





जहाँ जीवन में ज्ञान का प्रश्न आता है, वहाँ सदा सर्वदा से भगवती महासरस्वती की उपासना-साधना करने का विधान रहा है। मात्र ज्ञान प्रदात्री देवी के रूप में ही नहीं वाक्पटुता, वाणी कौशल, सौभाग्य एवं आयुष्य की अधिष्ठात्री देवी के रूप में महासरस्वती की उपासना करने का विधान रहा है।
जिसके जीवन में लक्ष्मी हो, मेधा अर्थात् प्रत्युत्पन्न्नमति हो, वरा अर्थात् वरदायक प्रभाव हो, शिष्टि अर्थात् सर्वरूपेण मंगलमयता हो, शिष्टता हो, गौरी अर्थात् शक्ति तत्व हो, तुष्टि अर्थात् परिपूर्णता का वातावरण हो, प्रभा अर्थात् शुभ्रता का एक आभामंडल हो तथा मति अर्थात् उचित-अनुचित का भेद करने की सामर्थ्य हो, उसका जीवन किस प्रकार से न्यून रह सकता है।
माता- पिता के यश-कीर्ति में वृद्धि सन्तान ही कर सकती है, और बाल्यावस्था वह काल है, जिसमें जीवन की नींव स्थापित होती हैं। सन्तान आपके भविष्य का सोपान है, सन्तान श्रेष्ठ, योग्य, ज्ञानवान हो, विद्या के प्रति लगन हो, उसमें उन सारे गुणों का प्रादुर्भाव हो सकें, जिससे वे योग्य और श्रेष्ठ बन सकें, उनकी प्रतिभा का विकास श्रेष्ठता की ओर अग्रसर हो।
यह सम्भव है, यदि जीवन में सरस्वती अपने अष्ट शक्तियों सहित स्थापित हों। सद्गुरु जब कृपा करते हैं शिष्यों को प्रदान करते हैं दीक्षा के माध्यम से वह शक्ति, जो पूरे शरीर में प्रवाहित कर देती है प्राण चेतना, ज्ञान चेतना। इस वसंत पंचमी पर पूज्य गुरूदेव जी के तरफ से एक अद्वितीय आशीर्वाद है आप सब के लिये, कि आप अपने परिवार के सदस्यों को मेधावी, ज्ञानवान, बुद्धिमान एवं सुसंस्कार युक्त बनायें, उन्हें सरस्वती की मात्र कृपा ही प्राप्त न हो, सरस्वती तत्त्व ही उनमें स्थापित हो जाये।
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