





विष्णु ने क्रोध में भर कर कहा- ‘तुम्हारा कर्त्ता तो मैं हूँ, तुम मेरी नाभि से उत्पन्न मेरे ही अंश हो। तुम मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।’ इस पर दोनों में युद्ध छिड़ गया, तभी आकाश में गम्भीर वाणी में ‘ऊँ-ऊँ’ की ध्वनि हुई और एक लिंग प्रकट हुआ। विष्णु ने लिंग में भी ऊँ आदि अक्षरों को देखा। इस अग्नि सदृश लिंग को देखकर दोनों ही विचार करने लगे, तभी वहाँ एक परम ऋषि प्रकट हुये, जिन्होंने शिव जी का ज्ञान दिया। इसके बाद मृत्युंजय मंत्र उत्पन्न हुआ। उसके साथ ही पंचाक्षर मंत्र ‘नमः शिवाय’ तथा ‘क्षम्यो’ चिंतामणि मंत्र भी उत्पन्न हुआ। दक्षिणमूर्ति मंत्र भी उत्पन्न हुआ और ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य भी उत्पन्न हुआ। तदुपरांत दोनों ने प्रसन्न चित्त से स्तुति प्रारम्भ की और विष्णु ने भगवान शिव से पूछा- ‘कि हे प्रभु! आप किस प्रकार प्रसन्न होते हैं?’
शिव ने कहा- ‘मैं तुमसे अति प्रसन्न हूं, तथा लिंग रूप में सदा पूज्य हूं। इसकी स्तुति से जैसे तुम्हारा दुःख दूर हुआ है, उसी प्रकार दुःखी प्राणी मुझे लिंग रूप में पूजकर अपना दुःख दूर कर सकता है। मैं अनेक प्रकार के फलों और मनोरथों को देने वाला हूँ।’ इस प्रकार शिव की किसी भी प्रकार से साधना करना पूर्ण फलप्रद होता ही है, और वह भी यदि शिवरात्रि या श्रावण मास में की जाये, तो और भी उत्तम होता है।
श्रावण मास को ‘शिव सिद्धि मास’ भी कहते हैं। भगवान शिव का प्रिय यह श्रावण मास प्रत्येक साधक के लिये महत्त्वपूर्ण माना गया है। जो साधनाओं के क्षेत्र में काल, मुहुर्त और पर्व विशेष के महत्त्व को समझते हैं, उन्हें ज्ञात है, कि श्रावण मास के सोमवारों का तंत्र दृष्टि से कितना अधिक महत्त्व होता है। ये सोमवार भगवान शिव की पूर्ण कृपा प्राप्त करने के दिन होते हैं, जिनमें कोई भी साधक शिव से सम्बन्धित साधना सम्पन्न कर अपेक्षित लाभ प्राप्त कर सकता है।
पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार दक्षप्रजापति ने अपनी 27 कन्याओं का विवाह चन्द्रदेव से कर दिया, परन्तु चन्द्रमा का अनुराग एकमात्र रोहिणी से हुआ, जिससे अन्य 26 उपेक्षित हो गई। इस पर दक्ष ने चन्द्रमा को श्राप दे दिया- ‘जा तू क्षयी हो जा!’ फलतः सुधाकर का सुधावर्षण कार्य रूक गया और चराचर में त्राहि-त्राहि होने लगी।
चन्द्रमा की प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को भगवान महामृत्युंजय की आराधना करने की सलाह दी। छः मास के महामृत्युंजय मंत्र जप व कठोर तप से भगवान महामृत्युंजय प्रकट हुये और चन्द्रमा को अमरत्व प्रदान किया और कहा- ‘कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी, पर साथ ही शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से तुम्हारी एक-एक कला बढ़ जाया करेगी और प्रत्येक पूर्णिमा को तुम पूर्ण चन्द्र हो जाया करोगे।’ इस प्रकार संसार में पुनः सुधाकर की सुधाकिरणों का संचार होने लगा।
भगवान महामृत्युंजय शिव का वह रूप है, जिसकी साधना कर साधक समस्त रोगों, आकस्मिक दुर्घटनाओं, असामयिक मृत्यु आदि के योगों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर सकता है। दुःसाध्य रोगों के निवारण हेतु भी यह प्रयोग सफल होते देखा गया है। इस प्रयोग को करने के लिये ‘महामृत्युंजय यंत्र’, ‘आपदहारिका’ और ‘काली हकीक माला’ की आवश्यकता होती है। श्रावण के प्रथम सोमवार 14 जुलाई को प्रातः शुद्ध होकर साधना में सफलता के लिये गुरूदेव से प्रार्थना करें-
योगीश्वर गुरोस्वामिन् देशिकस्वरत्मनापर, त्राहि त्राहि कृपा सिन्धो, नारायण परात्पर।
त्वमेव माता च पिता…
इसके बाद गणपति का स्मरण करें-
विघ्नराज नमस्तेऽस्तु पार्वती प्रियनन्दन, गृहाणार्चामिमां देव गन्धपुष्पाक्षतैः सह।
ऊँ गं गणपतये नमः।
सामने थाली पर कुंकुंम से ‘ऊँ’ व स्वस्तिक बनायें। ऊँ पर ‘महामृत्युंजय यंत्र’ एवं स्वस्तिक पर ‘आपदहारिका’ को स्थापित करें। दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें-
ऊँ मम आत्मनः श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्ति निमित्तं अमुकस्य(नाम) शरीरे सकल रोग निवृत्तिं पूर्वकं आरोग्य प्राप्ति हेतु महामृत्युंजय मंत्र जपं करिष्ये।
जल को भूमि पर छोड़ें व महामृत्युंजय का ध्यान करें-
महामृत्युंजय महादेव सर्वसौभाग्यदायकं त्राहि मां जगतां नाथ जरा जन्म लयादिभिः।
इसके बाद ‘ऊँ ह्रौं जूं सः प्रसन्न पारिजाताय स्वाहा’ मंत्र बोलते हुये एक-एक कर 108 बिल्व पत्र यंत्र पर चढ़ायें। आरोग्य प्राप्ति की कामना करें, फिर ‘काली हकीक माला’ से निम्न मंत्र की 11 माला जप करें-
अगले दिन सभी सामग्री को शिव मिन्दर में चढ़ायें।
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