





आदि शक्ति भगवती नित्य है तथा देवताओं एवं मनुष्यों के कार्य के लिए वे समय-समय पर अनेक रूपों में प्रकट होती रहती हैं। जगन्मूर्ति भगवती नित्य है, उनकी उत्पत्ति अनेक प्रकार से निर्मित है।
दुर्गा नारायणी श्यामा विष्णुमाया शिवा सती,
नित्या सत्या भगवती शर्वाणी सर्वमंगला।
अम्बिका वैष्णवी गौरी पार्वती च सनातनी,
नामानि कौधुमोक्तानि सर्वेषां अधिष्ठानी च।।
आदि शक्ति भगवती नित्य है तथा देवताओं एवं मनुष्यों के कार्य के लिए वे समय-समय पर अनेक रूपों में प्रकट होती रहती हैं। जगन्मूर्ति भगवती नित्य है, उनकी उत्पत्ति अनेक प्रकार से निर्मित है।
(प्रकृति खण्ड, ब्रह्मवैवर्त पुराण)
ब्रह्मवैवर्त पुराण में नारायण एवं नारद
संवाद का विवरण आता है। नारद भगवान से कहते हैं, कि भगवती दुर्गा के सोलह उत्तम स्वरूप हैं – दुर्गा, नारायणी, ईशानी, विष्णुमाया, शिवा, सती, नित्या, सत्या, भगवती, शर्वाणी, सर्वमंगला, अम्बिका, वैष्णवी, गौरी, पार्वती और सनातनी। कृपा करके इन सोलह नामों के समुचित अर्थ बताइये, जो वेदोक्त और सर्वसम्मत हों। कलियुग में भी किस प्रकार इनकी साधना की जाए, यह ज्ञान कराइये।
इस पर भगवान नारायण बोले सृष्टि के आदि में श्रीकृष्ण ने गोलोक में सर्वप्रथम देवी के इन स्वरूपों की अर्चना की। इसके बाद ब्रह्मा ने मधुकैटभ से भयभीत होकर और बाद में तीसरे त्रिपुर से प्रेरित होकर त्रिपुरारी (शिव) ने उनकी पूजा की और फि़र वह समस्त विश्व में मुनियों, सिद्धगणों, देवों और श्रेष्ठ महर्षियों द्वारा पूजित होकर सदैव पूजित होने लगीं।
भगवती दुर्गा अपने सोलह स्वरूपों में आविर्भूत होकर सोलह अलग-अलग भिन्न-भिन्न कलाओं से युक्त होकर इस संसार की सृष्टिकर्त्री, पालनकर्त्री एवं संहारकर्त्री के रूप में जानी जाती हैं। उन्हीं के ये सोलह स्वरूपों में से श्रेष्ठ साधनाऐं यहां दी जा रही हैं, जो अपने आप में विशेष अर्थवत्ता लिए हुए हैं तथा नववर्ष के प्रारम्भ में साधनाऐं विशेष रूप में फ़लप्रद है।
इन शीघ्र फ़लदायी प्रयोगों के अलग-अलग लाभ हैं, तथा कोई भी साधक इन्हें सम्पन्न कर सकता है। इन साधनाओं को किसी भी दिन तथा वर्ष में किसी भी नवरात्रि में सम्पन्न की जा सकती है। साधना को प्रारम्भ करने से पूर्व साधक को चाहिए, कि वह आवश्यक पूजन सामग्री के रूप में कुंकुम, अक्षत, मौली, पान, सुपारी, धूप, दीप, फ़ल, गंगाजल, मिष्ठान, नारियल आदि साथ रख लें।
भगवती दुर्गा के षोडश रूपों में यहां उनके श्रेष्ठ स्वरूपों की साधना प्रस्तुत है, परन्तु उनके किसी भी स्वरूप की साधना से पूर्व निम्न प्रकार से गुरु पूजन, संकल्प, कलश स्थापन आदि अवश्य करें। उसके बाद ही साधना प्रारम्भ करें।
साधक को चाहिए, कि प्रातः नित्य क्रिया से निवृत होकर उत्तर की ओर मुख करके पीले आसन पर बैठ जाए। सामने एक छोटी चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर गुरु चित्र स्थापित करें। अपनी दाई ओर दीपक प्रज्ज्वलित करें तथा अगरबत्ती जलाकर पंचोपचार से गुरु पूजन, गणपति पूजन सम्पन्न करके गुरु मंत्र की 1 माला जप करें। बाद में अपने दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न संकल्प करें –
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो
विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीश्वेतवाराहकल्पे
कलियुगे कलि प्रथम चरणे अमुक मासे (मास
बोलें) अमुक दिवसे (दिन बोलें) अमुक
शर्माऽहं (अपना नाम बोलें) सर्वमंगल सिद्धि
निमितं सकल बाधा निवारणाय आजीवनं
परमेश्वर्यै सिद्धि निमितं मनोरथ पूर्ति निमित्तं
सकल बाधा निवारणाय आजीवनं परमेश्वर्ये
सिद्धि निमित्तं मनोरथ पूर्ति निमित्तं च अहं इमं
प्रयोगं सम्पत्स्ये।
जल भूमि पर छोड़ दें।
इसके बाद अपने दायीं ओर कुंकुंम से रंगे हुए चावल से अष्टदल कमल बनाकर जल से भरा कलश स्थापित करें। फि़र निम्न मंत्र पढ़कर गंगा जल कलश में डालें –
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति नर्मदे
सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
पुनः अक्षत, दूब, चन्दन और पुष्प छोड़कर कर उसके ऊपर नारियल रखें। इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य आदि से वरुण देव का साधारण पूजन सम्पन्न करें। दोनों हाथ जोड़कर भगवान वरुण की प्रार्थना करें –
वरुणः पाश भृत् सौम्यः प्रतीच्यां मकराश्रयः।
पाश हस्तात्मको देवो जलराश्याधिकोमहान्।।
‘मंगल’ शब्द का मोक्ष अर्थ और ‘आ’ शब्द का अर्थ दाता है, तथा जो सभी को मोक्ष प्रदान करती हैं, उसे सर्वमंगला कहा गया है। विभिन्न विघ्नों तथा समस्त शत्रु बाधाओं से विमुक्ति के लिए यह प्रयोग आवश्यक है। जीवन में सामान्य रूप से या निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि प्रत्येक जीवन के साथ अंग-संग रूप में उपरोक्त बाधाएं रहती ही हैं।
उनके निवारण के लिए यह मंगला साधना जो भगवती दुर्गा का साक्षात स्वरूप है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए इस प्रयोग को सम्पन्न करना ही चाहिए। सुख, सम्पत्ति और कल्याण अर्थ में मंगल शब्द प्रयुक्त होता है और वह सभी प्राणियों को यह प्रदान करती हैं, इसलिए उसे सर्वमंगला भी कहते हैं।
साधना सामग्री: जगदम्बा यंत्र, विघ्नहर्त्ता गुटिका, शक्ति माला।
साधना विधि: गुरु पूजन, व कलश स्थापन के पश्चात संकल्प कर विघ्नहर्ता गुटिका को साधक अपनी बाई ओर चावल की छोटी ढेरी बनाकर उस पर स्थापित करें। गुटिका पर कुंकुंम से तीन बार तिलक करें, जिससे आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक त्रिविध तापों और श्रापों का शमन हो सके। उसके बाद उस पर अक्षत समर्पित करें तथा 21 बार निम्न मंत्र का मानसिक जप करें –
।। ॐ सर्वमंगलायै विघ्नैश्वर्यै नमः।।
फि़र किसी पात्र में कुंकुंम से स्वास्तिक बनाकर जगदम्बा यंत्र को स्थापित करें, तथा भगवती सर्वमंगला का ध्यान करें –
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके,
शरण्य त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।।
ध्यानं समर्पयामि नमः।
आवाहन
मांगल्ये शुभदे देवि! सर्व शक्ति समन्विते,
आवाहयामि देवि! त्वां जगदम्बे
नमोऽस्तुते।। आवाहयामि स्थापयामि नमः।।
अर्घ्य: दाहिने हाथ में जल, कुंकुम एवं अक्षत
लेकर यंत्र पर अर्पित करें।
स्नान: यंत्र को शुद्ध जल से स्नान करावें –
गंगा सरस्वति रेवा पयोष्णी नर्मदा जलैः
स्नापितासि मया देवि! तथा शान्ति कुरुष्व मे।
स्नानं समर्पयामि नमः।
वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि नमः।
वस्त्र समर्पित करें।
चन्दन
श्रीखण्ड चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरं
विलेपनं सुरश्रेष्ठि चन्दनं प्रतिगृह्यताम्।
चन्दनं समर्पयामि नमः।
अक्षत
अक्षतान् समर्पयामि नमः। (चावल चढ़ावे)
धूपं दीपं नैवेद्यं निवेदयामि नमः।
पुष्पांजलि
पुष्पांजलिं गृहाणेमां परब्रह्मस्वरूपिणी।
भक्त्वा समर्पितं देवि प्रसन्ना भव सर्वदा।।
क्षमा प्रार्थना
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्,
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि।
ॐ तत्सत् ब्रह्मर्पणमस्तु। अनेन कृतेन पूजाकर्मणा
भगवति सर्वमंगला प्रियन्तां नमम्।
बाएं हाथ की हथेली में शक्ति माला को लेकर दाएं हाथ से ढक लें तथा ‘ॐ दुं दुगार्यै नमः’ मंत्र का पांच मिनट तक मानसिक जप कर माला को शक्ति प्रदान करें।
उसके बाद निम्न मंत्र का शक्ति माला से 11 माला सात दिन तक जप करें –
साधना समाप्ति के बाद सभी सामग्री को लाल वस्त्र में लपेट कर प्रवाहित करें।
भगवान विष्णु का नाम नारायण भी है, जो इस विश्व के पालन पोषणकर्ता धर्ता हैं, जो इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र व्याप्त होकर सर्वत्र निहित हैं। उनकी ही विशेष शक्ति का नाम नारायणी हैं जो भगवान विष्णु की अर्द्धांगिनी स्वरूप हैं। उनके ही अधीन होकर नारायणी समस्त विश्व पर नियत्रंण करती है।
यश, तेज, रूप और गुणों में यह नारायण के समान हैं अतः इनकी साधना करने से साधक को अपने जीवन में अपने मनोवांछित क्षेत्र में यश तथा ख्याति प्राप्त होती है।
भगवती के नारायणी स्वरूप की साधना करने से साधक के अन्दर शुद्धता सात्विक सरसता, सूचिता और श्रेष्ठता के भाव जाग्रत होते हैं और उसे साधना क्षेत्र में पूर्ण सफ़लता प्राप्त होने की स्थिति निर्मित होती है।
साधना सामग्री:- प्राण प्रतिष्ठित जगदम्बा यंत्र, सिद्धेश्वरी माला, नारायणास्त्र।
पहले दिन विधान के अनुसार गुरु पूजन, संकल्प तथा कलश स्थापन आदि सम्पन्न कर लें। कलश पूजन के बाद नारायणास्त्र को साधक अपनी बाईं ओर चावल की छोटी ढेरी बनाकर उस पर स्थापित करें तथा उसका पंचोपचार पूजन करें। फि़र किसी पात्र में कुंकुंम से स्वास्तिक बनाकर जगदम्बा यंत्र को स्थापित करें। उसके बाद भगवती नारायणी का धयान करें –
त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरौश्र्वरी।
त्वमेआद्या सृष्टि विधौ स्वेच्छ या
त्रिगुणात्मिका ध्यानं समर्पयामि नमः।
विनियोग:– दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न सन्दर्भ का उच्चारण करें –
अस्य मंत्रस्य नारायण ऋषि कृति छन्दः
नारायणी देवता मम सकल मनोकामना
सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास:- इस न्यास में दाहिने हाथ की उंगलियों से शरीर के विभिन्न अंगों का स्पर्श करें –
ॐ नारायण ऋषये नमः – शिरसि
ॐ दुर्गाये यशये नमः – नेत्रयोः
कृति च्छन्दसे नमः – मुखे
नारायणी देवतायै नमो – हृदि
विनियोगाय नमः – सर्वांगे
करन्यास
ॐ नमः अंगुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ दुर्गायै तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ नारायण्यै मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ यशसे अनामिकाभ्यां नमः।
प्रतिष्ठायै कनिष्ठि काभ्यां नमः।
स्वाहा करतल करपृष्ठाभ्यांनमः।
हृदयादिन्यास
ॐ नमो हृदयाय नमः।
शिवायै शिरसे नमः।
नारायण्यै शिखायै वषट्।
यशसे कवचाय हुं।
प्रतिष्ठायै नेत्रत्रपाय वौषट्।
स्वाहा अस्त्राय फ़ट्।
इसके बाद यंत्र को किसी पात्र में रखकर उसके ऊपर दूध तथा जल की धारा से स्नान कराएं तथा पुनः शुद्ध जल से स्नान करावें दूसरे पात्र में ॐ नारायण्यै पुष्पासनायै नमः’ मंत्र बोलते यंत्र को पुष्प का आसन देते हुए स्थापित करें। फि़र पंचोपचार से यंत्र का पूजन (तिलक, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप) करें। इसके बाद कुंकुंम और अक्षत मिलाकर निम्न मंत्र बोलते हुए यंत्र पर चढ़ावें –
ॐ जयायै नमः। ॐ विजयायै नमः।
ॐ अजितायै नमः। ॐ अपरिजितायैनमः।
ॐ नित्यायै नमः। ॐ विलासिन्यै नमः।
ॐ शान्तायै नमः। ॐ पूर्णायै नमः।
शुद्ध जल से यंत्र को स्नान करावें, फि़र किसी दूसरे पात्र में यंत्र को स्थापित कर उसका पंचोपचार से पूजन करें। इसके बाद चारों दिशाओं में घी के चार दीपक जला कर निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप 5 दिन तक नियमित रूप से करें –
दोनों हाथों में पुष्प लेकर प्रतिदिन जप समाप्ति के बाद निम्न श्लोक बोलते हुए यंत्र, माला तथा नारायणास्त्र पर चढ़ा दें।
या देवि सर्वभूतेषु भाग्य रुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै वैष्णव्यै च नमो नमः।।
जप समाप्ति के बाद समस्त सामग्री को किसी निर्जन स्थान में भूमि में दबा दें।
परमात्मा विष्णु ने सृष्टि के पूर्वकाल में माया को उत्पन्न किया और उस माया द्वारा समस्त विश्व को मोहित कर दिया, अतः इसे विष्णुमाया कहते हैं। परम सत्ता जिसे हम परब्रह्म कहते हैं, इस समस्त विश्व को सुचारू रूप से चलाने के लिए तीन रूपों में विभक्त हुए। भगवान विष्णु संसार के पालनकर्ता के रूप में स्थापित हुए, उन्होंने अपनी जो विशेष शक्ति है, उसके द्वारा समस्त विश्व का पालन करने के लिए अपनी माया शक्ति को आधार बना कर ही कार्य किया। इस विशेष प्रयोग को साधक द्वारा सम्पन्न करने से साधक के भीतर अपने परिवार संचालन और भोग-विलास, आनन्द की विशेष शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और उसके अन्दर नेतृत्व के गुणों का भी विकास होता है।
साधना सामग्री:- मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित जगदम्बा यंत्र, सिद्धि माला, सिद्धि फ़ल।
इसका पूजन विधान पहले दिए क्रम के अनुसार ही सम्पन्न करें। संकल्प, कलश स्थापन पूर्ववत ही करें। इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर निम्न प्रकार से ध्यान करें –
वैष्णवी ताक्र्ष्यगा श्यामा षड्भुजा वनमालिनी।
वरदा गदिनी दक्षे विभ्रती च कराम्बुजे।
फि़र दोनो हाथ जोड़कर प्रार्थना करें –
विद्युद्दाम् समप्रभां पशुपतिस्स्कन्धा भीषणाम्
कन्याभिः करवाल खेट विशिखां हस्ताभिरा सेवितां।।
इसके बाद जगदम्बा यंत्र को थाली में रख लें, फि़र पूजन आरम्भ करें और निम्न प्रकार से षोडशोपचार पूजन आरम्भ करें –
ॐ विष्णुमायायै नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
यंत्र पर दो आचमनी जल चढ़ावें।
ॐ विष्णुमायायै नमः इदं अर्घ्य समर्पयामि।
आचमनी में जल, कुंकुंम, अक्षत लेकर यंत्र पर चढ़ावें।
ॐ विष्णुमायायै नमः आचमनीयं समर्पयामि।
तीन आचमनी जल समर्पित करें।
ॐ विष्णुमायायै नमः स्नानं समर्पयामि।
गन्धा और अक्षत जल में मिला कर यंत्र पर चढ़ावें।
ॐ विष्णुमायायै नमः वस्त्रेऽपवस्त्रं समर्पयामि।
वस्त्र के प्रतीक रूप में मौली चढ़ावें।
ॐ विष्णुमायायै नमः आभूषणं समर्पयामि।
आभूषण के प्रतीक रूप में अक्षत अर्पित करें।
ॐ विष्णुमायायै नमः इदं गन्धं समर्पयामि।
यंत्र के मध्य में कुंकुंम से तिलक करें।
ॐ विष्णुमायायै नमः अक्षतान् समर्पयामि।
यंत्र पर चावल के दानें अर्पित करें।
ॐ विष्णुमायायै नमः पुष्पं समर्पयामि।
दोनों हाथों में पुष्प लेकर यंत्र पर चढ़ावें।
ॐ विष्णुमायायै नमः धूपं आघ्रापयामि।
यंत्र को धूप दिखाएं।
ॐ विष्णुमायायै नमः पादयोः दीपं दर्शयामि।
यंत्र को दीपक दिखाएं।
ॐ विष्णुमायायै नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
यंत्र पर मिष्ठान का नैवेद्य अर्पित करें।
ॐ विष्णुमायायै नमः आचमनीयं समर्पयामि।
एक आचमनी जल भूमि पर छोड़े।
ॐ विष्णुमायायै नमः ताम्बूलं समर्पयामि।
यंत्र के ऊपर एक पान चढ़ावें।
ॐ विष्णुमायायै नमः दक्षिणा द्रव्यं समर्पयामि।
दक्षिणा द्रव्यादि अर्पित करें। फि़र दोनों हाथों में पुष्पांजलि लेकर निम्न सन्दर्भ का उच्चारण करें –
ॐ सर्वसिद्धिप्रदे विष्णुमाये एहि एहि इमं पुष्पांजलिं गृहाण मम सिद्धिं देहि देहि हुं फ़ट् स्वाहा।
इसके बाद पुष्पांजलि समर्पित करें। यंत्र के बाईं ओर सिद्धि फ़ल को स्थापित कर उसका संक्षिप्त पूजन करें तथा नित्य 11 दिन तक निम्न मंत्र का सिद्धि माला से नित्य 1 माला मंत्र जप करें –
साधना समाप्ति के पश्चात यंत्र, माला तथा सिद्धि फ़ल को जल में प्रवाहित करें।
नववर्ष 2070 हर दृष्टि से मंगलमय हो सके इस हेतु जगद्जननी आद्याशक्ति भगवती शक्ति जन्मोत्सव साधना शिविर पौराणिक और सांस्कृतिक पुंज से युक्त पवित्र गोमती नदी की आधयात्मिक भूमि पर अवस्थित लखनऊ (उ-प्र) में संपन्न होगा। पापमोचनी एकादशी और भगवान सदाशिव के प्रदोष पर्व पर साधनात्मक जन्मोत्सव 6-7 अप्रेल 2013 को आयोजित किया गया है। धनरूपेण सर्वमंगला, आरोग्य बल शक्ति रूपेण नारायणी, और सौभाग्य लक्ष्मी-विष्णु स्वरूपा से युक्त शक्तिपात दीक्षाऐं प्रदान की जाएंगी।
शिविर स्थल रामाधीन सिंह इण्टर कॉलेज ग्राउण्ड आई-टी-चौराहा के पास, डालीगंज लखनऊ (उ-प्र)
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