कहते है कि मनुष्य को अपने आंतरिक गुणों की ओर विशेष सचेत रहना चाहिए क्योंकि अंततः मनुष्य का लक्ष्य ब्रह्म का साक्षात्कार करना ही हे। वहीं आदि काल से ही बाह्य रुप पर भी विशेष बल दिया गया हे। इन दोनों बातों में विरोधाभास नहीं है। यह मनुष्य जीवन अपने आप को आंतरिक तौर पर श्रेष्ठ बनाने के लिए और बाह्य रुप को भी श्रेष्ठ बनाने के लिए ही प्राप्त हुआ हे।
ईश्वर द्वारा प्रदान देह को सजाने संवारने में मनुष्य जितना समय लगाता है, उतना समय तो किसी ओर कार्य में नहीं लगाता। प्राय: सौन्दर्य को केवल स्त्री से जोड़ा जाता हे और इसी कारण से स्त्री सौन्दर्य की चर्चा तो कई ग्रन्थों मे मिल जाती है पर ऐसे ग्रन्थ बहुत कम हें जिन्होंने पुरुष सौन्दर्य की व्याख्या की है। परशुराम तंत्र ऐसा ही एक ग्रन्थ है जिसमें नारी के साथ-साथ पुरुष सौन्दर्य की भी चर्चा की है। इसमें यह स्पष्ट रुप से बताया गया है कि नारी सौन्दर्य का जितना महत्व है, उतना ही महत्व पुरुष सोन्दर्य का भी है।
परशुराम तंत्र में पुरुष के सौन्दर्य की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि पुरुष का सौन्दर्य उसकी वीरता, ज्ञान, आत्मविश्वास, कार्यक्षमता, विपरीत परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता आदि हैं। लम्बा, भरा-पूरा कद, उन्नत ललाट, बडी-बड़ी दिव्य और तेजस्वी आंखें, उभरा हुआ वक्षस्थल, लम्बी भुजायें और उसके साथ-साथ देह सौष्ठव मजबूती, पौरुष, साहस और खतरों से जूझने की प्रवृति रखने वाला ही सही पौरूषवान कहलाता है।
पोरुषता तो एक ऐसा सोन्दर्य हे जो वास्तव में ही दर्शनीय और आकर्षक सम्मोहक युक्त हो, एक ऐसा सोन्दर्य जिसे देखते ही स्त्रियां ठगी सी खड़ी रह जाये, एक ऐसा सौन्दर्य जो वास्तव में ही अदम्य साहस का प्रतिबिम्ब हो और ऐसा ही पुरुष सोन्दर्य एक मानव रति अनंग साधना से प्राप्त कर सकता है।
इस ग्रन्थ में नारी सोन्दर्य की भी व्याख्या की हे जो कुछ इस प्रकार है। इसमें बताया गया है कि ईश्वर ने पुरुष और नारी का एक समन्वित स्वरुप बताया है। जहां जीवन में पुरुष सौन्दर्य की आवश्यकता है वहीं नारी सौन्दर्य की भी एक मधुरता, प्रफुल्लता और दिव्यता है। दुबला, पतला और मांसल शरीर, गोरा रंग, अण्डाकार चेहरा, उन्नत उरोज ओर मुट्ठी में आने लायक कमर। एक ऐसा शरीर जो अपने आप में खिले हुए गुलाब की याद दिलाता हो, एक ऐसा गौर वर्णीय शरीर जिसे देखते ही पौरुष वर्ग ठिठक कर खड़ा रह जाता है, एक ऐसा शरीर जो मधुर संगीत की याद दिलाता हो और ऐसे ही शरीर को स्त्री का सौन्दर्य कहा गया है जिसे आप इस साधना की सहायता से प्राप्त कर सकते हें।
सौन्दर्य शब्द तो अपने आप में जादू का सा असर दिखाता है। संसार में शायद ही कोई स्त्री या पुरुष होगा जो अपने आप को सोन्दर्यमय न दिखना चाहता हो। सौन्दर्य और स्त्री तो अपने आप में एक दूसरे के पर्याय ही हें पर यह सौन्दर्य यह आकर्षण स्वतः ही प्राप्त नहीं होता है।
प्रभु सुन्दर शरीर तो दे देता हे पर उसमें आकर्षण और कशिश तो व्यक्ति के प्रयत्न से ही सम्भव है। सौन्दर्य विशेषज्ञों ने तो नारी को सुन्दर, सुन्दरतम बनने की बात कही है। और यह सत्य भी हे कि जो मनुष्य सौन्दर्य की पराकाष्ठा पर खरा उतरता है उसमें आत्म विश्वास कूट-कूट कर भरा होता है या यह कहा जाये कि एक सौन्दर्यवान मनुष्य में आत्मविश्वास प्रभु डाल कर ही उसे भेजते हैं।
परन्तु ऐसा सोन्दर्य सामान्यतः देखने को नहीं मिलता है। आजकल जो कुछ देखने को मिलता हे वह हे सोन्दर्य प्रसाधन से पुता हुआ चेहरा। चेहरे पर जो ओज, ताजगी और निखार होना चाहिए वह कहीं पर भी दिखाई नहीं देती।
आज जो कुछ भी है वह सब नकली है, ढका हुआ है। चाहे ऊपर से जो भी दिखाई दे पर वह सोन्दर्य की परिभाषा से कोसों दूर है। सोन्दर्य एक आनन्द का स्रोत ओर मधुरता का प्रवाह है और ऐसे सौन्दर्य को प्राप्त करना तो साधना के द्वारा ही संभव हे।
भारतीय शास्त्रों में सौन्दर्य को जीवन का उत्साह माना है। यदि जीवन में सोन्दर्य नहीं हे तो वह जीवन नीरस और उदास हो जाता है। हम में से अधिकांश व्यक्ति ऐसा ही जीवन जी रहे हैं, हमारे होठों की मुस्कुराहट समाप्त हो गई है, चेहरे की मांस पेशियां सख्त और निर्जीव सी हो गई हे जिसके फलस्वरुप हम प्रयत्त करके भी खिलखिला नहीं सकते, उन्मुक्त रूप से हंस नहीं सकते, मुस्कुरा नहीं सकते।
एक प्रकार से हमारा जीवन बंधा हुआ सा बन गया है ओर जिस तरह से एक जगह रूके हुए पानी से सड़ान्ध पैदा हो जाती हे, इसी प्रकार रुका हुआ जीवन निराश ओर बेजान हो जाता हे। उसका कारण हम सौन्दर्य की परिभाषा भूल गये हें, सोन्दर्य साधना हमारे जीवन में रही ही नहीं है, हम धन के पीछे भागते हुए एक प्रकार से अर्थ लोभी बन गये हैं, जिसकी वजह से जीवन की अन्य वृत्तियां लुप्त हो गई हैं।
इसके विपरीत यदि हम अपने शास्त्रों को टटोल को देखें तो देवताओं ने और हमारे पूर्वजों ने प्रमुखता के साथ सोन्दर्य साधनायें सम्पन्न की हें, सौन्दर्य को जीवन में प्रमुख स्थान दिया है। देवताओं की सभा में नित्य अप्सराएं नृत्य करती थी। वशिष्ठ के आश्रम में तो अप्सराओं का निवास था। विश्वामित्र ने भी सौन्दर्य साधना के बल पर ही जीवन को पूर्णता प्रदान की थी।
ये सभी बातें इस बात की सूचक हैं कि जीवन तो वही है जिसमें एक छलछलाहट हो, एक नित्य नवीनता हो, किसी भी प्रकार की कोई कुण्ठा न हो और ऐसा जीवन प्राप्त करना ही जीवन की श्रेष्ठता है। जहां सामान्य मानव के लिए ऐसा जीवन प्राप्त करना एक कल्पना मात्र हे वहीं एक साधक के लिए यह साधना एक वरदान स्वरुप ही तो हे।
आज के युग में मानसिक चिंतायें, तनाव, अत्यधिक धूम्रपान, शराब और अन्य कई कारणों से ऐसे उत्तम कोटि के सौन्दर्य देखने को नहीं मिलते, परन्तु प्रत्येक पुरुष या स्त्री चाहती है कि उसे अद्वितीय सौन्दर्य कि प्राप्त हो, उसके जीवन में मधुरता और आनन्द प्राप्त हो और ऐसा इस युग में भी सम्भव है साधना द्वारा- इस साधना को सम्पन्न करने के लिए लम्बे-चोडे विधि-विधान की आवश्यकता नहीं है। इस साधना को सम्पन्न करने के लिए परशुराम प्रणीत कामदेव रति यंत्र जो कि अनंग मंत्र से सिद्ध और उर्वशी चेतना से प्राणासिक्त युक्त हो और सौन्दर्य युक्त दिव्य माला की आवश्यकता रहती है। यह यंत्र पूरे जीवन भर के लिए उपयोगी है पर एक यंत्र पर केवल एक पुरुष या स्त्री ही साधना कर सकती हे।
इस साधना को कोई भी पुरुष या स्त्री, बालक या बालिका, वृद्ध या अशक्त जो सौन्दर्यवान बनना चाहता है, वह कर सकता है। जो पहले से ही सोन्दर्यवान हें वे इस साधना को सम्पन्न कर अपने सोन्दर्य को ओर भी अधिक निखार सकते हें।
परशुराम तंत्र में यह स्पष्ट रुप से लिखा है कि जो जीवन में सफलता, सम्मान, यश और प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, जो ऊंचा उठना चाहते हैं, जो स्त्रियां पुरुषों पर शासन करने की आकांक्षा रखती हैं, उन सभी को यह साधना अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए।
इस साधना को रुप चतुर्दशी के दिन से प्रारम्भ करनी है। यह साधना मात्र आठ दिन की साधना है और इस साधना को सम्पन्न करने में नित्य एक घंटा ही लगता है। इस साधना को आप दिन या रात्रि में कभी भी सम्पन्न कर सकते हैं। यदि रुप चतुर्दशी के दिन से प्रारम्भ नहीं कर सकें तो इसे किसी भी शुक्रवार से भी प्रारम्भ कर सकते हैं।
चतुर्दशी के दिन पुरुष स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर आसन पर बेठ जायें और यदि स्त्री साधिका हो तो वह अपने बालों को धो कर पीठ पर फेला कर आसन पर बेठ जाये। सामने किसी पात्र में कामदेव रति यंत्र स्थापित कर दें और सर्वप्रथम उसे जल से स्नान करवायें ओर फिर उसे पोंछ कर उस पर कुंकुम का तिलक करें।
इस साधना में दीपक जलाने की कोई आवश्यकता नहीं हे, केवल सुगन्धित धूप या अगरबत्ती जला दें। अब ग्यारह पुष्पों को (यदि सम्भव हो तो गुलाब के पुष्पों का प्रयोग करें) यंत्र पर चढ़ाने का विधान हे। प्रत्येक पुष्प को यंत्र पर चढाते हुए निम्न मंत्र का जप करें और थोड़ा जल भी चढायें।
अब सोन्दर्य युक्त दिव्य माला से कामदेव रति मंत्र की नित्य 6 माला मंत्र जप करें।
मंत्र जप समाप्त होने पर माला को गले में धारण कर लें ओर कामदेव रति यंत्र पर जो पुष्प चढ़ाये हैं उनमें से कुछ पंखुडियों को प्रसाद के रुप में ग्रहण करें और जो जल चढाया है उसमे से एक-एक आचमनी जल लेकर छह बार थोड़ा-थोड़ा पी लें।
इस प्रकार यह मंत्र जाप निश्चित समय पर इसी क्रिया के साथ आठ दिन तक करें। आठवें दिन साधना समाप्ति पर उस कामदेव यंत्र को अपने गले में या बांह पर अथवा कमर में धागे में पिरो कर पहन लें व माला को नदी में प्रवाहित कर दें।
ऐसा करने पर वह स्वयं अपने आप में होते हुए परिवर्तन को अनुभव कर सकंगा। आप देखेगे कि किस प्रकार आपके आस पास के लोग आपकी सामीप्यता प्राप्त करने के लिए तत्पर बने रहते हें।
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