





इस कारण जो साधक, जो व्यक्ति, चाहे उसे शास्त्रों का ज्ञान हो या न हो, अपनी बुद्धि के अनुसार पूर्ण सेवा भाव से यदि हनुमान साधना भक्ति सम्पन्न करता है, तो उसे ये सभी गुण निश्चय ही प्राप्त होते है। शक्ति बाहर से प्राप्त नहीं की जा सकती और न ही बाजार में मिलती है, शक्ति स्त्रोत तो आपके स्वयं के भीतर छुपा है, उसे जाग्रत करने की आवश्यकता है, जिससे मन के साथ-साथ शरीर भी ऐसा तेजस्वी, बलवान और निरोगी हो जाये कि आत्मविश्वास का अमृत प्याला, शक्ति का सौन्दर्य, ज्ञान की गंगा, धैर्य का सागर, सरस्वती की सिद्धि आप में छलकने लगे-यही तो भक्ति साधना का परम स्वरूप है।
हनुमान मूल रूप से भगवान शंकर के अवतार है, क्योंकि जब भगवान विष्णु द्वारा राम का स्वरूप ग्रहण कर अवतार लिया गया तो शंकर ने हनुमान के रूप में अवतार लिया। इस प्रकार विष्णु एवं रूद्र के प्रभाव से ही विशिष्ट माया क्रियायें पूर्ण हो सकी। मूलतः हनुमान में वीर भाव के साथ-साथ सेवा तथा आदर्श का स्वरूप मुख्य रूप में हैं। ऐसा अपने आप में पूर्णत्व प्राप्त करने के लिये जिस समर्पण भाव का हनुमान स्वरूप में वर्णन मिलता है वहीं समर्पण-स्वरूप साधक द्वारा ग्रहण करने से ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। हनुमान साधना आदि के सम्बन्ध में सम्पूर्ण विवरण सर्वोत्तम रूप में लिखा गया है, पवन-पुत्र होने के कारण हनुमान जी की शक्तियां अत्यन्त विशाल एवं प्रबल मानी जाती हैं और यही फल साधक को अपनी साधना में प्राप्त होता है।
श्री हनुमान प्रतीक है-ब्रह्मचर्य, बल, पराक्रम, वीरता, भक्ति, निडरता, सरलता और विश्वास के, इनके एक-एक गुण के सम्बन्ध में हजारों अध्याय लिखे जा सकते है। निर्बल होकर, अधीन होकर भी क्या जीना? शत्रु अथवा बाधा बड़ी अथवा छोटी नहीं होती, वह तो केवल व्यक्ति अथवा घटना ही तो है और उस पर आत्मविश्वास द्वारा विजय प्राप्त की जा सकती है, जो श्री हनुमान द्वारा विजय प्राप्त की जा सकती है, जो श्री हनुमान का साधक है, उसके भीतर तो आत्म विश्वास की, आत्म शक्ति छलकती रहती है, उसे ज्ञान है कि मेरे साथ प्रबल पराक्रमी देव श्री हनुमान बजरंग बली खडे़ हैं, फिर मुझे काहे की चिन्ता।
यह सिद्ध बात है कि अर्द्धरात्रि के पश्चात् शहर या घने जंगल अथवा शमशान में भी हनुमान मंत्र, हनुमान चालीसा इत्यादि का पाठ करते हुये निकल जाये तो सर्प, बिच्छू, जंगली जानवर तो क्या भूत-प्रेत, पिशाच भी आपके पास नहीं फटक सकते।
यह एक तीव्र प्रयोग है, जिसे रात्रि में सम्पन्न करना चाहिये तथा क्रोध मुद्रा में इस मंत्र का जप किया जाता है। इसमें किसी माला की आवश्यकता नहीं होती। सामने ‘हनुमान यंत्र’ को स्थापित कर उसके ऊपर ‘हनुमान बाहुक’ स्थापित करें। फिर निम्न मंत्र का जप करें। पांच दिन तक नित्य 1000 बार इस का उच्चारण करने से चाहे किसी भी प्रकार की प्रेत बाधा या तंत्र बाधा हो, या दोष हो, उसका शमन हो जाता है।
पांच दिन बाद यंत्र को जल में विसर्जित कर दें तथा हनुमान बाहुक को लाल धागे में पिरोकर गले में जिसके लिये प्रयोग कर रहे हों, उसे धारण करा दें।
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