





निर्भीक वे पर्वतां पर मंजुल दोयं
मंजुल पदाम सै वदाम सहितं सदैवः
दीर्घो प्रसन्नतां भव नेत्र रूपं
निर्भीक मपरं शत्रुवै सदान्यं
कृष्ण यह श्लोक कह रहे हैं। जब भीष्म हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और उन्होंने कहा कि ये कौरव और पाण्डव आपको नहीं समझ पाए, किसी ने आपको मित्र कहा,किसी ने शत्रु कहा, दुर्योधन ने आपको शत्रु कहा, अर्जुन ने सारथी कहा, युधिष्ठर ने आपको मित्र कहा, द्रौपदी ने आपको सखा कहा। मगर आप इन सबसे परे हैं। आपका जो वास्तविक रूप है वह मैं कुछ-कुछ अंश एहसास कर रहा हूं।
ये यथा मां प्रपजस्ते ते तथाव्यं भजाम्यं
जो जिस ढंग से मुझे देखता है मैं उसी ढंग से उसके साथ हो जाता हूं। यदि कोई मुझे प्रेमी के रूप में देखता है तो मैं उसका प्रेमी हो जाता हूं। कोई मुझे शत्रु के रूप में देखता है तो मैं उसका शत्रु हूं, घोर शत्रु हूं। कोई मुझे मित्र के रूप में देखता है तो मैं उसका परम मित्र हूं, कोई सहायक के रूप में देखता है तो मैं सहायक हूं, जो जिस रूप में देखता है जो जिस रूप में मुझे भजता है, मैं उसी रूप में उसके साथ हो जाता हूं। तुमने मुझे देवत्व रूप में देखा है क्योंकि तुम्हारे ज्ञान नेत्र खुले है, इसलिए मैं तुम्हारे सामने साकार विराट् रूप में हूं। अर्जुन ने मुझे सारथी के रूप में देखा है तो मैं सारथी हूं, दुर्योधन ने मुझे शत्रु के रूप में देखा है तो मैं शत्रु हूं। ठीक वही स्थिति जो गीता में कही कि ये यथा मां, प्रपजस्ते— जो जैसा मुझे देखता है, जैसी आंखों से, जिस चितंन से, जिस विचार से, वह मुझसे वैसी ही उपलब्धि प्राप्त कर सकेगा।
अगर आप कहेंगे कि गुरुजी सामान्य ही है, तो आपको सामान्यता ही मिल पायेगी। यदि आप विशिष्टता देख पायेगे तो आपको विशिष्टता मिल पायेगी। यदि आप प्रेम देख पायेगे तो आपको प्रेम मिल पायेगा। आप कुछ नहीं देख पायेगे तो आपको कुछ नहीं मिल पायेगा। मैं तो उसी जगह खड़ा हूं, आप किस रूप में मुझे देखते हैं वह आप पर निर्भर है और कोई रूप अपने आप में गलत नहीं होता। शत्रु रूप भी अपने आप में सही है, मित्र रूप भी सही है, प्रेम रूप भी सही है। हर चीज अपनी जगह सही है। आंख की जगह आंख सही है, पैर की जगह पैर सही है। आप कैसा चिंतन करते हैं उस पर सब निर्भर है।
कृष्ण ने भीष्म से कहा – यह महाभारत युद्ध जब मैंने प्रारम्भ कराया तो हजारों आलोचनाएं हुई मगर मैंने इसलिए करवाया क्योंकि पाप बहुत बढ़ गया था और उस समय युद्ध शुरु करवाया जब ग्रहण काल आरम्भ हुआ, जिससे विजय पांडवों की ही हो। ग्रहण काल का इतना महत्व है। मगर हम कितने विपरीत जा रहे है। ग्रहण काल में बैठ जाते है हाथ पर हाथ रख कर कि ग्रहण है अभी कुछ नहीं करना चाहिए। पानी भी नहीं पीना चाहिए, खाना भी नहीं खाना चाहिए, खाना पकाते नहीं है। लोग कुछ करते नहीं और घर में बंद होकर बैठ जाते है। शब्द तो है ग्रहण – यानि स्वीकार करना और हमने उसे त्याज्य बना दिया, छोड़ दिया। बिल्कुल विपरीत धा्रुव पर हम चले गए। हमें ज्ञान ही नहीं रहा। इसलिए नहीं रहा कि बीच में कोई गुरु की कड़ी मिली नहीं जो समझा सके कि यह ग्रहण है, यह त्याज्य नहीं है।
राम जब युद्ध करते करते थक गए, पसीना आ गया तो उन्होंने मुड़कर के पीछे देखा, तो वहां गुरु विश्वामित्र खड़े थे। राम ने कहा कि मैं इस रावण को तो मार नहीं सकता। मैं मारता हूं तो फि़र से खड़ा हो जाता है।
विश्वामित्र ने कहा – तुम एक घड़ी ठहर जाओं। एक घड़ी का अर्थ है बत्तीस मिनट। एक घड़ी ठहर जाओं ग्रहण काल प्रारम्भ होने वाला है। उस समय ठीक नाभि में तीर तुम चलाओगे और शत्रु समाप्त हो जाएगा। बत्तीस मिनट तुम्हें ज्यों त्यों व्यतीत करने हैं। क्योंकि ग्रहण काल में ही तुम विजय प्राप्त कर पाओगे।
आप विश्वामित्र संहिता को पढ़े और राम ने राजतिलक से पहले वशिष्ठ को प्रणाम नहीं किया। विश्वामित्र को प्रणाम किया कि आपने मुझे सही समय का ज्ञान दिया और यह समझाया कि ग्रहण अपने आप में बहुत उपलब्धि परक चीज है, सब कुछ प्राप्त करने की क्रिया है, छोड़ने की क्रिया नहीं है। और वास्तव में ग्रहण काल सब कुछ प्राप्त कर लेने का अद्भुत संयोग है, ऐसा समय जहां पराजय होती ही नहीं। मगर आप पर निर्भर है कि आप किस प्रकार से उन क्षणों का प्रयोग करते हैं अब उस समय में आप गालियों को ग्रहण करना चाहें तो गालियों को ग्रहण कर लें, आलोचनाओं को ग्रहण करना चाहें तो आलोचनाओं को ग्रहण कर लें। मन में शंकाएं होंगी तो आपकों शंकाएं ही प्राप्त हो पाएंगी, ज्ञान प्राप्त करेंगे तो ज्ञान प्राप्त हो पाएगा।
श्री कृष्ण ने कहा कि मैं बार बार जन्म लेना चाहता हूं और मनुष्य जीवन लेना चाहता हूं, गर्भ से जन्म लेना चाहता हूं, फि़र नटखट बालक बनना चाहता हूं, और मुस्कुराते हुए, हंसते हुए, खिलखिलाते हुए और वीरता से शत्रुओं को समाप्त करना चाहता हूं। और मैं भी आपको ज्ञान देना चाहता हूं। मगर इसमें बहुत परिश्रम है, एक प्रकार से जूझना है। आप कुनैन लेंगे नहीं, इसलिए शक्कर में घोल करके मैं आपको कुनैन देने का प्रयास कर रहा हूं। मगर दूंगा जरूर जिससे कि आप सफ़लता प्राप्त कर लें। आदमी का अर्थ समाप्त होने की क्रिया है। जब पैदा होता है तो पैदा होते ही वह कुछ मृत्यु की ओर सरक जाता है किसी की उम्र मान लो साठ साल है तो ज्यों ही पैदा हुआ तो पांच मिनट बाद उस साठ साल में पांच मिनट कम हो गए। यानि वह सरकने लग गया मृत्यु की ओर। जीवन की ओर नहीं सरक पाया और एक दिन ऐसा आएगा कि वह मर जाएगा और एक दिन ऐसा भी आएगा कि लोग उसे भूल जाएंगे। और भूलने के लिए हम पैदा हुए नहीं है और हम भूल गए तो हमारा जीवन बेकार, आपके गुरु भी बेकार, आपका शिष्य बनना भी बेकार और मैं भी बेकार फि़र। इसलिए कुछ ऐसा करें कि लोग याद रखें, आने वाली पीढि़यां याद रख सकें।
और ऐसा तब हो सकता है जब आप देवत्व बन सकें। मनुष्य हों पर ऐसे मनुष्य हों जिसमें पौरुष हो, ताकत हो, जोश हो, जिसमें हिम्मत और साहस हो। आपने पढ़ा होगा या सुना होगा कि राजस्थान में खाटू स्थान है। वहां श्याम कृष्ण की मूर्ति है। वहां पर हर वर्ष 2 लाख लोग एकत्र होते है। मगर वह कृष्ण की मूर्ति है ही नहीं। वह बब्रुवाहन की मूर्ति है। भीम का पुत्र घटोत्कच, घटोत्कच का पुत्र बब्रुवाहन या बरबरीक। कृष्ण जानते थे कि बब्रुवाहन जैसा वीर संसार में है ही नहीं। अर्जुन तो इसके सामने तिनके की तरह है, उड़ जाएगा एक क्षण में और मुझे अर्जुन को विजय दिलानी है। अब कूटनीति मुझे क्या चलनी चाहिए ? उन्होंने बब्रुवाहन को बुलाया और कहा – तुम कैसे वीर हो ?तुम वीर हो भी ? उसने कहा मैं आपको अभी प्रमाण दे देता हूं।
उसने तीर उठाया और पीपल के बिखरे हुए पत्ते थे इक्कीस। एक तीर से इक्कीस पत्तों में छेद दिया ओर इक्कीसवां पत्ता कृष्ण के पैर के नीचे था। बब्रुवाहन ने कहा श्री कृष्ण अपना पैर हटा लीजिए वरना आपका पैर भी छिद जाएगा। उसने इतने उड़ते हुए पत्तों को एक तीर से छेद दिया। कृष्ण ने सोचा – पाण्डव नहीं टिक सकते इस बब्रुवाहन के सामने। संभव ही नहीं है क्योंकि यह कौरवों की तरफ़ है। कृष्ण ने कहा – या तो तुम शत्रु बन जाओं या एक वरदान दो। दोनों में से एक काम कर लो।
बब्रुवाहन ने कहा – आप जो भी चाहें वह मैं कर लूंगा। आप चाहे तो मैं सबको अकेला समाप्त कर सकता हूं। इतनी ताकत मुझमें है और आप अगर कुछ और मांगे मुझसे तो मैं देने को तैयार हूं। आप कृष्ण हैं और मैं जानता हूं कि आप क्या हैं। आप वरदान मांग लीजिए। जो आप मांगेंगे वह मैं आपको दूंगा। कृष्ण ने कहा – मुझे तुम्हारा सिर चाहिए। बब्रुवाहन ने कह – इतनी सी बात है। मैं सिर दे देता हूं। मगर मैं यह चाहता हूं कि आप इतनी ऊंचाई पर मेरा सिर रखें कि मैं महाभारत युद्ध को देख सकूं। बस इतना ही आपसे चाहता हूं। उसने अपना सिर काट करके कृष्ण के हाथ में दे दिया और कृष्ण ने कहा – तुम मेरा ही रूप बन करके इस संसार में पूजे जाओगे। राजस्थान में खाटू एक जगह है। वहां पर कृष्ण की मूर्ति है और वास्तव में वह बब्रुवाहन की मूर्ति है जिसकी कृष्ण के रूप में आज भी पूजा होती है और आज भी वहां हर वर्ष कम से कम ढाई-तीन लाख लोग इक्कठे होते है।
यह वीरता का सर्वोच्च उदाहरण है। मनुष्य अपने आपमें इतना वीर बन सकता है, ताकतवान बन सकता है। फि़र वह वृद्ध बनता ही नहीं। वह वास्तविक पौरुष है और अस्सी साल की उम्र में भी एक पौरुषता आ सकती है, ताकत आ सकती है, क्षमता आ सकती है और वह हो सकता है, जब हम पुरुष से महापुरुष, महापुरुष से पुरुषोत्तम बनें। और पुरुषोत्तम बनने की क्रिया इतनी आसान नहीं है। मैं सिर्फ कहूं उससे आप देवता नहीं बन पाएंगे। जब हमारे शरीर के अंदर जो अणु है, जब उन अणुओं को परिवर्तित किया जाएगा तब देवत्व स्थापन हो पाएगा और जब देवत्व स्थापन होगा तो साधना हो पाएगी। मनुष्य यों साधना कर ही नहीं सकता, क्योंकि उसका मन उसके कंट्रोल में नहीं आ सकता। आप इतने ऊंचे योगी नहीं है और योगियों के मन भी शांत नहीं है, योगी होने के बावजूद भी यह कोई जरूरी नहीं कि मन शांत रहे ही। भर्तृहरि ने कहा है घासफ़ूस, पत्ते, हवा और पानी पीकर के भी वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रीं, गर्ग बैठे है उनका मन भी चंचल रहता है तो गुरुदेव मेरा मन स्थिर कैसे हो पाएगा और आप कह रहे है कि अपना मन स्थिर करो। मैं यह कैसे करुंगा ?उनके ही मन स्थिर नहीं हो पा रहे हैं जो घास फ़ूल खाते हैं। मैं तो अन्न खाता हूं, दूध पीता हूं, घी खाता हूं तो मेरा मन शांत कैसे होगा ?
मन शांत हो पाएगा, जब आपके अणु परिवर्तित हो पांएगे। आपने किताबों में पढ़ा होगा कि भेड़ की अणुकृति लेकर पूरी की पूरी भेड़ बना दी गई। एक अणु को लेकर उस भेड़ में से एक अणु निकाला, उसको दूसरी जगह बीजारोपण किया और ठीक वैसी की वैसी भेड़ बना दी और पूरे संसार में तहलका है कि पूरी की पूरी अगर एक भेड़ बना दी तो वैसा का वैसा आदमी भी बन जाएगा आपके अंदर से एक अणु निकाल करके। आपकी तरह ही बीस और व्यक्ति खड़े हो जाएगे और पहचान नहीं सकेगे कि असली व्यक्ति कौन है। पत्नी भी नहीं पहचान पाएगी कि इनमें से असली कौन है। इतनी क्रांति आ रही है और यह क्रांति इसलिए आ रही है कि अणु को पहचानना प्रारम्भ कर दिया विज्ञान ने और हम उससे पहले ही अणु को पहचान गए थे। कणाद ने अणु की पूरी व्याख्या की है। कणाद ने और कुछ लिखा ही नहीं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति देवत्व स्थापन तब प्राप्त कर सकता है जब उसके अणु परिवर्तित होंगे और हमारे अणु अगर राक्षसमय ज्यादा है तो हम राक्षसवृति के होंगे। और हम है राक्षस वृति के। हमें स्वीकार करना पड़ेगा। हम केवल आलोचना करते है, गालियां देते है, मन में वितृष्णा रखते है, झूठ बोलते है, दूसरों के प्रति ईर्ष्या रखते है। राक्षस वृति अधिक है, देवत्व वृति बहुत कम है, आती है और मिट जाती है। स्थायी देवत्व वृति तब बन पाएगी जब हमारे अणुओं में परिवर्तन होगा।
यदि आपके अंदर हृदय या नई किड़नी लगाएं तो केवल ब्लड टेस्ट हीं नहीं होगा। ‘ए’ ग्रुप है या ‘बी’ गुप है तो देखा ही जाएगा। उसके बाद मांस पिण्ड देखा जाएगा कि आपका मांस ओर जिसकी किड़नी दे रहे है वह मांस एक जैसा है या नहीं फि़र उसके बाद में जो मांस के अंदर अणु हैं वे मिलाएंगे। अणु मिलेंगे तो वह हृदय या किडनी आप में समाहित हो पाएगी। अणु तक पहुंचना पडे़गा। केवल आपको दीक्षा देने से काम नहीं चल पाएगा। आपके अणुओं तक पहुंचने की क्रिया जो देगा तो आपको राक्षस भी बनाया जा सकता है और आपको देवता भी बनाया जा सकता है, पुरुष, महापुरुष और देवता। और देवता इसलिए कि हम वो सारे नक्षत्र देख लें, वह सारे ग्रह देख लें, सारा ब्रह्माण्ड देख लें इस मनुष्य शरीर में रहते हुए कि चंद्रलोक क्या है, शुक्रलोक क्या है, सूर्यलोक क्या है, कैलाश लोक क्या है, रुद्र लोक क्या है, हिमालय क्या है, विष्णु लोक क्या है, क्षीर सागर क्या है। अगर ये सब देखे ही नहीं तो फि़र मनुष्य शरीर धारण ही क्यों किया और फ़ायदा भी क्या हुआ।
धनवान कैसे बन सकते है, करोड़पति कैसे बन सकते हैं, योग्य संतान कैसे पैदा कर सकते हैं, वह सब क्षमता प्राप्त करना भी अणुओं के माधयम से हो सकता है। देवताओं के यहां देवता पैदा होते है। राक्षसों के यहां राक्षस ही पैदा होंगे। अधिकतर बेटा बाप की तरह ही बनेगा। अधिकतर चेहरा ऐसा ही बनेगा और वृतियां भी ऐसी ही बनेगी। इसलिए अणुओं को परिवर्तित करने की जरूरत है। किन्तु अणुओं को परिवर्तित आम आदमी, आम गुरु नहीं कर सकता। जिसको ज्ञान ही नहीं है वह ऐसा नहीं कर सकता। अब अणु है कहां ?
आप अगर मांस निकाले तो मांस तो अणु है नहीं। मांस के टुकडे़-टुकड़े कर दे तो वे भी अणु भी नहीं है और शरीर के एकएक रोम में अणु है। अणु का अर्थ है कि एक सुई की नोक पर पांच हजार अणु आते है। उन अणुओं को परिवर्तित करने पर देवत्व प्राप्त हो सकता है और यदि आपको देवत्व की ओर अग्रसर होना है तो उन पूरे अणुओं को परिवर्तित करना पड़ेगा और वे अणु परिवर्तित होंगे मंत्रों के माधयम से क्योंकि कहा गया है – मंत्रधिनाश्च देवता। ये सारी जो क्रियाएं हैं मंत्रों के अधीन हैं। मंत्र का अर्थ है मैं बोलूं ओर आपके कानों में उतरें। मैं बोलूं और उसका प्रभाव हो। मैं अगर आपको मां की गाली दूं तो आप एकदम पत्थर लेकर खड़े हो जाएंगे। ज्योहिं मैं गाली दूंगा आप एकदम क्रोधित हो जाएंगे। मैंने तो आपको हाथ भी नहीं लगाया। मगर शब्द द्वारा आपको क्रोध दिला दिया और आप मारने को तैयार हो गए। आपके और मेरे बीच में क्या था ?
शब्द थे! मैंने शब्द बोला, वह आपके अंदर उतरा और उसका प्रभाव हुआ अगर आपको शब्द द्वारा क्रोध दिला सकता हूं तो शब्द द्वारा देवत्व भी स्थापित कर सकता हूं। और क्रोध भी वह दिला सकता है गुरु जो खुद क्रोधमय हो। मरा हुआ गुरु तो क्रोध कर ही नहीं सकता। अगर मैं खुद क्रोधमय बनूंगा तो आपको क्रोधमय बना पाऊंगा। अगर खुद मरा हुआ हूं तो आपको क्या क्रोधमय बना पाऊंगा। आपके और मेरे बीच में शब्द है और शब्दों ने आपको क्रोध दिलाया है। शब्द ही मिलकर के मंत्र बनते है। गाली एक मंत्र है जिसने आपको क्रोध दिला दिया। एक मंत्र ऐसा भी है जो आपको देवता बना सकता है। शब्दों का संकुलन या शब्दों का जो योग है वहं मंत्र कहलाता है, वह चाहे अच्छा है, चाहे बुरा है।
और जब तक हम देवता बनेंगे नहीं तब तक साधनाओं में सफ़लता मिलेगी नहीं। इसलिए पहले हम पवित्रीकरण करते है कि अपवित्रे पवित्रः— गंगा जल स्नानं कुर्यात— संकल्प करते हैं, यज्ञोपवीत धारण करते है। बाहरी कर्मकाण्ड तो करते है पर अंदर कुछ परिवर्तित होता ही नहीं। यह होता नहीं है इसीलिये तो जैसे आप साल भर पहले थे वैसे ही मेरे सामने आकर खड़े हो जाते है। इसमें आपका दोष है ही नहीं। इसलिए नहीं कि आप उस स्थिति में मेरे सामने आकर खड़े हुए ही नहीं। साधना करते करते आप धीरे-धीरे उस स्थिति पर पहुंच सकते हैं कि फि़र गुरु एकदम से अणु परिवर्तित कर सकता है कि अब एम-ए- पास लड़का हो गया है अब मैं इसे डाक्ट्रेट करा सकता हूं। पहली क्लास वाले को तो डाक्ट्रेट करा भी नहीं सकता था। इतने घिसते घिसते पांच साल, दस साल गुरु को विश्वास होता है कि अब अणु परिवर्तित करके उन्हें देवता बना सकता हैं। फि़र वह संसार को दिखा सकता है कि ये उसके शिष्य हैं जिन पर उसको गर्व है।
यह जीवन की एक महत्वपूर्ण क्रिया है, अणु परिवर्तन की क्रिया जो कि ग्रहण काल में ही सम्पन्न होती है और ग्रहण काल में सफ़लता मिलती ही है, असफ़ल हो जाएं संभव ही नहीं । गुरु को मालूम है कि ग्रहण के क्षण कितने बहुमूल्य हैं। यह जरूरी नहीं कि आप परिवर्तित होंगे तो एक क्षण के लिए होगे, वापस वैसे ही बन जाएंगे। मगर आपके अणु परिवर्तित करने पर आपकी जो भी इच्छा होगी वह पूरी होगी ही। आप जो भी चाहेंगे वह होगा ही। देवता जो भी चाहता है वह प्राप्त कर लेता है। कल्पवृक्ष के नीचे बैठे हुए व्यक्ति को जो वह चाहे मिल जाता है क्योंकि कल्पवृक्ष अपने आप में देवतामय है। मैंने कहा कि आप जैसा मुझे याद करेंगे मैं बन जाऊंगा। आप मुझे समझेंगे कि यह ज्ञानवान है तो आप जो कुछ मेरे पास बैठकर मांगेंगे वह में दूगा और आपको मिलेगा, हर हाल में मिलेगा। यदि आप उस भावना के साथ मेरे पास बैठेंगे तो! और वह भावना पैदा होगी जब आपके अणु परिवर्तित होंगे। मन को बदलने से कुछ नहीं होगा। मन तो फि़र भटक जाएगा। ज्योंही आप मुझसे दूर गए और मन भटक जाएगा। आपका मन फि़र से बदल जाएगा और जो कुछ आपने किया वह बेकार हो जाएगा। मगर अणु बदलने पर आपका मन नहीं बदल सकता। फि़र आप चाहें कि आप चिर यौवन बनें तो चिर यौवनवान बनेंगे, पुत्रवान बनेंगे, धनवान बनेंगे, लक्ष्मीवान बनेंगे। मैं भी चाहता हूं आप करोड़पति बनें, देखें कि एक करोड़ रुपये गिनने में क्या आनन्द आता है। वह भी करके देखें आप। देखें जंगल में जाकर के कि जमीन पर लेट कर चांद तारों को देखने में मजा क्या है – वह भी आप देखें। पांच दिन भूखे रहकर भी आप देखें और हलवा पूरी भी खाकर देखें।
सब भोग आपके जीवन में होना चाहिए – यौवन, सौन्दर्य, स्वास्थ्य, पौरुष, क्षमता और जीवन के सारे भोग विलास मैं चाहता हूं मिलें आपको। मैं ऐसा गुरु नहीं हूं कि नहीं यह सब आपको मिलना नहीं चाहिए, आप मेरी सेवा करते रहिए। आप मेरी सेवा मत करिए। मेरे हाथ है दो और एक हजार हाथ है जिनके माध्यम से मैं अपनी सेवा कर सकता हूं। कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया तो अपने साथियों को कहना पड़ा कि अपनी-अपनी लाठियां टेकिए जरा, पर्वत बहुत भारी है। वे बेचारे ग्वाले लाठी टेककर पर्वत को कैसे उठाएंगे। मगर फि़र भी कृष्ण ने उनको श्रेय दिया। मैं भी श्रेय दे रहा हूं कि आप मेरी सेवा करें। आप क्या मेरी सेवा करेंगे ? राम खुद सीता को ढूंढ कर ले आते, लेकिन उन वानरों को श्रेय देना था सुग्रीव को, नल को, नील को, हनुमान को। हम कहते है कि हनुमान जी ने बहुत बड़ा काम किया और हनुमान भी खुश हुए कि मैंने काम किया प्रभु का।
और आप भी खुश हो रहे हैं कि मैंने गुरुजी का कार्य किया। आप तो हो सकता है अभी जुड़े है, पांच दस साल पहले मेरा कौन काम करता था, बीस साल पहले कौन काम करता था ? क्योंकि आप मेरे हैं इसलिए आपको सेवा का अवसर मैं दे रहा हूं। बाकी आपसे मुझे कुछ चाहिए नहीं। मैं तो केवल इतना चाहता हूं कि आप देवत्वमय बनें। देवत्वमय बनेंगे तो आगे के जीवन का उपयोग कर पाएंगे। मनुष्य जीवन से आप उपयोग नहीं कर पाएंगे। मानव शरीर तो केवल अस्थि चर्ममय देह है। चमड़ी, मांस, हड्डियां। चौथी चीज कोई है ही नहीं। जिस प्रेमिका को हम बिना देखे एक पल रह नहीं सकते कि तुम्हारे बिना जीवन अंधेरा है, मैं मर जाऊंगा और वह मर जाए तो आप एक क्षण देखना नहीं चाहेंगे। आप ही कहोगे – जलाओं इसको जल्दी से।
क्या हो गया आपको ? एक मिनट पहले तो आप रह नहीं पा रहे थे उसके बिना और अब एक मिनट बाद जलाने की क्रिया शुरु कर दी आपने। इसलिए कि आप अणुओं से नहीं जुड़े हुए थे, शरीर से जुडे हुए थे। सुंदर शरीर था इसलिए जुडे हुए थे। शरीर और अणु में यह अंतर है। और अणु परिवर्तित होंगे तो आप देवता बन पाएंगे। देवता बनेंगे तो आप उनके समकक्ष बन पाएंगे जो कृष्ण है, जो इंद्र है, जो यम है, जो कुबेर है, जो रुद्र है, जो शिव है, जो विष्णु हैं ,जो ब्रह्मा है। आप उनके लेवल पर खडे हो पाएंगे। फि़र आप जहां चाहे वहां जन्म ले सकेंगे। अगर चाहेंगे तो ही जन्म ले सकेंगे। जिस गर्भ में चाहे उस गर्भ से जन्म ले सकेंगे। ब्रह्माण्ड के जिस लोक में जाना चाहें जा सकेंगे। और यदि भेड़ के एक अणु से पूरी भेड़ बना सकते है, आपके तो शरीर में लाखों अणु हैं, लाखों अणुओं से तो असीमित शक्ति प्राप्त हो सकती है। एक अणु बम पूरे हिरोशिमा, नागासाकी को समाप्त कर सकता है। परन्तु उस असीमित शक्ति को अणुओं को परिवर्तित करके ही प्राप्त किया जा सकता है और यह परिवर्तन की क्रिया ग्रहण काल में ही हो सकती है। ऐसा क्षण आएगा तो पूरा शरीर आलोडि़त होगा, विलोडि़त होगा। पूरे शरीर में एक भूकम्प आएगा, एक भूचाल सा आएगा।
और आप आप देख ही रहे हैं कि विश्व में क्या हो रहा है। बूथ कैपचरिंग हो रही है, गोलियां चल रही है, बम फ़ट रहे हैं, इतने लोग मर रहे है। हर जगह व्यक्ति असुरक्षित सा हो गया। यह क्या हो गया, पूरा विश्व बदल गया, नेता बदल गए, स्थिति बदल गई, आपका पूरा जीवन ही बदल गया। अब यह रचनात्मक भी हो सकता था। और आगे हो सकता है। परन्तु मनुष्य शरीर से नहीं हो सकता। सबसे पहले आपके अणुओं को परिवर्तित करने की जरुरत है। अब उसके दो तरीके है – या तो साधना के माध्यम से या दीक्षा के माध्यम से। तरीके तो दो ही है। या तो कृष्ण अर्जुन को समझाए कि समझ ले मैं देवता, मैं महापुरुष हूं और या फि़र अपना विराट रूप दिखाएं। तीसरी कोई स्थिति थी ही नहीं कृष्ण के पास। समझाते समझाते थक गए तो उन्होंने अपना विराट रूप दिखाया कि मैं तुम्हारा सारथी नहीं हू। घोड़े चलाने वाला नहीं हूं पूरा ब्रह्माण्ड मेरे अंदर समाया हुआ है, देख ले अब।
तब जाकर ज्ञान हुआ अर्जुन को। तो या तो मैं आपको साधना कराऊ या आपको दीक्षा दूं। अब मैं आपको मंत्र दू तो आप मंत्र जप कर नहीं पाएंगे। करेंगे भी तो शरीर से करेंगे। कभी करेंगे, कभी नहीं करेंगे। कभी आप सफ़र में होंगे और कभी आप नहीं कर पाएंगे। नहीं कर पाएंगे तो मेरी मेहनत बेकार हो जाएगी और आप भी कहेंगे कि गुरुजी कुछ हुआ ही नहीं। मैं यह स्थिति टालना चाहता हूं। यह स्थिति टालने के लिए एक तरीका है, ब्रह्माण्ड रूप दिखाना और दूसरा तरीका है दीक्षा देना। यह साधना के द्वारा भी सकता है – पूर्ण अणु परिवर्तित देवत्व सिद्वि, और यह दीक्षा के माध्यम से भी हो सकता है। दीक्षा देना गुरु के लिए कठिन है क्योंकि उसे अपने शरीर का, अपनी तपस्या का अंश देना पड़ता है। पुत्र पैदा करना बहुत कठिन है क्योंकि मां के पूरे शरीर के खून को निचोड़ कर वह पी लेता है। जो कुछ खाती है मां उसका रस पूरा बच्चे के पेट में ही जाता है। मां के शरीर में ताकत धीरे-धीरे कम होती रहती है, वह अशक्त होती रहती है, उठ नहीं पाती है, चल नहीं पाती है। क्या हो गया उसको ?
सारा रस तो वह बच्चा ले लेता है और यदि में दीक्षा दूगा तो मेरा सारा सत्व तो आप ले लेंगे। इसलिए गुरु सहज ही दीक्षा देते ही नहीं। और दीक्षा मिल जाए, यदि कोई सद्गुरु ऐसी दीक्षा दे दे तो पूर्णता का एहसास होता ही है। जो भी पुरुष है वे पुरुष तभी पूर्णता प्राप्त करते है जब उनमें एक स्त्रीत्व आता है, नारीत्व आता है। कभी आप अपने आप को गुर्जरी या गोपी बनाकर देखे और कृष्ण के भजन को सुनें, फि़र आप को एहसास होगा कि चित्त या मन कितना कोमल बन जाता है और हृदय प्रेम से सिक्त हो जाता है। पौरुषता एक अलग चीज है जो आवश्यक है, मगर उस पौरुषता में जब तक एक नारी सुलभ कोमलता नहीं आ पाएगी तब तक सर्वांगीण विकास भी नहीं हो पाएगा। जीवन केवल पुरूष से नहीं बन सकता, जीवन केवल स्त्री से भी नहीं बन सकता। भगवान शिव अपने आपमें अद्धर्नारीश्वर कहलाए। आधा शरीर नारी का था, आधा शरीर पुरुष का था। कृष्ण को भी अर्द्ध नटराज कहा गया – आधे एकदम लक्ष्मी स्वरूप थे और आधे नारायण स्वरूप थे।
ऐसा क्यों कहा गया ? अद्धर्नारीश्वर कहने के पीछे क्या मतलब था उनका ? क्या शिव के त्रिशूल में ताकत नहीं थी ? क्या कृष्ण के सुदर्शन चक्र में कोई मूढ़ता आ गई थी ? हृदय का जो रस प्रवाह होता है वह दोनों की संयुक्तता से होता है। अगर मैं नारी बन कर के कृष्ण के भजन को सुनूं तो एक रस, एक संगीत अलग तरह का आ पाएगा। एक नारी पुरुषत्व को मनन करके, कृष्ण में अपने आप को लीन करती हुई भजन सुनेगी तो उसमें एक अलग अंतर आता है। जीवन खाली पुरुष बनने से नहीं चलता, जहां पुरुष बनना होता है वहां पुरुष ही बनना पड़ता है और जहा नारी बननी पड़ती है तो नारी ही बनना पड़ता है।
सारे भक्त-कवियों ने, ऋषियों ने, योगियों ने, मुनियों ने, नारी बनकर के ही भगवान को अपनाया है। चाहे वे कृष्ण हो, चाहे शिव हो, एकाकार होने के लिए दोनो का सम्मिलन होना आवश्यक है और इनके सम्मिलन को योग कहते है। जहां योग शब्द आया है तो उसका अर्थ है दोनों का संयोजन। हम अपने आप में स्त्रीत्व की भावना को भी सम्मिलित करें। हमारी आंख में भी लज्जा, मुस्कुराहट, आकर्षण, सम्मोहन आए और हममें ताकत और क्षमता भी आए।
और ऐसा होगा तो ही जीवन में आनन्द होगा, एक मस्ती होगी। मस्ती आपके अंदर से ही प्रकट होगी, बाहर से मस्ती कहीं से आती ही नहीं। कोई नहीं देगा आपको मस्ती बाहर से। बाहर से तो दुख आएगा, वेदना आएगी, तकलीफ़ आएगी। चाहे आपका बेटा हो, चाहे पति हो, चाहे पत्नी हो, वहां से आपको प्रसन्नता आ ही नहीं सकती। आएगी तो केवल आपके भीतर से आएगी। आप अपने मन का आलोड़न विलोड़न करेंगे तभी जीवन में एक आनन्द, एक उल्लास, उमंग, जोश और जो आप चाहते है वह प्राप्त हो पाएगा। मन के अंदर से वह चिंगारी फ़ूटे इसलिए भजन गाए जाते है, सुने जाते है। यदि कबीर को सुनें तो उसने कहा – मैं राम की बहुरिया हूं। चेतन्य महाप्रभु ने कहा – मैं तो कृष्ण की दासी हूं जो उसमें लीन हूं। पुरुष होकर भी क्यों उन्होंने नारी सुलभता प्रदर्शित की ?और नारी कोई इतनी कमजोर होती तो फि़र बगलामुखी नहीं बनती, महाकाली नहीं बनती। उनका भी हमारे जीवन में एक बड़ा रोल है। प्रत्येक व्यक्ति को बिगाड़ने में और प्रत्येक व्यक्ति को ऊंचा उठाने में एक नारी का ही योगदान होता है। उसका सत्यानाश भी कर सकती है तो नारी कर सकती है, और उसका निर्माण भी कर सकती है तो नारी कर सकती है। महाभारत युद्ध हुआ तो केवल एक द्रौपदी की वजह से हुआ। द्रौपदी ने कहा – तू अंधा है, अंधों के अंधे ही पैदा होते है।
उस एक वाक्य से पूरी महाभारत बना दी और करोड़ो लाखों लोग समाप्त हो गए। एक सीता के कारण पूरी रामायण बन गई, राम-रावण युद्ध हो गया और पूरा रावण कुल समाप्त हो गया। खैर यह एक अप्रसंगवश बात हो गई पर मूल बात यह थी कि जब पुरुषत्व और स्त्रीत्व दोनों का समावेश होगा तभी पूर्णता आ सकेगी। यह तभी होगा जब अणु परिवर्तन होंगे। तभी आप आनन्द और सुख की अनुभूति कर पाएंगे। और अभी आपके जीवन में आनन्द और उल्लास इसलिए नहीं है क्योंकि आप बाहर से सुख प्राप्ति की आशा कर रहे और बाहर से सुख मिल नहीं सकता। राधा ने एक बार कृष्ण से कहा – मैं निर्लज्ज होकर के आपके साथ क्यों जुड़ी हूं ?
कृष्ण ने कहा – राधा पहली बार नहीं जुड़ी हो। इससे पहले चालीस जीवन तुम्हारे मेरे साथ बीत चुके है। तुम चाहो भी तो नहीं टूट सकोगी। यह लोक लज्जा, समाज तो अपने आप में बहुत ओछी चीज है। ये तो चार दिन कुछ कहेंगे, चार दिन प्रशंसा कर लेंगे। समाज क्या कर लेगा? और समाज ने किया क्या ?क्या बदनामी की ?और बदनामी से क्या हो जाता है ?और नाम से फि़र क्या हो जाता है ? समाज कभी आपको ऊंचा नहीं उठने देगा, समाज बंधन को कहते है, समाज मन को घायल करने की अवस्था कहते है। समाज पग पग की रुकावटों को कहते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि आप निर्लज्ज हो जाए। मगर इसका मतलब यह भी नहीं कि आप भयभीत हो जाएं। जो कुछ करें बिल्कुल स्पष्ट व्यक्तित्व के साथ करें। बहादुर बनें तो ताकत के साथ प्रहार करें और यह क्षमता, यह ताकत साधनाओं और दीक्षाओं के माध्यम से ही आ पाएगी।
और जो दीक्षाएं मैं दे रहा हूं यह परम्परा आज की ही नहीं है। यह परम्परा पिछले पच्चीस हजार, पचास हजार वर्षों की हैं आप इसको समझ नहीं पा रहे है और मैं बार-बार कह रहा हूं आप समझ नहीं पा रहे है। इसका यह मतलब नहीं कि आपमें ज्ञान की कमी है। इसका मतलब यह है कि आपका ज्ञान बहुत अधिक ऊंचाई पर उठ गया है जो मेरी छोटी सी बात आपके हृदय में पच नहीं पा रही। क्योंकि आप इतने अधिक होशियार, इतने अधिक चतुर, इतने अधिक चालाक है कि जो मैं कह रहा हूं वह बात आपको समझ नहीं आ रही है। मगर एक क्षण आएगा तब मेरी बात आपके मन में घूमेगी, तब आप एहसास करेंगे कि किसी ने बहुत सही कहा था, हम समझ नहीं पाए उस समय और वह क्षण चला जाएगा। जो जीवन चला गया, जो क्षण चले गए वे वापस नहीं आ सकते। उनकी स्मृतियां आ सकती है, उनकी यादें आ सकती है।
जो कुछ भी मैं आपके सामने ज्ञान स्पष्ट कर रहा हूं उसके पीछे मेरा तो कोई स्वार्थ है ही नहीं। स्वार्थ यह है कि मैं कुछ निर्माण करुं, स्वार्थ यह है कि मैं कुछ मंदिर बनाऊं, कुछ देवालय बनाऊं, कुछ ऐसा बनाऊं कि कहते है मूर्तिया बोलती नहीं, पहले बोलती थीं तो मैं सिद्ध करके दिखा दूं कि मूर्तिया बोलती है, ये मंदिर सजीव हैं, सिद्ध है, जाग्रत है, चैतन्य हैं। उन लोगों की सहायता करुं जो दरिद्र है, गरीब है, अशक्त है और किन वजह से हैं ? वे अपने खुद के कर्मों की वजह से हैं। न मैंने आपको गरीब बनाया, न मैंने आपको अमीर बनाया, गरीब बने आप कोई न कोई पूर्व जन्मों के कारणों से। मगर मेरे पास आए है तो मैं वह चैतन्यता दूंगा ही दूंगा कि आपके जीवन में अभाव दूर हो सकें।
आप मुझसे नहीं जुड़े, एक साल नहीं आएं मेरे पास तो आपको एहसास होगा कि आप खोखले से है। आपको लगेगा कि आपके पास कुछ है ही नहीं। आपमें और एक गली में रहने वाले सामान्य मनुष्य में डिफ़रेंस रहेगा ही नहीं। फि़र चेंज क्या होगा आपमें ? आज आप मेरे पास आते हैं तो यह तो एहसास आपमें है कि मेरे पास गुरुजी है, मुझे भी यह तो एहसास है कि आप मेरे शिष्य हैं जिनको मैं दूंगा और वे ग्रहण करेंगे। यह छोटी बात नहीं है। यह अपने आपमें एक उपलब्धि है।
गुरु से कुछ प्राप्त करना या नहीं करना यह बहुत बड़ी घटना नहीं है। मेरा और आपका जुड़ना अपने आप में बहुत बड़ी घटना है। एकाकार हो जाना बहुत बड़ी घटना है। तब मै। आपको वीरोचित बना सकूंगा, पौरुषवान बना सकूंगा, ब्राह्मण बना सकूंगा। आपको परिवर्तित करने से पहले यह आवश्यक है कि पूर्णता के साथ अणुओं को परिवर्तित कर दूं। अंदर से, जड़ से ही जब परिवर्तित हो जाएंगे तो एक जीवन में क्रांति हो पाएगी। किसी पेड़ पर एक गुलाब की कलम लगाने से गुलाब नहीं पैदा होगा, अंदर से बीजारोपण होगा तब ही ऐसा कर दिया जाएगा तो गुलाब ही विकसित हो तब आप समाज में अलग से दिखाई देंगे। तब आंख में चिंगारी होगी तब आपमें स्नेह होगा, प्यार होगा, एक पागलपन होगा, एक दृढ़ता होगी। एक ऐसा जुनून होगा जो आपके पास ही होगा। तब आप मेरे बिना नहीं रह पाएंगे और जब वह क्षण आए तब आप समझ लीजिए आप मेरे शिष्य है। उससे पहले आप शिष्य नहीं है। उससे पहले आप केवल श्रोता है, जिज्ञासु है, जानना चाहते है। एक जिज्ञासु और शिष्य में हजारों मील का अंतर है। अगर आप गुरु के साथ समीपता नहीं अनुभव करते तो आपमें और मेरे बीच में एक इंच का डिफ़रेंस है।
आप गुरु से एकाकार होना अनुभव कर लें। जब आपकी आंखों में आंसू छलक जाएं, जब आपको एहसास हो जाए कि अन्दर कुछ घटना घटित हो रही है तो समझे आप शिष्य है। अंदर जो कुछ घटित होगा वह अणु में परिवर्तन से होगा। अणु परिवर्तन की यह क्रिया एक ऐसी क्रिया है कि हमारे अंदर जितना भी दैन्य है, दुख है, दरिद्रता है, पाप है वे सब जल जाएं, समाप्त हो जाएं। हमारे अंदर जो अविद्या है, हमारे गले में जो संगीत नहीं है, हमारे पैरों में जो थिरकन नहीं हे, हमारे चेहरे पर जो उल्लास नहीं है और ये जो सब माइनस पाइंट है ये समाप्त हो जाए, ऐसी यह क्रिया है।
मैं आपको बताना चाहता हूं कि निर्मुक्त बनिए, स्वच्छंद बनिए, मस्ती के साथ रहिए। जो क्षण मेरे साथ बीत जाएं वे धरोहर होंगे। न जाने कौन सा क्षण ऐसा हो सकता है। कृष्ण ने कहा – मैं जा रहा हूं, मेरा जितना काम था मैं कर चुका हूं। अब पूरे संसार को सुधारने का ठेका न कृष्ण ने लिया था, न सुधारा, ना सुधरेगा। मुट्ठी भर लोग ही सुधरेंगे और वे मुट्ठी भर लोग ही संसार में परिवर्तन ला सकते हैं। एक चांद ही पूरे आकाश को रोशनी देगा, हजारों तारे भी मिलकर रोशनी नहीं दे पाएंगे। कणाद ने पूर्ण रूप से अणु की थ्योरी बताई थी कि आदमी पूर्ण रूप से परिवर्तित होता हुआ जो चीज बनना चाहे वह बन सकता है और गुरु जो चीज बनाना चाहे वह बना सकता है।
मैं आपको वैसा ही पूर्ण बनाना चाहता हूं। मगर आपको मेरे प्रत्येक शब्द को रचा पचा लेना पड़ेगा। उतारना पड़ेगा। केवल सुनना नहीं है, आप श्रोता नहीं हैं। मैं रामायण की कथा नहीं सुना रहा हूं कि रावण सीता को उठा कर ले गया और राम ने उसे तीर मार दिया। मैं कथाएं नहीं सुनाता। मैं जो कुछ दे रहा हूं बिल्कुल नवीनता के साथ दे रहा हूं, शास्त्रोचित दे रहा हूं, मर्यादानुकूल दे रहा हूं। जो कुछ छिपा हुआ ज्ञान है वह आपको दे रहा हूं जिससे कि यह चीज जीवित रह सके। यह दीक्षा गुरु से लेने के बाद आप खुद अपने आप में एक परिवर्तन अनुभव करेंगे, एहसास करेंगे कि हम अपने अंदर से बहुत कुछ परिवर्तित हो रहे है। जो हमारे पास नहीं था वह अब मैं प्राप्त कर रहा हूं।
मैं जानता हूं कि लोग टूटेंगे। बिखरते, बिखरते जितने बच जाएंगे वे ही वास्तव में शिष्य कहलाने के योग्य होंगे। क्योंकि हंसों की पंक्तियां नहीं होती। बहुत झुण्ड के झुण्ड हंस नहीं होते। दो चार हंस कहीं-कहीं दिखाई देते है। दो चार शेर दिखाई देते है। कई सौ वर्षों में जाकर एक व्यक्तित्व पैदा होता है सिफऱ्, जो बहुत कुछ करके चला जाता है। राम के बाद कृष्ण आए। पूरा युग बीत गया। इस बीच कोई पैदा ही नहीं हुआ। जो पूरे देश को एक नेतृत्व दे सके, वह पैदा नहीं हुआ। नेताओं की बात नहीं कर रहा हूं। नेता एक अलग चीज है। वह तो आज है, कल नहीं है। कल लोक सभा अध्यक्ष थे आज सड़क पर खड़े है।
एक पुरुष, एक युगपुरुष, एक अद्वितीय व्यक्तित्व पांच सौ, छः सौ हजारों वर्षो के बाद पैदा होता है, हर दिन, हर गली में पैदा नहीं हो सकता। उस समय अगर हम उसको नहीं पहचान पाएंगे, उस समय अगर हम उसको आत्मसात नहीं कर पाएंगे तो हम चूक जाएंगे, हम पिछड़ जाएंगे। कितने बुद्ध पैदा हुए, कितने ईसामसीह पैदा हुए, कितने मोहम्मद साहब पैदा हुए, कितने चैतन्य पैदा हुए, कितनी मीराबाई पैदा हुई। एक व्यक्ति ने पूरे संसार को मार्ग दिया और हम उसको नहीं समझ पाए तो हमारे जीवन की न्यूनता रही और न्यूनता यह रही कि हमने कणाद को नहीं समझा, अंदर के अणुओं को परिवर्तित नहीं किया।
इस बात का आप ध्यान रखे कि कोई एक उम्र का व्यक्ति हीं गुरु नहीं होता। आपकी धारणाओं को मैं हूं आप के प्रत्येक शब्द का, कुछ प्रदान करना है वह मेरी ड्यूटी तोड़ रहा हूं। मैं आपमें उतनी शक्ति दे दूं तो आप कुछ भी कर लेंगे, अगर मैं कहूं कि जूझ जाओं तो आप जूझ जाएंगे। तुममें ताकत है, बल है, तुममें एहसास है कि पीछे कोई खड़ा है, इसलिए मन के दास बनने की जरूरत नहीं है। मैं साक्षीभूत प्रत्येक घटना का, जिम्मेवार मैं हूं, जो है, उसमें न्यूनता होगी तो जिम्मेवारी मेरी होगी।
मैं पीछे हटने की क्रिया नहीं करता हूं। मैं जप करके जूझने की क्रिया करता हूं। मैं जिन्दगी भर जूझा हूं। जितना मैं जूझा हूं उतना आप दस हजार जन्म लेकर भी नहीं जूझ सकते। उतना मैं जूझा हूं अपनी जिन्दगी से, अपने आपसे। यह मैं ही जानता हूं कि हिमालय कितना ऊबड़ खाबड़ है, यह मैं ही जानता हूं कि हिंसक पशु कैसे होते हैं, यह मैं ही जानता हूं कि गृहस्थ जीवन को संभालना कितना कठिन है, यह मैं ही जानता हूं कि दुष्ट व्यक्तियों के बीच जिंदा रहना, सांस लेना कितना कठिन होता है। शिव ने अगर जहर पिया होगा तो बहुत कठिनाई के साथ पिया होगा। मगर उन्होंने चेहरे पर ऊंह नहीं आने दी। और ऐसा कह कर मैं कोई एहसान भी नहीं थोप रहा हूं और जहर मिल जाए कोई बात नहीं। एहसास तो हो जाए कि कितना पी सकता हूं। शायद इसमें दस हजार गुना मैं पी सकता हूं। इतनी क्षमता है मुझमें। जूझंगा और पूरी क्षमता के साथ जूझूंगा।
यह तो एक गुरु शिष्य, पिता-पुत्र के बीच का संवाद है। जहां पुत्र होगा तो पिता कहेगा और डांटेगा भी, पुचकारेगा, सीने से लगाएगा और थप्पड़ भी मारेगा। मगर उसे अपने समान बनाने की क्रिया की कोशिश में लगा रहेगा। इसलिए नहीं कि वह स्वार्थी बने, वह धोखेबाज बने। इसलिए कि वह गुरु के अंशीभूत बने। शिष्य को अपने आप में पुत्र कहा गया है, तनय कहा गया है। उसके शरीर के सदृश्य कहा गया है। आप पुत्र हैं मेरे, आप शिष्य नहीं है। मेरे शरीर के किसी न किसी भाग के हिस्से है आप। आपसे मिलकर के एक चीज बनी है जिसे नारायण दत्त श्रीमाली कहते हैं। ब्रह्मरंध्र जो उसके माध्यम से हम पूरे शरीर के अणुओं को परिवर्तित कर सकते है। पूरे शरीर के अगर अणु एकत्रिभूत है तो आज्ञा चक्र में है या नाभि में है। दो जगह ही है। एक बच्चा अपनी मां से पूरी तरह से नाभि से जुड़ा होता है और किसी जगह से जुड़ा नहीं होता वो और जब जन्म लेता है तो नाभी के साथ नाल आती है। उस नाल से ही वह सारा रस ग्रहण करता हुआ जिंदा रहता है। सांस भी उससे ही लेता है। और बड़े होने के बाद आज्ञा चक्र जो है दोनो भौहों के बीच में पूरे शरीर के अणु वहां पूंजीभूत होते हैं इसलिए औरते वहां बिंदी लगाती हैं कि वह भाग ठंडा रहे। इसलिए ब्राह्मण यहां चंदन लगाते है कि यह भाग ठण्डा बना रहे। गर्मी में एकदम विस्फ़ोटक न हो जाए। बिंदी लगाने के पीछे या चंदन लगाने के पीछे तर्क यह है। कोई सुंदरता की बात नहीं है।
और अगर कुछ गुरु से ज्ञान लें या दीक्षा लें इसी आज्ञा चक्र के माध्यम से ले सकते है और कहीं से ले भी नहीं सकते। इसी के माध्यम से पूर्ण अणु परिवर्तन भी संभव है। मैं आपको आशीर्वाद देता हूं और कामना करता हूं कि एक सक्षम गुरु आपको मिले, मिले और वह पूर्ण अणु परिवर्तन करता हुआ आपको उस पूर्णता पर ले जाकर खड़ा कर दे जहां जीवन का आनन्द है, एक मस्ती है, एक उल्लास है। मैं एक बार फि़र आपको हृदय से आशीर्वाद देता हूं।
– परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद
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