



भैरव अपने तीव्र रूप में साधक को हर प्रकार से अभय प्रदान करते है।
यदि भैरव आपके साथ हैं तो संसार में कोई भी आपको किसी तरह की हानि नहीं पहुंचा सकता।
जहां है भैरव वहां है शिव और शक्ति का समन्वय साथ ही प्राप्त होता हैं।


भैरव की रम्य स्थली श्मशान! जगह-जगह चितायें जल रहीं थीं। चड़ड़-चड़ड़ की ध्वनि के साथ मृत मानवों के चर्म, मांस-मज्जा जल कर वातावरण को एक विचित्र गंध से भर रहे थे। चारों ओर व्याप्त भय जनक शब्द कठोर हृदय मानव को भी दहला देने में समर्थ थे। भारी पंखों से वृक्षों पर फड़फड़ाते गिद्ध मांस के टुकडों की प्रतीक्षा में थे और चित्ता से उठती धूम्र की अंतिम लपट शून्य में विलीन होती हुई मानों कह रही थी – बस! इस मृतक का जो शेष रह गया है, उसे लेकर मैं आकाश तत्व में मिलाने जा रही हूं— किसी के लिए वीभत्स, तो किसी के लिए अपूर्व शान्तिदायक दृश्य।
मंद चलती वायु एक क्षण के लिए रूकी, ज्यों प्रकृति की ही श्वास थम गई हो। अचानक एक ओर से आंधी का प्रचण्ड झोंका उड़ता चला गया। पास ही एक वृक्ष जड़ से उखड़ कर गिर गया। कोलाहल मच गया, सैकड़ों पक्षियों के साथ-साथ अनेक भटकती आत्माओं की प्रिय स्थली वह वृक्ष, जिसकी उभरती जड़ों पर बैठ मैं नित्य जाह्नवी का सौन्दर्य निहारा करता था, शव के समान धराशाही पड़ा था।
बीज मंत्र का जप निरन्तर जारी था, एक क्षण के लिए भी मैंने आत्मसंयम नहीं खोया था। अविचलित भाव से मैं साधना के अंतिम चरण की पूर्णाहुति में लीन था। एक ही भावना, एक ही लगन थी कि किसी भी तरह ‘कंकाल भैरव’ को सामने उपस्थित करना ही है। चाहे प्रकृति कितनी भी परीक्षा ले, भले ही यह देह समाप्त हो जाये, परन्तु यदि अब प्रत्यक्षीकरण नहीं हुआ, तो मेरा साधक होना ही व्यर्थ है, बेमानी है, अपने गुरू का इतना बड़ा अपमान असह्य है मेरे लिये। कितनी प्रार्थना के बाद उन्होंने मुझे अनुमति प्रदान की थी इस तीक्ष्ण साधना के लिए।
वर्षों से मुझे वे इसका अद्वितीय साधक बनने की प्रक्रिया कर रहे थे। उन्होंने परम दुर्लभ ‘कंकाल भैरव दीक्षा’ प्रदान कर मेरे एक-एक अणु को चैतन्य करके, उसे शक्तिमान बनाने की क्रिया की है। भला असफल या अपूर्ण कैसे हो सकती है मेरे सर्व समर्थ गुरू द्वारा दी गयी अनुपम दीक्षा और उनके द्वारा बतायी गई यह अद्भुत साधना।
अब तो पूर्ण क्षमता के साथ कंकाल भैरव जैसे पुरूष को अपने वशीभूत करना ही है, साक्षात् अपनी देह में उतार कर ही गुरू चरणों का स्पर्श करूंगा। विजय की आकांक्षा से विद्युत सी दौड़ गई मेरे सुदृढ़ शरीर में और विशिष्ट रक्षा मंत्र का उच्चारण कर सरसों के दाने आंधी की दिशा में उछाल दिये —– वातावरण साफ होता चला गया। पृथ्वी का कम्पन, आकाश की गड़गड़ाहट और पवन का वेग स्वतः ही शांत हो गये थे। तीव्र मंत्रों के घोष और आग्नेय नेत्रों से निःसृत लपटों के सामने हवन कुण्ड की अग्नि भी तीव्र हो गई थी। आह्नान मंत्रों के साथ प्रत्येक आहुति देते हुए इष्ट दर्शन की मेरी आतुरता बढ़ती जा रही थी।
अभीरू भैरवनाथो भूतयो योगिनी पतिः।
शूलपाणि खड्गपाणि कंकाली ध्रूमलोचनः।।
त्रिनेत्रे बहुनेत्रश्च तथा पिंगललोचनः।
कंकालः कालशमनः कलाकाष्टाननः कविः।।
रक्तपः पानपः सिद्धः सिद्धिदः सिद्धसेवितः।
श्मशानवासी मांसाशी खर्परासी स्मरान्तकः।।
भोर के पहले एक अपूर्व प्रकाश श्मशान में फैल गया। चारों ओर से अपूर्व सुगन्ध आने लगी। अचानक एक बलिष्ठ कृष्णवर्णीय श्वान प्रकट हुआ और भोग का लड्डू उठा कर तीव्र गति से भाग गया। मुझे स्मरण था, कि उच्चकेाटि के इष्ट अपने साक्षात् दर्शन से पूर्व अपने किसी गण को भेजा करते हैं और श्वान तो भैरव का वाहन ही है — मैं विचलित हुए बिना यज्ञ कार्य में तल्लीन रहा।
अंतिम आहुति— सारा वातावरण एकदम से कोलाहल पूर्ण हो उठा, सैकड़ों प्रकार की चीखें, हलचल और भगदड़, ज्यों कोई दैवी विपदा आ पड़ी हो। दूर बहती जाह्नवी में छटपटाहट कुछ और तीव्र हो गयी थी, पता नहीं वायु के वेग में अथवा उछल कर घटित हो रही एक विलक्षण घटना का साक्षीभूत बनने के लिये —-
—- और तभी एक भीमकाय तेजपुंज पुरूषाकृति साकार हो उठी, ऐसा लग रहा था मानो स्वयं काल ही पुरूष रूप धारण कर साकार हो गया हो। उसक आगमन के साथ ही निर्जन श्मशान में प्रचण्ड वेग से पवन प्रवाहित होने लगी, निकट उपस्थित शिलाखण्ड थर्राने लगे, देखते ही देखते सूर्य के समान तेजस्वी कंकाल भैरव के तेजस ताप से सारा वातावरण झुलसने सा लगा, तीव्र ताप से आकुल मैं अभ्यर्थना के लिए झुका ही था, कि वह भीषण प्रचण्ड एक अत्यन्त शीतल सौम्य स्वरूप में परिवर्तित हो उठा, जिसका हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ था—- कुछ ही क्षणों में वह दिव्य तेजपुंज शून्य में विलीन हो गया। मेरा अंतर अपूर्व आनन्द से उद्भासित हो उठा।
मेरी एकनिष्ठ उग्र साधना पूर्ण सफल हो गई थी। मन ही मन मैं गुरूदेव के चरणों में बार-बार प्रणिपात कर उठा, जिनकी असीम अनुकम्पा के फलस्वरूप मैं भैरव के जाज्वल्यमान स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन कर सका, उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सका। मेरा रोम-रोम हर्षित हो रहा था, मेरे शरीर का एक-एक कण मानो कह रहा हो, कि आज मैंने एक अप्रतिम साधना प्रत्यक्ष कर स्वयं तो एक सिद्धि प्राप्त की ही, एक दुर्लभ शक्ति को हस्तगत किया ही है, साथ ही आज मैंने गुरू के गौरव को भी प्रवर्धित किया है।
वह महाकाल की तीव्रतम साधना जब मैंने गुरू कृपा से सम्पन्न की तो ऐसा अनुभव हुआ जैसे मैंने तंत्र के क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर ली है, मुझे ऐसा प्रत्यक्ष आभास होने लगा कि मेरे भीतर अपार शक्ति का समावेश हो गया है और अब कोई भी मुझे किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचा सकता। मेरे चेहरे पर एक तीव्र भाव व्याप्त हो गया और हर क्षण मुझे ऐसा लगता कि रक्षाकारक भैरव देव सदा मेरे साथ हैं। ऐसी महान साधना मंत्र जप प्रत्येक साधक के लिए अपने जीवन में सफलता हेतु अनिवार्य है।
किसी भी शुभ कार्य हेतु भैरव स्थापना अवश्य की जाती है, क्योंकि भैरव रक्षा कारक देव हैं, जहां भैरव की स्थापना पूजा होती है, वहां कार्य में कोई विघ्न-बाधा नहीं आ सकती, शत्रुओं पर वज्र की तरह प्रहार किया जा सकता है। जो अपने दम पर जीये दुनिया उसी की कहलाती है। जो अपने जीवन में जोखिम उठा कर कार्य करता है, भाग्य उसी का साथ देता है और वही अपने जीवन में सफल होता है। आप जी रहे हैं और मोहल्ले के बाहर आपको कोई पहचानता ही नहीं है, फिर ऐसा जीवन किस काम का, नूतन कार्य करने का, नये जोखिम उठाने का उत्साह हर समय होना चाहिए तभी सड़े-गले जीवन से नये जीवन का निर्माण हो सकेगा।
यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि जो व्यक्ति आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं, उनके ही मार्ग में रुकावटें आती हैं, शत्रु उत्पन्न होते हैं, जो अपने जीवन को एक निश्चित गति पर कोल्हू के बैल की तरह चलने देते है, उसके शत्रु कैसे होंगे ? जो जीवन से भाग कर छुप जाता है, वह साधना का नाटक करता है, उसके शत्रु कैसे होंगे इसलिए शत्रु तो जीवन का अंग है, इनसे घबरा कर पैर पीछे हटा लिये तो उन्नति नहीं हो सकती ।
इतिहास उठा कर देखें तो हमें यह स्पष्ट मालूम पड़ेगा कि हमने केवल उन्हीं की पूजा की है जो अपने शत्रुओं से लड़े हैं और जिन्होंने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की है। चाहे वह राम हों अथवा श्रीकृष्ण, हनुमान हो अथवा महाकाली, इनमें से प्रत्येक का जीवन आख्यान राक्षस विजय से जुड़ा है। अतः आवश्यकता है कि अपने आपको प्रबल बनाया जाये, शत्रु बाधा का वीरता से सामना किया जाये और शत्रुओं पर विजय प्राप्त की जाये। संघर्ष कर जीवन में कुछ प्राप्त करने का आनन्द ही अनोखा होता है।
शिव के अंश, शिव स्वरूप, शक्ति सम्पन्न, शक्ति स्वरूप महाकाली सेवक के रूप में काल भैरव की मान्यता विख्यात है। भैरव जन-जन के देव हैं, जो साधक विशेष मंत्रों को नहीं जानता, पूजा का विशेष विधान नहीं जानता, वह भी भैरव की पूजा कर सकता है और ऐसे एक दो नहीं हजारो-लाखों उदाहरण हैं जहां सामान्य साधक को भैरव कृपा में विशेष सफलता मिली है।
भैरव की मान्यता मूल रूप से रक्षात्मक देव के रूप में ही है। बडे़ से बड़े यज्ञ में पहले भैरव स्थापना की जाती है जिससे कि भैरव अपने शक्ति से दसों दिशाओं को आबद्ध कर देते हैं फिर सम्पूर्ण कार्य में कोई विघ्न उपस्थित नहीं हो सकता है। भूत, प्रेत, पिशाच, तांत्रिक प्रयोग कैसा भी प्रबल प्रहार किया जाए और वहां भैरव उपस्थित हों तो वहां से यह प्रहार उलटे लौट आते हैं और इस प्रकार के गलत तांत्रिक प्रयोग करने वालों का ही नाश कर देते हैं।
भैरव पूजा का विधान अत्यन्त सरल है और यहां पाठकों हेतु काल भैरव के कुछ सरल प्रयोग स्पष्ट किये जा रहे हैं जिनमें सरलता से ही इनकी सिद्धि और उपयोगिता है।
स्थान में तेल का दीप प्रज्ज्वलित करें और गुग्गुल का धूप तथा अगरबत्ती इत्यादि जला दें। अपने हाथ में जल लेकर संकल्प करें कि मैं अपनी अमुक शत्रु बाधा के निवारण हेतु काल भैरव साधना सम्पन्न कर रहा हूं।
अब एक पात्र में सरसों, काले तिल मिलाएं, उसमें थोड़ा तेल डालें, थोड़ा सिन्दूर डालकर उसे मिला दें। इस मिश्रण को निम्न भैरव मंत्र का जप करते हुए ‘काल भैरव गुटिका’ के समक्ष अर्पित करते रहें –
इस प्रकार 51 बार मंत्र का जप कर पूजा में रखे, धूप और दीप से भैरव की आरती सम्पन्न करें। अब भैरव गुटिका को छोड़ कर बाकी सब सामग्री काले कपड़े में बांध कर कहीं सुनसान जगह पर जमीन में गाड़ दें और साथ ही उस पर भारी पत्थर भी रख दें। अगले दो रविवार तक भैरव गुटिका के समक्ष इस मंत्र का जप करते रहें।
यह प्रयोग इतना प्रबल है कि प्रबल से प्रबल शत्रु भी तीस दिन के भीतर शांत हो जाता है, उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं।
यह प्रयोग प्रातः काल में सम्पन्न किया जाता है। इसमें यदि स्वयं की बीमारी नाश हेतु साधना करनी है, तो अपने नाम का संकल्प लें और यदि दूसरे के नाम से साधना करनी है तो उसके नाम से संकल्प लें।
ऊँ अस्य श्री बटुक भैरव स्त्रोतस्य सप्त ऋषि
मातृका छन्दः श्री बटुकः भैरव देवता,
ममोप्सित, सिद्धयर्थ जपे विनियोगः।
अपने सामने एक पात्र में ‘काल भैरव महायंत्र’ स्थापित कर उस पर सिन्दूर चढ़ाएं तथा एक दीपक जलाएं जिसमें चार बत्तियां हों, तथा दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर बैठें। भैरव यंत्र के सामने पुष्प, लड्डू, सिन्दूर, लौंग तथा पुष्प माला, काला धागा रखें तथा मंत्र जप प्रारम्भ करें। मंत्र जप के पहले जल से भरे हुए पात्र का मुंह लाल कपड़े से बांध दें।
अब एक पात्र में तिल लें। उसमें सात सुपारी रखें तथा निम्न मंत्र का जप करते हुए यह तिल दक्षिण दिशा की ओर फेंकते रहें –
इस प्रकार 108 बार मंत्र जप के पश्चात सातों सुपारी सभी दिशाओं में फेंक दें। भैरव यंत्र को पूजा में प्रयोग लाए काले धागे को रोगी की भुजा पर बांध दें अथवा गले में पहना दें। पूजा का पवित्र जल आचमनी स्वरूप 2-3 चम्मच ही पिलाएं, क्लिष्ठ रोग से निवृति प्राप्ति होती हैं।
इस साधना को साधक सांयकाल में सम्पन्न करें, पूजा स्थान में पूर्ण रूप से शांति होनी चाहिए तथा जिस विशेष कार्य के सम्बन्ध में प्रयोग करना है, वह कार्य एक कागज पर सिन्दूर से लिख लें।
अब अपने सामने ‘काल भैरव महाशंख’ स्थापति करें। शंख के चारों ओर सिन्दूर से घेरा बना दें, सामने एक ‘नागचक्र’ स्थापित करें, भैरव शंख के दोनों ओर तीन, तीन तेल के दीपक जला दें। इसके पहले वाले प्रयोग के अनुसार संकल्प कर जल छोड़ें तथा वह कागज जिसमें कार्य लिखा है भैरव शंख के नीचे रख दें। वीर मुद्रा में बैठकर मुट्ठी ऊपर कर मंत्र जप प्रारम्भ करें –
108 बार मंत्र जप करने के पश्चात इस महा भैरव शंख को काले कपड़े में बांध कर बैग में रख दें और किसी भी मुकदमें के लिए जाते समय बैग अपने पास रखें, प्रबल से प्रबल विरोधी भी वशीभूत होकर संधि करने का इच्छुक हो जाता है। मुकदमें मे विजय प्राप्त होती है, मंत्र जप नियमित रूप से अवश्य सम्पन्न करने से अनुकूलता बनी रहती हैं।
जब तक पूर्ण सफलता न मिले आगे आने वाले सात रविवार तक मंत्र जप अवश्य की सम्पन्न करते रहना चाहिए।
पुरूषार्थ प्राप्ति क्रिया में जो प्रमुख चार शत्रु हैं शारीरिक दुर्बलता, जीवन में अकारण बढते शत्रु, मैली क्रियाओं से जीवन को मलीन बनाने वाले असुर और ग्रह बाधा के निवारण हेतु काल भैरव दीक्षा प्राप्त करने पर इन शत्रुओं से तो विजय प्राप्त होगी ही और जीवन में उच्चता और पूर्णता का भाष हो सकेगा।
जीवन का तात्पर्य ही अभय और निडरता से ओत-प्रोत होना हैं मानसिक प्रसन्नता के बाद ही आनन्द की अनुभूति प्रारम्भ होती हैं। इसीलिए व्यक्ति को बलशाली, अभय, शत्रुसंहारक, निडर और प्रभावशाली होना चाहिए।
जीवन को उक्त विशेषताओं से पूर्ण करने हेतु पूर्ण विजय श्री युक्त काल भैरव शक्तिपात दीक्षा को आत्मसात करना चाहिए। इस दीक्षा की न्यौछावर राशि मात्र 2100/- भेजने पर आप शक्तिपात दीक्षा और भैरव साधना में प्रयुक्त तीनों साधना पैकेट उपहार स्वरूप प्राप्त कर अपने जीवन की समस्त बाधाओं पर पूर्ण विजय प्राप्त कर जीवन को आरोग्य युक्त बना सकेंगें। साथ ही काल को वश में करना सम्भव हो सकेगा। कालाष्टमी दिवस 30 जून से पूर्व दीक्षा प्राप्त कर अपने जीवन को सौभाग्य, आरोग्य से ओत-प्रोत करने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो सकेगी।
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