





गुरु पूर्णिमा न तो कोई अवतरण दिवस है और न ही निर्वाण दिवस और न ही कोई अन्य दीक्षा दिवस । गुरु पूर्णिमा तो एक ऐसा शाश्वत दिवस है जिस दिन शिष्य अपने आराध्य गुरुदेव के प्रति क़ृतज्ञ धन्य धन्य होते हुए उनके चरणों में पहुंचता है। वर्ष भर में उनके जीवन में जो भी दुःख़ संताप आये हैं या जो भी आह्लाद और प्रसन्नता के क्षण आये हैं उन सब को उनके श्रीचरणों में प्रकट करने के लिये पहुंच जाता है और केवल एक ही निवेदन होता है, ‘‘गोविन्दं त्वदियं वस्तु तुभ्यं समर्पयामि’’ हे मेरे आराध्य गुरुदेव, मैं जैसा भी हूं और जो भी हूं और संसार में मुझे जो भी प्राप्त हो रहा है, वह आपकी क़ृपा से ही प्राप्त हो रहा है, उसे आपको ही समर्पित करता हूं।
यदि देखा जाये तो यह पर्व सही अर्थों में गुरु का पर्व है ही नहीं, यह तो शिष्य पर्व है, इसे शिष्य पूर्णिमा कहा जाता है, क्योंकि यह शिष्य के जीवन का एक अन्तरंग और महत्वपूर्ण क्षण है। यह आपके लिये उत्सव का आयोजन है, यह मन की प्रसन्नता को व्यक्त करने का त्यौहार है, यह ऐसा पर्व है जो जीवन की प्रफ़ुल्लता, मधुरता और समर्पण के पथ पर गुरु के चरण चिह्न अंकित कर अपने आपको सौभाग्यशाली मानता है।
यह एक ऐसा पर्व है जिस दिन गुरु और शिष्य अपनी आत्मा से बंध के एक दूसरे से जुड़ जाते हैं, यह एक ऐसा पर्व है जब शिष्य अपना सब कुछ न्यौछावर कर गुरु के चरणों में सपरिवार पहुंच जाता है, और इस दिन गुरु भी अपना सब कुछ लुटा देते हैं शिष्य पर, जीवन का सार भूत प्रदान कर देते हैं शिष्य को और ज्ञान में, साधनाओं में तथा पूर्णता की द़ृष्टि से गुरु अपने शिष्य को अपने सीने से लगाकर वह सब कुछ प्रदान कर देते हैं, जो शिष्य के लिये आवश्यक होता है।
इस दिन शिष्य सशरीर, सपरिवार गुरु चरणों में पहुंचकर अपने कर्तव्य की पूर्णता को प्रदर्शित करता है और गुरु को बता देता है कि मैंने तो अपना कर्तव्य का पालन कर दिया, अब आप ही अपनी मर्यादा का पालन करें। मैं तो जीवन की पूर्णता का पात्र लिए आपके सामने उपस्थित हूं, अब आप भी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए वह सब कुछ मुझे प्रदान करें जो मेरे जीवन में आवश्यक है।
नर्मदा संगमं यावद् यावच्चमरकण्टकम्।
तत्रान्तरे महाराज तीर्थकोट योदशस्थिताः।।
सर्वतीर्थाभिषेकं च यः पश्येतसागरेश्र्वरम्।
तं द़ृष्टवा सर्वतीर्थानि द़ृष्टानि स्युर्न संश्यः।।
1- अमरकण्टक की व्याख्या सनातन धर्म के सभी पूज्य ग्रन्थों जैसे पुराण, महाभारत, रामायण आदि में मिलती है।
2- इसे तीर्थराज भी कहा जाता है।
3- इस स्थान पर देवताओं, दैत्यों और ऋषि-मुनियों ने साधना तपस्या की है और अत्यधिक शक्ति सम्पन्न बने हैं।
4- पाण्डवों ने अपना अज्ञातवास अमरकण्टक के जंगलों में ही बिताया था और यहां पर कृष्ण द्वारा बताई गई उच्चकोटि की साधनाएं सम्पन्न की थीं।
5- यदि कोई स्त्री फ़ल और फ़ूल से यहां पूजन करे तो वह अखण्ड सौभाग्य को प्राप्त करती है।
6- इस स्थान पर कई तीर्थ स्थल एवं शक्तिपीठ हैं और आज भी वहां पर साधनारत साधक देखने को मिल जाते हैं।
7- अमरकण्टक प्राक़ृतिक सौन्दर्य का एक साक्षात स्वरूप है । यहां पर कई दुर्लभ औषिद्धयां उपलब्ध हैं जिनका उल्लेख आयुर्वेद के ग्रंथों में है।
8- अमरकण्टक से ही नर्मदा का उद्गम होता है। नर्मदा को शिव की पुत्री कहा जाता है और उनका अवतरण भगवान शिव की आत्मा से हुआ था। नर्मदा को कलियुग की पवित्रतम नदी का श्रेय प्राप्त है।
9- नर्मदा की उच्चता और पवित्रता को इस कहावत से भी आंका जा सकता है कि जो पुण्य साधक को यमुना के तट पर सात दिनों की पूजा अर्चना से मिलते हैं, वही पुण्य सरस्वती के तट पर तीन दिनों में प्राप्त हो जाता है, उतना ही पुण्य गंगा में स्नान कर के प्राप्त होता है और इतना पुण्य मात्र नर्मदा के दर्शन से प्राप्त हो जाते हैं । कहते हैं कि जब गंगा खुद लोगों के पापों को धोते धोते मैली हो जाती है तब वह भी पवित्र होने के लिये नर्मदा में स्नान करती है।
10- इसी नर्मदा नदी के तट पर भगवतपाद शंकराचार्य ने अपने गुरू गोविंदपादाचार्य जी से दीक्षा ग्रहण की थी और उन्होंने पातालेश्वर महादेव को स्थापित किया था।
11- यह आप का सौभाग्य है कि गुरुदेव स्वयं आपको दीक्षा, साधना, ज्ञान देने के लिये उसी पवित्रतम स्थान पर आ रहे हैं।
कलियुग में नर्मदा गंगा के समान ही पवित्र है। श्रद्धालु जन नर्मदा की परिक्रमा करते हैं। नर्मदा-किनारे अनेक तीर्थ स्थल हैं। तपस्वी साधकों को नर्मदा सदाप्रिय रही है। नर्मदातट पर स्थान स्थान पर महापुरुषों के आश्रम हैं। नर्मदा स्नान पापहारी है। पवित्र नदियों में अब एक नर्मदा ही ऐसी नदी है जिनसे कोई नहर नहीं निकलती है और न ही कोई नाला उसमें गिरता है।
श्री नर्मदा जी मेकल पर्वत पर अमरकण्टक नामक कुण्ड से निकली हैं। मेकल पर्वत से निकलने के कारण इनका नाम मेकल-सुता भी है। विन्ध्याचल और सतपुरा पर्वत श्रेणियों के बीच में मेकल पर्वत है। कहा जाता है कि इस पर्वत पर भगवान शंकर, राजा मेकल तथा व्यास, भ़ृगु, कपिल आदि ऋषियों ने तपस्या की थी।
अमरकण्टक के पास निम्न तीर्थस्थल हैं जिनका विशेष महत्व है। मार्कण्डेय आश्रम, शोणष्द्र का उग्दम, भ़ृगु-कमण्डलु, कबीर चबूतरा , ज्वालेश्र्वर, कपिलधारा, दूध धारा, कुकरी मठ आदि।
यह हमारा सौभाग्य है कि इस गुरु पूर्णिमा के अवसर पर ऐसा दिव्यतम शिविर का आयोजन होने जा रहा है जो अपने आपमें अद्वितीय है, अप्रतिम है, अचरजभरा है और जीवन को पूर्णता देने वाला है। ऐसा समय, ऐसा क्षण और ऐसा अवसर आने के बावजूद भी यदि शिष्य उसमें भाग नहीं ले सके, तो उसका दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।
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