





उस दिन मैं शाम को कार्यालय से घर जल्दी वापस आ गया था, मन बहुत ही बैचेन था, निराशा-हताशा में इच्छा हो रही थी, कि नौकरी छोड़ दूंगा, तो करूंगा क्या? यही प्रश्न बार-बार मानस पटल पर उभर कर मानो मेरे निर्णय को चुनौती दे रहा था।
शुरू से ही मेरी रूचि संगीत की ओर विशेष रूप से रही है, परन्तु दुर्भाग्य यह कि चाह कर भी मैं इसमें इच्छित सफलता नहीं प्राप्त कर पा रहा था—-और यह बात सर्वविदित ही है कि कला के प्रेमी को नौकरी शोभा नहीं देती और न ही उसका रूझान नौकरी की तरफ संभव है।
अनमने मन से उठ कर मैंने अपने लिए एक प्याली चाय बनाई और आराम कुर्सी पर बैठ कर उस किताब के पृष्ठ उलटने लगा, जो मैंने पिछले सफर में ‘टाइम पास’ के लिए ली थी।
पुस्तक ज्यादा रूचिकर नहीं थी, परन्तु उसका एक खण्ड मेरा ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल हुआ। उसमें कुछ साधनाएं भी छपी थीं—-और उन्हीं में से एक थी ‘मधुश्रवा गन्धर्व कन्या’ की साधना—- ‘पुस्तक के अनुसार मानव योनि के अलावा ब्रह्माण्ड के अन्दर सैकड़ों इतर योनियां भी व्याप्त हैं यथा- यक्ष, किन्नर, विद्याधर, गन्धर्व, नाग कन्याएं आदि। इन सभी में दिव्य क्षमताएं होती हैं और ये सभी मानव से सम्पर्क के लिए लालायित रहते हैं। अतः कोई भी व्यक्ति यदि किसी भी प्रकार से इनके सम्पर्क में आ जाता है, तो वे अपनी क्षमतानुसार उसकी मदद करते हैं, जिससे व्यक्ति समाज में पूर्ण यश, सम्मान आदि प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।
जब मैं पढ़ते-पढ़ते मधुश्रवा गन्धर्व कन्या पर पहुंचा, तो एक क्षण तो खुशी के मारे मेरी चीख ही निकल गई—- मुझे अपना स्वप्न सत्य सा होता दिखाई दे रहा था। पुस्तक में यह वर्णित था, कि जो कोई इस साधना को सिद्ध कर लेता है वह स्वतः ही उच्चकोटि का संगीतज्ञ, गीतकार एवं कला के क्षेत्र में अद्वितीय हो जाता है, विद्वत् समाज में उसका पूर्ण सम्मान होता है और वह धन, यश, मान, वैभव आदि सब कुछ प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।
डूबते को जैसे तिनके का सहारा—- शायद मैं कुछ कर पाऊंगा—- पुस्तक में मधुश्रवा साधना भी अंकित थी, जिसे मैंने भली भांति हृदयंगम कर लिया, परन्तु एक बात जो बार-बार मुझे कचोट रही थी, वह यह कि मैंने अभी तक जीवन में कोई गुरु नहीं बनाया था और बिना गुरु के साधना– – परन्तु उसके बाद घटनाएं इतनी तीव्र गति से घटित होती गई। उसी रात स्वप्न में मुझे सफेद धोती-कुर्ता पहने एक आकृति दिखाई दी थी—- अत्यधिक दिव्य व्यक्तित्व था— उनका हाथ आशीर्वाद मुद्रा में उठा हुआ था और वे कह रहे थे- ‘भय रहित होकर साधना आरम्भ करो—- निश्चय ही आरम्भ करो—।
मैं झटके से नींद से उठ बैठा और मैंने तुरन्त बत्ती जलाई— रात्रि के साढ़े तीन बजे थे—कक्ष में मेरे सिवा कोई नहीं था—-हां! एक अलौकिक सुगन्ध वातावरण में चारों ओर व्याप्त थी।
सुबह स्वप्न को याद करके मन में अत्यधिक पुलकित था। मैंने उसी दिन से साधना प्रारम्भ करने की ठानी और सभी साधना सामग्रियों को एकत्र करने का प्रयास किया, इस बीच पूरा एक माह गुजर गया।
सभी साधना सामग्रियों के एकत्र होने के बाद मैं शुक्रवार के दिन रात्रि दस बजे के उपरान्त एकान्त कक्ष में पीत वस्त्र धारण कर पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया और पुस्तक में वर्णित विधि से साधना प्रारम्भ कर दी, तथा दिये गए मंत्र का जप करने लगा। मंत्र जप समाप्त होने पर वहीं भूमि पर ही कम्बल बिछा कर उस पर सो गया। इस प्रकार दूसरा और तीसरा दिन भी निर्विघ्न ही बीता—- फिर चौथे दिन– मैं साधना के लिए आसन पर बैठा ही था, कि गुलाब और चन्दन की सुगन्ध का एक तीव्र झोंका कहीं से आकर नथुनों में समा गया—- कुछ क्षणों के लिए तो मैं मदहोश ही हो गया—- परन्तु अगले ही क्षण चेतना वापस लौटी और मैं अपने आसन पर जा बैठा। अभी मंत्र जप आधा ही हुआ था, कि घुंघरुओं की छम-छम और चूडि़यों की खनखनाहट वातावरण में गूंज उठी— वहां कोई दिखाई तो नहीं दे रहा था, परन्तु ध्वनि निरन्तर ही आ रही थी और जब तक मेरी साधना पूरी नहीं हो गई, तब तक आती ही रही।
पांचवी रात को कुछ खास नहीं हुआ! जब मैं साधना करके उठा, तो ऐसा लगा मानो कोई मेरे पास में उठ कर कक्ष के बाहर गया है—-
छठे दिन मैं पूर्ण उत्साह के साथ साधना में संलग्न था— जब कुछ मालाएं ही शेष रह गई थीं, बिम्बात्मक रूप में एक स्त्री हवा में तैरती हुई सी मेरे समक्ष उपस्थित हुई और ठीक मेरे सामने आकर बैठ गई—-
उसका सौन्दर्य अनुपम था, अनिवर्चनीय था, अद्वितीय था— ऐसा लग रहा था, मानो कहीं स्वर्ग से अमृत का निर्मल निर्झर इस धरा पर उतर आया हो— वैसा अद्वितीय सौन्दर्य मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा था और जब देखा, तो देखता ही रह गया— कुछ समय के लिए तो मैं अपने आपको भी भूल गया, माला हाथ में स्थिर पड़ी थी और होंठ— शायद कोई गीत गुनगुनाने लगे थे— तभी मेरे कानों में उस दिव्य पुरूष की आवाज गूंजी, जिसे मैंने पहले दिन स्वप्न में देखा था- मंत्र जप बंद नहीं होना चाहिए, संयम पूर्वक मंत्र जप करते रहो।
इस आदेश को सुनते ही मेरी चेतना वापस लौटी और अपनी आंखें बंद कर पूर्ण मनोयोग पूर्वक मंत्र जप करने का प्रयास करने लगा— परन्तु आंखें कहां मेरी आज्ञा मान रही थीं, वे तो बस उस अद्वितीय सौन्दर्य को अपने में बसा लेने को व्यग्र थीं—- पलकें बार-बार खुल जाती और निगाहें उस अद्वितीय सुन्दरी पर केन्द्रित हो जाती।
उस रात मुझे नींद नहीं आई—- बार-बार उस स्त्री का बिम्ब मेरी आंखों के सामने नाच उठता और एक अजीब सी खुमारी मुझे मदहोश कर देती— सारा कक्ष उसी के बदन की खुशबू से महक रहा था——
सातवीं रात उस साधना की आखिरी रात थी— मैंने मंत्र जप प्रारम्भ ही किया था, कि तभी पाजेब की छम-छम सुनाई दी— मैंने आंखें खोलीं, तो देखा-संगीत की सप्त लहरियों के साथ कल वाली स्त्री ही मेरे सामने उपस्थित थी, बिम्बात्मक रूप में नहीं, सशरीर कई गुणा ज्यादा आकर्षण— ज्यादा मोहक—
मैंने बल पूर्वक उधर से अपना ध्यान हटा कर साधना में केन्द्रित किया—- वह चल कर मेरे पास आई और मेरे साथ सट कर बैठ गई और मेरे कन्धों पर उसने अपना सिर टिका दिया, उसकी गर्म सांसे मेरे बदन से टकरा कर एक अजीब सी उत्तेजना को जन्म दे रही थीं—- कुछ पल के लिए तो मुझे होश ही नहीं रहा, ऐसा लगा, कि मैं उन सांसों की गर्मी से पिघलता चला जा रहा हूं।
विचार उठा, कि माला को एक किनारे रख कर मैं उसी झील सी गहरी आंखों में डूबता चला जाऊं—– तभी उस दिव्य पुरूष का बिम्ब मेरी आंखों के सामने साकार हुआ और उसने मंत्र जप जारी रखने का संकेत किया। मैंने अपना ध्यान उसकी तरफ से हटाने की कोशिश की और पुनः मंत्र जप में संलग्न होने की कोशिश करने लगा परन्तु मंत्र जप करते रहना अत्यधिक कठिन था—- इस बीच उसने न जाने कितने ही प्रश्न किये—- परन्तु मैं कुछ नहीं बोला और केवल मंत्र जप करता रहा—- जब मेरा मंत्र जप पूर्ण हुआ, तो मैंने पहले से ही लाकर पास में रखी गुलाब के पुष्पों की माला उसके गले में पहना दी—-
ऐसा करते ही उसने मुझसे कहा- मैं मधुश्रवा हूं, तुमने मुझे सिद्ध किया है और अब मैं तुम्हारे साथ प्रेमिका रूप में रहने के लिए वचनवद्ध हूं। जब भी तुम मुझे याद कर मेरे मंत्र का ग्यारह बार उच्चारण करोगे, मैं तत्काल तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊंगी।
वह दिन है और आज का दिन— वह नित्य मेरे पास आती है, मुझे संगीत एवं दूसरी कलाओं के अनेक गोपनीय रहस्यों को बताती है, मेरी समस्याओं का समाधान करती है और प्रेम की अमृत वर्षा कर मुझे आनन्द प्रदान करती—– उसके साहचर्य में कब मैं धीरे-धीरे संगीत के क्षेत्र में उच्चता और प्रसिद्धि प्राप्त करता गया, मैं खुद नहीं जानता—- आज मुझे कोई भी वाद्य यंत्र बजाने में मुश्किल नहीं होती, जब मैं गाता हूं तो लोग कहते हैं, कि मानो कानों में मधु उड़ेल दिया हो—– सर्वत्र मेरे गीत-संगीत की सराहना होती है, उच्चकोटि के विद्वानों ने भी मेरी प्रसंशा की है—- यह सब उस गन्धर्व कन्या के कारण ही हुआ है और आज मेरे पास सब कुछ है-धन, वैभव, यश, सम्मान—- और उससे बड़ी बात तो यह है, कि मुझे पूज्य गुरुदेव के चरण कमलों में स्थान प्राप्त हुआ। जब मैं पहली बार जोधपुर पहुंचा और उनके कक्ष में कदम रखा, तो एक क्षण के लिए तो मैं गहन आश्चर्य में डूब गया—मेरे सामने और कोई नहीं, सफेद धोती-कुर्ता पहने वहीं व्यक्तित्व बैठा था, जिसके मार्गदर्शन में मैंने यह साधना सम्पन्न की थी तथा जिसकी मधुर ध्वनि पहले भी मेरे कानों में अमृत घोल चुकी थी।
मधुश्रवा साधना शीघ्र ही फलप्रद होती है, क्योंकि यह स्वयं भी मानव के संग स्वर्ण गौरी स्वरूप में जाने को व्यग्र रहती हैं। इसकी एक शीघ्र फलप्रदा एवं सरल साधना विधि यहां प्रस्तुत है-
1- यह साधना किसी भी शुक्रवार से प्रारम्भ ही जा सकती है। यह सात दिवसीय साधना है।
2- रात्रि दस बजे के उपरान्त पीले वस्त्र धारण कर पूर्वाभिमुख होकर बैठें। अपने सामने बाजोट पर श्वेत वस्त्र बिछा कर उस पर गुलाब की पंखुडि़यों के ऊपर ‘मधुश्रवा यंत्र’ को स्थापित कर उसका पंचोपचार पूजन करें।
3- यंत्र के ऊपर ‘स्वर्ण गौरी गुटिका’ स्थापित कर उसका भी पूजन करें और फिर ‘गन्धर्व माला’ से निम्न मंत्र का 21 माला मंत्र जप करें।
ऐसा सात दिनों तक नित्य करें, सातवें दिन जब मधुश्रवा उपस्थित हो, तो पहले से ही लाकर रखी हुई गुलाब के पुष्पों की माला उसके गले में पहना दें। ऐसा करने से साधना सिद्ध हो जाती है।
सात दिन पश्चात् ही यंत्र, माला व गुटिका को किसी नदी, तालाब या जलाशय में प्रवाहित कर दें और इस साधना के विषय में किसी को भी कुछ न बतायें।
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