





शुभाशीर्वाद !
वर्ष 2012 पूर्णता की ओर गतिशील है और यह विचार करना चाहिए की हमारा यह वर्ष किन-किन स्थितियों में क्या-क्या क्रियाएं करने से श्रेष्ठ रहा और क्यात क्या न्यूनताएं रही। आने वाले वर्ष में नूतन चिंतन क्या है और उसकी पूर्ति किस तरह से संभव होगी । इन सभी स्थितियों के बारे में न केवल विचार ही करना है वरन् मंथन भी करना है कि मैं अपने आने वाले भविष्य को किस तरह से उज्जवल, उच्चतम और श्रेष्ठतम रूप से प्राप्त कर सकता हूं।
सही अर्थों में भाव विचार के साथ क्रियात्मक चिंतन और कर्म की निरंतरता रहना आवश्यक है। मात्र केवल विचार करने से, योजनाएं बनाने से अथवा इच्छाएं या मनोकामनाएं व्यक्त करने से ही अभिलाषाएं पूर्ण नहीं हो पाती हैं। वर्तमान को जिस तरह से सींचेंगे उसी तरह का पौधा और वृक्ष निर्मित होगा और उसी अनुरूप मिठास अथवा कड़वाहट पूर्ण फल की प्राप्ति होगी अर्थात् इन सभी स्थितियों के लिए कर्म का भाव प्रमुख है और उसी के अनुरूप क्रियात्मक स्थिति प्राप्त होती है।
यह भी विचार करें कि जैसे जीवन के वर्ष बीतते गए, वैसे ही यह वर्ष भी बीत गया और क्या आगे भी इसी तरह की स्थिति रहेगी ? क्या जीवन में केवल उम्र बढ़ने के अलावा और कोई वर्तमान स्थितियों में बदलाव या प्रगति की स्थिति प्राप्त हुई अथवा क्या जीवन में सुस्थितियां आ सकेगी और इन सुस्थितियों की प्राप्ति के लिए कोई भी योजना और उस योजना को पूर्ण करने का एकरूपता और निरन्तरता का भाव जीवन में रहा है इस पर विचार करना और मनन करना आवश्यक है। ऐसा करना इसीलिए आवश्यक होता है क्योंकि जब जीवन में सुस्थितियों के निर्माण के लिए न तो कोई रूप रेखा होती है न ही कोई क्रियात्मक भाव का चिंतन होता है अर्थात् जीवन एक Routine Life की तरह ही व्यतीत होती जा रही है। इसी कारण से जीवन सामान्य सा बना रहता है, न तो हममें कर्म का भाव होता है और न ही अपने प्रति समर्पण का भाव होता है।
केवल और केवल सपने बुनते रहते हैं, ये सपने कैसे पूरे होंगे? जब की वास्तवता में जिस भी व्यक्ति में कर्म के प्रति समर्पण का भाव होता है तो उसे जीवन में पूर्णता और शांति मिलती ही है। उसका अहंकार नष्ट होता जाता है। समर्पण की भावना रहने से नम्रता बनी रहती है और मनुष्य विपत्ति के समय जब संघर्ष करके थक जाता है, जब उसे कोई उपाय व मार्ग नहीं सूझता तब अन्ततः वह प्रभु या गुरू की शरण में जाता है और यही भावना और धारणा बनती है कि गुरू ही मेरा बेड़ा (भार) पार करेंगे। इस तरह जब गुरू के प्रति समर्पण भाव आता है तो उसी समय से जीवन में पूर्णता मिलनी प्रारंभ हो जाती है और जीवन की क्रियात्मक इच्छाओं की पूर्णता प्राप्ति के लिए गुरू के द्वारा निरन्तर शक्ति प्राप्त होती रहती है, ऐसा लगता है कि मेरी पीठ मजबूत है मेरे पीछे भी किसी का सहारा है।
मीरा का श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण होने से नाग भी कण्ठहार बन गया और मीरा को जो विष पिलाया गया वह भी अमृत में परिवर्तित हो गया | महाभारत युद्ध से पूर्व द्रोपदी चीरहरण के समय वह अपने पाण्डवों के बल पर गर्वित थी और जब भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गई तब श्रीकृष्ण ने उसकी लाज बचाई । इसीलिए जब व्यक्ति देवता या गुरू को प्रणाम कर समर्पित होता है तो उसके सिर पर पड़ी पाप की गठरी स्वतः गुरू चरणों मे गिर जाती है एवं गुरू स्वयं उसका योग और क्षेम वहन करते हैं। अतः समर्पण एक गुप्त शस्त्र है जो सदा साधक के साथ रहता है। समर्पण भाव से ही चित्त आज्ञाचक्र के उपर चढ़ता है । जब तक अहं भाव रहता है तब तक चित्त आज्ञाचक्र के नीचे ही रहता है, अर्थात् जीवन में अहं भाव से ही मन अनेक अनेक दिशाओं की ओर गतिशील रहता है और जब मन अनेक दिशाओं की ओर अग्रसर रहेगा तो कोई भी इच्छा, भावना, धारणा को मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता है ।
मनुष्य में बुराई व कुसंस्कार का भाव चिंतन ऊपर की ओर अर्थात् सदैव मस्तिष्क में बना रहता है और लोभ वश मनुष्य बुराई को जल्दी ग्रहण कर लेता है। जब इस अहं भाव से जीवन में असफलता आती है तो व्यक्ति के भीतर और अधिक तीव्रता से ईर्ष्या, देष, वेमनस्यता, क्रोध और अशांति रूपी विष बनते रहते हैं और उसी के प्रभाव से जीवन विषाक्त पूर्ण बन जाता है । अधिकांश अधिकांश व्यक्तियों की स्थिति ऐसी ही रहती है । कोई वस्तु नीचे पड़ी हो तो उसको उठाने के लिए आपको झुकना ही पड़ेगा। मनुष्य के भीतर अच्छाई हमेशा हृदय भाव में दबी पड़ी रहती है | उसको उठाने के लिए मनुष्य को भीतर झांकना ही पड़ता है और अच्छाई को ग्रहण करने के लिए हृदय की गहराई में उतरना पड़ता है। गुरू, माता, पिता, ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को नीचे झुकना ही पड़ता है।
निष्काम उपासना में व्यक्ति को काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह तथा अपनी कामनाओं को त्यागना पड़ता है। केवल कामना युक्त पूजा होने से मन रूपी चित्त आज्ञाचक्र से आगे नहीं बढ़ेगा और जीवन की पूर्णता में अवरोध बने रहते हैं।
तानसेन अकबर के दरबार में प्रसिछ गायक थे। बेजू बावरा भी संगीत में रूचि रखता था। उसके मन में तानसेन से अधिक प्रसिद्ध गायक बनने की इच्छा प्रकट हुई । तब वह तानसेन के गुरू के पास संगीत सीखने के लिए गया। गुरू से प्रार्थना की कि मुझे ऐसी शिक्षा दीजिए की मैं तानसेन से श्रेष्ठ गायक बन सकूं। तब तानसेन के गुरू ने कहा कि सबसे पहले तुम तानसेन के प्रति ईर्ष्या को समाप्त करो तथा संगीत के प्रति समर्पित हो | बैज़ूवावरा ने गुरू के बताये अनुसार वैसे ही किया और तानसेन से अधिक श्रेष्ठ गायक बना |
गुरू के द्वारा शिष्य को आशीर्वाद देते समय हाथों से सात्विक ऊर्जा निकलती है उस समय शिष्य का हृदय जितना निर्मल होगा उतना लाभ मिलेगा। संत महात्माओं के चरणों का स्पर्श करने से जो किरणें विकरित होती हैं उन सतोगुणी किरणों का सुप्रभाव स्वतः शिष्य को प्राप्त हो जाता है क्योंकि गुरू के भीतर सात्विक भाव होता है और उसके चारों ओर श्वेत और शांति का ओज होता है। उसके पास बैठने से शांति व हल्का पन महसूस होगा, वहां से उठने का मन नहीं करेगा। गुरू जिस किसी वस्तु को छूता है उस पर भी उसका प्रभाव अवश्य रहता है।
सद्गुरूदेव की आज्ञा से ही आप सभी के लिए दीपावली की रमा एकादशी से लाभ पंचमी के बीच विशेष नो दिवसों में सर्वरक्षा कवच मंत्र चेतन्यै आपूरित किये गये हैं । जिससे की आप जीवन भर हर दृष्टि से सुरक्षित रहें । आपकी संकल्प शक्ति के द्वारा एक पत्रिका सदस्य बनाने पर आपको यह सर्वरक्षा कवच उपहार स्वरूप भेजा जायेगा और अपने परिवार के अन्य सदस्यों को भी धारण करायें तो उनका नूतन वर्ष हर दृष्टि से मंगलमय और उज्ज्वलमय बन सकेगा । ऐसा ही मेरा आशीर्वाद है।
आपका अपना
कैलाश चन्द्र श्रीमाली
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