



अब सौंप दिया सब भार तुम्हारे हाथों में साधना तपस्या तंत्र सभी सफल हैं जब करते है अनुष्ठान
जो होली की रात्रि को सम्पन्न करना ही है


……………… जब मैं जैसा चाहूंगा वैसा घटित हो ही, मेरा कोई विरोधी न हो, मेरी कोई अनायास क्षति न करे और मेरे जीवन में दरिद्रता न हो- यही कामना होती है, किसी भी सही साधक की और गृहस्थ से जुड़े हुए तंत्र के ज्ञाता की भी। तांत्रिक तो एक विशेषण है, तांत्रिक कोई वेशभूषा या अभिचारिक कर्मो का ज्ञाता मात्र ही नहीं, और इसके लिए साधक वर्ष भर प्रयासरत रहता ही है, व्याघ्र की तरह अवसर की प्रतीक्षा करता रहता है कि कब उचित क्षण आये और वह झपट्टा मारकर सफलता और सिद्धि प्राप्त कर सकें।
जो साधना की मर्यादा समझते हैं, साधना का वास्तविक अर्थ समझते हैं, जीवन रो-झींक कर काट देना ही पर्याप्त नहीं समझते, वे ही फिर आगे बढ़कर साधना में और उससे भी आगे बढ़कर तांत्रोक्त प्रक्रियाओं में संलग्न होने की क्रिया करते ही हैं।
एक श्रेष्ठ साधक को यह ज्ञात होता है कि तंत्र की कोई भी प्रक्रिया बिना यंत्रों एवं सही उपकरणों के पूर्ण नहीं होती, साधनात्मक शैली से सम्बन्धित रहे, किसी भी पंथ या मत का इतिहास पलट कर देखा जाये तो उसमें एक से एक अनोखी वस्तुएं साधनात्मक उपकरणों के रूप में वर्णित मिलती है।
तंत्र का कोई ग्रंथ पलटकर देख ले, विचित्र प्रकार की वस्तुएं सामग्री के रूप में प्रयुक्त किये जाने का विधान मिलता है….. कहीं शेर का नाखून तो कहीं मोर पंख की भस्म, या ऐसे ही हैरत से और प्रायः जुगुप्सा से भरी वस्तुओं का विधान मिलता है। हमें कृतज्ञ होना चाहिये उन अनेक अज्ञात योगियों और मनस्वी पुरूषों का जिन्होंने ऐसी दुर्लभ सामग्री के स्थान पर यंत्र-उत्कीर्ण करने के रहस्य खोजे, विधान रचे और तंत्र साधनाओं को गृहस्थ व्यक्तियों के लिये भी सुलभ कराया।
उसके पीछे उनका कोई स्वार्थ मूलक चिंतन नहीं था। उनका उद्देश्य, उनका लक्ष्य और उनकी मानसिक क्षुधा तो केवल किसी साधना-विशेष का रहस्य जानने तथा उसका सरलीकृत रूप ढूंढने तक ही सीमित रहती थी, और शेष जो कुछ भी रहा वह स्वतः ही जनकल्याणार्थ उपलब्ध हो गया।
आज के युग में ऐसे यंत्रों की रचना और उनकी विधिवत् प्रतिस्थापना का रहस्य केवल गिने-चुने व्यक्तियों को ही ज्ञात रह गया है, जिनके माध्यम से साधक ने केवल अपनी इच्छित सिद्धि प्राप्त करता है वरन् जाने-अनजाने अपना बहुत कुछ उन यंत्रों पर आरोपित कर देता है। संभवतः श्रेष्ठ साधक भी इस तथ्य से परिचित नहीं होंगे, किन्तु यह एक वास्तविकता है कि जो यंत्र माला आदि व्यक्ति के प्राणों एवं शरीर से सम्पर्कित हो जाती है, वह शनैः-शनैः दूषित भी होती जाती है, क्योंकि वह साधक के ऊपर आने वाली अनेक ज्ञात-अज्ञात विपदाओं के समक्ष ढाल बन कर खड़ी हो, अपनी ऊर्जा का क्षरण तो करती ही है, साथ ही साथ साधक के द्वारा प्रतिदिन भौतिक जगत में किए जाने वाले व्यवहारों, झूठ, छल, व्याभिचार, नेत्र-दोष, मानसिक – दोष का निराकरण भी अपनी तेजस्विता से करती जाती है।
यंत्र एवं मालाएं ताम्र पत्र के टुकड़े या बहुमूल्य पत्थर ही नहीं वरन देवता विशेष का यथार्थ प्रतिरूप ही होते हैं, और इन प्रकारों से उनकी तेजस्विता पर अघात पहुँचता है।
ऐसे यंत्रों और मालाओं का स्थापित किए रहना अथवा धारण करना दोष-युक्त माना गया है। तंत्र शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि व्यक्ति जिस प्रकार अपने अन्य दोषों का परिष्कार करता रहता है, उसी प्रकार इन यंत्रों का भी परिष्कार होना चाहिये। यह दो प्रकार से संभव है, या तो व्यक्ति उसी यंत्र को पुनः शुद्ध कर नवीन ढंग से चैतन्यीकरण और प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न कराये अथवा नवीन यंत्र की स्थापना करे। प्रथम उपाय व्यय साध्य एवं जटिल है।
दोष युक्त यंत्रों के विसर्जन के लिय भी नियम संहिता बनाई गई है क्योंकि वह न केवल दिव्य वस्तु होती है वरन् उनके साथ-साथ व्यक्ति के पाप, दोष तंत्र प्रयोग इत्यादि भी जुड़ जाते है। जिस प्रकार मैल से भरे हुए कपडे़ को जलाकर नष्ट करना ही स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित माना गया है उसी प्रकार इन यंत्रों आदि को भी शुद्ध करने के लिए उनके साथ-साथ अपने विविध कष्टों को भी समाप्त कर देने की उचित प्रक्रिया निर्मित की गई है।
होलिका दहन की रात्रि को होलिका दहन से कुछ पूर्व एक बड़े लाल कपड़े पर अपनी सभी यंत्र एवं मालाओं को एकत्र कर उंगलियों पर एक सौ आठ बार गुरू मंत्र का उच्चारण कर और मानसिक संकल्प कर कि इस प्रयोग के द्वारा मैं अपने सभी इह जन्मकृत दोषों तथा समस्त अनिष्ट से मुक्ति पाने के लिये इन्हें होलिका की पवित्र अग्नि में समर्पित कर मुक्ति प्राप्त करने का आकांक्षी हूं, एक पोटली सी बनाकर चुपचाप होलिका दहन के समीप जाकर उसकी एक परिक्रमा कर भेंट चढ़ा दें तथा बिना पीछे मुड़े एवं देखे सीधे घर आकर स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण कर अपने सामने पूज्य गुरूदेव का चित्र रखे तथा तांबे के पात्र में पांच लघु नारियल रख गुरू मंत्र की पांच माला मंत्र जप पहले से प्राप्त नयी स्फटिक माला से करें एवं इन पांच लघु नारियलों को घर के महत्त्वपूर्ण स्थानों यथा अन्न भंडार, व्यापार स्थल, पूजन स्थान, शयन कक्ष, तथा एक घर के द्वार के समीप पीले कपड़े में बांध कर स्थापित कर दें।
उपरोक्त सभी यंत्रों एवं मालाओं के साथ-साथ साधक का समस्त दूषित भी अग्नि में जलकर नष्ट हो जाता है और एक रिक्तता उत्पन्न हो जाती है, ज्यों कोई बोझ हटने पर व्यक्ति को कुछ समय के लिए अस्वस्थ भी कर सकती है लेकिन उससे चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं तथा उपरोक्त पांच नारियलों की इसी उद्देश्य से पूजा की जाती है जिससे रिक्तता को तुरंत ही शुभ्रता से भरा जा सके। साधक इस अवसर पर निम्न दुर्लभ मंत्र की एक माला मंत्र जप अर्थात् एक सौ आठ बार उच्चारण करे जिसमें सम्पूर्ण होली साधना का रहस्य छुपा है-
उपरोक्त मंत्र जप व्यक्ति को इसी रात्रि में कर लेना चाहिये, जिससे कि वह समस्त सुख, वैभव प्राप्त करने के साथ-साथ तांत्रोक्त प्रयोगों दूषित प्रभावों से वर्ष भर के लिए मुक्त रहे।
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