





मिरगी क्या है
यह कोई बीमारी नहीं अपितु एक लक्षण है जो दिमाग से सम्बन्धित है। जब दिमाग की कोशिकाओं में विद्युत तरंगें अव्यवस्थित हो जाती है तब यह लक्षण पैदा होता है। इसमें आदमी अचानक बेहोश हो कर गिर जाता है, मुंह से झाग निकलने लगता है, हाथ पांव तन जाते हैं, ऑखें पथरा जाती हैं आदि। ऐसी स्थिति में यदि कोई सड़क पर जा रहा हो तो काफ़ी गम्भीर परिणाम हो सकते हैं। इस स्थिति में यदि थोड़ी सी सावधानी बरती जाये तो आकस्मिक दुर्घटना से बचा जा सकता है।
मिरगी के प्रारम्भिक लक्षण
जब मिरगी का दौरा आने वाला होता है तो अलग-अलग लोगों को अलग-अलग तरह के अनुमान या चिन्ह अनुभव होते हैं। कुछ लोगों को चक्कर आते हैं तो कुछ के आंखों के सामने अन्धकार आ जाता है, कुछ लोगों को सीटी की आवाज सुनाई देने लगती है आदि। यदि ऐसा अनुभव हो तो व्यक्ति को घर वालों के बीच में जा के बैठ जाना चाहिये, यदि वह सड़क पर हो तो सड़क के किनारे बैठ जाना चाहिये और यदि कार चला रहा हो तो कार को एक तरफ़ रोक कर आराम करना चाहिये। यह दौरा या तो कुछ सैकण्डो के लिये होता है या दो चार मिनट के लिये ही, कुछ लोगो को दिन में एक या दो बार ऐसा दौरा पड़ जाता है तो कभी कभी महीने दो महीने तक ऐसा दौरा नही आता। कहने का तात्पर्य यह है कि इस बीमारी का पूर्व अनुमान नही लगाया जा सकता और इसी वजह से आदमी का एक्सीडेन्ट भी हो जाता है। खाना बनाती हुई स्त्रियों को जलने का खतरा हो जाता है और परिवार में परेशानी बढ़ जाती है। यह बीमारी आनुवंशिक भी होती है अर्थात यदि माता या पिता को यह बीमारी होती है तो उसकी सन्तान में भी यह बीमारी आ जाती है।
उपचार
जिन लोगों को यह रोग हो उसे दो तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों को खान पान में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। नित्य खुली हवा में व्यायाम करना चाहिए।
हमेशा प्रसन्न रहना चाहिए और ज्यादातर सन्तरा, सेब या अंगूर का रस लेना चाहिए। इस के अलावा एलोपैथी में इस प्रकार के रोगी को फि़नोबर्ब की गोलियां देते हैं। ये गोलियां केवल दिमाग को शान्त रखती हैं पर इस से रोग समाप्त नही होता। आयुर्वेद में इसके उपचार हैं और इस के माध्यम से कई रोगियों को ठीक भी किया गया है।
इस रोग पर तीन प्रकार से पूर्णतः नियन्त्रण प्राप्त किया जा सकता है। इस रोग से पीडि़त व्यक्ति के फ़ोटो को यदि सामाने रख कर उसे भावना दी जाये और उसके दिमाग को नियन्त्रित किया जाये तो बार-बार भावना देने से रोगी पूर्णतः ठीक हो जाते हैं। इसी विधि में यदि फ़ोटो के बजाये स्वयं रोगी को सामने बिठा कर उस पर प्रयोग किया जाये तो ज्यादा सफ़लता मिलती है।
आयुर्वेदिक उपचार
यह विधान भी अपने आप में पूर्ण प्रमाणिक है और इस विधि से भी कई लोगों का सफ़लता पूर्वक उपचार किया गया है।
पित्तपापड़ा को आक के दूध में भिगो कर छाया में सुखा देना चाहिए। इस प्रकार 21 बार करें और फि़र इस में बराबर मात्र में नागछत्र, तुलसी, तगर, कपूरबेल तथा अंजीर ले कर उन सबको कूट पीस कर पाउडर बना दें और उसकी चने के आकार की गोलियां बना लें और शीशी में भर के रख दें।
नाड़ी निदान
कान 72 नाडि़यों से मिल कर बना है, या यों कहा जाये कि कान में 72 नाडि़यां गतिशील हैं। इसमें नीचे की नाड़ी दिमाग के उस भाग से सम्बन्धित है जिसमें अकारण विद्युत अव्यवस्थित हो जाती हैं। इस नाड़ी को छेद कर इस में ताम्बे की तार पिरो दी जाये तो इसके द्वारा दिमाग की वे नसें व्यवस्थित हो जातीं हैं जिसकी वजह से यह रोग होता है।
वास्तव में यह रोग एक अत्यन्त खतरनाक रोग है परन्तु उपरोक्त उपायों से इस पर पूर्ण नियन्त्रण पाया जा सकता है।
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