

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में कहा हैं कि-
।। गतश्रीर्गणकान्द्वेष्टि गतायुश्च चिकित्सकान्
गतश्रीश्च गतायुश्च ब्राह्मणान्द्वेष्टि सिद्धिम् ।।
मंत्र, तीर्थ, देवता, ज्योतिष, औषधि तथा गुरु पर जिसकी जैसी भावना होती है, उसको वैसी ही अभिष्ठ सिद्धि मिलती है।
आज के इस भौतिकमय वातावरण में सुख की लालसा में व्यक्ति दिन रात दौड़ता हैं और इस दौड़ धूप के चक्कर में अपने अध्यात्म को व्यक्ति भूल सा गया हैं मनुष्य के पास इस लालसा के कारण साथ ही अर्न-गल सोच-विचार से ही जीवन घिरा रहता हैं।
मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र धैर्य हैं, यदि धैर्य है तो संकट के समय उसकी आत्ममंथन शक्ति, ही कोई रास्ता दिखायेगी। एक दूसरे से आगे बढ़ने व भौतिक सुख की लालसा में हम अपने धैर्य को, आत्मीय शक्ति को भूल चुके हैं थोड़ी सी भी असफलता आने पर हम भयभीत हो जाते है, अरबपति को भी कंगाल होते देखा गया है। बार-बार असफलता जीवन में क्यों आ रही हैं इसका उसे वास्तविक ज्ञान नहीं रहता।
आज व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार हैं अपने इस पतन का। 20 रूपये पास में होते हैं और 100 रूपये का काम करता हैं। व्यापार में नित्य समीकरण बदलने से पर उसका भंयकर रूप से पतन होता है। फैशन व उपभोक्तावादी संस्कृति ने उसे कर्जदार बना दिया हैं। जीवन के काल और बाधाओं का सामान्य व्यक्ति को ज्ञान नहीं होता और अज्ञानता स्वरूप अनेक-अनेक अर्न-गल क्रियाऐ करता रहता हैं जिससे और अधिक जीवन और न्यूनताओं और विषमताओं से घिर जाता हैं।
कालसर्प योग से जातक ‘दुर्भाग्य’ से छुटकारा पाने के लिये भौतिक उपायों का सहारा लेता है। धन प्राप्ति के लिये अनेक उपाय सोचता है। उसके लिये आवश्यक नियोजन भी करता है। बार-बार प्रामाणिक और युक्तिसंगत प्रयोग करने पर भी सफलता न मिलने पर अंतिम उपाय के लिये उसका ध्यान ‘ज्योतिष शास्त्र’ और ‘हस्त रेखा’ की ओर जाता है। मनुष्य की कुण्डली में लाभ के वक्री ग्रह एक ही स्थान पर स्थित हो अथवा भाग्य रेखा अनेक रूपों में विभक्त हो तो कालसर्प योग निर्मित होता हैं। इसके फलस्वरूप जीवन अनेक दुष् चिंताओं न्यूनताओं अभावों और अनेक-अनेक विसंगतियों से घिरा रहता हैं। साथ ही पूर्व जन्मकृत पाप दोष, शापोद्वार दोष और पितृदोष के कुयोग के फलस्वरूप जीवन नारकीय बन जाता हैं और जीवन में गतिशीलता नहीं रह पाती हैं तो निश्चित रूप से पूर्ण कालसर्प दोष रूपी कुस्थितीयों से मनुष्य का जीवन घिर जाता हैं।
उक्त स्थितियों में से आपके साथ कोई भी क्रिया हो रही हैं उसके फलस्वरूप जीवन में आनन्द हर्ष, प्रसन्नता, समाप्त सी हो गई हैं तो शीघ्र आपको कालसर्प दोष निवारण की प्रक्रिया पूर्ण रूपेण अपने जीवन में स्थापित कर हर रूप में जीवन में मधुरता आनन्द और श्रेष्ठता की स्थितियों को पूर्ण रूपेण आत्मसात करना आवश्यक हैं। इसीलिए 25-26-27 जून 2013 कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर में कालसर्प दोष निवारण साधनात्मक प्रक्रिया सम्पन्न होगी। इस शिविर में भाग लेकर अपने जीवन को सर्वागीण रूप से श्रेष्ठतम और उच्चतम बना सकेंगें।
इस शिविर का उद्देश्य जीवन को साधने की क्रिया की अग्रसर होना है। इसी कारण केवल वे ही साधक आयें जो जीवन में श्रेष्ठता के आकांक्षी हों।
प्रत्येक साधक को प्रातः 4:00 बजे उठना है और अपनी पूजा-साधना प्रारम्भ करनी है।
साधक अपने साथ स्वच्छ पीली धोती, गुरु चादर, आसन, पंच पात्र और सद्गुरुदेव का चैतन्य चित्र लेकर आयें।
साधना काल में व्यर्थ की बातों में समय व्यय न कर गुरुदेव द्वारा प्रदान किए गए मंत्रों का अधिक से अधिक जप करना है जिससे इष्ट से तारत्मय जुड़ सके।
साधना काल में बाहर का भोजन वर्जित है। गुरुधाम में ही सभी साधक स्वयं खाना बना कर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें। जिससे आपको किसी प्रकार का अन्न दोष न लगे।
किसी भी प्रकार का व्यसन सर्वथा वर्जित है।
आपको रहने दोनों समय भोजन और चाय की व्यवस्था खाने पीने का कोई अन्य व्यय नहीं उठाना है। यह स्नेह आपको गुरुदेव की ओर से ही प्राप्त होगा।
प्रत्येक साधक को 4100/- रु अग्रिम भेज कर अपना पंजीकरण 21 जून तक सुनिश्चित करवा लेना अनिवार्य है। इस न्यौछावर राशि में ही गुरुदेव द्वारा आपको इस विशिष्ट कालसर्प दोष मुक्ति साधना विधान, साधना सामग्री एवं दीक्षा प्रदान की जायेगी।
केवल साधना में भाग लेने वाले साधक ही पंजीकरण कराये और अपने साथ परिवार के अन्य सदस्यों को साथ नहीं लाये है। बहिन, बेटिया, मातायें अकेली कभी नहीं आये। यह साधनात्मक वातावरण बनाये रखने की दृष्टि से अनिवार्य है।
25 जून को साध्य बेला तक जोधपुर आना अनिवार्य हैं, 27 जून को दोपहर बाद साधना सम्पन्न कर सीधे घर को लौटना श्रेयष्कर रहता है जिससे साधना का पूर्णरूपेण लाभ प्राप्त होता हैं।
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